एक छोटी सी जीत
जितेन्द्र, गुड़गाँव
मैं जितेन्द्र मैनपुरी (यू.पी.) का रहने वाला हूँ। मुझे गुड़गाँव आये 4 महीने हुए है और मैं गुड़गाँव पहली बार आया हूँ। हम अपने परिवार के तीन लोग साथ में है और तीनों एक ही फैक्ट्ररी ओरियण्ट क्रॉफ्ट, 7 पी सेक्टर-34 हीरो होण्डा चौक गुड़गाँव में चार महीने से काम कर रहे है। वैसे तो इस फैक्ट्री में कोई संगठन या एकता नहीं है। और न ही हो सकती है क्योंकि करीब 6 से 7 ठेकेदार के माध्यम से हेल्पर, कारीगर, प्रेसमैन, एक्पॉटर वगैरह भर्ती होते हैं जिनकी माँगे अलग है, काम अलग है और एक-दूसरे से कोई वास्ता नहीं है। मगर फिर भी एक छोटी सी जीत की खुशी तो होती ही है। ठीक इसी प्रकार बड़े पैमाने पर मज़दूर साथी लड़े तो हम सबकी ज़िन्दगी ही बदल जाये।
घटना कुछ इस प्रकार है कि फरवरी महीने में हेल्पर का ग्रेड 4967 रु. से बढ़कर 5212 रु. हो गया जिसके आधार पर सभी मज़दूरों का पी.एफ. काटा गया लेकिन सभी को भुगतान 4967 रु. के हिसाब से किया गया। हम रजनीश ठेकेदार के पास काम करते हैं जिसके इस फैक्ट्री में (स्त्री व पुरुष) 45 मज़दूर है। 11 मार्च को सभी महिलाओं का 4967 रु. के हिसाब से भुगतान हो गया। तीन-चार पुरुष मज़दूरों का भी हो गया। हम लोगों ने माँग की, कि हमको 5212 रु. के हिसाब से तनख्वा दो। सुपरवाईजर राज ने देने से मनाकर दिया। हम आठ लोगों ने मिलकर सलाह की जिसमें एक ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ संगठन से सम्पर्क में थे। उन्होंने सलाह दी कि महीने भर की तनख्वा पहले ले ली जाये जिससे समस्या ज्यादा न बढ़े और फिर बढ़े हुए ग्रेड की माँग की जाये। ठेकेदार पुराने ग्रेड के हिसाब से तनख्वा देने को तैयार था। हम लोगों ने नये ग्रेड के लिए अपने और भी मज़दूर साथियों से बात की; वो भी साथ आ गये। लड़ते हुए पहले पुराने ग्रेड से हिसाब ले लिया और नये ग्रेड के लिए संघर्ष करते रहे (हल्ला हंगामा करते रहे, कार्मिक विभाग ‘पर्सनल’ में जाते रहे, 10-15 जो भी थे काम छोड़कर अन्दर ही मीटिंग करते रहे) ठेकेदार का सुपरवाईजर भी इन 15-20 में से 1-2 अगुवा मज़दूरों को पहचान गया और उनका हाथ पकड़कर गेट बाहर करने लगा। मगर हम सब में यही बात हुई थी कि एक अकेला कुछ भी नहीं कर पायेगा। जो भी बोलना सबको मिलकर बोलना होगा। सब साथ रहेंगे तभी एक उम्मीद है कि बढ़ा हुआ पैसा मिल जाये। और यही हुआ। जब सुपरवाईजर उनको बाहर करने लगा तो बाकी हम सब भी बोलते हुए साथ चलने लगे। पूरी पहली मंजिल के 100-150 लोग खड़े होकर तमाशा देखने लगे और आखिर सुपरवाईजर सफल न हो पाया और अगले ही दिन 14 तारीख को ठेकेदार रजनीश (जो कि कभी नहीं आता) आया और कम्पनी का एक अधिकारी भी आया और सभी स्त्री व पुरुष मज़दूरों को केबिन में बुलाया गया। अभी तक जो पाँच-छह लोग बचे थे उनको बढ़े हुए ग्रेड 5212 रु. से हिसाब मिला और बाकी जिनका तीन सौ, पाँच सौ या हज़ार जो भी बनता, वो अगले महीने देने का वायदा किया।
मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2013













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