मज़दूर बिगुल की ओर से बीते 4 अप्रैल को हैदराबाद के जीडीमेटला औद्योगिक क्षेत्र की मज़दूर बस्ती, रामि रेड्डी नगर में मज़दूर बिगुल अख़बार का प्रचार अभियान चलाया गया।
गैस की किल्लत के चलते इस औद्योगिक क्षेत्र की एक बड़ी प्रवासी मज़दूर आबादी अपने गाँव लौट गई है। जो मज़दूर अभी यहाँ काम कर रहे हैं, वे अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। अभियान के दौरान उन्होंने अपनी समस्याएँ मज़दूर बिगुल के कार्यकर्ताओं के साथ साझा कीं। कई लोग लकड़ी पर खाना बना रहे हैं, तो कुछ बाहर का खाना खाकर गुज़ारा कर रहे हैं। बाहर का खाना, जो पहले 70 रुपए में मिलता था, अब 120–130 रुपए में मिल रहा है। कुछ मज़दूरों ने अपने परिवार को गाँव वापस भेज दिया है और खुद यहाँ अकेले रहकर मज़दूरी कर रहे हैं। अगर गैस का संकट बरकरार रहा तो बचे-खुचे मज़दूरों में से भी ज़्यादातर आने वाले दिनों में घर वापस चले जाएँगे।
बिगुल के कार्यकर्ताओं ने मौजूदा संकट के पीछे साम्राज्यवादी अमेरिका और ज़ायनवादी इज़रायल की मुनाफाख़ोर हवस और भारत की फ़ासीवादी मोदी सरकार की भूमिका का पर्दाफ़ाश किया। मौजूदा समय में मोदी सरकार इस संकट का समाधान करने में फ़िसड्डी साबित हो रही है। साथ तेलंगाना की रेवंत रेड्डी नीत कांग्रेसी राज्य सरकार भी मज़दूरों की समस्याओं को कम करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं कर रही है।
मज़दूर बिगुल के कार्यकर्ताओं ने मोदी सरकार द्वारा लाए गए मज़दूर-विरोधी चार लेबर कोड पर भी अपनी बात रखी।
अधिकांश मज़दूर अच्छी तरह समझ रहे है कि मोदी सरकार अदानी-अम्बानी जैसे पूँजीपतियों की ही चाकरी कर रही है और यह देश के मेहनतकश लोगों को पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर रही है। बातचीत के दौरान मज़दूरों ने मोदी सरकार की बेरुख़ी पर अपना आक्रोश व्यक्त किया। कई मज़दूरों ने बिगुल अख़बार लिया और अपना सम्पर्क भी दिया।
 

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