कोटद्वार (उत्तराखण्ड) में संघी उत्पात और फ़ासिस्ट साम्प्रदायिक राजनीति का कारगर प्रतिरोध

प्रसेन

“मेरा नाम मोहम्मद दीपक है। मैंने जानबूझकर अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया क्योंकि इन्सान की पहचान धर्म से नहीं होनी चाहिए।…शहर का आधा हिस्सा मेरे साथ है, लेकिन अच्छे काम पर लोग तालियाँ नहीं बजाते। ईमानदारी की एक क़ीमत चुकानी पड़ती है। लेकिन मैं पीछे हटने वाला नहीं हूँ चाहे इसकी क़ीमत मुझे अपनी जान से चुकानी पड़े।”

ऊपर दिया गया बयान उत्तराखण्ड के कोटद्वार में रहने वाले जिम ट्रेनर दीपक कुमार कश्यप का है। यह बयान न केवल फ़ासीवादी संघ परिवार की साम्प्रदायिक नफ़रत की राजनीति के ख़िलाफ़ देशभर के प्रगतिशील और सच्चे धर्मनिरपेक्ष लोगों की भावना का प्रतिनिधित्व करता है बल्कि इस समझदारी की आज के वक़्त में सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

ग़ौरतलब है कि पिछली 26 जनवरी को उत्तराखण्ड के कोटद्वार में उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री पुष्कर सिंह धामी का जुलूस निकलने वाला था। उसके पहले बजरंग दल के गुण्डे एक 70 वर्षीय बुज़ुर्ग मुस्लिम दुकानदार से उनकी दुकान के नाम ‘बाबा स्कूल ड्रेस एण्ड मैचिंग सेण्टर’ से ‘बाबा’ शब्द हटाने पर ग़ैरक़ानूनी दबाव बना रहे थे। फ़ासिस्टों के सत्ता में आने के बाद संघी गुण्डों को जितनी छूट मिली है और ऐसी गुण्डागर्दी में पुलिस प्रशासन का उन्हें जितना साथ मिलता है उसके मद्देनज़र वह बुज़ुर्ग दुकानदार 30 साल पुरानी दुकान का नाम बदलने के लिए बस कुछ वक़्त माँग रहे थे, जिसे ‘देने के लिए’ बजरंग दल के गुण्डे तैयार नहीं थे। वहाँ मौजूद दीपक कश्यप और विजय रावत ने बजरंग दल की इस गुण्डागर्दी का विरोध किया। तब बजरंग दल के गुण्डे दीपक कश्यप से उनका नाम पूछने लगे। इस पर दीपक ने बजरंग दल की साम्प्रदायिक मानसिकता का जवाब देते हुए जानबूझकर अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया क्योंकि वे धार्मिक आधार पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से दुकानों और लोगों को टारगेट कर रहे थे। दीपक कश्यप के दृढ़ रवैये को देखते हुए बजरंग दल के गुण्डे उस समय वहाँ से पूँछ दबाकर निकल लिए। यह वीडियो वायरल हो गया। उसके बाद 31 जनवरी को बजरंग दल दीपक कुमार को ‘सबक’ सिखाने के लिए विभिन्न इलाक़ों से एक भीड़ जुटाकर उनके जिम पर पहुँच गया। और अपने असली चरित्र के मुताबिक़ बजरंग दल के गुण्डों ने दीपक कुमार से अभद्रता करने की कोशिश की, उनको और उनके परिवार वालों को गालियाँ दीं। यही नहीं दीपक का साथ देने वाले रुद्रपुर के मोहित के जिम के बोर्ड पर कालिख पोती। इस दिन उत्तराखण्ड का मुख्यमन्त्री ‘धामी’ भी कोटद्वार में ही मौजूद था।

अब सवाल यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस-प्रशासन की भूमिका क्या थी? 31 जनवरी को पुलिस ने विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के सदस्य गौरव कश्यप और बजरंग दल के सदस्य कमल पाल की शिकायत के बाद दीपक कुमार और विजय रावत के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की। उन पर आपराधिक धमकी, जानबूझकर चोट पहुँचाने, दंगा करने और शान्ति भंग करने का आरोप लगाया गया है। दीपक और विजय रावत पर यह भी आरोप लगाया कि इन्होंने पैसे, घड़ियाँ और फोन छीन लिया और डराने-धमकाने के लिए जातिवादी गालियाँ दीं। इसके अलावा विहिप और बजरंग दल के इन लम्पटों का कहना है कि वे घर-घर “जागरूकता” फैलाने गए थे! दीपक कुमार उर्फ़ अक्की, विजय रावत और अन्य के ख़िलाफ़ भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2), 191(1), 351(2) और 352 के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया है। एक तरफ़ दीपक और विजय पर झूठी नामजद एफ़आईआर की गयी, वहीं दूसरी तरफ़ बजरंग दल के गुण्डों का अता-पता होने के बावजूद 30-40 “अज्ञात” लोगों पर शान्ति भंग करने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गयी। इन “अज्ञातों” के फोटो और वीडियो मौजूद हैं। यही नहीं ये “अज्ञात” पुलिस के सामने दीपक के घर पर हुड़दंग कर रहे थे और गालियाँ दे रहे थे। पुलिस ने दीपक को उस जगह से हटा दिया जबकि बजरंग दल के गुण्डों को घण्टों हुड़दंग करने के लिए छुट्टा छोड़ दिया गया।

