गोदी मीडि‍या ने कैसी घृणि‍त चालें चलीं?
गोदी मीडिया ने नोएडा और मानेसर के मज़दूर आन्दोलन को ग़ैर-क़ानूनी बनाकर पेश करने के लिए कैसी घृणित चालें चलीं?

अरविन्द

(तेज़ और हॉरर फिल्म सरीख़ी डरावनी आवाज़ में और डरावने पार्श्व संगीत के साथ गोदी मीडिया के एक न्यूज़ चैनल का बाज़ारू एंकर):नोएडा मज़दूर हड़ताल कामास्टरमाइण्डआदित्य आनन्द नोएडा में मज़दूर आन्दोलन कर रहा था! वह देश में अलगअलग जगह मज़दूरों को संगठित करता है। वह मज़दूरों को हड़ताल में नेतृत्व देता है!”

(एक अन्य गोदी मीडिया एंकर उतनी ही सनसनीख़ेज़ डरावनी आवाज़ में और उतने ही थर्ड क्लास पार्श्व संगीत के साथ चिल्लाते हुए): “मास्टरमाइण्ड रूपेश देश में घूमघूमकर मज़दूरों को उनके अधिकार बता रहा था! वह नोएडा में मज़दूरों को बिजली कनेक्शन के अधिकार के लिए लड़ने को बोल रहा था! वह मज़दूरों को यूनियन बनाने के लिए उकसा रहा था!”

(एक और बाज़ारू गोदी मीडिया चैनल का एंकर उतनी ही घिनौनी सनसनीख़ेज़ चीख़ और भयाक्रान्त करने वाले संगीत के साथ): हिमांशु ठाकुर छात्रों के बीच मज़दूरों की हड़ताल का समर्थन करने का आह्वान कर रहा था। वह नोएडा में मज़दूरों के समर्थन के लिए भी गया था! वह जनता को उनके अधिकारों के बारे में बताता है!”

ये सिर्फ़ चन्द उदाहरण हैं। 11 अप्रैल से लेकर क़रीब 27-28 अप्रैल तक गोदी मीडिया के समस्त चैनल इसी प्रकार की बाज़ारू व भड़काऊ बातों से भरे हुए थे। उपरोक्त बातों को ऐसे पेश किया जा रहा था मानो वे कोई असंवैधानिक और ग़ैर-क़ानूनी हरक़तें हों। लेकिन उपरोक्त बातों पर ज़रा ग़ौर करें: क्या मज़दूर आन्दोलन करना ग़ैरक़ानूनी और आपराधिक हरक़त है? क्या मज़दूरों को उनके हक़ों के बारे में जागरूक बनाना कोई असंवैधानिक हरक़त है? क्या मज़दूरों के लिए बिजली कनेक्शन का हक़ माँगना नाजायज़ है? क्या छात्रोंयुवाओं को देश की मेहनतकश जनता के संघर्षों का समर्थन करने के लिए कहना ग़ैरक़ानूनी है? क्या यूनियन बनाना असंवैधानिक है?

अगर आप भारत का संविधान और मोदी सरकार द्वारा पारित फ़ासीवादी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता को भी पढ़ें तो उपरोक्त कार्रवाइयों में से कोई भी असंवैधानिक या ग़ैर-क़ानूनी नहीं है। भारत के हर नागरिक को उपरोक्त कार्रवाइयों में शामिल होने का पूरा अधिकार है। संविधान की धारा 19(1)(सी) के अनुसार देश के हर नागरिक को संघ, संगठन या यूनियन बनाने का अधिकार प्राप्त है। धारा 19 शान्तिपूर्ण रूप से एकत्र होने प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार देती है। इसी धारा के तहत, हर नागरिक को अभिव्यक्ति का पूरा अधिकार है, जिसके तहत वे किसी भी आन्दोलन, संघर्ष या हड़ताल का समर्थन कर सकते हैं, उसके पक्ष में लिख सकते हैं और बोल सकते हैं। धारा 14 के अनुसार भारत का हर नागरिक चाहे वह मालिक हो या मज़दूर, देश के क़ानून के समक्ष समान माना जायेगा। कम-से-कम काग़ज़ों पर लिखा तो यही है!

