लेनिन के दो उद्धरण
“आम तौर से पूँजीवाद और ख़ास तौर से साम्राज्यवाद जनवाद को भ्रम बना देता है, हालाँकि पूँजीवाद उसके साथ ही जन साधारण में जनवादी आकांक्षाएँ पैदा करता है, जनवादी संस्थाओं की सृष्टि करता है, जनवाद को अस्वीकृत करने वाले साम्राज्यवाद तथा जनवाद की आकांक्षा करने वाले जन साधारण के बीच विरोध को संगीन बनाता है। पूँजीवाद और साम्राज्यवाद का तख़्ता अत्यन्त “आदर्श” जनवादी परिवर्तनों द्वारा भी नहीं, बल्कि केवल आर्थिक क्रान्ति द्वारा उलटा जा सकता है। लेकिन जो सर्वहारा वर्ग जनवाद के संघर्ष में शिक्षित नहीं है, वह आर्थिक क्रान्ति सम्पन्न करने में असमर्थ है।….”
“…जनवाद की समस्या का मार्क्सवादी हल यह है कि अपना वर्ग संघर्ष चलाने वाला सर्वहारा वर्ग बुर्जुआ वर्ग का तख़्ता उलट देने की तैयारी करने और अपनी विजय सुनिश्चित करने के लिए बुर्जुआ वर्ग के खिलाफ़ सभी जनवादी संस्थाओं और आकांक्षाओं का इस्तेमाल करे। ऐसा इस्तेमाल कुछ आसान काम नहीं है। “अर्थवादियों”, तोलस्तोयपंथियों इत्यादि को यह बात अकसर उसी तरह “बुर्जुआ” और अवसरवादी विचारों के लिए अक्षम्य रियायत प्रतीत होती है जिस तरह “वित्तीय पूँजी के युग में” राष्ट्रीय आत्मनिर्णय की वक़ालत प. कीयेव्स्की को बुर्जुआ विचारों के लिए अक्षम्य रियायत प्रतीत होती है। मार्क्सवाद हमें सिखाता है कि मौजूदा, पूँजीवादी समाज की बुर्जुआ वर्ग द्वारा सृजित और विकृत की जाने वाली जनवादी संस्थाओं के इस्तेमाल को तिलांजलि देकर “अवसरवाद से लड़ने” का अर्थ है अवसरवाद के सामने पूर्णतः घुटने टेक देना!”
(‘प. कीयेव्स्की (यू.प्याताकोव) को जवाब’, ‘मज़दूर आन्दोलन में जड़सूत्रवाद और संकीर्णतावाद का विरोध’ संकलन)
मज़दूर बिगुल, अक्टूबर 2014














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