कुल मिलाकर देखा जाये तो पुलिस प्रशासन पूरी बेशर्मी के साथ बजरंग दल के गुण्डों का साथ दे रही थी। वैसे यह कोई एक जगह की बात नहीं है। सत्ता में आने के बाद से फ़ासिस्टों ने पुलिस प्रशासन से लेकर न्यायपालिका, चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई आदि सभी संस्थाओं पर अन्दर से कब्ज़ा कर लिया है। ऐसे में उत्तराखण्ड की घटना में पुलिस ने वही किया जो फ़ासिस्ट चाहते थे। इसी कारण पूरे देश में ‘बजरंग दल’, ‘हिन्दू रक्षा दल’ और ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ के गुण्डे चारों ओर घूम-घूमकर गुण्डागर्दी कर रहे हैं और उन्हें किसी का कोई डर नहीं है। पहले तो ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से मुस्लिम दुकानदार को दुकान के नाम से ‘बाबा’ शब्द हटाने के लिए धमकाते हैं, फिर दीपक कुमार को सबक सिखाने के लिए दीपक के जिम के सामने खुलेआम हुड़दंग करते हैं, लेकिन नामजद एफ़आईआर दीपक कुमार और उनके साथी पर होती है! जिस देश के प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री, मुख्यमन्त्री खुलेआम मुस्लिमों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते हों, उनके चित्र पर बन्दूक से निशाना साधते हों (असम के मुख्यमन्त्री) और उच्चतम न्यायालय तक के पास इस पर ‘विचार करने का समय न हो’ वहाँ और किस चीज़ की उम्मीद की जा सकती है? मतलब साफ़ है कि इन साम्प्रदायिक ताक़तों को शासन-प्रशासन का पूरी तरह संरक्षण प्राप्त है। उत्तराखण्ड को फ़ासिस्टों ने लम्बे समय से साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इस घटना के कुछ समय पहले ही विकासनगर में दो कश्मीरी नौजवानों के ऊपर हमले हुए और हिन्दुओं की धार्मिक जगहों पर मुस्लिमों को जाने से प्रतिबन्धित करने का मामला सामने आया था।

लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती। इस पूरे घटनाक्रम से फिर से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि फ़ासिस्ट संघ परिवार की साम्प्रदायिक साज़िश की पोलपट्टी खोलते हीहिन्दू’ ‘हिन्दूनहीं रह जाता। वहग़द्दारहो जाता है और हिन्दू धर्म के झण्डाबरदारों द्वारा उसकी हत्या की सुपारी बाँटी जाने लगती है। यानी या तो आप फ़ासिस्टों के हर झूठ, नफ़रत की राजनीति में उनका साथ दीजिए या चुप रहिए! अगर आप इनकी असलियत को उजागर करेंगे तो आपको ‘हिन्दू’ से ‘ग़द्दार’ होने में सेकण्ड भी नहीं लगेंगे! दीपक के साथ भी यही हुआ। दीपक ने बजरंग दल की गुण्डागर्दी पर ज्यों ही उँगली उठायी  (जो कि हर इंसाफ़पसन्द इन्सान का फ़र्ज़ है!) वैसे ही दीपक के नाम सुपारी दी जाने लगी। ग़ौरतलब है कि ‘हिन्दू रक्षा दल’ के अध्यक्ष ललित शर्मा ने दीपक का सिर कलम कर लाने वाले को 5 लाख 51 हज़ार रुपये का इनाम देने का ऐलान किया। 12 फ़रवरी को एक भीड़ भी इकट्ठी की गयी थी, हालाँकि मामले के तूल पकड़ने के कारण पुलिस ने उस जुलूस को “रोक” दिया था। फिर एक और वीडियो आया जिसमें उत्कर्ष सिंह नाम का एक व्यक्ति माथे पर तिलक लगाये हुए, हाथ में नोटों की गड्डियाँ पकड़े नज़र आता है जो मोहम्मद दीपक को मारने और उसे सनातन धर्म का ‘पाठ’ पढ़ाने वाले को 2 लाख रुपये देने की घोषणा कर रहा होता है। ये बात अलग है कि फ़ासिस्ट कायर होते हैं, मुकदमा दर्ज़ होते ही ये गिड़गिड़ाने लगा कि उसने वायरल होने के लिए ऐसा वीडियो बनाया था!