यानी आन्दोलन करने, हड़ताल करने, संघर्ष करने, शान्तिपूर्ण रूप से एकत्र होने, अपनी यूनियन संगठन बनाने, किसी भी नागरिक को उसके या भारत के अन्य नागरिकों के अधिकारों बारे में अवगत कराने में कुछ भी ग़ैरक़ानूनी या असंवैधानिक नहीं है। देश का कोई भी नागरिक देश के किसी भी हिस्से में जा सकता है और उपरोक्त कार्रवाइयाँ कर सकता है और वह पूरी तरह से क़ानून के दायरे में होगा।

इन सारी क़ानूनी कार्रवाइयों को गोदी मीडिया के बाज़ारू दलाल अपनी घिनौनी चीख़-चिल्लाहट में और घृणास्पद सनसनीख़ेज़ आवाज़ में ऐसे पेश कर रहे हैं मानो आदित्य, रूपेश, हिमांशु, सृष्टि, आकृति, मनीषा और सत्यम वर्मा ने मज़दूरों के आन्दोलन व हड़ताल में शिरक़त करके या दूर बैठे ऑनलाइन उसका समर्थन करके कोई अपराध किया हो! यह सारा काम योगी सरकार और उसकी पुलिस की शह पर किया जा रहा था। इसी के साथ इन सामाजिक कार्यकर्ताओं के बारे में 11 अप्रैल से ही गोदी मीडिया ने (ज़ाहिरा तौर पर उत्तर प्रदेश पुलिस के निर्देशों पर) तरह-तरह के झूठे प्रचार और अफ़वाहें फैलायीं। पहले कहा गया कि इन कार्यकर्ताओं का रिश्ता पाकिस्तान से है! अब चूँकि सारी जनता जान चुकी है कि भाजपाई और उनके ऑनलाइन अफ़वाहें फैलाने वाले आईटी सेल के दल्ले हर उस व्यक्ति या संगठन को पाकिस्तानी एजेण्ट घोषित कर देते हैं जो पूँजीपति वर्ग और उसकी चहेती फ़ासीवादी पार्टी भाजपा पर सवाल उठाते हैं, इसलिए इस प्रचार का कोई असर नहीं हुआ। फिर 2-3 दिनों के भीतर उत्तर प्रदेश पुलिस की शह पर गोदी मीडिया में यह रपटें आने लगीं कि ये कार्यकर्ता नक्सली हैं! लेकिन इन कार्यकर्ताओं के सार्वजनिक लेखन और वक्तृता में बार-बार भाकपा (माओवादी) की “वामपंथी” दुस्साहसवादी लाइन की आलोचनाएँ आ चुकी थीं और उनके ऊपर ऐसे झूठे आरोप टिकेंगे नहीं, और जनता भी समझने लगी है कि जो भी पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण या दमन का विरोध करे, उसे “आतंकवादी”, “नक्सलवादी” आदि क़रार दे दिया जाता है, इसलिए यह दुष्प्रचार और अफ़वाह भी क़ामयाब नहीं हुए। आप अगर गोदी मीडिया के न्यूज़ चैनलों के यूट्यूब चैनलों पर जाएँ तो 11 अप्रैल के बाद से उनके द्वारा फैलायी गयी इन अफ़वाहों और दुष्प्रचार से भरी उनके वीडियोज़ पर 75 फ़ीसदी से ज्यादा लोगों ने नकारात्मक टिप्पणियाँ की हैं और गोदी मीडिया के दुष्प्रचार को मानने के बजाय ख़ुद ही उसका पर्दाफ़ाश कर दिया है। शासक वर्ग के भाड़े के टट्टू भी दिन भर बैठकर यह जाँचते रहते हैं कि इस प्रकार की अफ़वाहें और प्रचार जनता में सफल हो रहे हैं या नहीं। उन्हें जल्द ही यह रिपोर्ट मिलने लगी कि इन अफ़वाहों और दुष्प्रचार का उल्टा असर हो रहा है और योगी सरकार व गोदी मीडिया इससे और भी अलोकप्रिय हो रहे हैं।

