केन्द्रीय बजट : मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश जनता के शोषण को और भी बढ़ायेगा
फ़ासिस्ट मोदी सरकार द्वारा श्रम के शोषण को जारी रखने और पूँजीपति वर्ग की जेबें भरने का दस्तावेज़
मोदी सरकार खोखले नारों और आँकड़ों की बाज़ीगरी की माहिर रही है। वित्त मन्त्री निर्मला सीतारमण ने “आर्थिक विकास को गति देना”, “जन आकांक्षाओं की पूर्ति करना” और “समावेशी विकास सुनिश्चित करना”– इन तीन “कर्तव्यों” के नाम पर बजट पेश किया है। लेकिन इन शब्दों का वास्तविक अर्थ है, ‘बुर्जुआ वर्ग के मुनाफ़े की दर को सुनिश्चित करना’, ‘जन असन्तोष को यथासम्भव नियन्त्रित करना’ और ‘सभी के लिए काम करने का दिखावा करते हुए असल में कॉरपोरेट पूँजी तथा पूँजीपति वर्ग के अन्य हिस्सों को अधिकतम लाभ पहुँचाना’।
आर्थिक विकास बनाये रखने की “आवश्यकता” दरअसल उस दीर्घकालिक मन्दी जैसी स्थिति का परिणाम है, जिससे लम्बे समय से भारतीय अर्थव्यवस्था जूझ रही है। आँकड़ों में भारी हेरफेर और 7 से 10 प्रतिशत की विकास दर पाने जैसी भविष्यवाणियों के बावजूद सच्चाई यह है कि मुनाफ़े की गिरती हुई औसत दर का गहराता संकट भारतीय अर्थव्यवस्था को जकड़े हुए है। पिछले वर्ष के बजट में राजस्व संग्रह में हुई कमी इसका प्रमाण है। यही कारण है कि पूँजीपति वर्ग का निवेश घट रहा है और सट्टेबाज़ी का बुलबुला बढ़ता जा रहा है। इससे निकलने का एकमात्र रास्ता मेहनतकश वर्ग के शोषण को बढ़ाना है और इसी कारण मोदी सरकार ने 4 श्रम संहिताएँ लागू की हैं, जो श्रमिकों के अधिकांश अधिकार छीन लेती हैं। साथ ही पहले से कमज़ोर और नाकाफी ‘मनरेगा’ क़ानून को और भी कमज़ोर VB-GRAM(G) योजना से प्रतिस्थापित कर दिया गया है। ये दोनों क़दम शहरी और ग्रामीण श्रमिकों के लिए काम के अधिक घण्टे और कम मज़दूरी ही सुनिश्चित करती है। वास्तव में ये नये क़ानून पूँजीपति वर्ग (जिसमें खेतिहर पूँजीपति वर्ग भी शामिल है) की लम्बे समय से चली आ रही माँग थे क्योंकि पुराने क़ानून पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने के बावजूद संगठित क्षेत्र के औपचारिक कर्मचारियों को कुछ अधिकार देता था और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में ‘मनरेगा’ क़ानून के कारण मज़दूरी पर ऊपर की ओर दबाव बनता था, ग्रामीण मज़दूर वर्ग की सापेक्षतः मोलभाव की क्षमता बढ़ती थी और इसलिए पूँजीपति वर्ग इसके पक्ष में कतई नहीं था। इस बजट को इन्हीं फ़ासीवादी क़दमों की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। कुछ राज्यों में छल-प्रपंच और चुनाव आयोग की मिलीभगत से मिली चुनावी जीत से उत्साहित होकर भाजपा की मोदी सरकार ने जीएसटी दरों में कमी जैसे पूर्व में लिए दिखावटी फैसले से भी हाथ खींच लिए हैं।
बजट में लगभग 53.5 लाख करोड़ रुपये के खर्च का प्रावधान है, जिसमें से 28.7 लाख करोड़ करों से आयेंगे और कुल ग़ैर-ऋण आय 36.5 लाख करोड़ होगी। कर राजस्व मूलतः अप्रत्यक्ष करों से आता है जो कि मेहनतकश जनता की आय का हिस्सा है या फिर मुनाफ़ा, ब्याज, लगान आदि के रूप में पूँजीपति वर्ग द्वारा हड़पे गये अधिशेष मूल्य से आता है। लेकिन मोदी सरकार द्वारा प्रत्यक्ष करों को घटाने और अप्रत्यक्ष करों को बढ़ाने की प्रवृत्ति लगातार जारी है। पिछले 12 वर्षों में कॉरपोरेट टैक्स 35–40 प्रतिशत से घटाकर 22–23 प्रतिशत कर दिया गया है और आयकर छूट सीमा 7 लाख से बढ़ाकर 22 लाख कर दी गयी है। इस बजट में भी इन्हें कम ही रखा गया है, यानी अमीर वर्ग और कॉरपोरेट पूँजी समेत पूँजीपति वर्ग अधिशेष मूल्य पर बेरोकटोक लगातार कब्ज़ा करते रहेंगे। पेट्रोल-डीज़ल पर भारी कर और जीएसटी में कोई कमी नहीं की गयी है।
लगातार घटता सामाजिक व्यय और “भव्य” खोखला तमाशा!
