मई दिवस के दिन बिगुल मज़दूर दस्‍ता की ओर से हैदराबाद के जीडीमेटला औद्योगिक क्षेत्र के न‍िकट स्थित मज़दूर बस्‍ती रामी रेड्डी नगर में एक रैली निकाली गई

कल मई दिवस के दिन बिगुल मज़दूर दस्‍ता की ओर से हैदराबाद के जीडीमेटला औद्योगिक क्षेत्र के न‍िकट स्थित मज़दूर बस्‍ती रामी रेड्डी नगर में एक रैली निकाली गई। मोहल्‍ले के नुक्‍कड़ों व चौराहों पर सभाएँ करके मज़दूरों के बीच मई दिवस के इतिहास और उसके महत्‍व पर बात की गई। मज़दूरों ने उत्‍सुकता के साथ बात सुनी और अभ‍ियान के लिए सहयोग भी दिया।

रैली के दौरान बिगुल मज़दूर दस्‍ता के सदस्‍यों ने मई दिवस के बारे में मज़दूरों को जागरूक करते हुए बताया कि मज़दूर चाहे जिस भी देश में रहता हो, चाहे जो भी भाषा बोलता हो, उसका मजहब या उसकी संस्‍कृति चाहे जो भी हो, मज़दूर द‍िवस उसका सबसे बड़ा त्‍योहार है। यह दिन मज़दूरों के संघर्षों और मुक्ति की उनकी आकांक्षाओं का प्रतीक है। आज से 139 साल पहले अमेरिका के शिकागो शहर के मज़दूरों ने यह घोषणा की थी कि वे गाय-गोरू नहीं बल्कि इन्‍सान हैं और इसलिए ‘8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन’ उनका हक़ है।

1 मई 1886 को शिकागो सहित अमेरिका के कई शहरों में मज़दूरों ने अपनी गुलामी भरी ज़‍िन्‍दगी के ख़‍िलाफ़ बग़ावत का बिगुल फूँक दिया था। लाखों मज़दूरों ने एकजुट होकर हड़ताल का ऐलान करते हुए फ़ैक्ट्रियों व रेल यातायात को ठप्प कर दिया। इसी दौरान ‘8 घंटे काम, 8 घंटे आराम , 8 घंटे मनोरंजन’ का नारा आसमान में गूँज उठा। लेकिन पूँजीपति वर्ग ने अपने मुनाफ़े पर ख़तरा देख इस संघर्ष को ख़ून के दलदल में डुबोने की ठान ली। 4 मई को शिकागो के हेमार्केट स्‍क्‍वायर में मज़दूरों की हड़ताल को कुचलने के लिए एक साज़‍िश रची गयी। इस साज़‍िश के तहत हड़ताल के दौरान बम और गोलियाँ बरसायी गयीं और कई मज़दूर नेताओं को फ़र्जी तरीक़े से इस हिंसा के लिए ज़‍िम्‍मेदार ठहराते हुए मुक़दमें चलाए गए। इस झूठे मुक़दमे के बाद 4 मज़दूर नेताओं – अल्बर्ट पार्सन, अगस्त स्पाइस, जॉर्ज एँजिल और एडोल्फ फ़िशर – को फाँसी दे दी गयी। लेकिन मज़दूरों का आन्‍दोलन थमने की बजाय बढ़ता गया और वह पूरी दुनिया में फैल गया। अन्‍तत: पूँजीपति वर्ग को मज़दूर वर्ग की माँगों के आगे झुकना पड़ा। आज अगर दुनिया भर में मज़दूरों को कहने के लिए ही सही मगर कुछ अधिकार हासिल हैं तो इसमें शिकागो से शुरू हुइ इस बग़ावत की बड़ी भूमिका थी।

परन्‍तु आज मज़दूरों के अधिकार एक-एक करके छीने जा रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा उठाए गए मज़दूर विरोधी क़दमों के बारे में बात करते हुए वक्‍ताओं ने कहा कि श्रम क़ानूनों में मालिकों के हित में बड़ा फेरबदल किया जा रहा है। 4 लेबर कोड के लागू होने के बाद मज़दूरों का शोषण और बढ़ने वाला है और उनके लिए यूनियन बनाना और हड़ताल करना और मुश्‍किल हो जाएगा।
मज़दूरों का आह्वान किया गया कि हमें मई दिवस की क्रान्तिकारी विरासत से प्रेरणा लेनी चाहिए। मई दिवस की इस जलती हुई मशाल की लौ में हमें अपने संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा। हमें जाति–धर्म के झगड़े छोड़कर अपनी वर्गीय एकता क़ायम करनी होगी। हम अकेले और अलग-थलग रहकर अपनी समस्‍याओं का समाधान नहीं कर सकते हैं। हमें मिलजुलकर और एकजुट होकर कोशिश करनी होगी। हमें अपनी मज़दूरी बढ़ाने, काम के घण्‍टे कम करने जैसे अध‍िकरों के लिए संघर्ष करने के साथ ही साथ एक नये तरह के समाज के लिए संघर्ष करना होगा। एक ऐसा समाज जहाँ फ़ैक्‍ट्रियों के मालिक मुट्ठी भर पूँजीपति नहीं बल्कि समूचा मज़दूर वर्ग हो। ऐसा समाज जहाँ शासन-प्रशासन धन्‍नासेठों के बजाय मेहनतकशों के हितों में काम करे। यानी हमें पूँजीवाद को उखाड़कर समाजवाद यानी मज़दूरों का राज क़ायम करने की तैयारी करनी होगी। यही मई दिवस के शहीदों को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
रैली के दौरान मज़दूरों के संघर्षों और बेहतर समाज बनाने के सपनों से जुड़े क्रान्तिकारी गीत भी प्रस्‍तुत किये गए। मज़दूरों के बीच मई दिवस पर हिन्‍दी और तेलुगू में निकाला गया पर्चा भी वितरित किया गया। कई मज़दूरों ने अपना सम्‍पर्क दिया और संगठित होने की ज़रूरत को स्‍वीकार क‍िया।