सत्यनिकेतन पीजी हादसा: मुनाफ़ाख़ोर व्यवस्था द्वारा युवाओं की हत्या!
पीजी मालिकान के मुनाफ़े की हवस व प्रशासनिक लापरवाही की भेण्ट चढ़ गये दर्जनों आम छात्र!
रऊफ़
रविवार छः सितम्बर दोपहर डेढ़ बजे के क़रीब, दिल्ली विश्वविद्यालय के मुख्य साउथ कैम्पस से लगभग दो किलोमीटर दूर सत्यनिकेतन इलाक़े में ‘हॉस्टल डेज़’ नामक एक पाँच मंज़िला इमारत धराशायी हो गयी। चूँकि यह छुट्टी का दिन था ऐसे में हादसे के वक़्त लगभग 4 दर्जन लोगों की इमारत के अन्दर मौजूदगी की आशंका जतायी जा रही थी। बहरहाल, इस दर्दनाक घटना के 10 मिनट के अन्दर ही नज़दीकी पुलिस थाने में इत्तला दे दी गयी थी जिसकी पुष्टि खुद पुलिस कॉल रिकॉर्ड से हुई। बावजूद इसके, बचाव एवं राहत कार्य सम्बन्धी दलों को इस जगह पहुँचने में डेढ़ घण्टे से अधिक समय लगा।
इस घटना की शुरुआती तहक़ीकात में ही यह सामने आ गया था कि यह इमारत तमाम सुरक्षा मानदण्डों का उल्लंघन करते हुए ग़ैर-क़ानूनी रूप से चल रही थी। पीजी मालिक द्वारा अधिकाधिक मुनाफ़ा कमाने की चाहत में बग़ैर किसी अनुमति के बेसमेण्ट में मरम्मत का काम चल रहा था। इस इलाक़े के पीजी मालिकों के भाजपा से घनिष्ठ सम्बन्धों की पोलपट्टी भी आने वाले दिनों में खुल गयी। दिल्ली में भाजपा की “ट्रिपल इंजन” सरकार की असलियत इस हादसे के बाद एक बार फिर से पूरे देश के सामने आ गयी। हादसे के कुछ दिनों बाद तक “तू नंगा-तू नंगा” का बेशर्म खेल भी भाजपाइयों के बीच चला!
इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है कि व्यवस्थागत गड़बड़ी व क़ानूनों के गम्भीर उल्लंघन की इस ख़बर को बाहर आने के लिए भी पहले 7 लोगों को बेमौत मरना पड़ा। यहाँ तक कि बचाव अभियान ख़त्म होने के बाद भी मौतों की सही संख्या को लेकर गम्भीर प्रश्नचिन्ह लगे क्योंकि घटना के वक़्त इमारत में 40-50 लोगों के होने का अनुमान था जो कि मृतकों व घायलों के सरकारी आँकड़ों के मुक़ाबले एक बड़ी संख्या है। दूसरे, इमारत के बेसमेण्ट में काम चल रहा था तो कई मज़दूरों के भी हताहत होने की आशंका है परन्तु रेस्क्यू ऑपरेशन की समाप्ति के इतने वक़्त बाद भी इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं दी गयी है कि बेसमेण्ट में खुदाई का कार्य किस स्तर तक पूरा हुआ और क्या नतीजे प्राप्त हुए!
यह नियमित तौर पर सेफ़्टी ऑडिट यानी सुरक्षा जाँच न करने की प्रशासनिक लापरवाही का ही नतीजा था कि आम लोगों को जान गँवानी पड़ी। और यदि हम सोचते हैं कि सत्यनिकेतन या दिल्ली व देश के अन्य किसी कोने में ऐसी दर्दनाक घटनाएँ कभी-कभार की ही बात हैं तो यह हमारी ख़ुशफ़हमी है। सत्यनिकेतन में ही 2022 में इसी तरह की ढाँचागत गड़बड़ी व प्रशासनिक लापरवाही के चलते दो मज़दूर मारे गये थे। देशभर में तो इस तरह की घटनाएँ अकसर पढ़ने, सुनने में आती ही रहती हैं।
ग़ौरतलब है कि निकम्मे प्रशासन की ढिलाई और लापरवाही के चलते वहाँ राहत एवं बचाव कार्य सम्बन्धी दल डेढ़ घण्टे देरी से पहुँचते हैं। उनके आने से पहले ही सत्यनिकेतन में रहने वाले आम छात्र वहाँ लोगों की सहायता के लिए जुटने लगे थे और मलबे से घायलों व मृतकों को निकालने की प्रक्रिया में शामिल होने लगे। आमतौर पर ही हॉस्टल जैसी बुनियादी सुविधा मुहैया न होने के चलते दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र सत्यनिकेतन जैसे इलाक़ों में बेहद ख़तरनाक परिस्थितियों में रहने को विवश हो जाते हैं। ऐसे में, सत्यनिकेतन का यह हादसा होने के बाद बरसों से ख़तरनाक परिस्थितियों में रहने को मजबूर आम छात्र-युवा हॉस्टल की माँग, रेग्युलर सेफ़्टी ऑडिट व घायलों व मृतकों को मुआवज़े जैसी जायज़ बुनियादी माँगों के इर्द-गिर्द स्वतःस्फ़ूर्त ढंग से घटनास्थल के आसपास प्रदर्शन करने लगे।
चूँकि यह घटना दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनावों के माहौल में हुई तो ऐसे में पूँजीपतियों के चुनावबाज़ राजनीतिक दलों के पिछलग्गू छात्र संगठन मसलन भाजपा-आरएसएस के एबीवीपी, काँग्रेस के एनएसयूआई का चील-गिद्धों की मानिन्द लाशों पर अपनी चुनावी रोटियाँ सेंकने के लिए झटपट घटना स्थल पर कूद पड़ना कोई हैरानी की बात नहीं थी। क्रेडिटखोरी की होड़ में इन सभी चुनावबाज़ पार्टियों के पिछलग्गू छात्र संगठनों ने गम्भीर हादसे पर भी वीभत्स नौटंकी करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं किया और उल्टे राहत कार्य को बाधित करने का ही काम किया।
इसी क्रम में संशोधनवादी चुनावबाज़ पार्टियों के दुमछल्ले छात्र संगठन मसलन आइसा, एसएफ़आई भी किसी आन्दोलन को लपककर रही-सही कोई उम्मीद भी ख़त्म करने की अपनी पुरानी आदत से मजबूर वहाँ पहुँचकर लाइमलाइट की घटिया राजनीति शुरू करने लगे। विशेषकर सीजेपी आन्दोलन की चमक-दमक की धुन पर सवार आइसा ने तो आनन-फ़ानन में घटना स्थल पर अनिश्चितकालीन धरने की घोषणा कर डाली! ज़ाहिर है, उनकी इस नौटंकी के पीछे का प्रमुख कारक आगामी डूसू चुनाव थे वरना आइसा का अनिश्चितकालीन धरना कितना सुनिश्चितकालीन होता है – यह तो हम सीजेपी आन्दोलन के समय ख़ूब देख ही चुके!
