सब याद रखा जायेगा! – दो
नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान गिरफ़्तार श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं को सलाख़ों के पीछे रखने की योगी सरकार की चालों को उत्तर प्रदेश के मज़दूर-मेहनतकश भूलेंगे नहीं!

गायत्री भारद्वाज

पहली किश्त का लिंक 

ज्ञात हो कि अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए स्वत:स्फूर्त मज़दूर आन्दोलन को योगी सरकार ने हर प्रकार के छल-प्रपंच द्वारा कुचलने का प्रयास किया था। इसमें मज़दूरों के व्हाट्सएप ग्रुपों में पुलिस के लोगों को घुसाकर मज़दूरों को हिंसा के लिए उकसाने से लेकर शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर बर्बर दमन तक शामिल थे। इनमें से तमाम साज़िशें बाक़ायदा कैमरे पर क़ैद हो गयीं और यहाँ तक कि उनका सार्वजनिक तौर पर अख़बारों, चैनलों, यूट्यूब आदि पर बार-बार खुलासा हो चुका है। इसके बावजूद, नोएडा में उत्तर प्रदेश सरकार व उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की गयी नाजायज़ कार्रवाई के तहत गिरफ़्तार आठ सामाजिक व श्रम अधिकार कार्यकर्ता सत्यम वर्मा, रूपेश राय, आदित्य आनन्द, आकृति चौधरी, सृष्टि गुप्ता, मनीषा चौहान, हिमांशु ठाकुर और योगेश मीणा अभी भी सलाख़ों के पीछे हैं।

इस बीच ऐसे स्पष्ट वीडियो प्रमाण भी सामने आये जो यह इशारा करते हैं कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने इन सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को फँसाने के लिए नक़ली सबूत आरोपित करने का प्रयास किया है। साथ ही, पुलिस के क़ानूनी तौर पर गिरफ़्तारी के सारे दावे भी ग़लत साबित हो चुके हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश पुलिस इन सभी कार्यकर्ताओं को अगवा किये जाने की तिथि को अदालत से लेकर मीडिया तक में ग़लत बताती रही है। मिसाल के तौर पर, उत्तर प्रदेश पुलिस ने सत्यम वर्मा को अगवा किये जाने की जगह पहले नोएडा बतायी थी और उसकी तारीख़ भी 19 अप्रैल बतायी थी। लेकिन जब वीडियो प्रमाण सामने आया कि सत्यम वर्मा को 17 अप्रैल की रात ही लखनऊ से ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से अगवा किया गया था, तो पुलिस ने अपनी बात बदल ली। इसी प्रकार रूपेश राय, आकृति चौधरी, सृष्टि गुप्ता और मनीषा चौहान को गिरफ़्तारी करने की तिथि भी 12 अप्रैल बतायी गयी है, जबकि इस बात के वीडियो प्रमाण मौजूद हैं कि इन्हें 11 अप्रैल को शाम क़रीब 7 बजे नोएडा के एक मेट्रो स्टेशन से अगवा किया गया था। ऐसे तमाम प्रामण मौजूद हैं, जिनके विस्तार में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं में से दो पर, यानी सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पर उत्तर प्रदेश सरकार ने अन्यायपूर्ण क़ानून एन.एस.ए. (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) थोप दिया ताकि उन्हें अधिक समय तक जेल में रखा जा सके। लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय की जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने आकृति चौधरी पर लगाये गये राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून को रद्द कर दिया, पुराने मामले को ही “मनगढ़न्त कहानी” क़रार दिया और उत्तर प्रदेश पुलिस व सरकार को ज़बर्दस्त फटकार लगाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश प्रशासन आकृति चौधरी पर रासुका लगाने के समर्थन में एक भी वाजिब सबूत नहीं पेश कर पाया है, यहाँ तक कि गिरफ़्तारी की प्रक्रिया के दौरान कोई भी क़ानूनी नियम व दिशा-निर्देश तक लागू नहीं किये गये हैं। केवल अपने राजनीतिक आक़ाओं को प्रसन्न करने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस व प्रशासन ने एक 25 वर्षीय छात्रा और राजनीतिक कार्यकर्ता को प्रताड़ित करना जारी रखा है और उसे नाजायज़ तरीक़े से सलाख़ों के पीछे डाल रखा है। इसके लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एन.एस.ए. के आदेश को अनुशंसित करने वाली केचुआ आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी डी.एम. मेधा रूपम व अन्य अधिकारियों पर रु. 5 लाख का जुर्माना भी किया, जिसका भुगतान आकृति चौधरी को किया जाना था। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि डी.एम. मेधा रूपम के सर्विस रिकॉर्ड में इन अवांछनीय कार्रवाइयों को दर्ज किया जाये। लेकिन मोदी के चहेते केचुआ ज्ञानेश कुमार की पुत्री पर ऐसी कोई कार्रवाई हो पाती, भला यह कैसे सम्भव होता?

