फ़ासिस्ट मोदी के राज में नफ़रती हिंसा और अपराध चरम पर
आशीष
फ़ासिस्ट मोदी सरकार के राज में साम्प्रदायिक एवं नफ़रती अपराध को अंजाम देने वाले अपराधियों का मनोबल सातवें आसमान पर पहुँच गया है। नस्ल, क्षेत्रीय पहचान या धर्म के आधार पर नफ़रत के मामले हमारे देश में लगातार तेज़ी से बढ़ रहे हैं। इसकी चपेट में आये दिन अक्सर प्रवासी मज़दूर, मुस्लिम, दलित, आदिवासी, उत्तर भारत में ऊनी कपड़े बेचने आये कश्मीरी एवं उत्तर पूर्व के राज्यों की आबादी आदि आती रहती है।
पिछले दिनों देहरादून से एक दुखद घटना सामने आयी। उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में विगत 9 दिसम्बर को त्रिपुरा का रहने वाला एक छात्र एंजेल चकमा और उसके भाई माइकल चकमा के ऊपर कुछ लोगों के एक समूह द्वारा नस्लभेदी टिप्पणी की गयी। दोनों भाइयों ने इस उपहास का विरोध किया। इसके बाद उन दोनों के साथ बर्बर तरीक़े से मारपीट की गयी। हमले में एंजेल के ऊपर धारदार हथियार से वार किया गया। नाज़ुक हालत में उसे स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज के दौरान घटना के 17 दिन बाद उसकी मौत हो गयी। इस मामले में पुलिस-प्रशासन ने पर्याप्त लापरवाही बरती। एफ़आईआर दर्ज करने में देरी की गयी। यह घटना जब सुर्ख़ियों में आयी तब केस दर्ज करके कुछ आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया, लेकिन अभी भी उनमें से एक आरोपी फ़रार है। उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री पुष्कर सिंह धामी पीड़ित के पिता से फोन पर बात करने का वीडियो सोशल मीडिया पर डालकर न्याय दिलाने की नौटंकी करने लगे। पुलिस के एक अधिकारी मृतक के भाई को ही झूठा बताने लगे। उक्त पुलिस अधिकारी का कहना है कि इस घटना में नस्ल के आधार पर नफ़रत एवं हिंसा का कोई कोण नहीं है। मृतक के भाई माइकल चकमा का कहना कि उन्हें “चाइनीज़”, “मोमो”, आदि जैसे शब्दों के ज़रिये अपमानित किया गया। चकमा भाइयों ने हमलावरों को बताया कि उनके पिता सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में एक हेड कांस्टेबल है, वह चाइनीज़ नहीं बल्कि भारतीय है, हमलावरों ने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।
विगत 17 दिसम्बर को बांग्लादेशी होने के शक के आधार पर केरल के पलक्कड़ ज़िले में छत्तीसगढ़ के एक प्रवासी मज़दूर रामनारायण बघेल की एक भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। इसी तरह बांग्लादेशी होने के शक के आधार पर ही विगत 24 दिसम्बर को ओडिशा में पश्चिम बंगाल के एक प्रवासी मज़दूर जुएल को पीट-पीटकर मार डाला। मॉब लिंचिंग की इस घटना में दो अन्य मज़दूर भी बुरी तरह घायल हो गये थे।
क्रिसमस के अवसर पर देश में कई जगहों पर ईसाइयों पर हमले किये गये। देश के कई हिस्सों में चर्च के सामने आरएसएस के अनुषंगी संगठन विश्व हिन्दू परिषद एवं बजरंग दल ने हनुमान चालीसा का पाठ किया और उन्मादी नारे लगाये। इस उन्मादी भीड़ ने कई जगहों पर तोड़फोड़ मचाया एवं लोगों के ऊपर हमले भी किये। केरल के पलक्कड़ में भी क्रिसमस के गीत गाने वाले ग्रुप पर हमला करने के आरोप में पुलिस ने आरएसएस-बीजेपी कार्यकर्ता अश्विन राज को गिरफ़्तार किया। इन लोगों ने गीत गाने वाले बच्चों पर हमला भी किया और उनके बाजे भी तोड़ दिये।
