नोएडा के मज़दूर आन्दोलन और गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों के बारे में उत्तर प्रदेश पुलिस की विचित्र ‘सत्य कथाएँ’ और वास्तविक सच्चाई
वृषाली
देश में शायद ही कोई ऐसा हो जो यह न जानता हो कि नोएडा के मज़दूर आन्दोलन के दौरान सैंकड़ों मज़दूरों और 7 सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और छात्र कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। इन पर शुरू में उत्तर प्रदेश पुलिस और गोदी मीडिया ने “पाकिस्तानी एजेण्ट” होने का आरोप लगा दिया! इस पर जनता के बड़े हिस्से की हँसी छूट गयी। इसके बाद इनको “नक्सली” बताने का प्रयास भी किया गया। इस पर भी जनता अपनी हँसी मुश्किल से ही रोक पायी, पर कुछ लोग फिर फक से हँस दिये! लेकिन ज्यादा बड़ा चुटकुला सुनने का मन हो तो आप उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अब तक गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं की ज़मानत का विरोध करने वाले लिखित आवेदन और रिमाण्ड दस्तावेज़ देख सकते हैं। हम आपको विस्तार से उत्तर प्रदेश पुलिस के ये चुटकुले सुनाते हैं। ये चुटकुले उत्तर प्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों और उनके तहत काम करने वाले पुलिसकर्मियों की मानसिक स्थिति और क्षमताओं के बारे में भी काफ़ी-कुछ बताते हैं। आइये, अब तक उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अदालत में पेश कुछ दस्तावेज़ों की पड़ताल करें। पुलिस की भाषा पढ़कर हँसी आ सकती है क्योंकि एक दसवीं पास लड़का भी इससे बेहतर भाषा लिख सकता है।
दिनांक 27 अप्रैल 2026 को न्यायालय अपर सिविल जज एसीजेएम 03, गौतमबुद्धनगर द्वारा पारित रिमाण्ड ऑर्डर में पुलिस द्वारा प्रस्तुत पक्ष में यह कहा गया : “हिमांशु ठाकुर उपरोक्त द्वारा सीडी पर्चा संख्या 11 में अपने बयान में यह कहा गया कि ‘नोएडा में मजदूरों के आन्दोलन की जानकारी होने पर पेटिका के माध्यम से मैंने चन्दा भी लिया था तथा मैंने आन्दोलन में मौजूद मजदूरों/श्रमिकों को मैं दिनांक 11-4-2026 को तथा दिनांक 13-4-2026 को नोएडा में गया था तथा सभी को अपनी माँगें पूरी कराने के लिए हिंसात्मक कार्य करने के लिए उकसाया था। नोएडा में जो हिंसात्मक घटना हुई थी उसमें मैं शामिल था जो पुराने समाचार–पत्र मेरे कमरे से मिले है वह समाचार–पत्र में जो भी आन्दोलन होता है उसे मैं मौजूद लोगों को बाँट देता है जिससे लोगो के अन्दर जोश आता है। जो बैनर मुड़ासे मिले है वह मैंने स्वयं बनाए है तथा जो पम्पलेट मिले है वह भी मैंने दिनांक 11 एवं 13 अप्रैल को मजदूरों के आन्दोलन में बाँटे थे। हिमांश उपरोक्त के कमरे से बरामद सामग्री तथा की गयी पूछताछ के दौरान दिनांक 11-4-2026 एवं दिनांक 13-4-2026 को हुई मजदूरों के आन्दोलन कि हिंसक घटना में शामिल होना स्वीकार किया गया है और पूछताछ करने पर कुछ नहीं बताया और यह कहकर चुप हो गया।…”
