‘नोएडा के मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अभियान’ (CaRWAN) के बैनर तले दिल्ली में विरोध प्रदर्शन
बिगुल संवाददाता
दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर विगत 14 जून को ‘नोएडा के मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अभियान’ (CaRWAN) द्वारा एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गयाl यह प्रदर्शन नोएडा हिंसा मामले में झूठे आरोपों में फँसाए गए मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की पहली गिरफ़्तारी के दो महीने पूरे होने के मौक़े पर उनकी रिहाई और अन्य माँगों को लेकर थी।
ज्ञात हो कि यूपी पुलिस ने 11 अप्रैल को बॉटेनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से चार कार्यकर्ताओं – सृष्टि, आकृति, मनीषा, रूपेश को अवैध रूप से उठाकर जेल में डाल दिया था। इनका “अपराध” केवल इतना था कि जब नोएडा के मज़दूर अपनी जायज़ माँगों के लिए हड़ताल कर रहे थे तब इन्होंने उन मज़दूरों का साथ दिया। इन्होंने बार-बार आन्दोलन को शान्तिपूर्ण ढंग से चलाने की अपील की थी ।
13 अप्रैल को हिंसा भड़कायी गयी, जिसमें खुद पुलिस की भूमिका संदिग्ध है। नोएडा हिंसा का बहाना बनाकर पुलिस ने हड़ताल को बेरहमी से कुचल दिया। इस दौरान चार और कार्यकर्ताओं ( सत्यम वर्मा, आदित्य आनन्द, हिमांशु ठाकुर व योगेश मीणा) तथा एक हजार से अधिक मज़दूरों को अवैध रूप से गिरफ़्तार किया। पिछले दिनों इलाहाबाद हाइकोर्ट ने यूपी पुलिस के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा कि यूपी के पुलिस अधिकारी संविधान की जगह सत्ता के प्रति वफ़ादार है। इन दो महीनों में यूपी पुलिस और प्रशासन ने न्याय और क़ानूनी प्रक्रियाओं का मज़ाक बना दिया – अवैध हिरासतें, “विच-हंट ” (पूर्वाग्रहपूर्ण तलाश और उत्पीड़न) और हिरासत में हिंसा। इसके साथ ही झूठी कहानी फैलाई जिसके ज़रिये मज़दूरों के आन्दोलन को साज़िश बता दिया और उनके विरोध को अपराध घोषित किया कर दिया। इस विरोध प्रदर्शन में विभिन्न प्रगतिशील संगठनों, जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, छात्रों, कलाकारों और जागरूक नागरिकों ने भाग लिया। प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स लीग के कलाकारों ने प्रतिरोध के गीत गाये। जन्तर-मन्तर की सड़कों पर चित्रकारी की। अपने कलाकर्म के ज़रिये जेल में बन्द मज़दूरों और कार्यकर्ताओं के प्रति एकजुटता दिखायी।
‘नोएडा के मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अभियान’ की ओर से चिरांशु ने प्रतिरोध सभा को सम्बोधित करते हुए कहा: “नोएडा की हड़ताल मज़दूरों का स्वतःस्फूर्त आन्दोलन था। आन्दोलन के पीछे कई वजहें थी मसलन, न्यूनतम मज़दूरी कम होना, कठिन कार्य परिस्थितियां, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और लगातार बढ़ती महँगाई । मज़दूर 12 घण्टे काम के बदले केवल 10-12 हजार रुपये में काम करने के लिए मजबूर थे। रिचा ग्लोबल और मदरसन जैसी बड़ी कंपनियों के मालिकों के ने कई श्रम क़ानूनों का उल्लंघन किया और मज़दूरों को ग़ुलामी से भी बदतर परिस्थितियों में रहने को मजबूर किया। उन मालिकों के ऊपर प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। यूपी पुलिस और सरकार उन्हीं उद्योगपतियों के इशारों पर काम कर रही है। वह मज़दूरों के विरोध को अपराध बना रही है और आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रही है। एक ही घटना के लिए कई एफ़आईआर दर्ज करने का कोई क़ानूनी या तार्किक आधार नहीं है। जब आम लोगों ने यूपी पुलिस द्वारा फैलायी गयी पाकिस्तान और नेपाल से जुड़ी साजिश जैसी बेतुकी बातों को ख़ारिज कर दिया, तो अब पुलिस कार्यकर्ताओं को फँसाने के लिए एफ़आईआर का जाल बुनकर उन्हें क़ानूनी और प्रशासनिक उलझनों में फँसा रही है ताकि उनकी रिहाई और कठिन हो जाए। इनके द्वेषपूर्ण कृत्य सच को डिगा नहीं सकते। जेल में भी हमारे साथियों के हौसले बुलन्द हैं। जेल में वो कहानियां-कविताएं लिख रहे हैं। पेंटिंग्स बना रहे हैं। महान कृतियों का अनुवाद कर रहे हैं। उन्होंने सालों से जेल में बन्द पड़ी पुस्तकालय को साफ़ सुथरा किया और उसे चालू करवाया। उनकी सृजनशीलता जारी है।”
