दिल्ली में हर साल प्रदूषण से हो रही हैं 17 हज़ार मौतें!! प्रदूषण प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि मुनाफ़े की व्यवस्था से पैदा हुआ संकट है!
प्रदूषण पर कार्रवाई करने के बजाय सरकार साफ़ हवा माँग रहे नागरिकों-छात्रों का दमन कर रही है

योगेश

देश की राजधानी दिल्ली में होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण अब प्रदूषण बन गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली में पिछले कुछ सालों में किसी भी अन्य बीमारी से उतनी मौतें नहीं हुई जितनी प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण हो रही हैं। दिल्ली एनसीआर की हवा की गुणवत्ता बेहद चिन्ताजनक स्थिति में पहुँच गयी है। यहाँ की हवा में साँस लेने का मतलब ज़हर पीना हो गया है। दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण इतना बढ़ जाने का कारण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है बल्कि इस मौजूदा मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था है जिसके चलते दिल्ली और आस-पास रहने वाले लोगों का स्वास्थ्य संकट की स्थिति में आ चुका है। दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने के क्या क्या कारण है इस पर हम आगे आयेंगे अभी कुछ आँकड़ों के ज़रिये समझने की कोशिश करते हैं कि प्रदूषण के चलते दिल्ली के लोग कैसे धीमी मौत मरने को मजबूर हैं।

इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ मीट्रिक्स  ऐंड इवैल्यूशन (IHME) की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में साल 2023 में 17,188 लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण हुई। यानी मरने वाले हर सात में एक व्यक्ति की मौत दिल्ली की ज़हरीली हवा के कारण हुई है। प्रदूषण के चलते दिल्लीवासियों की ज़िन्दगी के 10-12 साल कम हो जाते हैं।

इस साल दिवाली बीतते ही दिल्ली के प्रदूषण ने पुराने सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिये! AQI 500 पार पहुँच गया, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्वस्थ माने जाने वाले स्तर से 10 गुना ज़्यादा है। कुछ इलाक़ों में, प्रदूषण फैलाने वाले ज़हरीले कणों – PM2.5 और PM10 – का स्तर 1,800 के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया, जो स्वस्थ माने जाने वाले स्तर से 15 से 20 गुना ज़्यादा है। पराली जलाने में 77.5 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी में वायु की गुणवत्ता बेहद ख़तरनाक स्तर पर पहुँच गयी है। दिल्ली में एम्स के पूर्व निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया के मुताबिक़ दिल्ली की ज़हरीली हवा कोरोना से भी ख़तरनाक है। उन्होंने बताया कि हानिकारक कण (PM2.5) असल में पूरे शरीर में सूजन पैदा करते हैं – न सिर्फ़ फेफड़ों में, बल्कि दिल, रक्त वाहिकाओं, और दिमाग़ तक में। एक रिपोर्ट बताती है कि वायु प्रदूषण भारत में एक बहुत बड़ा स्वास्थ्य ख़तरा है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण से सिर्फ़ श्वास-सम्बन्धी बीमारियाँ नहीं होतीं। बढ़े हुए प्रदूषण का सम्बन्ध हृदयाघात, स्ट्रोक, कैंसर और न्यूरोलॉजिकल डिज़ीज़ जैसे रोगों से है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली में लगातार बहुत ख़राब हवा की वजह से कैंसर का जोखिम भी बढ़ रहा है, और यह सिर्फ़ अस्थायी नहीं बल्कि दीर्घकालीन स्वास्थ्य समस्या है। प्रमुख वैज्ञानिक और मेडिकल एक्सपर्ट यह कह रहे हैं कि दिल्ली का वायु प्रदूषण चाहे कोविड-19 जैसे संक्रमण की तरह नज़र न आये, लेकिन स्वास्थ्य के लिए बहुत ख़तरनाक “साइलेण्ट पैण्डेमिक” की तरह है। प्रदूषण लम्बी अवधि में जीवन की औसत आयु को बहुत प्रभावित करता है, और यह सिर्फ़ साँस की बीमारी नहीं, बल्कि हृदय, दिमाग़, कैंसर और अन्य गम्भीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। यह सिर्फ़ एक “मौसमी असुविधा” या “ठण्ड के वक्त का अस्थायी मसला” नहीं माना जाना चाहिए – यह एक गम्भीर पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी मानी जा रही है।