अब इस दस्तावेज़ का विकूटीकरण करना पहला कार्य है क्योंकि भाषा समझ से परे है! लेकिन पर्याप्त विकूटीकरण के बाद पाठक समझ सकते हैं कि हिमांशु ठाकुर को किस प्रकार पुलिस झूठे आरोपों में फँसाने के लिए एक मनगढ़न्त कहानी बना रही है। पहली बात यह है कि हिमांशु ठाकुर ने अपने वक़ीलों को जेल में मुलाकात पर साफ़ बताया कि उसने कोई इक़बालिया बयान दिया ही नहीं है। इसके अलावा, जो बातें उपरोक्त दस्तावेज़ में लिखी हैं उसमें से कई कार्रवाइयों में (अगर वह अभियुक्त ने वाक़ई की हैं!) कुछ भी ग़ैर-क़ानूनी या असंवैधानिक नहीं है। पर्चा बाँटना, अख़बार बाँटना या संघर्ष के लिए सहयोग एकत्र करना हर जन संघर्ष में सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा की जाने वाली आम क़ानूनी कार्रवाइयाँ हैं। जहाँ तक 11 अप्रैल का प्रश्न है, तो उस दिन कोई हिंसात्मक घटना घटी ही नहीं थी। और जहाँ तक 13 अप्रैल का प्रश्न है, तो उस दिन मदरसन कम्पनी के बाहर हिंसात्मक घटना घटी थी लेकिन पुलिस ने इस बात का कोई प्रमाण पेश नहीं किया है कि हिमांशु ठाकुर वहाँ मौजूद था, न तो कोई कॉल डिटेल रिकॉर्ड पेश किये गये हैं और न ही कोई मोबाइल लोकेशन पेश किये गये हैं। इसके अलावा हिंसा की वारदात की जगह का कोई ऐसा वीडियो या तस्वीरें भी पेश नहीं की गयी है जिनमें हिमांशु ठाकुर मौजूद हो और हिंसा कर रहा हो या हिंसा के लिए लोगों को उकसा रहा हो। वास्तव में, 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के समक्ष हुई हिंसा की शुरुआत का अगर कोई सीसीटीवी फुटेज पुलिस पेश करे, तो सच्चाई साफ़ हो जायेगी। सच्चाई यह है कि 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के बाहर उन सात सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों में से कोई भी मौजूद नहीं था, जिन पर पुलिस हिंसा भड़काने का आरोप लगा रही है। हाँ, उत्तर प्रदेश पुलिस भारी संख्या में वहाँ ज़रूर मौजूद थी! कई चश्मदीद मज़दूरों ने कैमरे पर बताया है कि 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी में हिंसा की शुरुआत की वजह पुलिस की कार्रवाई थी क्योंकि पुलिस कम्पनी से नाइट शिफ़्ट पूरी करके निकल रहे मज़दूरों को कम्पनी के भीतर रहने के लिए बाध्य कर रही थी और कह रही थी कि वे लोग बाहर नहीं जा सकते क्योंकि वे बाहर जाकर प्रदर्शन करेंगे। जब मज़दूरों ने इस बात को मानने से इंकार किया तो पुलिस ने महिला मज़दूरों पर लाठी-चार्ज शुरू कर दिया जिसके बाद हिंसा भड़की। इन सबूतों की पुलिस कोई छानबीन नहीं कर रही है। क्यों?
इसी रिमाण्ड ऑर्डर के कुछ अन्य हिस्सों पर विचार करते हैं : “तथा अभियुक्त सत्यम वर्मा उपरोक्त द्वारा सीडी पर्चा संख्या 11 में अपने बयान में यह कहा गया है कि ‘…8 अप्रैल 2026 से नोएडा में शुरू हुए मजदूर आन्दोलन में आदित्य आनन्द द्वारा बनाये टेलीग्राम पर बिगुल मीडिया यपू पर ही सारी यात हुई थी। नोएडा मजदूर आन्दोलन पर अपने संगठन की पकड बनाने के लिए कुछ लोगो को नामित कर नोएडा भेजा गया था। जहाँ पर रुपेश राय व आदित्य आनन्द द्वारा अपने भडकाऊ भाषणों से मौजूद भीड को आन्दोलन उग्र रूप से चलाने चलाने हेतु उकसाया गया था। जिसमे रूपेश राय के कुछ स्थानीय साथी भी सम्मिलित थे। जिन्होने रूपेश राय के गिरफ्तार हे के वाद प्रशासन पर दबाव बनाने हेतु भीड इकट्ठा कर थाने पर पहुंचने व आंदोलन उप करने हेतु उकसाया था। जिसके फलस्वल्य 