इसके बाद, उत्तर प्रदेश पुलिस की ही शह पर ऐसी बातें गोदी मीडिया में आने लगीं कि ये कार्यकर्ता कई राज्यों में आपसी तालमेल से काम करते हैं, इनका एक देशव्यापी नेटवर्क है, वगैरह। लेकिन अगर ऐसा है तो इसमें कुछ भी ग़ैरक़ानूनी नहीं है! भाजपा और आरएसएस और अन्य सभी पूँजीवादी चुनावी पार्टियों का भी पूरे देश में ही नेटवर्क है! तो क्या इस वजह से उन पर बैन लगा दिया जाना चाहिए? इसके बाद पुलिस और गोदी मीडिया ने यह कहना शुरू किया कि ये कार्यकर्ता एक साथ कई संगठनों के सदस्य कैसे हो सकते हैं? लेकिन फिर सवाल यह भी उठता है कि अगर ऐसा है तो इसमें भी असंवैधानिक या ग़ैरक़ानूनी क्या है? क्या नरेन्द्र मोदी एक साथ भाजपा और आर.एस.एस. के सदस्य नहीं हैं? क्या अरुण जेटली एक साथ ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और भाजपा के सदस्य नहीं थे? क्या गौरव खारी और नकुल भारद्वाज जैसे भाजपा नेता एक साथ ही विद्यार्थी परिषद, भाजयुमो, भाजपा आर.एस.एस. के मेम्बर नहीं हैं?

यह तो किसी भी नागरिक का नैसर्गिक अधिकार है कि वह एक साथ कई संगठनों का हिस्सा हो सकता है क्योंकि हर नागरिक की कई पहचानें होती हैं: वह एक युवा हो सकता है, साथ में उसकी एक जेण्डर पहचान, भाषाई पहचान, पेशागत पहचान, क्षेत्रीय पहचान, आदि हो सकती है और इन पहचानों के आधार पर वह कई मंचों, जनसंगठनों या पार्टियों का हिस्सा हो सकता है और संविधान और क़ानून की कोई भी धारा या प्रावधान उसके इस अधिकार को नहीं छीनती। तो फिर उत्तर प्रदेश पुलिस और गोदी मीडिया इस पर सवाल कैसे उठा सकता है? यह मज़ाकिया दुष्प्रचार कर नोएडा आन्दोलन के तहत गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध जन राय निर्माण करने का उत्तर प्रदेश सरकार, पुलिस व गोदी मीडिया का मंसूबा भी धरा का धरा रह गया।

दूसरी ओर, देश भर में प्रगतिशील व जनवादी शक्तियों के प्रयासों और गिरफ्तार साथियों की रिहाई के लिए जारी अभियान के कारण वैकल्पिक मीडिया में, जो अब जनता के ज्यादा बड़े हिस्से में देखा जाता है, यह ख़बरें आने लगीं कि नोएडा में हिंसा भड़काने में उत्तर प्रदेश पुलिस की सन्देहास्पद भूमिका है क्योंकि उससे जुड़े लोग मज़दूरों के व्हाट्सऐप ग्रुपों में भड़काऊ सामग्री डाल रहे थे। और साथ ही जो सामाजिक कार्यकर्ता गिरफ्तार किये गये हैं, उन पर लगे आरोपों का कोई भी ठोस प्रमाण अब तक पुलिस ने कहीं भी पेश नहीं किया है। अब तक सामने आये प्रमाणों और मीडिया रिपोर्टों के आधार पर यह प्रश्न उठने लगे कि नोएडा पुलिस कि नोएडा में भड़की हिंसा में क्या भूमिका थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि मज़दूर आन्दोलन के दमन को वैध ठहराने के लिए उसमें हिंसा भड़कायी गयी? इन सवालों का जवाब तो किसी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जाँच से ही मिल सकता है। चूँकि यह बात जनता के व्यापक हिस्से के सामने आने लगी तो नोएडा प्रकरण की जाँच के लिए उत्तर प्रदेश प्रशासन ने एक मजिस्ट्रेट जाँच बिठा दी। लेकिन यह भी एक पुलिसिया स्तर की ही जाँच है और आम तौर पर ऐसी जाँचों से ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। यह उत्तर प्रदेश सरकार व पुलिस द्वारा अपना चेहरा बचाने के लिए की जाने वाली क़वायद ज्यादा प्रतीत होती है। नैरेटिव पलट गया है और मज़दूरों और जनता के बीच सच्चाइयाँ साफ़ तौर पर जाने लगी हैं।