पिछले वर्ष के संशोधित बजट अनुमान दिखाते हैं कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर जो शोर मचाती है, वह भी खर्च नहीं करती। आँकड़े खुद इसकी गवाही देते हैं—स्वच्छ भारत मिशन: 2,000 करोड़ (बजट अनुमान – 5,000 करोड़), ग्राम सड़क योजना: 11,000 करोड़ (बजट अनुमान – 19,000 करोड़), प्रधानमन्त्री आवास योजना (शहरी): 7,500 करोड़ (बजट अनुमान – 19,974 करोड़), प्रधानमन्त्री आवास योजना (ग्रामीण): 32,500 करोड़ (बजट अनुमान- 54,832 करोड़), प्रधानमन्त्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन: 2,443 करोड़ (बजट अनुमान – 4,200 करोड़)। सामाजिक व्यय में पिछले एक दशक से कटौती जारी है और इस बजट में भी यही रुख बरकरार रखा गया है। रोज़गार सृजन और घटती मज़दूरी पर यह बजट पूरी तरह मौन है, जबकि बेरोज़गारी देश के युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। पोषण, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा पर घटता खर्च मेहनतकश जनता के जीवन के अधिकार पर सीधा हमला है। स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी के 1 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन दूसरी ओर ‘मेडिकल टूरिज़्म’ को बढ़ावा दिया जा रहा है। 2025–26 के संशोधित अनुमानों में ग्रामीण विकास, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, शहरी विकास, आवास और पेयजल परियोजना सहित कई सामाजिक क्षेत्रों में वास्तविक रूप से कटौती हुई है। 20 में से 17 मदों में खर्च घटा है, जिनमें एससी/एसटी कल्याण और आँगनवाड़ी योजना भी शामिल हैं। ग़रीब किसानों की लागत घटाने के लिए आवश्यक उर्वरक सब्सिडी भी कम कर दी गयी है।
बड़ी पूँजी के लिए पलक–पाँवड़े बिछाती केन्द्र सरकार
सबसे अमीर पूँजीपतियों पर कर बढ़ाने की बात तो दूर, सरकार ने पूँजीपति वर्ग को लाभ पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लगभग 12.2 लाख करोड़ रुपये पूँजीगत व्यय के नाम पर बाज़ार को बढ़ावा देने में खर्च होंगे, यानी ऐसे इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया जायेगा जो ठेकों के माध्यम से पूँजीपतियों को लाभ पहुँचायेगा। बायोफार्मा कम्पनियों को 10,000 करोड़, सेमीकण्डक्टर क्षेत्र को 40,000 करोड़ की सब्सिडी दी जा रही है, और ‘रेयर अर्थ मिनरल कॉरिडोर’ बनाकर निजी खनन क्षेत्र को लाभ पहुँचाया जा रहा है। कमज़ोर हो चुके एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग) सेक्टर को मात्र 10,000 करोड़ का प्रावधान कर सांत्वना देने की कोशिश की गयी है। क्लाउड सेवाएँ देने वाली अडानी-अम्बानी जैसी बड़ी कम्पनियों को कर में छूट दी गयी है। कृषि में ड्रोन और एआई जैसी योजनाएँ भी बड़े पूँजीपतियों को सब्सिडी देने का माध्यम हैं। विदेशी आय और सम्पत्ति की स्वैच्छिक घोषणा जैसी योजनाओं के ज़रिये काले धन को सफेद बनाने का मौका फिर से दिया गया है। मिनिमम अल्टर्नेट टैक्स (MAT) 15 प्रतिशत से घटाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया है। व्यक्तिगत आयकर संग्रह (14.66 लाख करोड़) का कॉरपोरेट कर संग्रह (12.31 लाख करोड़) से अधिक हो जाना दिखाता है कि अब न केवल मेहनतकश तबक़ा बल्कि मध्यवर्ग भी कॉरपोरेट्स को दी जा रही रियायतों का बोझ उठा रहा है। अमीरों के लिए कॉरपोरेट्स द्वारा बनाये जाने वाले हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर को फण्ड किया जा रहा है, जबकि लोकल, पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनों का ढाँचा लगातार जर्जर होता जा रहा है।
कुलमिलाकर कहें तो यह मज़दूर-विरोधी और जन-विरोधी बजट दरअसल मोदी सरकार की फ़ासीवादी नीतियों की ही निरन्तरता है जो पूरे पूँजीपति वर्ग और विशेष रूप से बड़ी पूँजी के हित में है। इस हमले का प्रतिरोध करने के लिए मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में व्यापक जनआन्दोलन खड़ा करना हमारी तात्कालिक आवश्यकता है।
मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026