13 अप्रैल में आंदोलनकारी मजदूरो द्वारा नोएडा में हिंसक रूप से तोड–फोड व आगजनी की गयी थी और मेरे द्वारा भी कुछ मैसेज व खबरो की ड्राफ्टिंग कर उन्हे भडकाऊ रूप से प्रचारित किया गया था। यह कार्य हम लोग योजनावद्ध तरीके से पड़यंत्र बनाकर कर रहे थे। हमारा उद्देश्य नोएडा में औद्योगिक गतिविधियों को ठप करना था आदित्य आनन्द दिनाक 13-4-2026 को नोएडा में हुये हिंसक प्रदर्शन के दौरान फेज 2 नोएडा में मौजूद था एवं घटना के बाद यहां से चला गया था और पूछने पर कुछ नहीं बताया और यह कहकर चुप हो गया…”
यहाँ भी हास्यास्पद भाषा का विकूटीकरण स्वयं करें। हम केवल इन दावों की पड़ताल करेंगे। पुलिसिया दावे के अनुसार 13 अप्रैल को सत्यम वर्मा नोएडा में हिंसक घटना के बाद मैसेज व ख़बरों की ड्राफ्टिंग करके प्रचारित कर रहे थे। लेकिन 13 अप्रैल को तो सत्यम वर्मा पूरे दिन लखनऊ में हसनगंज थाना में नोएडा व लखनऊ पुलिस की हिरासत में थे! उनका फ़ोन पुलिस ज़ब्त कर चुकी थी, हालाँकि पुलिस के पास ऐसा करने के लिए कोई क़ानूनी नोटिस या पूर्वसूचना या वारण्ट नहीं था! ऐसे में, अगर सत्यम वर्मा के फ़ोन से कोई मैसेज या ख़बर गयी जो भड़काऊ थी, तो वह तो उत्तर प्रदेश पुलिस ने ही की होगी, क्योंकि सत्यम वर्मा को उनका फ़ोन 13 अप्रैल की रात दिया गया जब एक अन्य नागरिक की मौजूदगी में उन्हें रिहा करके सुपुर्दगी दस्तावेज़ पर उनके हस्ताक्षर करवाये गये! 13 अप्रैल को सत्यम वर्मा मदरसन कम्पनी के बाहर भी नहीं हो सकते थे, क्योंकि वे हसनगंज थाना, लखनऊ में पुलिस की हिरासत में अन्य दो साथियों के साथ मौजूद थे! सच तो यह है कि सत्यम वर्मा पिछले 12 वर्षों में कभी नोएडा गये ही नहीं हैं! अगर पुलिस की बात सच है तो सत्यम वर्मा के पास ज़रूर कोई जादुई या दैवीय शक्ति है जिसके ज़रिये वे एक साथ दो स्थानों पर मौजूद हो सकते हैं! इसके अलावा, सत्यम वर्मा ने भी अपने क़ानूनी प्रतिनिधि को जेल में मुलाक़ात के दौरान बताया है कि उन्होंने ऐसा कोई बयान पुलिस को नहीं दिया है। हिमांशु ठाकुर, आदित्य आनन्द और सत्यम वर्मा, किसी ने भी ऐसा कोई इक़बालिया बयान पुलिस को नहीं दिया है और पुलिस के इन दावों को रद्द करने के लिए उन्होंने अदालत में इन झूठे इक़बालिया बयानों को रद्द करने का आवेदन भी मई के पहले सप्ताह में दे दिया है।
इसी रिमाण्ड ऑर्डर में आगे लिखा है : “तथा अभियुक्त आदित्य आनन्द उपरोक्त द्वारा सीडी पर्चा संख्या 11 में अपने बयान में कहा गया है कि…हमने नोएडा में मजदूरों की आवाज प्रदर्शन भी हमारे ही बनाई गई योजना पर हये थे मेरे साथी रूपेश राय, हिमांश ठाकूर, सत्यम बनकर हिंसक प्रदर्शन दिनाक 10/11/12-04-2026 को किया था। इसके बाद भी हये हिसक वर्मा, आकृति श्रष्टि, मनिया, प्रियमवदा आदि है हम सब समय समय पर मीटिंगे करके वाट्सएप गुपो के माध्यम से श्रमिकों एवं पीडितो की गेटरिंग करते है और कुछ अपने आटमी घुसाकर उनका माइड मैकअप करके आगजनी व तोडफोड करके हिंसक प्रदर्शन करते है हम विभित्र संगठनों जैसे काम करते है तथा अपनी सक्रिय भूमिका निभाते है। इसके बाद चुप हो गया बार–बार पूछने पर भी RWPI दिशा छात्र संगठन नवजात भारत सभा, मजदूर बिगुल दस्ता आदि संगठनों के लिए कुछ नहीं बोला…”
