बीते 9 नवम्बर 2025 की शाम को हैदराबाद के जीडीमेटला औद्योगिक क्षेत्र में स्थित रामिरेड्डी नगर मज़दूर बस्ती की गलियाँ नारों, और क्रान्तिकारी गीतों से गूँज उठीं। अवसर था बिगुल मज़दूर दस्ता द्वारा महान अक्टूबर क्रान्ति की 108वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का। इस अवसर पर सफ़दर हाशमी के नाटक पर आधारित नाटक — ‘कहानी एक मेहनतकश औरत की’ और ‘मशीन’ — का मंचन भी किया गया। दोनों नाटकों ने मज़दूर वर्ग के जीवन के संघर्ष और उसकी ताक़त को जीवन्त रूप में प्रस्तुत किया। आसपास की फ़ैक्ट्रियों और बस्तियों से लगभग 500 लोग कार्यक्रम को देखने के लिए इकट्ठा हुए, जिनमें स्त्री-पुरुष मज़दूर और बच्चे शामिल थे।
नाटक के दौरान बच्चे उत्साह से तालियाँ बजाते रहे। ‘कहानी एक मेहनतकश औरत की’ में महिला मज़दूर के संघर्षपूर्ण जीवन से स्त्री-पुरुष दर्शक गहराई से जुड़े रहे। वहीं ‘मशीन’ नाटक में दर्शायी गयी फ़ैक्टरी जीवन की कठिनाइयों और संघर्षों में मज़दूरों ने अपने ही जीवन की झलक देखी। दोनों नाटकों में पूँजीपतियों के विरुद्ध मज़दूरों के विद्रोह को वहाँ मौजूद मज़दूरों ने तालियों और उत्साह के साथ सराहा। नाटक के हास्य और व्यंग्य से भरे दृश्यों पर लोग हँसे, तालियाँ बजाईं और कलाकारों की सराहना की। कार्यक्रम के दौरान और नाटकों के बाद ‘अक्टूबर क्रान्ति’ पर पर्चे बाँटे गए और गीत गाए गए। नाट्य प्रस्तुतियों के बाद भी भीड़ उत्साह से देर तक कार्यकर्ताओं से बातचीत करती रही।
सभा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि 108 वर्ष पहले रूस में हुई अक्टूबर क्रान्ति आज भी मज़दूर वर्ग के लिए एक पर्व के समान है। इस क्रान्ति ने यह सिद्ध किया था कि मज़दूर वर्ग न केवल उत्पादन का संचालन कर सकता है, बल्कि शासन-प्रशासन के पूरे ढाँचे पर भी क़ाबिज़ हो सकता है। यद्यपि सोवियत प्रयोग कुछ दशकों तक ही चला, पर रूस के मज़दूरों ने यह सिद्ध किया कि मज़दूर वर्ग पूँजीवादी शोषण से मुक्त होकर समाजवादी समाज का निर्माण कर सकता है।
वक्ताओं ने सोवियत यूनियन की ऐतिहासिक उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सर्वहारा वर्ग ने सोवियत यूनियन के क्रान्तिकारी दौर में बेरोज़गारी का पूरी तरह से ख़ात्मा कर दिया था, अशिक्षा को समाप्त कर दिया था, जनता को बेहतरीन भोजन, घर, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल दिए और उनके जीवन-स्तर को दर्जनों गुना ऊँचा उठा दिया था। उस देश से भुखमरी और कुपोषण पूरी तरह समाप्त हो गया, वेश्यावृत्ति का ख़ात्मा हो गया, औरतों को चूल्हे-चौके की ग़ुलामी से आज़ादी दिलाने की महान शुरुआत हुई थी जिसके लिए विशालकाय सामूहिक रसोईघर और शिशु-पालन गृह बनाए गए, जिनसे घर-गृहस्थी के काम और बच्चों के लालन-पालन का समाजीकरण संभव हुआ। समूची जनता को सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा से मुक्ति दिलाई गई। आज भारत के मज़दूरों के सामने खड़ी चुनौतियों पर बात करते हुए मज़दूरों की एक नई क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण की ज़रूरत पर बल दिया गया। अक्टूबर क्रान्ति की एक अहम सीख यह है कि बिना अपनी पार्टी के मज़दूर वर्ग पूँजीपतियों की सत्ता को चकनाचूर करके सत्ता पर अपना क़ब्ज़ा नहीं कर सकता।
सभा का समापन क्रान्तिकारी गीतों और नारों से हुआ। कई मज़दूरों ने अपने संपर्क दिये और बिगुल मज़दूर दस्ता के कार्यकर्ताओं को अपने घरों में चाय पर बुलाया। इस प्रकार वह शाम रामिरेड्डी नगर के लिए अक्टूबर क्रान्ति की उपलब्धियों को याद करने और आज भारत के मज़दूर वर्ग के सम्मुख उपस्थित चुनौतियों को चिह्नित करने वाली यादगार शाम बन गयी।