नतीजतन, मेधा रूपम इस फ़ैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय जाती हैं, जहाँ उनकी त्रुटिपूर्ण पेटिशन को आनन–फ़ानन में कोर्ट सुनवाई के लिए लिस्ट कर देता है! मेधा रूपम का केस लड़ते हैं भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता! यानी देश के मज़दूरों–मेहनतकश के ख़र्च पर ही मज़दूरों के विरुद्ध क़ानूनी कार्रवाई का व्यय पूरा किया जाता है! इसके अलावा, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से भी एक याचिका दायर की जाती है ताकि आकृति चौधरी लगे एन.एस.ए. को भी क़ायम रखा जा सके। इस याचिका पर जिरह करने कौन आता है? पूर्व एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी! इसके अलावा, इन दोनों याचिकाओं को उन चार बेंचों में से किसी के पास जाना चाहिए था जो मौजूदा लागू रोस्टर के अनुसार हेबियस कॉर्पस व प्रिवेण्टिव डिटेंशन सम्बन्धी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे हैं और विशेष तौर पर वह बेंच जो नोएडा से जुड़े सारे मामलों की सुनवाई कर रही है। यह बेंच है जस्टिस नागरत्ना की। हर वकील से लेकर हर पत्रकार यह मानकर चल रहा था कि अगर स्थापित प्रक्रिया का पालन होता है तो ये दोनों याचिकाएँ जस्टिस नागरत्ना की बेंच के सामने आयेंगी जो पहले से ही नोएडा के तीन मसलों की सुनवाई कर रही है। लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकान्त (‘कॉकरोच’ टिप्पणी वाले) ने इसे जस्टिस सतीश चन्द्र शर्मा और जस्टिस एन. के. सिंह की बेंच के पास भेज दिया, जो वर्तमान रोस्टर के अनुसार इस प्रकार की याचिकाएँ सुन ही नहीं रही थी! इस प्रक्रिया-सम्बन्धी उल्लंघन के विषय में यह ख़बर पढ़ें: https://www.livelaw.in/amp/articles/questions-raise-over-listing-of-noida-dm-medha-roopams-plea-in-supreme-court-551516। ग़ौरतलब है कि जस्टिस सतीश चन्द्र शर्मा वही महानुभाव हैं जिन्होंने चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति सम्बन्धी विवाद के मुक़दमे में मोदी सरकार के पक्ष में अपनी टिप्पणियाँ की थीं।

बहरहाल, इस केस का मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त द्वारा सतीश शर्मा की बेंच के पास भेजा जाना वक़ीलों व पत्रकारों के लिए चौंकाने वाला था, हालाँकि हम मज़दूर-मेहनतकश जानते हैं कि जब बात मज़दूर वर्ग व मेहनतकशों के वर्गीय हितों व अधिकारों की आती है, तो भारतीय न्याय प्रणाली किस प्रकार काम करती है। इसलिए किसी वर्ग-सचेत मज़दूर को इस पर ज़रा भी अचरज नहीं हुआ। अधिकांश मज़दूरों ने यही कहा कि यह तो होना ही था! भला मोदी के चहेते ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम पर कार्रवाई कैसे हो सकती है? भला मज़दूर हक़ों के लिए संघर्ष करने वालों पर एन.एस.ए. कैसे हटाया जा सकता है?