ख़ैर, आइसा व अन्य कथित वाम छात्र संगठनों ने प्रदर्शनस्थल पर सिवाय नारेबाज़ी के कुछ भी नहीं किया। माँगों से सम्बन्धित कोई पोस्टर, बैनर उनकी सभा में लगभग नदारद ही रहा और आम छात्रों के बीच व्यवस्थित अभियान चलाकर उन्हें हॉस्टल जैसी बुनियादी माँगों के इर्द-गिर्द लामबन्द करने का न तो उन्होंने कोई प्रयास किया और न ही ऐसी कोई मंशा ही ज़ाहिर की।
हालाँकि ‘दिशा छात्र संगठन’ एक स्वतंत्र क्रान्तिकारी ताक़त के तौर पर घटनास्थल व उसके आसपास शुरू से ही मौजूद रहा और अपनी सीमित ताक़त के बूते ‘दिशा छात्र संगठन’ के कार्यकर्ताओं ने सत्यनिकेतन में रहने वाले आम छात्रों के बीच पर्चा वितरण व हस्ताक्षर अभियान चलाने का कार्य किया। ‘दिशा छात्र संगठन’ अपनी सभाओं व पर्चों, माँगपत्रक के ज़रिये लगातार इस बात पर ज़ोर देता रहा कि यह वक़्त दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा सबको हॉस्टल मुहैया कराये जाने की माँग पर एक जुझारू जनआन्दोलन खड़ा करने के लिए एकदम मुफ़ीद है। साथ ही, दिशा के कार्यकर्ताओं ने इस मसले पर विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस में रैली में भी अहम भागीदारी की और नॉर्थ व साउथ कैम्पस के कुछ कॉलेजों में इस मसले पर अभियान भी चलाया।
सत्यनिकेतन की इस दर्दनाक घटना ने दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन की भी कलई खोल कर रख दी। मुख़र्ज़ी नगर से लेकर नाँगलोई जैसे इलाक़ों में विश्वविद्यालय की कुल 200 एकड़ ज़मीन खाली होने के बावजूद आज बमुश्किल 2 फ़ीसदी छात्रों को छात्रावास की मूलभूत सुविधा मिल पा रही है। इस खाली ज़मीन पर रिहाइश का इन्तज़ाम करना तो दूर की बात, उल्टे यूनिवर्सिटी उपलब्ध हॉस्टलों पर भी एक-एक कर ताला लगाने पर आमादा है।
हालत यह है कि कुछ दो-ढाई लाख छात्रों में से सिर्फ़ कुछ 7000 के लगभग हॉस्टल की सीटें हैं। इसलिए मुनाफ़ाखोर पीजी माफ़िया, दिल्ली सरकार के साथ-साथ यह निकम्मा दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन भी सत्यनिकेतन में हुई दर्दनाक मौतों के लिए ज़िम्मेदार है जो आम छात्रों को हॉस्टल जैसी बुनियादी सुविधा मुहैया नहीं कराता और सत्यनिकेतन, मलकागंज, कमलानगर के गन्दे, बदबूदार, दमघोंटू दड़बेनुमा महँगे कमरों में रहने को विवश करता है जहाँ बरसों से सुरक्षा की जाँच सम्बन्धी सर्वेक्षण नहीं हुए होते हैं और आग लगने से लेकर जर्जर इमारतों के ढह जाने के डर की तलवार आम छात्रों की गर्दन पर लगातार लटकी ही रहती है।
ऐसे में रिहाइशी इलाक़ों में निरन्तर तौर पर इमारतों की सुरक्षा जाँच, छात्र बहुल इलाक़ों में रेण्ट कण्ट्रोल अधिनियम लागू कराने व सबको हॉस्टल जैसी बुनियादी माँगों को लेकर एक जुझारू समझौताविहीन संघर्ष खड़ा करना आज एक ज़िन्दा सवाल बन चुका है। इनमें से किसी भी एक माँग पर किसी भी तरह का समझौता आम छात्र-युवा आबादी के लिए पराजय साबित होगा।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026














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