आइए अब जानते हैं दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण के स्तर के गिरने के मुख्य कारण क्या हैं।

दिल्ली में प्रदूषण के मुख्य कारण

दिल्ली में वायु प्रदूषण एक जटिल और बहुआयामी समस्या बन चुकी है, जिसके पीछे कई प्रमुख कारक हैं।

  1. वाहनों से होने वाला प्रदूषण : शहर में वाहनों की संख्या में लगातार वृद्धि, पुराने इंजन वाले वाहन और ख़राब गुणवत्ता वाला ईंधन वायु गुणवत्ता को गम्भीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। विशेष रूप से डीज़ल चालित वाहन, PM2.5 और PM10 जैसे हानिकारक सूक्ष्म कणों का उत्सर्जन करते हैं, जो श्वसन सम्बन्धी बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
  2. औद्योगिक प्रदूषण : दिल्ली और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से सल्फ़र डाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOx) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) जैसी हानिकारक गैस उत्सर्जित होती हैं। ये प्रदूषक वायु की गुणवत्ता को बिगाड़ते हुए स्वास्थ्य पर गम्भीर प्रभाव डालते हैं। इस प्रदूषण को रोकने के लिए जिस प्रकार के तकनीकी इन्तज़ाम किये जाने चाहिए, उनसे पूँजीपतियों को सरकार ने पूरी छूट दे रखी है। नतीजा सामने है।
  3. निर्माण कार्यों से उत्पन्न धूल : शहर में चल रहे निर्माण कार्य बड़ी मात्रा में धूल फैलाते हैं। नियमों के अनुपालन की कमी और निर्माण सामग्री के खुला रहने से यह धूल वायु में मिश्रित होकर प्रदूषण बढ़ाती है।
  4. पराली का जलाना : सर्दियों में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के धनी पूँजीवादी किसान खेतों की सफाई के लिए सही वैज्ञानिक प्रणाली अपनाने के बजाय पराली जलाते हैं, क्योंकि इससे ख़र्च कम होता है। इसका धुआँ हवा के साथ दिल्ली तक भी पहुँचता है और शहर में वायु प्रदूषण बढ़ा देता है। लेकिन पराली जलाने की दर में पिछले वर्ष के मुक़ाबले 50 से 70 प्रतिशत तक की कमी आयी है।

कुछ अन्य कारण भी हैं जैसे कचरा जलाना। घरेलू और औद्योगिक कचरे को खुले में जलाना भी हानिकारक धुएँ और रसायनों का स्रोत है और नये मकान, सड़क और मेट्रो निर्माण के काम से बहुत अधिक धूल उड़ती है, जिसे रोकने के पर्याप्त उपाय नहीं किये जाते।

लेकिन दिल्ली में प्रदूषण का मुख्य कारण निजी वाहन हैं। दिल्ली एनसीआर में इसका मुख्य कारण फैक्ट्री-कारख़ानों से होने वाला प्रदूषण है। पिछले साल तक सरकार और गोदी मीडिया द्वारा सारे प्रदूषण का कारण सिर्फ़ पराली जलाने को बताया जाता था। यह सच है कि पराली जलाना तात्कालिक तौर पर प्रदूषण को बढ़ाने का काम तो करता ही है। लेकिन इस साल पराली जलाने में 77.5 प्रतिशत की कमी के बावजूद प्रदूषण अब तक के सबसे ख़राब स्तर तक पहुँच गया। इस बार प्रदूषण बढ़ने का एक कारण दिवाली में बेरोकटोक पटाखे जलाना भी रहा। बड़े स्तर पर पटाखे जलाने के कारण यह अचानक से बढ़ गया। सरकार को यहाँ के प्रदूषण की हालत को देखते हुए पटाखों को पूरी तरह से प्रतिबन्धित करना चाहिए था, लेकिन कहने को कोर्ट ने बस “ग्रीन पटाखे” जलाने के आदेश दिये, वैसे तो ये भी पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं हैं, बस “कम प्रदूषण” करते हैं, पर बाज़ार में नक़ली ग्रीन पटाखे और आम पटाखे बहुत आसानी से मिल रहे थे और सरकार द्वारा इस पर कोई ख़ास रोकटोक भी नहीं की गयी। ऊपर से संघ-भाजपा के लोग और भी ज़्यादा पटाखे जलाने के लिए लोगों को उकसा रहे थे। नतीजतन, दिवाली बीतते ही पूरी दिल्ली सफ़ेद धुन्ध की चादर से ढँक गयी और साँस लेना भी दूभर हो गया।