उत्तर प्रदेश पुलिस की हिन्दी भाषा पढ़कर हँसी आ रही हो तो उसे रोकें और हमारी बातों पर ग़ौर करें! पहली बात यह कि आदित्य आनन्द ने अपने क़ानूनी प्रतिनिधियों से जेल में मुलाक़ात के दौरान ऐसा कोई भी बयान देने से साफ़ इंकार किया है। शायद इसीलिए दो बार उन्हें पुलिस कस्टडी में यातना दी गयी। इसके बावजूद उन्होंने कोई इक़बालिया बयान नहीं दिया क्योंकि इक़बाल करने के लिए कोई जुर्म है ही नहीं । मजिस्ट्रेट के समक्ष सुनवाई में पुलिसिया हिरासती हिंसा से चोटिल आदित्य आनन्द ने पुलिस द्वारा अपने ऊपर की गयी हिंसा की शिक़ायत की तो मजिस्ट्रेट ने पुलिस को फटकारा और इस वाक़ये पर डीसीपी जाँच बिठा दी। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट में पुलिस हिरासत में यातना पर डाली गयी याचिका के फलस्वरूप 8 मई को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस व सरकार के आला अधिकारियों को नोटिस भेजी है। हिंसा करने वालों में आई.ओ. हरेन्दर राणा प्रमुख था। अब पुलिस अपनी जाँच स्वयं करेगी, तो उसका क्या नतीजा निकलेगा यह सभी को पता है। इसके अलावा, आदित्य आनन्द भी अपने वक़ील के ज़रिये कोर्ट में इस बात का आवेदन जमा कर चुके हैं कि पुलिस को उन्होंने कोई इक़बालिया बयान नहीं दिया है और पुलिस द्वारा रिमाण्ड ऑर्डर में किये गये दावे सिरे से बेबुनियाद और झूठे हैं।
वैसे तो कोई व्यक्ति उपरोक्त रिमाण्ड ऑर्डर में पुलिस की भाषा पढ़कर ही अन्दाज़ा लगा सकता है कि जल्दी-जल्दी में एक कहानी रच दी गयी है। पुलिस ने इस बात का कोई प्रमाण पेश नहीं किया है कि आदित्य आनन्द 13 अप्रैल को नोएडा में था। न तो कोई कॉल डिटेल रिकॉर्ड, न मोबाइल लोकेशन और न ही कोई वीडियो। इसके अलावा, पुलिस का भड़काऊ भाषण देने का आरोप भी बेबुनियाद है क्योंकि आदित्य आनन्द द्वारा मज़दूरों के बीच दिये गये भाषण का वीडियो ऑनलाइन सार्वजनिक तौर पर मौजूद है। इस वीडियो में आदित्य आनन्द और रूपेश राय मज़दूरों को शपथ दिलवा रहे हैं कि वे अपनी हड़ताल को शान्तिपूर्ण तरीके से चलायेंगे और किसी भी प्रकार की हिंसा न तो करेंगे और न ही करने देंगे। आदित्य आनन्द जिस एक व्हाट्सऐप ग्रुप के सदस्य थे, उसमें भी उन्होंने वीडियो डालकर मज़दूरों से अपील की है कि वे पुलिस के उकसावे में न आएँ जो बार-बार उन्हें हिंसा के लिए भड़का रही है, वे अपनी हड़ताल को पूर्णत: शान्तिपूर्ण तरीक़े से चलाएँ। यह वीडियो भी कुछ खोजी रिपोर्टरों द्वारा ऑनलाइन डाला जा चुका है। राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता, एक्सप्रेस ग्रुप, वायर आदि अख़बारों व न्यूज़ पोर्टलों ने भी इस बाबत रिपोर्टिंग की है और दिखलाया है कि आदित्य आनन्द और रूपेश राय लगातार हड़ताल को शान्तिपूर्ण बनाये रखने के लिए मज़दूरों का आह्वान कर रहे थे और उन्हें आगाह कर रहे थे कि पुलिस जानबूझकर हिंसा फैलाना चाहती है, ताकि बाद में आन्दोलन को ग़ैर-क़ानूनी दिखाकर उसके दमन को सही ठहरा सके। यही वजह है कि कोई भी हिंसा रूपेश व उनके साथियों के गिरफ्तार होने के बाद ही हुई।