इसके बाद जब इस मामले की सुनवाई जस्टिस सतीश शर्मा की बेंच के सामने 23 सितम्बर 2026 को हुई तो उसमें अदालत के माइक बन्द कर दिये गये ताकि बाहर मौजूद पत्रकारों, वकीलों आदि को, जो वीडियो के ज़रिये इन मुक़दमों की सुनवाइयों को देख व सुन सकते हैं, वे सुन ही न सकें कि दोनों पक्षों ने क्या जिरह की है और इस बात की पड़ताल ही न कर सकें कि न्यायाधीशों का निर्णय उचित है या अनुचित। ज़ाहिर है, किसी भी तरह उत्तर प्रदेश सरकार और योगी आदित्यनाथ के दबाव में केचुआ आयुक्त ज्ञानेश कुमार-पुत्री मेधा रूपम को बचाना था और साथ ही योगी सरकार द्वारा शान्तिपूर्ण तरीक़े से अपने जायज़ हक़ों की माँग कर रहे मज़दूरों के बर्बर दमन का बचाव किया जाना था!

हुआ वही जिसका अन्देशा था : सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस सतीश शर्मा बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार और मेधा रूपम को अन्तरिम राहत देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस श्रीधरन व जस्टिस सचदेव के फ़ैसले पर अन्तरिम रोक लगा दी है।

यानी योगी सरकार और मोदी सरकार मिलकर अपनी पूरी ताक़त लगा देते हैं कि किसी भी क़ीमत पर योगी सरकार द्वारा मज़दूरों के आन्दोलन के दमन की हिमायत की जा सके, उसका क़ानूनी तौर पर बचाव किया जा सके और केचुआ ज्ञानेश कुमार की बेटी डी. एम. मेधा रूपम को बचाया जा सके। वहीं उन्होंने पूरा प्रयास किया है कि मज़दूर अधिकार कार्यकर्ताओं को अधिक से अधिक समय तक जेलों में रखा जा सके।

आज के समय में मज़दूरों के हक़ों के बारे में बोलना भी योगी सरकार और मोदी सरकार ने एक अघोषित अपराध बना दिया है। यही कारण है कि सितम्बर-मध्य तक नोएडा मसले में कार्यकर्ताओं पर की गयी क़रीब ग्यारह एफ़.आई.आर. में इलाहाबाद उच्च न्यायालय लगातार समानता के आधार पर सभी कार्यकर्ताओं को एक-एक करके ज़मानत देता जा रहा था। लेकिन आकृति चौधरी पर रासुका के हटने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय के बाद सभी को समानता के न्यायिक सिद्धान्त के आधार पर ज़मानत दे रहे उन्हीं न्यायाधीश महोदय ने ज़मानत देना बन्द कर दिया और सवा से लेकर डेढ़ महीने तक की लम्बी तारीख़ें देना शुरू कर दिया, जबकि सर्वोच्च न्यायालय का यह दिशा–निर्देश है कि सभी अदालतें ज़मानत की याचिकाओं पर एक माह के भीतर कार्रवाई पूरी करें। लम्बी तारीख़ें देते हुए उक्त न्यायाधीश ने कहा कि नोएडा मसले में तो “नेतागीरी” करने की बू आ रही है! यानी उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक के रुख़ और तौर-तरीक़े में नोएडा मसले के सन्दर्भ में एक गुणात्मक बदलाव आ जाता है, जिसकी व्याख्या बिना योगी सरकार व मोदी सरकार के दबाव को जानने और मानने के बिना नहीं की जा सकती है।

यह शब्द न्यायालय से लेकर पुलिस प्रशासन व सरकारें तक मज़दूर कार्यकर्ताओं के बारे में बार-बार इस्तेमाल करते हैं। अगर कोई भी व्यक्ति मज़दूरों–मेहनतकशों के हक़ों को लेकर उन्हें जागृत, गोलबन्द व संगठित करता है, तो शासक वर्ग के ये सभी नुमाइन्दे बोलते हैं कि “नेतागीरी मत करो, राजनीति मत करो, वरना तुम्हें सबक सिखाया जायेगा!” लेकिन अगर मोदी, योगी, आदि अडाणी, अम्बानी, टाटा, बिड़ला के लिए काम करें, उनके पक्ष में संसद–विधानसभाओं में राजनीति करें, उनके धनबल के बूते चुनाव लड़ें, भाषण दें, तो वह नेतागीरी व राजनीति नहीं कहलायेगी क्या?

