एक तरफ़ बढ़ती बेरोज़गारी है और दूसरी तरफ़ लाखों शहरी नौजवानों को गुज़ारे के लिए दो-दो जगह काम करना पड़ रहा है
पराग वर्मा, हैदराबाद
हाल ही में मैंने ओला बाइक बुक करके दफ़्तर जाना शुरू किया है । एक तो इसमें खर्च कम होता है और दूसरा जिनकी बाइक से जाते हैं उनसे दोस्ती हो जाती है । एक दिन एक बाइक राइड के दौरान श्रीकांत नामक व्यक्ति से बात हुई। बहुत एहतियात बरतते हुए सही स्पीड से बाइक चलाने की उसकी आदत के विषय से हमारे बीच वार्तालाप शुरू हुआ। उसने बताया कि दिन के समय वो एक प्रायवेट अस्पताल में अटेंडेंट का काम करता है और शाम को ओला बाइक चलाता है। प्रायवेट अस्पताल में उसको संडे तक की छुट्टी नहीं मिल पाती और अक्सर इमरजेंसी कहके उसे संडे को भी काम करने बुलाया जाता है। उसे अस्पताल से दस हज़ार रुपये की तनख़्वाह मिलती है और रोज़ सवेरे 8 बजे से शाम 5 बजे तक लगातार काम रहता है । शाम को 5 बजे से रात के 10 बजे तक श्रीकांत ओला बाइक चलाता है जिससे उसे दिन के 300 रुपए तक मिल जाते हैं । यदि वह महीने में 20 दिन बाइक चलाता है तो उसको 6000 रुपए की आय होती है । यानी श्रीकांत की मासिक आय दोनों काम को मिलाकर लगभग 16000 होती है। श्रीकांत बताता है कि अस्पताल की आय से उसके परिवार का गुज़ारा चल ही नहीं सकता। वह अपने माँ-बाप और पत्नी के साथ रहता है। उसकी पत्नी भी कहीं काम करती है और महीने की 5000 तक की कमाई उसकी हो जाती है । बस इन्हीं 20-21 हज़ार में हैदराबाद जैसे महँगे शहर में चार लोगों का खर्च चलाना पड़ता है। उसने बताया कि उसकी तनख़्वाह बढ़ने का कोई नियमित ढंग नहीं है क्योंकि वह अस्पताल के पेरोल पर नहीं है बल्कि एक मैनपावर सप्लाई के ठेकेदार के माध्यम से वहाँ काम पर लगा है और पैसे बढ़ना तो बहुत दूर की बात है नौकरी बची रहे इसलिए ठेकेदार जो कहता है हम मान लेते हैं। वह बताता है कि रोज़ 14 घंटे का काम और हैदराबाद के हैवी ट्रैफिक में 5 घण्टे बाइक चलाने के बाद जब वह घर पहुँचता है तो बेहोश जैसे सो जाता है और इतना ड्राइव करने के बाद उसकी कमर का बुरा हाल हो जाता है।
श्रीकान्त अकेला नहीं है। मेरे परिचय में एक और लड़का सवेरे कूरियर के पैकेट बाँटता है और शाम को किसी के फ़ूड स्टाल पर खाना देता है। एक और युवा सवेरे उबर ईट्स के लिए काम करता है और शाम को ओला बाईक चलाता है। शहर भर के तमाम युवाओं की यही कहानी है।
यह सब सुनने के बाद मुझे दो वाहियात कथन याद आये जो किसी मध्यवर्गीय मूर्ख ने बोले थे। उसने कहा था कि जब बड़े-बड़े प्रायवेट अस्पताल खुलते हैं तो कितने सारे लोगों को बढ़िया नौकरी मिलती है और उनका जीवन सुधरता है। नौकरियाँ कम नहीं हुई हैं बल्कि ओला-उबर ने नये रोज़गार दिये हैं और युवा पीढ़ी इन बदलावों से उत्साहित है। ऐसी एकतरफ़ा और यथार्थ को नकारती सोच सुनकर बहुत ग़ुस्सा तो आता ही है, बेचैनी भी होती है। एक तरफ़ कुछ लोग दो-दो रोज़गार करके भी सही जीवन नहीं जी पा रहे और दूसरी ओर अनगिनत बेरोज़गार ही हैं । रोज़गार की इस झड़प में तनख़्वाह कम से कम रखकर पूँजीपति मुनाफ़ा पीट रहे हैं और खाया-पिया मध्यवर्ग वाहियात तर्कों द्वारा इस व्यवस्था को बचाने की बहस करता रहता है।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2019














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