इस सबके बावजूद दिल्ली की मुख्यमंत्री बेशर्मी से यह कहती हैं कि इस बार दिवाली के बाद प्रदूषण में कमी आयी है। जब दिल्ली की आम जनता ज़हरीली हवा में साँस लेने को अभिशप्त है, तो मुख्यमंत्री वातानुकूलित कमरों के भीतर एयर प्यूरिफ़ायर के बीच रहकर इस तरह की बयानबाज़ियाँ कर रही हैं।

दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण का सबसे बड़ा हिस्सा कारख़ानों से आता है, जिसपर कोई भी रोक-टोक नहीं है। ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (टेरी) की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार एनसीआर में उद्योगों का कुल प्रदूषण में 40% से ज़्यादा योगदान है। रिपोर्ट में पार्टिकुलेट मैटर में योगदान (PM10 में 41%  PM2.5 में 44%) का सबसे बड़ा स्रोत कारख़ानों को बताया गया है। इसके बाद स्टोन क्रशर (PM10 में 22%, PM2.5 में 19%) का स्थान है। PM10 और PM2.5 बेहद छोटे व ज़हरीले गैस के कण होते हैं जो आसानी से हमारी साँस के माध्यम से फ़ेफड़ों में चले जाते हैं। अन्य ज़हरीली गैसों में एनसीआर में पावर-प्लाण्ट सल्फ़र डाइऑक्साइड  (46%) के सबसे बड़ा उत्सर्जक हैं, जबकि परिवहन कार्बन मोनोऑक्साइड (97%), वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (58%) और नाइट्रोजन ऑक्साइड्स  (66%) का सबसे बड़ा उत्सर्जक है। यही नहीं, दिल्ली जैसे शहर में प्रदूषण के बेहिसाब बढ़ने का एक और कारण यह है कि दिल्ली में इस शहर की क्षमता से काफ़ी ज़्यादा आबादी रहती है। इसका कारण यह है कि आज पूरे देश में कारख़ानों और नौकरियों का असमान बँटवारा होने के कारण बड़ी आबादी दिल्ली जैसे शहर में पलायन करती है और यहाँ हर तरह से दबाव बढ़ जाता है। इतनी बड़ी आबादी के साथ ही निजी वाहनों की संख्या भी यहाँ अत्यधिक है, जोकि अच्छे और सस्ते सार्वजानिक परिवहन के न होने के कारण है।

दिल्ली में  जानलेवा हो चुके प्रदूषण को लेकर सरकार ने क्या क़दम उठाये है इसपर एक नज़र डाल लेते हैं। सच्चाई यह है कि अभी तक केन्द्र और दिल्ली में सत्ता में बैठी भाजपा सरकार प्रदूषण की समस्या को लेकर गम्भीर नहीं दिख रही है। यह इससे भी पता चलता है कि दिल्ली में प्रदूषण विनाशकारी स्थिति में है लेकिन दिल्ली  सरकार की ओर से अब तक कोई जन स्वास्थ्य सलाह जारी नहीं की गयी। साफ़ दिख रहा है कि दिल्ली की जनता को इस स्वास्थ्य संकट से बचाने के लिए दिल्ली सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है। इसलिए दिवाली से पहले किसी भी तरह का कोई परहेज़ नही किया गया और न ही कोई बड़ी पाबन्दी लगायी गयी। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने बेशर्मी से कहा कि दिल्ली में पटाखे जलाने से कोई प्रदूषण नहीं हुआ, पर तत्काल ही सीएम ऑफ़िस में कुल 5.5 लाख के 15 एयर प्यूरिफ़ायर लगवा दिये गये।