अब आइये देखते हैं कि एक प्राथमिकी (एफ.आई.आर. 164/2026) के तहत रूपेश राय को मिली अन्तरिम ज़मानत के दस्तावेज़ में पुलिस की सत्य कथाएँ किस प्रकार एक नये शिखर पर पहुँचती हैं। इसमें लिखा है : “एफ़.आई.आर. के अवलोकन से विदित होता है कि अभियुक्त (रूपेश राय) पर दिनांक 13-04-2026 को समय लगभग सुबह 06:15 से 2 बजे के मध्य वादी कम्पनी के परिसर में काफ़ी संख्या में वादी कम्पनी के वर्करों द्वारा एकत्रित होकर कम्पनी में जबरन गेट तोड़कर प्रवेश किया एवं शीशे तथा परिसर को क्षतिग्रस्त करने का आरोप है।”
तो पुलिस का आरोप है कि रूपेश राय 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के बाहर मौजूद थे, मज़दूरों को भड़का रहे थे, हिंसा करवा रहे थे और कम्पनी में तोड़-फोड़ करवा रहे थे। कहानी सुन्दर है लेकिन इसमें एक दिक़्क़त है। रूपेश राय तो 11 अप्रैल से ही पुलिस की हिरासत और फिर न्यायिक हिरासत में थे और 13 अप्रैल को वह नोएडा के कासना के लुक्सर जेल में बन्द थे! अब एक बार फिर से या तो रूपेश राय प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्रोडिंगर की परिकल्पनात्मक बिल्ली के समान एक साथ दो स्थानों पर हो सकते हैं, या फिर पुलिस शपथ के मातहत होने के बावजूद कोर्ट में झूठ बोल रही है। अगर ऐसा है, तो क्या पुलिस पर सख़्त से सख़्त कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए? लेकिन सूरजपुर कोर्ट ने ऐसा कुछ नहीं किया, बस इस विशिष्ट प्राथमिकी में रूपेश राय को अन्तरिम ज़मानत दे दी!
जब अदालत ने पुलिस से पूछा कि 13 अप्रैल को रूपेश राय भला मदरसन कम्पनी के बाहर कैसे मौजूद हो सकते हैं, तो पुलिस ने फ़ौरन अपनी बात बदल दी और कहा कि रूपेश राय ने हिंसा का षड्यन्त्र किया था। लेकिन तब भी यह सवाल पैदा होता है कि 11 अप्रैल से ही जेल में मौजूद रूपेश राय 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के बाहर होने वाली हिंसा का षड्यन्त्र कैसे रच सकते हैं, जबकि न तो उनके पास कोई फ़ोन था और न ही कोई इलेक्ट्रॉनिक यन्त्र! ज़ाहिर है, यह पुलिसिया झूठ भी उतना ही नंगा था जितना कि यह कि रूपेश राय 13 अप्रैल की सुबह मदरसन कम्पनी के बाहर मौजूद थे। अब आप स्वयं सोचें कि पुलिस इन सामाजिक कार्यकर्ताओं पर जो आरोप लगा रही है, वे सच्चे हैं या झूठे। सच्चे होते तो पुलिस को बार-बार अपनी बात बदलने की कोई ज़रूरत नहीं होती। यही वजह है कि जिला न्यायालय के न्यायाधीश को भी एक एफ़.आई.आर. में रूपेश राय की अन्तरिम ज़मानत स्वीकार करते हुए यह कहना पड़ा : “न्यायालय द्वारा विवेचक से प्रश्न किये जाने पर ऐसा कोई सन्तोषजनक दस्तावेज़ या साक्ष्य प्रथम दृष्टया नहीं दिखाया गया जो यह दर्शाता हो कि अभियुक्त द्वारा कम्पनी में तोड़–फोड़ के सम्बन्ध में कोई षड्यन्त्र रचा गया हो।”
