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मेहनतकशों के खून से लिखी पेरिस कम्यून की अमर कहानी

पेरिस कम्यून में शामिल मेहनतकशों ने राजकाज चलाकर, बेहद महत्वपूर्ण व मौलिक फ़ैसले लेकर अपार सर्जनात्मकता का परिचय दिया था। यदि उनका मार्गदर्शन करने वाली सही विचारधारा से लैस एक क्रान्तिकारी पार्टी होती तो यह प्रयोग आगे बढ़ सकता था। पर अपने छोटे से जीवन में भी कम्यून ने यह तो साबित ही कर दिखाया कि पुरानी दुनिया को खाक में मिलाने के बाद व्यापक मेहनतकश अवाम की सामूहिक शक्ति और सामूहिक मेधा एक नई दुनिया का भी ढांचा खड़ा कर सकती है, एक नये जीवन का भी ताना-बाना बुन सकती है।

नई मज़दूर क्रान्ति की राह भी रौशन करती रहेगी पेरिस कम्यून की मशाल !

आज के समय में पेरिस कम्यून के आदर्श और मॉडल को याद करना विशेष प्रासंगिक है। समाजवादी क्रान्तियों की फ़ौरी पराजय और खासकर, पूंजीवाद की खुली बहाली के बाद, जब से पूरी दुनिया में निजीकरण-उदारीकरण का शोर मचा हुआ है, तब से मजदूर आन्दोलन के नेतृत्व पर काबिज सामाजिक जनवादी और तरह-तरह के बुर्जुआ सुधारवादी भी यह कहने लगे हैं कि इन घोर मजदूर-विरोधी नीतियों को स्वीकारने के अतिरिक्त मजदूर वर्ग के पास और कोई चारा नहीं है। समाजवाद और क्रान्ति का तो जैसे उन्होंने नाम ही भुला दिया है। उनके अनुसार, मजदूर वर्ग का लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा “कल्याणकारी राज्य” के बुर्जुआ मॉडल को पूरी तरह तोड़े जाने से बचाना है, सब्सिडी और रियायतों में कटौती को रोकना है और अपने ही भाइयों की छंटनी और रोजगार में कटौती की शर्तों पर अपनी तनख्वाहें बढ़वाना है।

लेनिन – मेहनतकश वर्ग के चेतना की दुनिया में प्रवेश करने का जश्न

एक तरफ खड़े हैं ख़ून चूसने वाले मुट्ठी भर अमीरो-उमरा, उन्होंने फैक्टरियाँ और मिलें, औज़ार और मशीनें हथिया रखे हैं, उन्होंने करोड़ों एकड़ ज़मीन और दौलत के पहाड़ों को अपनी निजी जायदाद बना लिया है, उन्होंने सरकार और फौज को अपना ख़िदमतगार, लूट-खसोट से इकट्ठा की हुई अपनी दौलत की रखवाली करने वाला वफादार कुत्ता बना लिया है। दूसरी तरफ खड़े हैं उनकी लूट के शिकार करोड़ों ग़रीब। वे मेहनत-मज़दूरी के लिए भी उन धन्‍ना सेठों के सामने हाथ फैलाने पर मजबूर हैं। इनकी मेहनत के बल से ही सारी दौलत पैदा होती है। लेकिन रोटी के एक टुकड़े के लिए उन्हें तमाम उम्र एड़ियाँ रगड़नी पड़ती हैं। काम पाने के लिए भी गिड़गिड़ाना पड़ता है, कमरतोड़ श्रम में अपने ख़ून की आख़िरी बूँद तक झोंक देने के बाद भी गाँव की अँधेरी कोठरियों और शहरों की सड़ती, गन्दी बस्तियों में भूखे पेट ज़िन्दगी गुज़ारनी पड़ती है। लेकिन अब उन ग़रीब मेहनतकशों ने दौलतमन्दों और शोषकों के ख़िलाफ जंग का ऐलान कर दिया है। तमाम देशों के मज़दूर श्रम को पैसे की ग़ुलामी, ग़रीबी और अभाव से मुक्त कराने के लिए लड़ रहे हैं जिसमें साझी मेहनत से पैदा हुई दौलत से मुट्ठी भर अमीरों को नहीं बल्कि सब मेहनत करने वालों को फायदा होगा। वे ज़मीन, फैक्टरियों, मिलों और मशीनों को तमाम मेहनतकशों की साझी मिल्कियत बनाना चाहते हैं। वे अमीर-ग़रीब के अन्तर को ख़त्म करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि मेहनत का फल मेहनतकश को ही मिले, इन्सानी दिमाग़ की हर उपज काम करने के तरीक़ों मे आया हर सुधार मेहनत करने वालों के जीवन स्तर में सुधार लायें उसके दमन का साधन न बनें।