ख़ामोशियों को तोड़िये, आवाज़ दीजिये
प्राची, इलाहाबाद
हमें ‘मज़दूर बिगुल’ बहुत अच्छा लगता है। इसके पिछले कुछ अंकों को मैंने पढ़ा है। यह सच्चे अर्थों में एक क्रान्तिकारी अख़बार है, इसे पढ़ने के बाद हमें चीज़ों को सही रूप में देखने की प्रेरणा मिली। हर तरफ फैली बुराइयों, भ्रष्टाचार और पूँजीवाद का घिनौना सच देखने की दृष्टि हमें ‘मज़दूर बिगुल’ और एक अन्य पत्रिका ‘आह्वान’ के माध्यम से मिली। इसके लिए हम आप सबके आभारी हैं।
मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि यह सब जानने-समझने में मैंने इतना वक़्त क्यों लगाया, मैं इतनी मूर्ख क्यों थी। शायद इसका कारण यह है कि यहाँ पर न तो इसे जाने का कोई ज़रिया था और न ही बताने वाला। मैं भगतसिंह को एक सच्चे देशभक्त क्रान्तिकारी के रूप में बचपन से जानती थी, पर उनके सपनों को, उनके सच्चे उद्देश्य से पूरी तरह अनजान थी, जिसे मैंने अब जाना है।
मैं एक साधारण लड़की हूँ, मैं कोई राजनीतिक या वैज्ञानिक सोच नहीं रखती हूँ, पर मैं सबकुछ जानना और समझना चाहती हूँ। मैं सर्वहारा वर्ग के लिए और स्त्रियों की मुक्ति के लिए कुछ करना चाहती हूँ। मैं अपना सम्पूर्ण जीवन सर्वहारा वर्ग के लिए समर्पित करना चाहती हूँ। पर इस वक़्त मेरी जंग ख़ुद अपनी आज़ादी के लिए है। मुझे शशिप्रकाश जी का एक शेर बहुत प्रेरित करता हैः
‘इस हैबते हालात पे कुछ ग़ौर कीजिये, अब भी तो ख़ौफ़ छोड़िये आवाज़ दीजिये।
ग़म की नहीं ग़ुस्से की सदा बनके मेरे दोस्त, ख़ामोशियों को तोड़िये, आवाज़ दीजिये।’
मज़दूर बिगुल, अक्टूबर 2013













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