मगर जब दिल्ली के नागरिक प्रदूषण के मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे हैं तो मुख्यमंत्री और अन्य नेता चुप्पी साधे बैठे हैं। उल्टा, शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और नागरिकों को दिल्ली पुलिस हिरासत में ले लेती है और सड़कों पर घसीटती है।  पुलिस का कहना है कि दिल्ली में किसी भी तरह का प्रदर्शन या जुटान सिर्फ़ जन्तर-मन्तर पर ही किया जा सकता है, वह भी 10 दिन पहले अनुमति लेकर – जिसे प्रदर्शन से एक दिन पहले ही बिना किसी वाजिब कारण के ख़ारिज भी किया जा सकता है। बस धीरेन्द्र शास्त्री जैसे भाजपा समर्थक दंगाई साम्प्रदायिक बाबा को लोगों की भीड़ के साथ सड़कों पर यात्रा निकालने की छूट है।

क्लाउड सीडिंगकी नौटंकी

बता दें कि केवल 2 बार की क्लाउड सीडिंग में अब तक दिल्ली सरकार 1.28 करोड़ रुपये स्वाहा कर चुकी है। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली!

अब समझते हैं कि “क्लाउड सीडिंग” क्या है और दिल्ली में क्यों यह प्रभावी नहीं हो सकता?

सबसे पहले मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और पर्यावरण मंत्री मनजिन्दर सिंह सिरसा के क्लाउड सीडिंग के दावों की सच्चाई जानते हैं! क्लाउड सीडिंग में विमान या ड्रोन का इस्तेमाल करके बादलों में सिल्वर आयोडाइड के कण डाले जाते हैं, जिनकी संरचना बर्फ़ जैसी होती है। पानी की बूँदें इन कणों के चारों ओर इकट्ठा हो जाती हैं, जिससे बादलों की संरचना बदल जाती है और वर्षा की सम्भावना बढ़ जाती है। क्लाउड सीडिंग का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों ने साफ़ कहा है कि यह कोई रामबाण उपाय नहीं है। इससे बादलों की तुलना में ज़्यादा बार और ज़्यादा भारी बारिश होती है, लेकिन इसका असर अक्सर कम होता है। इस प्रक्रिया के लिए बादलों की भी ज़रूरत होती है और सर्दियों में जब प्रदूषण चरम पर होता है, तब अक्सर बादल दिल्ली में मौजूद नहीं होते। यह प्रदूषण के मूल कारणों का भी समाधान नहीं करता। दिल्ली स्थित सेण्टर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज के दो प्रोफ़ेसरों ने इस योजना की निन्दा करते हुए इसे एक “नौटंकी” बताया। शहजाद गनी और कृष्ण अच्युत राव ने ‘द हिन्दू’ अख़बार में लिखा कि यह विज्ञान के ग़लत इस्तेमाल और नैतिकता की अनदेखी का एक सटीक उदाहरण है।उन्होंने इन योजनाओं की तुलना उन “स्मॉग टावरों” से की, जिन्हें पिछली सरकार ने अरबों रुपये की लागत से दिल्ली में बनवाया था, लेकिन वायु गुणवत्ता में सुधार लाने में ये टावर काफ़ी हद तक निष्प्रभावी पाये गये।

