तेलंगाना के पटानचेरु में केमिकल फ़ैक्‍ट्री हादसे के बारे में हैदराबाद के जीडीमेटला औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूर रिहायशी बस्ती में पर्चा वितरण अभ‍ियान

तेलंगाना के पटानचेरु में केमिकल फ़ैक्‍ट्री हादसे के बारे में हैदराबाद के जीडीमेटला औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूर रिहायशी बस्ती में पर्चा वितरण अभ‍ियान बिगुल मज़दूर दस्ता ने पिछले कुछ दिनों में हैदराबाद के जीडीमेटला औद्योगिक क्षेत्र की मज़दूर रिहाइश बस्ती सुभाष नगर और रामी रेड्डी नगर में पर्चा वितरण अभ‍ियान चलाये। इन अभ‍ियानों के दौरान बिगुल मज़दूर दस्ता के कार्यकर्ताओं ने सिगाची केमिकल फैक्ट्री में लगी आग के मामले में फ़ैक्ट्री मालिकों की आपराधिक लापरवाही और सरकार की मिलीभगत को उजागर किया, जिसमें 100 से अधिक मज़दूरों की जान चली गई। 30 जून 2025 को सिगाची फार्मा प्लांट में लगी भीषण आग में 100 से ज्‍़यादा मज़दूर ज़िंदा जलकर राख हो गए। इतनी बड़ी संख्या में मज़दूरों की मौत के सही आंकड़ों को पूंजीवादी मीडिया और सरकार ने रिपोर्ट नहीं किया। सिगाची फ़ैक्ट्री बिना अनिवार्य अनुमतियों के संचालित हो रही थी, जिसमें फायर NOC भी शामिल थी। यह तेलंगाना फायर सर्विस एक्ट (1999) और फैक्ट्री एक्ट (1948) की कानूनी ख़ामियों का फायदा उठा रही थी। प्लांट में बुनियादी सुरक्षा इंतज़ाम तक नहीं थे — न अलार्म, न हीट सेंसर, न विस्‍फोट-रोधी दीवारें या संरचनाएँ। एक मृतक मज़दूर के परिवार ने बताया कि मज़दूरों ने बार-बार प्रबंधन से असुरक्षित मशीनों को बदलने की मांग की थी, लेकिन प्रबन्‍धन की ओर से कोई भी कार्रवाई नहीं हुई। पटानचेरु, जीडीमेटला, आईडीए बोलारम और पशमैलारम जैसे औद्योगिक क्षेत्र मौत के कुएँ बन चुके हैं।इन इलाक़ों में हर दो दिन में एक आग की घटना होती है। पिछले 3 वर्षों में 600 और पिछले 8 वर्षों में 1,500 से अधिक हादसे हुए हैं। तेलंगाना ही नहीं, पूरे भारत में सरकारी प्रशासन की मिलीभगत से फ़ैक्ट्रियाँ ऐसे ही जोख़िम भरे हालात में चल रही हैं। इससे सिद्ध होता है कि सरकारें पूँजीपतियों के हितों की ही नुमाइन्‍दगी करती हैं, और मालिकों को मज़दूरों की जान जोख़िम में डालकर मुनाफ़ा कमाने की खुली छूट देती हैं। अभ‍ियान के दौरान कार्यकताओं ने ज़ोर देकर कहा कि मज़दूरों को पूँजीवादी राजनीतिक पार्टियाँ से यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वे उनके लिए लड़ेंगी, क्योंकि ये पार्टियाँ पूँजीपति वर्ग के हितों की सेवा करती हैं। फ़ासीवादी मोदी सरकार की नई श्रम संहिताएँ मज़दूरों की काम करने की स्थितियों को और भी बदतर बना देंगी। इसलिए मज़दूरों के लिए जरूरी है कि वे धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के सभी विभाजनों से ऊपर उठकर अपने हक के लिए एक साझा संघर्ष में एकजुट हों।