पायलट और विमान कर्मचारियों के हितों को ताक पर रखकर मोदी सरकार की देश के पूँजीपतियों के प्रति वफ़ादारी एक बार फिर ज़ाहिर हुई!
इण्डिगो के मुनाफ़े की हवस की मार झेलते इण्डिगो कर्मचारी!!
विगत 1 दिसम्बर से देशभर में कई उड़ानें प्रभावित रही हैं। 3 दिसम्बर से अब तक सैंकड़ों फ़्लाइट रद्द हो चुकी हैं। इसका कारण यह है कि भारतीय एयरलाइन में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले और एशिया के दूसरे सबसे बड़े एयरलाइन इण्डिगो के स्टाफ़ और पायलट के ऊपर लगातार कामों का दबाव बढ़ता जा रहा है, और सम्भवतः वे हड़ताल पर चले गये हैं।
ग़ौरतलब है कि इण्डिगो में काम करने वाले कर्मचारी और पायलट अपने यूनियनों के माध्यम से अपनी जायज़ माँगों को लेकर सरकार और इण्डिगो के ऊपर काफ़ी पहले से दबाव बना रहे थे। राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय उड़ानों की संख्या को मिलाकर प्रतिदिन 2,300 से अधिक उड़ान भरने वाले इण्डिगो के पास न तो पर्याप्त क्रू (कर्मचारी) हैं और न ही पायलट। इसकी वजह से एक-एक पायलट और कर्मचारी पर कामों का अतिरिक्त बोझ आ रहा है। अन्तरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से भी ये कर्मचारी और पायलट अतिरिक्त काम करने को मजबूर हैं। नाइट में शिफ़्ट में एक पायलट को 6 लैण्डिंग करनी पड़ती है। दो उड़ानों के बीच में उन्हें अपर्याप्त आराम मिलता है। इसके साथ ही इस क़िस्म के कई कामों में सीधे-सीधे अन्तरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन किया जा रहा है, जिससे न केवल पायलट और कर्मचारियों के स्वास्थ्य को नुक़सान हो रहा है, बल्कि हर दिन हवाई जहाज से सफ़र करने वाले लाखों लोगों की सुरक्षा से भी समझौता किया जा रहा है।
इस वर्ष अप्रैल के महीने में यूनियनों के दबाव में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इण्डिगो को एफ़डीटीएल (फ़्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन) की नियमावली को लागू करने का आदेश दिया। न्यायालय द्वारा इसे दो फ़ेज़ में इसे लागू करने की बात की गयी। पहले फेज़ 1 जुलाई से लागू होना था और दूसरा फेज़ 1 नवम्बर से। इस नियमावली के तहत पायलटों और कर्मचारियों के कामों के दबाव को कम किया गया।
इसके तहत पायलटों को लगातार सात दिन काम के बाद 48 घण्टों का आराम देना अनिवार्य बना दिया गया। नाइट ड्यूटी के वक़्त एक पायलट द्वारा लैण्डिंग की अधिकतम सीमा छः से घटाकर दो कर दी गयी। लगातार दो नाइट शिफ़्ट को ख़त्म कर दिया गया। उड़ान के एक घण्टे पहले और बाद हर प्रकार के कामों को रोक दिया गया। एक लम्बी उड़ान के बाद 24 पायलट के लिए 24 घण्टे के आराम को अनिवार्य बना दिया गया। इस नियमावली से इण्डिगो को समस्या होनी शुरू हो गयी, क्योंकि उन्हें इस नियमावली का पालन करने के लिए कर्मचारियों और पायलटों की संख्या बढ़ानी होती, जिससे कर्मचारियों की हड्डियों से निचोड़ने वाला उनका मुनाफ़ा कम हो जाता। इसलिए इण्डिगो ने इस आदेश पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस नियमावली के लागू होने का दूसरा फ़ेज़ 1 नवम्बर से शुरू होने वाला था। कामों के दबाव में कोई विचारणीय बदलाव न आने पर क्रू सदस्य और पायलटों ने इसपर ऐतराज़ जताना शुरू किया। इसके नतीजे के तौर पर कई उड़ानें रद्द होनी शुरू हो गयी। 3 दिसम्बर तक आते-आते स्थिति और बिगड़ गयी और सैकड़ों की संख्या में उड़ानें रद्द हो गयी हैं।