आपको बता दें कि क्लाउड सीडिंग में प्रयुक्त रसायनों, जैसे सिल्वर आयोडाइड या सोडियम क्लोराइड, के बार-बार उपयोग से कृषि और मानव स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है। आईआईटी दिल्ली में किये गये एक अध्ययन में बताया गया है कि क्लाउड सीडिंग दिल्ली की सर्दियों में होने वाले वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने का न तो मुख्य और न ही भरोसेमन्द तरीक़ा हो सकता है, क्योंकि दिल्ली का मौसम इसके लिए उपयुक्त नहीं है। उनके अनुसार क्लाउड सीडिंग और स्मॉग टावर जैसे समाधान ध्यान भटकाने वाले और संसाधनों की बर्बादी हैं।

असलियत यह है कि पहले तमाम फैक्ट्रियों को बिना पर्यावरण की परवाह किये, बेधड़क बिना किसी अवशिष्ट व प्रदूषण संसाधन के उत्पादन करने की खुली छूट दी जाती है और जब प्रदूषण अपने चरम पर पहुँच जाता है, तो प्रदूषण के आँकड़े छिपाने की कोशिश की जाती है। उदाहरण के लिए रात में दिल्ली में प्रदूषण की रीडिंग ही ग़ायब हो जाती है। दिल्ली का AQI जिसकी ऊपरी रीडिंग 500 ही है, प्रूदषण उससे कहीं ऊपर चला जाता है, जैसा कि कई अन्तरराष्ट्रीय मापकों ने बताया भी है। लेकिन जब सच छिपाये नहीं छिपता तो “क्लाउड सीडिंग” की नौटंकी शुरू कर दी जाती है और हमें बताया जाता है “फिकर नॉट, सब चंगा सी!” कुल मिलाकर बात यह है कि सरकार प्रदूषण पर पिछले आठ महीने से आँख मूँदकर बैठी रहती है और जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है तो आनन-फ़ानन में कुछ दिखावटी ड्रामा शुरू कर देती है।

दिल्ली में प्रदूषण के कारणों के लिए ज़िम्मेदार कौन?

अक्सर तमाम न्यूज़ चैनलों, टीवी, अख़बारों के ज़रिये हमें बताया जाता है कि देश और दिल्ली में हो रहे प्रदूषण के लिए हम, यानी आम जनता ही ज़िम्मेदार है। हमने अपना काम ठीक से नहीं किया इसलिए प्रदूषण बढ़ रहा है। लेकिन हक़ीक़त यह नहीं है। इसके लिए तो मुख्य तौर पर सरकार और वे कारख़ाना मालिक ज़िम्मेदार हैं जो अपने मुनाफ़े की अन्धी हवस में प्रकृति को किसी भी हद तक निचोड़ने को तैयार हैं, बिना इसकी परवाह किये कि इसका धरती पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उत्पादन बढ़ाने के लिए कारख़ानों में तमाम सुरक्षा पैमानों को बाईपास कर दिया जाता है और इन कारख़ानों में बेरोकटोक उत्पतादन जारी रहता है। वैसे ही तमाम बड़े पूँजीपति किसानों द्वारा पराली को जला दिया जाता है और सरकार कुछ नहीं करती या नाम के लिए कुछ एफ़आईआर दर्ज कर लेती है। पूँजीपतियों के लिए काम कर रही यह सरकार उन्हें खुली छूट देती है और दोषारोपण आम जनता पर किया जाता है।

संक्षेप में कहें तो उद्योगों से, यातायात के विभिन्न साधनों से, जीवाश्म ईंधन के जलने से पैदा होने वाला धुआँ और रेडिएशन प्रदूषण के सबसे बड़े कारण हैं। और इन कारणों के कारण क्या हैं? पूँजीवाद के भोंपू अक्सर इसका कारण बढ़ती हुई आबादी को बताते हैं। प्रदूषण के बढ़ने और अनियंत्रित होने का कारण बढ़ती हुई आबादी नहीं है, बल्कि मुनाफ़े पर टिकी हुई पूँजीवादी व्यवस्था है। इस व्यवस्था में कोई भी उत्पादन, वाहन या कारख़ाने, आबादी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि मुनाफ़े के लिए होता है। यहाँ तक कि खाद्य पदार्थों का उत्पादन भी। तो ज़ाहिर है, इसके प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार भी मुनाफ़े पर आधारित व्यवस्था है, न कि आबादी। इतना ही नहीं इस अन्धी हवस में जो अतिरिक्त उत्पादन होता है तथा इस उत्पादन की प्रक्रिया में जो कचड़ा निकलता है वह सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जन के स्रोतों में आते हैं और यही इस पूरे धरती पर ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी ज़िम्मेदार होते हैं।