फिर भी, नोएडा और मानेसर में मज़दूर आन्दोलनों का पूरा प्रकरण दिखलाता है कि इस समय देश में अगर कोई सबसे बड़ा देशद्रोही है तो वह गोदी मीडिया है। सत्ता पर प्रश्न करने के बजाय वह सत्ता की गोद में बैठा हुआ है, फ़ासीवादी और साम्प्रदायिक प्रचार में सत्ता में बैठी साम्प्रदायिक फ़ासीवादी शक्तियों का वह पूरा साथ देता है और कई बार जोश में उससे भी ज्यादा साम्प्रदायिक हो जाता है, जितना यह सत्ता चाहती है! इसकी यह अश्लीलता और नग्नता अब इस हद तक जनता के सामने आ चुकी है कि जनता का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा गोदी मीडिया के चैनल देखना छोड़ चुका है या फिर कभी किसी सस्ते क़िस्म का मनोरंजन करने का मन हो, तो ही देखता है! गोदी मीडिया की कोई विश्वस्नीयता नहीं है और जनता के बड़े हिस्से का उस पर से भरोसा पूरी तरह से उठ चुका है।

नोएडा व मानेसर के मज़दूर आन्दोलनों को आपराधिक व ग़ैर-क़ानूनी बनाने का गोदी मीडिया ने पुरज़ोर प्रयास किया। उसके कार्यकर्ताओं पर तरह-तरह के लांछन लगाकर उन्हें कलंकित करने की हर सम्भव कोशिश इस दलाल मीडिया ने की। लेकिन जनता के बीच इसका उल्टा असर हुआ। जनता के सामने यह पहले से भी ज्यादा साफ़ हो गया कि सत्यम, रूपेश, आदित्य, हिमांशु, सृष्टि, आकृति और मनीषा का गुनाह सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने जनता का पक्ष चुना, कि उन्होंने न्याय का पक्ष चुना और इसी की सज़ा योगी सरकार और उसकी पुलिस उन्हें दे रही है। यही वजह है कि 11 अप्रैल के बाद दो सप्ताह के भीतर ही गोदी मीडिया नोएडा मज़दूर आन्दोलन और उसके गिरफ्तार मज़दूर व सामाजिक कार्यकर्ताओं के मसले पर चुप्पी साध गया है। अगर देश में कोई निष्पक्ष न्यायपालिका है तो उसे समूचे मुख्यधारा मीडिया द्वारा किये जा रहे दुष्प्रचार, अफ़वाहसाज़ी, साम्प्रदायिक उन्माद के प्रचार, फ़ेक न्यूज़ फैलाने की घटिया हरक़तों पर स्वयं संज्ञान लेना चाहिए और ऐसे चैनलों व समाचार प्रतिष्ठानों के प्रबन्धन और दोषी पत्तलकारों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। मतलब, होना तो यही चाहिए। बाक़ी देश के मौजूदा हालात आप सभी को पता हैं।

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026