अब जब सवाल सरकार की वैधता पर खड़ा होना शुरू हो गया है तो मामले को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए सरकार इण्डिगो से लगातार वार्ता करने में लगी है। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू लोगों को तरह-तरह के आश्वासन देने में लगे हैं। लेकिन सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि इण्डिगो के लिए मुनाफ़े को किसी तरह से बचा लिया जाये। हालिया जानकारी के मुताबिक़ सरकार ने इण्डिगो के प्रति अपनी वफादारी ज़ाहिर करते हुए उनके द्वारा इस नियमावली को लागू करने के लिए 10 फरवरी तक समय को बढ़ा दिया है। साथ ही उपरोक्त नियमावली में उन्हें काफी छूट भी दी गयी है। फेडरेशन ऑफ़ इण्डिया पायलट्स ने यह बयान जारी किया है कि इण्डिगो पिछले लम्बे समय से कर्मचारियों के ऊपर कामों का दबाव बना रहा था और नये कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं की जा रही थी। एफ़डीटीएल को लागू करने के लिए कम्पनी को दो साल का वक़्त दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद न कोई नयी नियुक्ति हुई और न ही कामों की स्थिति सुधारी गयी।
अधिकतम मुनाफ़ा निचोड़ने के लिए इण्डिगो द्वारा विमानों को रद्द किये जाने की वजह से यात्रियों को न केवल परेशानियों का सामना करना पड़ा, बल्कि कई यात्रियों को 12-12 घण्टे तक इन्तज़ार करना पड़ा। उन्हें खाने से लेकर सैनिटरी पैड जैसी बुनियादी चीज़ें भी नहीं प्रदान की गयी। यह बात दीगर है देश में करोड़ों आबादी हर दिन इससे भी बदतर स्थिति में रेल में सफ़र करती है। खाना और सैनिटरी पैड तो दूर, 24-24 घण्टे तक रेल में भेड़-बकरियों की तरह ठूंसकर जाते हैं, जहाँ टॉयलेट इस्तेमाल करना भी उन्हें मयस्सर नहीं होता है।
इस घटना के बाद से देश के पूँजीपतियों के प्रति मोदी सरकार की पक्षधरता एक बार फिर ज़ाहिर हो गयी है। मोदी सरकार इण्डिगो के मुनाफ़े को बचाने के लिए जी जान से लगी हुई है। उन्हें न तो पायलट और क्रू के लोगों के ऊपर कामों के बढ़ते दबाव से कोई मतलब है और न ही लोगों की सुरक्षा से। मोदी सरकार उस काम को बख़ूबी निभा रही है, जिसे करने के लिए इन पूँजीपतियों ने उन्हें करोड़ों का चन्दा दिया था। इस पूरे मसले को लेकर जहाँ एक ओर मोदी सरकार की पक्षधरता साफ़ तौर पर नज़र आ रही है वहीं दूसरी ओर कुछ लोग एकाधिकार पूँजीवाद के बरक्स “मुक्त प्रतिस्पर्धा” के दौर की वकालत कर रहे हैं। लेकिन न तो उस दौर में प्रतिस्पर्धा वास्तव में मुक्त थी और न ही आज इजारेदारी के दौर में प्रतिस्पर्धा पूरी तरह समाप्त हो गयी है। ये दोनों दौर असल में पूँजीवाद के ही अलग-अलग चरण हैं। हमें यह समझना होगा कि अपने आप में यह समस्या पूँजीवाद जनित है, और एकाधिकार पूँजीवाद असल में “मुक्त प्रतिस्पर्धा” की ही तार्किक परिणति है। इसलिए इस समस्या को बिना पूँजीवादी व्यवस्था को जोड़कर न तो समझा जा सकता है और न ही हल किया जा सकता है। मुनाफ़े के लिए कर्मचारियों के ऊपर कामों के बढ़ते दबाव और उनकी इस परिस्थिति का स्थाई हल असल में पूँजीवादी समाज के ख़ात्मे के बिना मुमकिन नहीं है।
लेकिन आज जो इण्डिगो खुलेआम कर रहा है, वह इस व्यवस्था के भीतर पूँजीपति वर्ग द्वारा सुनिश्चित किये जाने वाले कामों के हालातों और बुनियादी सुरक्षा के मानकों का भी उल्लंघन है। हम यह माँग करते हैं कि इण्डिगो कर्मचारियों के ऊपर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए एफ़डीटीएल तत्काल प्रभाव में लागू किया जाये। साथ ही इण्डिगो द्वारा एफ़डीटीएल न लागू करने और इसकी वजह यात्रियों को जो परेशानी हुई है, उसके ख़िलाफ़ इण्डिगो पर सख़्त कार्रवाई की जाये, और तात्कालिक तौर पर उड़ानों की स्थिति को सुधारने के लिए सरकार त्वरित तौर पर हस्तक्षेप करे।













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