प्रोफेसर नंदिता नारायण ने कहा, “मुझे आकृति, हिमांशु और योगेश जैसे छात्रों पर गर्व है। आज की पीढ़ी के छात्रों को ऐसा ही करना चाहिए। केवल अपने करियर के बारे में सोचने के बजाय उन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग उत्पीड़ित लोगों की आवाज़ बनने के लिए किया। सभा में उपस्थित छात्रों को सम्बोधित करते हुए प्रो. नंदिता ने विश्वविद्यालयों में जनवादी स्पेस के सिकुड़ने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “यह वास्तव में परेशान करने वाली बात है कि योगेश को यूपी पुलिस के सिविल ड्रेस में आए पुलिसकर्मियों द्वारा नॉर्थ कैंपस के अन्दर से अगवा किया गया और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।” सामाजिक कार्यकर्ता नौरीन ने नोएडा मज़दूर आन्दोलन के बाद यूपी पुलिस द्वारा चलाए गए “विच हंट” पर विस्तार से बाते रखी। यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने निजी स्थानों, लाइब्रेरी और कई जगहों पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से छापेमारी की और बिना किसी उचित प्रक्रिया के युवाओं को अगवा कर अवैध रूप से गिरफ़्तार किया। नौरीन ने यह भी बताया कि ट्रैकिंग और निगरानी अभी भी जारी है। यूपी पुलिस के अधिकारी अब भी दिल्ली में महिला छात्रों का पीछा कर रहे हैं, उन्हें धमका रहे हैं। उन्होंने कहा, “ पुलिस ने मुझे भी अगवा किया था, मेरी धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ित किया, मुझे बांग्लादेशी तक कहा।”
नौजवान भारत सभा के आशीष ने स्वतंत्र और जनपक्षधर मीडिया को सम्बोधित करते हुए अपनी बाते रखी। उन्होंने इस कठिन समय में मज़दूरों और कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहने के लिए जनपक्षधर मीडिया का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “ नोएडा आन्दोलन के दौरान जीस्ट से लेकर दैनिक भास्कर तक के मीडियाकर्मियों को यूपी पुलिस ने कैमरे के सामने पीटा। न्यूज पिंच के रिपोर्टर को बेइज्जत किया। उसी समय मुख्यधारा की मीडिया ने झूठ फैलाने और यूपी पुलिस की ब्रीफिंग्स को बिना जाँच पड़ताल किये आगे बढ़ाने का विकल्प चुना। वहीं न्यायप्रिय पत्रकारों ने स्वतंत्र जाँचों के माध्यम से सच्चाई उजागर की, जिसमें यह सामने आया कि यूपी पुलिस ने उकसावे की भूमिका निभाई और हिंसा को बढ़ावा दिया।”
भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) से योगेश ने वहाँ एकत्रित लोगों से अपील की कि वे नोएडा मामले में गिरफ़्तार मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की रिहाई तक अभियान को जारी रखें और उसे और तेज़ करें। उन्होंने कहा कि जनसमूह की सामूहिक एकता ही हर प्रकार के दमन का प्रतिरोध कर सकती है।
इस विरोध प्रदर्शन में प्रोग्रेसिव स्टूडेंट यूथ एसोसिएशन, मज़दूर संघर्ष संगठन और बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन के कार्यकर्ताओं ने भी भाग लिया।प्रदर्शन का समापन नारों के साथ हुआ, जिनमें सभी आरोपों को वापस लेने, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को रद्द करने और मज़दूरों एवं कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई की माँग की गई।
मज़दूर बिगुल, जून 2026













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