अब जब तमाम मीडिया रिपोर्टों में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान हिंसा भड़काने के सबूत सामने आने लगे हैं, तो अचानक उत्तर प्रदेश प्रशासन ने नोएडा हिंसा की जाँच से भाजपा विधायक राजेश्वर राय की पत्नी और नोएडा कमिश्नर लक्ष्मी सिंह को पीछे कर दिया है, जो अब तक रोज़ मीडिया के सामने आकर “पाकिस्तान कनेक्शन”, “नक्सली साज़िश”, इत्यादि जैसे बेतुके बयान दे रही थीं और गोदी मीडिया उसे नमक-मिर्च लगाकर फैला रहा था। लोगों के दिमाग़ में यह सवाल आने लगा कि साज़िश तो ज़रूर हुई है, लेकिन लगता है कि यह साज़िश मज़दूर आन्दोलन और उसमें सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं और उसके समर्थक बुद्धिजीवियों को बदनाम करने के लिए स्वयं उत्तर प्रदेश पुलिस और उत्तर प्रदेश सरकार ने की है। अब चेहरा बचाने के लिए एक मजिस्ट्रेट जाँच बिठा दी गयी है, जो आम तौर पर यह जाँच करेगी कि नोएडा में मज़दूरों का प्रदर्शन स्वत:स्फूर्त था या उसके पीछे कोई साज़िश थी! लेकिन उसकी निष्पक्षता भी सवालों के दायरे में है क्योंकि जाँच करने का काम स्वयं एक पुलिस अधिकारी ही करेंगे। ऐसे में, उत्तर प्रदेश की सन्देहास्पद भूमिका की क्या कोई निष्पक्ष जाँच हो सकती है? पुलिस भला अपनी जाँच स्वयं कैसे कर सकती है?
इसकी निष्पक्ष जाँच होने की कुछ उम्मीद एक ही सूरत में है: सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम या फिर कोई उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच कमीशन इसकी जाँच करे। सारी पुलिसिया जाँचों का क्या होता है, इसका इतिहास देश की जनता को पता है। नतीजतन, मजिस्ट्रेट जाँच चेहरा बचाने की क़वायद ज्यादा प्रतीत होती है। दूसरी बात यह है कि नोएडा में ही नहीं, बल्कि देश के दर्जनों शहरों व औद्योगिक केन्द्रों में मज़दूर भयंकर शोषण, बेहद कम मज़दूरी, और ख़राब होते ज़िन्दगी और काम के हालात के विरुद्ध सड़कों पर उतर रहे हैं। क्या ये सभी आन्दोलन किसी साज़िश का हिस्सा हैं? ऐसी बात कोई अज्ञानी व्यक्ति ही कर सकता है या फिर कोई ऐसा व्यक्ति जो मौजूदा शोषण के पक्ष में खड़ा हो और शोषण करने वाले मालिक वर्ग और उसकी सरकारों को बचाना चाहता है।
उत्तर प्रदेश में यह सारा पुलिसिया गोरखधंधा खुलेआम हो रहा है, जिसमें, अब तक सामने आये साक्ष्यों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस को मालिकों व प्रबन्धन की शह पर कथित तौर पर हड़ताल को तोड़ने की ज़िम्मेदारी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दी जाती है; लेकिन जब तक हड़ताल शान्तिपूर्ण रहती तब तक उसे तोड़ना मुश्किल था; इसलिए उसके दौरान हिंसा होना अनिवार्य था; लेकिन आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि, आकृति व मनीषा जैसे श्रम अधिकार कार्यकर्ता तमाम उकसावों और भड़कावों के बावजूद आन्दोलन को हिंसक नहीं होने दे रहे थे; नतीजतन, ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस और कम्पनियों के मालिकान-प्रबन्धन के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा वे ही थे; नतीजतन, बिल्कुल ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से उप्र पुलिस के सादी वर्दी में आये लोगों ने, बिना किसी महिला पुलिसकर्मी की मौजूदगी के, सूरज डूबने के बाद 11 अप्रैल शाम सात बजे रूपेश व तीन स्त्री सामाजिक कार्यकर्ताओं सृष्टि, आकृति और मनीषा को नोएडा के बोटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से अगवा कर लिया और अगले दिन तक उनके स्थान के बारे में कोई सूचना