मज़दूरों-मेहनतकशों को संगठित होकर अपने हक़ के लिए लड़ना होगा
– संजय, अलीपुर, दिल्ली
मैं दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र हूँ। मैं दिल्ली के नरेला में आने वाले अलीपुर गाँव में रहता हूँ। मैं ‘मज़दूर बिगुल’ के पाठक के अनुभव के आधार पर अपने विचारों को साझा करना चाहता हूँ। मैं पिछले डेढ़ वर्षों से मज़दूर बिगुल अख़बार का पाठक रहा हूँ। मुझे लगता है यह अन्य अख़बारों की तुलना में जनता के बीच उन विचारों को ले जा रहा है जिन्हें ले जाने की मंशा और हिम्मत कॉरर्पोरेट मीडिया में नहीं है। आज के दौर में छात्रों- युवाओं, मज़दूरों और ग़रीब किसानों के एक बड़े हिस्से में व्यवस्था को लेकर गहरा असंतोष है और कुछ कर गुज़रने का जोश है। इसलिए हमें ऐसी अख़बार की सख़्त ज़रूरत है जो समाज में हो रही घटनाओं का सही नज़रिये से विश्लेषण प्रस्तुत करता हो, एक सामाजिक वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करता हो।
मौजूदा व्यवस्था की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रक्रियाओं के वास्तविक रूप को जानने के लिए मज़दूर बिगुल अख़बार महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह वर्ग-संघर्ष को वैज्ञानिक भौतिकवादी आधार प्रस्तुत करता है। जैसा कि हम जानते हैं कि मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के कल-कारख़ानों और खेतों में काम करने वाली मेहनतकश आबादी का ख़ून चूसा जाता रहा है। पूँजीपति मुनाफ़े को बरक़रार रखने के लिए तरह-तरह के हथकण्डे अपनाता रहा है। एक तरफ़ तो बेरोज़गारी की मार है तो दूसरी तरफ़ मज़दूरी इतनी कम दी जाती है कि मज़दूर अपने जीवन-यापन के लिए ज़रूरी संसाधनों को जुटाने में असमर्थ है। इस स्थिति में वह बमुश्किल ही जीवित रह पाता है, लेकिन व्यावसायिक मीडिया में वही जानकारी दी जाती है जो पूँजीपति और उनके पार्टियों के मुताबिक़ हमारी सोच को संचालित करने में मददगार हो। आज कॉरर्पोरेट और गोदी मीडिया के न्यूज़ चैनल शासक वर्ग और पूँजीपतियों के हाथों की कठपुतली हैं, इन्हें जनता के दुःख-दर्द से कोई सरोकार नहीं रह गया है। इस स्थिति में यह ज़रूरी बन जाता है कि मज़दूर बिगुल अख़बार मेहनतकश आबादी तक पहुँचे और वे वर्ग और वर्ग विचारधारा को समझने की चेतना विकसित करें। मैं पिछले कई वर्षों से अलीपुर में रह रहा हूँ जो कि नरेला के निर्वाचन क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। अलीपुर में एक प्रशासनिक मुख्यालय भी है। यहाँ सामाजिक वर्ग मतभेद व्यापक स्तर पर हमेशा मौजूद रहा है। एक तरफ़ आरएसएस जैसी फ़ासीवादी संस्था पिछले कई वर्षों से पैर फैलाए हुए है जो हिन्दुत्ववादी कट्टरता का प्रचार कर रही है। विचित्र बात यह है कि यह संस्था अलीपुर को हरिपुर के नाम से सम्बोधित करती है। दूसरी तरफ़ मध्यम वर्ग की स्थानीय आबादी ने भी यूपी और बिहार से आने वाली मेहनतकश आबादी को कमरों के किराये और दबंगई से उनके ऊपर अपने दबदबे को बरक़रार रखा है। मुझे लगता है इन विकराल परिस्थितियों में वर्ग-संघर्ष जैसे विचारों को मज़दूर बिगुल और उसके अध्ययन चक्रों के ज़रिये मेहनतकश आबादी में ले जाने की ज़रूरत है ताकि उनमें एक वर्ग चेतना विकसित हो।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2020













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