यानी, मज़दूरों व पूँजीपतियों के बीच मौजूद वर्ग–संघर्ष में राजनीति करने का, अपना नेतृत्व पैदा करने का (“नेतागीरी” करने का!) अधिकार केवल अमीरज़ादों और धन्नासेठों के नुमाइन्दों को ही है! अगर मज़दूर वर्ग संघर्ष करता है, सत्ता व शक्ति के लिए संघर्ष करता है, तो वह “नेतागीरी” करता है और अगर मोदी और योगी की सरकारें पूरी नंगई के साथ क़ानून व संविधान को ताक पर रखकर अम्बानी–अडाणी की सेवा, सिजदा और पायबोस करते हैं, तो उसे “राष्ट्रसेवा” कहा जाता है। लुब्बेलुआब यह कि मज़दूर वर्ग के लिए राजनीति करना, अपने हक़ों के लिए लड़ना, सत्ता व शक्ति के लिए लड़ना निषिद्ध व प्रतिबन्धित है और अगर वह ऐसा करता है, तो उसी समय उसे ठीक उसी प्रकार सबक सिखाने का प्रयास किया जाता है, जैसा कि नोएडा के मज़दूर आन्दोलन के बाद योगी सरकार और मोदी सरकार ने मिलकर किया है : हज़ारों मज़दूरों को गिरफ़्तार करना, उन्हें यातना देना, उन्हें आतंकित करना, मज़दूर वर्ग के कार्यकर्ताओं को ग़ैर–क़ानूनी तरीक़े से गिरफ़्तार करना, उन पर फ़र्ज़ी मुक़दमे थोपना, न्यायपालिका पर दबाव डालकर उन्हें सलाख़ों के पीछे रखना।

आप और भी मसलों को याद करें : क्या आपको याद आता है कि कभी पूँजीवादी न्यायपालिका से मज़दूरों और उनके क्रान्तिकारी प्रतिनिधियों को न्याय मिला हो? इसके विपरीत, क्या आपको याद है कि कभी पूँजीपतियों को अपनी माँगों को न्यायपालिका से पूरी करवाने में कोई देरी हुई हो? पूँजीपतियों के हितों की बात आती है तो अदालतों के दरवाज़े रात के 12 बजे भी खुल जाते हैं और आनन-फ़ानन में उनके पक्ष में फ़ैसला देकर उन्हें राहत दे दी जाती है। लेकिन मज़दूरों, मेहनतकशों व आम जनता को लम्बी-लम्बी तारीख़ें देकर अदालतों के चक्कर कटवाये जाते हैं और आम तौर पर बरसों तक हज़ारों-लाखों रुपये वक़ीलों की फ़ीसों पर ख़र्च करने के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिलता। और फ़ासीवादी मोदी सरकार व फ़ासीवादी योगी सरकार के राज में तो यह और भी भयंकर रूप धारण कर चुका है क्योंकि फ़ासीवादी पार्टी आर.एस.एस.-भाजपा ने समूची राज्यसत्ता के सभी अंगों, पुलिस, सेना, नौकरशाही, न्यायपालिका तक में अपने आन्तरिक घुसपैठ के ज़रिये एक कब्ज़ा जमा रखा है। लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएँ व संस्थाएँ अब केवल काग़ज़ों पर अस्तित्वमान हैं। पूँजीवादी लोकतन्त्र का बस लिफ़ाफ़ा बचा रह गया है, मशमूलात को फ़ासीवाद चबा रहा है।