गिरफ्तार लोगों के परिजनों, मित्रों या वक़ीलों को देने से इंकार कर दिया; उसके बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48 का खुलेआम उल्लंघन करते हुए इन गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल भेज दिया गया; इसके साथ, उप्र पुलिस के अधिकारी आदित्य आनन्द के बारे में गोदी मीडिया के ज़रिये आपराधिक अफ़वाहें फैलाकर उनके ख़िलाफ़ एक मॉब लिंचिंग जैसा माहौल बनाते हैं, उनपर “पाकिस्तानी लिंक” आदि का हास्यास्पद आरोप लगाते हैं ताकि उन्हें मीडिया ट्रायल द्वारा किसी जाँच या मुक़दमे के पहले ही अपराधी बना दिया जाय।
इस प्रकार, नोएडा के मज़दूर आन्दोलन व हड़ताल को शान्तिपूर्ण व व्यवस्थित और संगठित बनाये रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को पहले जेलों में डाला जाता है और उसके बाद नोएडा में 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के सामने हिंसा भड़काना सम्भव हो पाता है। इसी बीच इस बात के प्रमाण भी सामने आ गये कि मज़दूरों के व्हाट्सऐप ग्रुपों में पुलिस के घुसपैठिये, जिनमें एक सबइंस्पेक्टर बीना और एक स्वयं को पुलिस अधिकारी का ड्राइवर बताने वाला अनिल भी शामिल थे, मज़दूरों को हिंसा के लिए उकसाने वाले सन्देश, स्क्रीनशॉट व ऑडियो शेयर कर रहे थे। यानी, उत्तर प्रदेश पुलिस के लोग ख़ुद मज़दूरों के व्हाट्सऐप ग्रुपों में हिंसा भड़काने की कार्रवाइयों में संलग्न थे। ये सबूत ऑनलाइन सार्वजनिक तौर पर मौजूद हैं और राष्ट्रीय दैनिक ‘जनसत्ता’ और एक्सप्रेस ग्रुप के यूट्यूब चैनल और अन्य कई समाचार मीडिया पर ये सबूत जनता के सामने आ चुके हैं।
अब आप बाकी सिरों को ख़ुद जोड़ लें और आप समझ जाएँगे कि उत्तर प्रदेश पुलिस को अदालत में पेश दस्तावेज़ों में नोएडा मज़दूर आन्दोलन के तहत गिरफ्तार किये गये सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों के बारे में कहानियाँ क्यों बनानी पड़ रही हैं। अब तक सार्वजनिक हुए साक्ष्यों और रपटों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि उसे हिंसा के पूरे प्रकरण में अपनी भूमिका को छिपाने के लिए ऐसी “सत्य कथाएँ” रचनी पड़ रही हैं और शायद यह छिपाने के लिए भी कि हिंसा करवाई ही क्यों गयी।
वैसे भी पूरी दुनिया में 1886 में मई दिवस के आन्दोलन के समय से ही यह पुलिसिया दमन का पुराना ‘टूलकिट’ और ‘टेम्पलेट’ रहा है : मज़दूर आन्दोलनों व हड़तालों को तोड़ने के लिए पहले ख़ुद हिंसा भड़काओ और फिर मज़दूर आन्दोलन का दमन कर उन श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं को ही हिंसा का झूठा आरोप लगाकर जेलों में डाल दो, जो हिंसा करवाने की साज़िशों को नाक़ाम कर रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस बार भी इसी ‘टूलकिट’ का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए इस पूरे मसले की सच्चाई तभी सामने आ सकती है जब एक उच्च स्तरीय न्यायिक समिति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में निष्पक्ष जाँच हो।
मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026














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