बिगुल के तीन पाठकों के पत्र
आज सुबह ही डाक में ‘बिगुल’ का अंक गलत पते पर सही हाथों में लिया। डाकिये की इस गलती पर उसे धन्यवाद है।
हम यहाँ गुना में मज़दूरों में काम करते हैं। हम सीपीआई से मोहभंग हुए लोग हैं। सदस्य तो बने हुए हैं पर सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें? सदस्यता छोड़ने से गुना जैसे सामन्ती समाज में संघर्ष का झण्डा थामे अपेक्षाकृत बेहतर संगठन के बारे में गलत संदेश जाता है। कृपया मार्गदर्शन करें।
अंक मिलता रहे तो अच्छा लगेगा। यथासम्भव यथासमय अपना आर्थिक सहयोग भिजवा देंगे। हाँ, जल्दी ही ‘बिगुल’ आन्दोलन के नाम सौ रुपए का मनीआर्डर करने का वचन देते हैं।
— पुष्पराग, गुना, मध्यप्रदेश
आज कल मैं जहाँ कार्यरत हूँ, यानी ऊधमसिंहनगर इसके आस-पास में बहुत तेज़ी से उद्योगों का विस्तार हो रहा है। साथ ही आवासीय कालोनियाँ भी विकसित हो रही हैं। इससे समाज जनजीवन बहुत ही प्रभावित हो रहा है जबकि बिल्डरों और नवधनाढ्यों के पौ-बारह हो रहे हैं। आम आदमी की मुश्किलें पहले से ज़्यादा बढ़ गई हैं और अपराधों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो रही है जो कि इसकी आवश्यक परिणति ही है। इस तरह मेरी यह इच्छा है कि हमारे जागरूक ‘बिगुल’ के माध्यम से इस पर कुछ सार्थक लेखन हो और उसे यहाँ के जागरूक लोगों के बीच प्रचारित-प्रसारित किया जाए।
आपका साथी,
— अविनाश कुमार, रुद्रपुर, ऊधमसिंहनगर
‘बिगुल’ लगातार मिलता रहा है। कहानियों के बारे में आपका प्रयास आपकी इच्छा शक्ति को दर्शाता है। दरअसल जिनकी कहानियाँ हैं, वे कहें या लिखें तो बहुत अच्छा, पर क्या ऐसा ही है। जनार्दन को पढ़ना मुझे संवेदनशील बना गया—लोधा, चइया की कहानी देश के सत्तर फ़ीसदी का क्रूर यथार्थ है।—पर इस क्रूर यथार्थ को प्रकृति का नियम तो नहीं माना जा सकता—ऐसी स्थिति में हुई क्रूरता के ख़िलाफ़ क्या वैचारिक हस्तक्षेप आवश्यक नहीं, वह भी क्यों और कैसे के रूप में, जर्नादन के साथ, तथा उन्हीं की तरह बहुत से ऐसे हैं जो इस प्रकार से सक्रिय हैं—वे नामी भी तथा अनामी भी हो सकते हैं। उन्हें प्रकाश में लाना, बार-बार लाना बुरा नहीं होगा।
— रामनाथ शिवेंद्र, राबटर्ससंगज, सोनभद्र
बिगुल, दिसम्बर 2006-जनवरी 2007













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