योगी सरकार की निगाह में 2027 की शुरुआत में ही होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी हैं। उसे उत्तर प्रदेश की जनता को यह दिखाने की फ़िक्र है कि नोएडा मसले में उत्तर प्रदेश सरकार सही थी और यह बात न्यायपालिका में भी साबित हो गयी है! लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस श्रीधरन व जस्टिस सचदेव द्वारा आकृति चौधरी पर से एन.एस.ए. हटाये जाने, उप्र सरकार व पुलिस को फटकार लगाये जाने और ज्ञानेश कुमार-पुत्री डी.एम. मेधा रूपम पर जुर्माना लगाये जाने से योगी सरकार की इस उम्मीद को भारी झटका लगा था क्योंकि पूरे देश का वैकल्पिक मीडिया इस फ़ैसले को भारी कवरेज दे रहा था। यही वजह थी कि योगी सरकार आनन–फ़ानन में सर्वोच्च न्यायालय दो–दो याचिकाओं को लेकर पहुँची, फ़ौरन उसके लिए उपयुक्त बेंच का प्रबन्ध किया गया और आनन–फ़ानन में ही जस्टिस श्रीधरन की पीठ के फ़ैसले पर अन्तरिम रोक लगा दी गयी। लेकिन जिस तरीक़े से योगी सरकार और मोदी सरकार ने यह पूरा प्रपंच किया, वह भी देश के सामने आ गया। अब उनकी पहले से भी ज़्यादा छी–छी थू–थू हो रही है।

एक बार फिर से उत्तर प्रदेश की जनता के सामने और भी स्पष्टता से यह तथ्य सामने आ गया है कि योगी सरकार, मोदी सरकार और भाजपा पार्टी जैसी मज़दूर–विरोधी, मेहनतकश–विरोधी, स्त्री–विरोधी और जन–विरोधी और कोई भी पार्टी नहीं है। ऐसे में, उत्तर प्रदेश के सभी चेतनासम्पन्न मज़दूरों-मेहनतकशों को यह प्रण लेना चाहिए कि उनके समूचे वर्ग के साथ किये जा रहे इस अन्याय को वे भूलेंगे नहीं : फ़रवरी 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान वे याद रखेंगे कि पिछले दस वर्षों में योगी सरकार ने प्रदेश के मज़दूरों, मेहनतकशों, सरकारी कर्मचारियों, आशाकर्मियों, आँगनवाड़ीकर्मियों, शिक्षा मित्रों आदि के साथ क्या सुलूक किया है। वे याद रखेंगे कि प्रदेश के दलितों, स्त्रियों और मुसलमान आबादी के साथ योगी सरकार ने क्या सुलूक किया है। सब याद रखा जायेगा। योगी सरकार और मोदी सरकार वोट-चोरी के ज़रिये जनादेश की चोरी कर चुनाव जीतने की उम्मीद कर सकते हैं। विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) और ईवीएम का खेल इसी के लिए किया जा रहा है। इस समूचे घपले की परतें हर दिन के साथ देश की जनता के सामने खुलती जा रही हैं। इस घपले के ज़रिये ही भाजपा महत्वपूर्ण चुनावों की चोरी कर रही है। अन्यथा, मज़दूर इनके ख़िलाफ़ सड़कों पर हैं, आम ग़रीब किसान इनके ख़िलाफ़ सड़कों पर हैं, छात्र–युवा इनके विरुद्ध सड़कों पर हैं, स्त्री–विरोधी अपराधों से त्रस्त स्त्रियाँ इनके ख़िलाफ़ सड़कों पर है, सोशल मीडिया पर मौजूद आम जनता का 95 प्रतिशत इनके विरुद्ध है, तो इन्हें वोट दे कौन रहा है? जवाब आप जानते हैं। इसलिए एक ओर एसआईआर को रद्द करने और बैलेट पेपर से चुनाव कराने का संघर्ष लड़ना होगा, वहीं याद रखना होगा कि आने वाले विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में घोर मज़दूर–विरोधी, मेहनतकश–विरोधी व जन–विरोधी भारतीय जनता पार्टी और योगी आदित्यनाथ का पूर्ण बहिष्कार करना है।

मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026

 

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