प्रदूषण के बढ़ते ही जब सरकार हर तरीक़े से इस रोकने में विफ़ल हो जाती है, तो हर बार इसका ठीकरा आम जनता पर फोड़ा जाता है। दिल्ली की ज़हरीली हवा में हर दिन आम लोगों का दम पहले ही घुट रहा है, ऐसे में तमाम निर्माण कार्यों पर रोक लगाने, स्कूल-कॉलेज बन्द कर देने, कई परिवहनों पर रोक लगाने तथा सरकारी मानकों को न मानने का हवाला देकर लोगों पर जुर्माना लगाने जैसे तरीक़ों से आम जनता को ही प्रताड़ित किया जाता है।

फ़िलहाल, दिल्ली व देश के अन्य हिस्सों में भयावह वायु प्रदूषण की स्थिति से निपटने के लिए केन्द्र व दिल्ली सरकार तत्काल यह करना चाहिए :

1) दिल्ली में स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा की जाये और इससे लोगों को बचाने के लिए तत्काल ठोस और प्रभावी योजना ली जाये।

2) दिल्ली सरकार की जवाबदेही तय हो – मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता स्वयं रिपोर्ट पेश करें।

3) प्रदूषण नियंत्रण पर एक जन नागरिक समिति गठित की जाये, जिसमें आम नागरिक शामिल हों।

4) निजी वाहनों से हो रहे प्रदूषण को कम करने के लिए सस्ते और बेहतर सार्वजनिक परिवहन का नेटवर्क खड़ा किया जाये।

5) ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को उपयोग में लाया जाना चाहिए।

6) औद्योगिक अपशिष्ट का निष्पादन पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित मापदण्डों के अनुसार किया जाना चाहिए।

7) सुरक्षा मापदण्डों का उल्लंघन करने वाले कारख़ाना मालिकों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जानी चाहिए और उनका पंजीकरण रद्द किया जाना चाहिए।

8) सीवेज ट्रीटमेण्ट की उचित व्यवस्था की जाये।

9) प्रदूषण के कारण बढ़ रही बीमारियों के उपचार के लिए सरकार को निःशुल्क और उचित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करानी चाहिए।

10) अगर निर्माण कार्य पर रोक लगायी जाती है, तो सभी निर्माण मज़दूरों को पर्याप्त गुज़ारा भत्ता दिया जाये।

11) फैक्ट्रियों को विकेन्द्रित किया जाये और देश के अन्य इलाक़ों में इनका विस्तार किया जाये जिससे दिल्ली जैसे शहरों के भार को कम किया जा सके।

हमें यह भी समझना होगा कि प्रदूषण की समस्या का अन्त इस मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था में हो ही नहीं सकता है क्योंकि वायु प्रदूषण की समस्या पूँजीवादी समाज व्यवस्था की अन्तर्निहित अराजकता, समृद्धिशाली वर्गों की निकृष्ट स्वार्थपरता और विलासिता तथा पूँजीवादी समाज में सरकारों की वर्गीय पक्षधरता का परिणाम है।

जन समुदाय यदि जागरूक होकर और संगठित होकर दबाव बनाये, तभी सत्तातंत्र को इस समस्या से राहत दिलाने के लिए कुछ सार्थक क़दम उठाने को बाध्य किया जा सकता है। इस समस्या का अन्तिम और निर्णायक समाधान तभी हो सकता है जब लोभ-लाभ और स्वार्थपरता की जननी पूँजीवादी व्यवस्था को जन समुदाय द्वारा उसकी सही जगह, इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया जाये।

 

मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2025

 

 

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