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बजरंग दल की गुण्डागर्दी के सामने दीपक कुमार के दृढ़तापूर्वक खड़े होने के बाद देश के युवाओं, वकीलों, पत्रकारों और आम लोगों की एक बड़ी संख्या फ़ासिस्टों की साम्प्रदायिक राजनीति के बरक्स ‘मोहम्मद’ दीपक के साथ खड़ी हो गयी। यह देश की क्रान्तिकारी राजनीति के लिए एक अच्छा संकेत है। बजरंग दल के गुण्डों की तो केवल दीपक के तनकर खड़े हो जाने से फूँक सरक गयी थी, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों के मुखर समर्थन मिलने से हिन्दू धर्म के तथाकथित झण्डाबरदार संगठन भी फिलहाल बिल में घुसे नज़र आ रहे हैं।

वास्तव में, फ़ासिस्टों ने सत्तारोहण के बाद से आम मेहनतकश जनता को तबाही-बर्बादी के दलदल में धकेल दिया है। गाँवों-शहरों की आम मेहनतकश जनता तेज़ रफ़्तार से बढ़ती बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, टैक्सों के पहाड़ के नीचे कराह रही है। मज़दूरों की मेहनत की लूट की खुली छूट देकर मुट्ठीभर पूँजीपतियों के मुनाफ़े की दर बरक़रार रखने के लिए कुख्यात ‘चार लेबर कोड’ मोदी सरकार द्वारा लागू कर दिये गये हैं। पूँजीपतियों के मुनाफ़े की हवस पूरी करने के लिए प्रकृति को दाँव पर लगा दिया गया है। सरकारी विभागों पर निजीकरण का पाटा चलाया जा रहा है। जनान्दोलनों को कुचलने के लिए काले क़ानूनों और खुले पुलिसिया दमन का सहारा लिया जा रहा है। लोगों के असन्तोष को सत्ता में बने रहने की बाधा बनने से रोकने के लिए ‘केचुआ’ के सहारे चुनाव में धाँधली और एसआईआर का खेल फ़ासिस्टों द्वारा खेला जा रहा है। वहीं आम मेहनतकश जनता के वास्तविक हितों के आधार पर बनने वाली उनकी क्रान्तिकारी एकजुटता को तोड़ने के लिए फ़ासिस्ट देशभर में बहुत निरन्तरता और योजनाबद्धता के साथ साम्प्रदायिक उन्माद को बढ़ाने वाली घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं ताकि लोग गलत जगह उलझे रहें।

लेकिन फ़ासिस्टों की साम्प्रदायिक राजनीति अब देश की एक बड़ी आबादी को समझ में आ रही है। कोटद्वार की घटना में एक बड़ी संख्या में लोगों का दीपक कुमार का साथ देना इस बात को साबित करता है। लेकिन केवल इतने से साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति का मुकाबला नहीं किया जा सकता। ज़रूरत इस बात की है कि देश की व्यापक मेहनतकश जनता के बीच सच्ची धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों का सघन और निरन्तर प्रचार संगठित किया जाये। मेहनतकश जनता अपनी क्रान्तिकारी विरासत का पुनःस्मरण करते हुए भगतसिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ उल्ला खान, शहीद उधम सिंह (जिन्होंने जाति-धर्म के झगड़ों के बरक्स जनता की एकजुटता की मिसाल के लिए अपना नाम ‘राम मोहम्मद सिंह आज़ाद’ रख लिया था।), सावित्रीबाई फुले-फ़ातिमा शेख के विचारों को जाने और अपनाये। मेहनतकश जनता को यह बात समझनी ही होगी कि फ़ासिस्टों को ‘हिन्दू हित’, ‘राष्ट्र हित’ से कुछ भी लेना-देना नहीं है बल्कि जनता को बाँटकर, लोगों में भ्रम फैलाकर इन्हें पूँजीपतियों की तिजोरी भरनी है। इन फ़ासीवादी गुण्डों की गुण्डागर्दी का कारगर व त्वरित जवाब तभी दिया जा सकता है जबकि मेहनतकश जनता गाँवों-कस्बों-शहरों में अपने को जुझारू तौर पर संगठित करे। मेहनतकश जनता अपने असली दुश्मनों यानी पूँजीपतियों व वर्तमान फ़ासिस्टों से तभी माकूल लड़ाई लड़ सकती है, जबकि वह अपने बीच पहले से बनी और शासक वर्ग द्वारा मज़बूत की जा रही जाति-धर्म के बँटवारे की दीवार गिरा दे।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026

 

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