विगत 27 दिसम्बर को शिवांगी नाम की एक छात्रा अपने दोस्तों के साथ बरेली के एक रेस्टोरेंट में जन्मदिन की पार्टी मनी रही थी। इस पार्टी में शिवांगी के दो मुस्लिम युवक दोस्त भी शामिल थे। बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने इसी को ‘लव जिहाद’ का फर्जी मसला बनाकर शिवांगी और उनके दोस्तों के ऊपर हमला कर दिया और रेस्टोरेंट में जमकर तोड़फोड़ मचाई।
उत्तराखण्ड के काशीपुर में बजरंग दल से जुड़े छह कार्यकर्ताओं ने कश्मीरी शॉल विक्रेता बिलाल अहमद गनी को ‘भारत माता की जय’ बोलने के लिए मजबूर किया और ‘भारत माता की जय’ बोलने के बावजूद बर्बरता पूर्वक उसकी पिटाई की। इस मामले में पुलिस ने बजरंग दल के कार्यकर्ता को गिरफ़्तार किया। इस घटना के कुछ दिन पहले ही हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के देहरा क्षेत्र में भी एक कश्मीरी शॉल विक्रेता को एक फ़ासीवादी गुण्डा गिरोह ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाने के लिए मजबूर करने की कोशिश की थी। उस विक्रेता ने नारे लगाने से इनकार किया था। इसी प्रकार हरियाणा के कैथल और फतेहाबाद में कश्मीरी शॉल विक्रेताओं के साथ उत्पीड़न की घटना सामने आयीं। ज्ञात हो कि भारत के कई शहरी इलाक़ों में कश्मीरी शॉल विक्रेताओं का अपना सामान लेकर पूरे देश में घूम-घूमकर बिक्री करना दशकों से जारी रहा है और भाजपा और संघ परिवार की फ़ासीवादी नफ़रत और हिंसा के हावी होने के पहले ऐसी घटनाएँ बिरले ही सुनने में आती थीं। लेकिन देश में बढ़ते नफ़रत भरे माहौल के बीच हाल के वर्षों में उन पर हमलों की घटनाएँ सामने आने लगी हैं।
मोदी राज में गोमांस के निर्यात में भारत पूरे दुनिया में दूसरे स्थान पर है और इनके छुटभैय्ये फ़ासीवादी गुण्डा गिरोह “गाय की रक्षा” के नाम पर मुसलमान आबादी को लगातार निशाना बना रहा है। महाराष्ट्र के सम्भाजीनगर में एक मवेशी के व्यापारी और पंजाब के लुधियाना में एक बिरयानी के दुकानकार को “गौरक्षा” गुण्डा गिरोह के कोप का भाजन बनना पड़ा। मध्य प्रदेश के दमोह में तथाकथित “गौरक्षकों” के दबाव में पुलिस ने नौ मुस्लिमों को सार्वजनिक रूप से परेड करवाया और आरोपियों को पशु क्रूरता अधिनियम के तहत जेल भेजा गया। बाद में अधिकारियों ने मारे गये जानवर में गाय की जगह भैंस के बछड़े का माँस पाया। इस घटना की आड़ लेकर दमोह में साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने की चालें चली गयी। फ़ासीवादी उपद्रवियों ने माँस व्यापारियों के ऊपर पहले तो लाठियों से हमले किये और बाद पुलिस प्रशासन ने सार्वजनिक तौर पर मार्च करवाकर पीड़ित पक्ष को ही अपमानित करने का काम किया। इस घटना में सीधे तौर पर यह दिखलाई पड़ता है कि फ़ासीवादी गुण्डा गिरोह एवं स्थानीय पुलिस प्रशासन ने एक साथ मिलकर बेगुनाह लोगों के ऊपर ज़ुल्म ढ़ाने का काम किया।
धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध नफ़रत एवं हिंसा से सम्बन्धित घटनाओं की लम्बी फेहरिस्त है सबके बारे में यहाँ चर्चा करना सम्भव नहीं है। इनमें से कई घटनाएँ सीधे तौर राज्य की तथाकथित निष्पक्षता की कलई खोलकर रख देती हैं। फ़ासीवादी नफ़रती गुण्डा गैंगों पर कठोर कार्रवाई ना होना सत्ता के साथ उसके गठबन्धन का स्पष्ट संकेत है। हमारे देश में नफ़रती हिंसा की घटनाओं में लगातार जो बढ़ोतरी हो रही है, इसका कारण साफ़ तौर फ़ासीवादी सत्ता और उसकी राजनीति है। फ़ासीवाद की एक आम चारित्रिक अभिलाक्षणिता होती है कि एक विचारणीय आकार की धार्मिक, नस्ली, जातिगत या किसी अन्य अस्मिता पर आधारित अल्पसंख्यक आबादी का अन्यकरण करना और उसे बहुसंख्यक आबादी एवं यहाँ तक कि समस्त देश का शत्रु घोषित कर देना। पूँजीवादी लूट से उत्पन्न समस्याओं, मसलन असमानता, ग़रीबी, बेरोज़गारी एवं विभिन्न तरह की सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा आदि के लिए इसी काल्पनिक शत्रु को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है। आज हमारे देश में मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को इसी प्रकार एक नकली शत्रु के तौर पर पेश किया जा रहा है और देश की बहुसंख्यक आम जनता को गुमराह कर उसी के हितों के ख़िलाफ़ एक दंगाई भीड़ में तब्दील करने का प्रयास किया जा रहा है। आम जनता अपने बुनियादी मसलों पर एकजुट होकर सरकार के ऊपर सवाल ना उठा पाये इसलिए उन्हें लगातार नफ़रत के भँवरजाल में उलझाया जा रहा है।
2014 में मोदी की सरकार के सत्ता में पहुँचने के बाद से ही आरएसएस और उनके तमाम अनुषंगी संगठनों को नफ़रत फैलाने और नफ़रती अपराधों को अंजाम देने की खुली छूट मिली हुई है। नफ़रती अपराधों को अंजाम देने में फ़ासीवादी आरएसएस-भाजपा परिवार से सम्बन्ध रखने वाले लोग सबसे अगली कतार में खड़े हैं, यह बात सभी जानते हैं। नफ़रती अपराध को अंजाम देने के बाद सत्ता के संरक्षण द्वारा दोषियों के बच निकलने की हर सम्भव मदद की जाती है। सत्ता की मेहरबानी नफ़रत का ज़हर उगलने वाले अपराधियों के मनोबल को बढ़ाने का काम कर रही है। अपराधियों को सत्ता की शह मिलने का नतीजा आज स्त्रियों, उत्तरपूर्व के राज्यों के निवासियों, मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, आदिवासियों आदि के विरुद्ध नफ़रती अपराध चरम पर है और यहाँ तक कि व्यापक पैमाने पर ग़रीब मेहनतकश हिन्दू आबादी भी इसकी चपेट में आ रही है। यह तो होना ही था। फ़ासीवाद जिन बर्बर शक्तियों को निर्बन्ध करता है, उसमें यह होता ही है और यह फ़ासीवादी राजनीति की ज़रूरत भी होती है।
हमें यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि देश में बढ़ती बेरोज़गारी, ग़रीबी, महँगाई आदि का ज़िम्मेदार धार्मिक अल्पसंख्यक नहीं बल्कि यह मानवद्रोही पूँजीवादी व्यवस्था है। फ़ासीवादी सत्ता इस जालिम पूँजीवादी व्यवस्था को टिकाये रखने के लिए जनता को साम्प्रदायिक आधार पर बाँटने यानी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना रही है और धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध होने वाले अपराधों को बढ़ावा दे रही है। आज सभी मज़दूर-मेहनतकश एवं इन्साफ़पसन्द लोगों का यह फ़र्ज़ बनता है कि वह अपनी जुझारू जनएकजुटता के दम पर हर सम्भव तरीक़े से फ़ासीवादियों की नफ़रती राजनीति का प्रतिकार करें।
मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026













