मई दिवस के अवसर पर RWPI द्वारा शाहबाद डेरी, दिल्ली में गली मीटिंग का आयोजन
1 मई यानी अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस के अवसर पर शाहबाद डेरी, दिल्ली मे गली मीटिंग का आयोजन किया गया। इस दौरान मई दिवस की क्रान्तिकारी विरासत और आज के वक़्त में उसकी प्रासंगिकता पर बातचीत की गयी। इसके साथ ही नोएडा व गुड़गाँव में मज़दूरों के आन्दोलन और सरकार द्वारा मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं के बर्बर दमन पर भी बातचीत की गयी।
सभा में एकत्र लोगों को वक्ताओं द्वारा बताया गया कि 1886 में शिकागो के मज़दूरों ने अपने संघर्ष और क़ुर्बानियों से जिस मशाल को ऊँचा उठाया था, उसे मज़दूरों की अगली पीढ़ियों ने अपना ख़ून देकर जलाये रखा और दुनियाभर के मज़दूरों के अथक संघर्षों के दम पर ही 8 घण्टे काम के दिन का क़ानून बना। इसी प्रकार, मज़दूरों की कुर्बानियों और लड़ाइयों के बूते ही उन्होंने अन्य सभी जनवादी श्रम अधिकार क़ानूनी तौर पर हासिल किये। लेकिन पिछले पाँच-छह दशकों में, यानी नवउदारवाद के दौर में, मज़दूरों के अधिकार दुनिया के अधिकांश देशों में पूँजीवादी सरकारों ने एक-एक करके छीने हैं। प्रभावत: यही काम फ़ासीवादी मोदी सरकार के नये लेबर कोड भी करते हैं।
‘आठ घण्टे काम, आठ घण्टे मनोरंजन, आठ घण्टे आराम’ के नारे के साथ एक इन्सानी ज़िन्दगी के हक़ के वास्ते शिकागो के मज़दूरों ने एक शानदार संघर्ष लड़ा जिसमें एल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, एडोल्फ़ फ़िशर व जॉर्ज एंजेल जैसे हमारे वीर मज़दूर साथी शहीद हुए थे। इनके संघर्ष के बूते दुनियाभर में आठ घण्टे के काम के दिन के हक़ को पूँजीपति वर्ग को अन्तत: स्वीकार करना पड़ा। लेकिन आज की सच्चाई यह है कि 2026 में कई मायनों में मज़दूरों के हालात 1886 से भी बदतर हो गये हैं। मज़दूरों की ज़िन्दगी आज भयावह होती जा रही है। दो वक़्त की रोटी कमाने के लिए 12-12 घण्टे खटना पड़ता है। पूरी ज़िन्दगी मालिकों के शोषण के पहिए में गोल-गोल घूमती रहती है।
मई दिवस के हमारे शहीदों ने अपना ख़ून बहाकर ‘आठ घण्टे काम, आठ घण्टे मनोरंजन, आठ घण्टे आराम’ का अधिकार हासिल किया था। लेकिन आज मज़दूर वर्ग के इस अधिकार को फ़ासीवादी मोदी सरकार चार लेबर कोड के ज़रिये ख़त्म कर रही है। जिस तरह से शिकागो के हे मार्केट स्क्वायर में मज़दूरों की सभा में पुलिस और मालिकों के गुण्डों ने ही बम फेंककर सारा इल्ज़ाम मज़दूरों और मज़दूर नेताओं पर डाल दिया था, ठीक उसी पद्धति पर अमल उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और उसकी पुलिस ने मज़दूर आन्दोलन व उसके एक्टिविस्टों के साथ किया है। नोएडा में तीन दिन से मज़दूर शान्तिपूर्वक हड़ताल कर रहे थे। मालिक और सरकार तरह-तरह से इस हड़ताल को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे।
लेकिन हर बार उनके हाथ नाकामयाबी ही लग रही थी। अब तमाम अख़बारी रपटों व सबूतों के सामने आने से साफ़ प्रतीत हो रहा है कि मज़दूरों की शान्तिपूर्वक हड़ताल से बौखलाकर मालिकों और सरकार ने आन्दोलन का दमन किया। ऐसी ख़बरें व रपटें सामने आ चुकी हैं जिन्होंने नोएडा में 13 अप्रैल को हुई हिंसा में उत्तर प्रदेश पुलिस की भूमिका पर गहरा सन्देह पैदा कर दिया है। दूसरी ओर, बेगुनाह सामाजिक कार्यकर्ताओं पर इस हिंसा का इल्ज़ाम डाल उन्हें जेलों में डाल दिया गया है। पानीपत से लेकर गुड़गाँव-मानेसर और नोएडा हो या देश के अन्य हिस्सों में हुई हड़तालें हों, फ़ासीवादी मोदी सरकार जायज़ हक़ों के लिए उठ रही मज़दूरों कि आवाज़ का बर्बर दमन कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे मज़दूर डर जायेंगे? क्या मज़दूर अपने हक़ों की आवाज़ उठाना बन्द कर देंगे? जवाब है बिल्कुल भी नहीं। न इतिहास में ऐसा हुआ था, न वर्तमान में ऐसा हुआ है और न भविष्य में ऐसा होगा! जब-जब मज़दूरों का दमन होगा तब-तब मज़दूर वर्ग दोगुनी ताक़त और एकजुटता से अपनी माँगों को लेकर अपनी आवाज़ बुलन्द करेगा। हमारे पास मई दिवस कि शानदार क्रान्तिकारी विरासत है जिसकी प्रेरणा तमाम बर्बर दमन के बावजूद हमारे हौसलों को बुलन्द रखने के लिए काफ़ी है।
मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026













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