दैनिक हिन्‍दुस्‍तान में ‘बिगुल’ की चर्चा

आज (28/10/09) के दैनिक हिन्‍दुस्‍तान में प्रकाशित अपने कॉलम ‘ब्‍लॉग चर्चा’ में चर्चित पत्रकार और ब्‍लॉगर रवीश कुमार ने ‘बिगुल’ के ब्‍लॉग का विस्‍तृत उल्‍लेख किया है। साथ ही उन्‍होंने मुख्‍यधारा के मीडिया में मजदूरों और मजदूर आन्‍दोलनों की अनदेखी पर भी सवाल उठाया है। वे लिखते हैं कि मुख्‍यधारा के मीडिया में मजदूरों के मुद्दों के प्रति सहनशीलता खत्‍म होती जा रही है। मजदूरों के आन्‍दोलन खबर तभी बनते हैं जब वे कैमरों के लिए हंगामेदार और नजरें खींचने वाली तस्‍वीरें दे सकें। रवीश ने ‘बिगुल’ में प्रकाशित विभिन्‍न आन्‍दोलन और मजदूरों के शोषण की रिपोर्टों का भी जिक्र किया है। मजदूरों और मजदूरों के इस ब्‍लॉग की बातें व्‍यापक पाठक समुदाय तक पहुंचाने के लिए हम उनके आभारी हैं।

उनका लेख 

मजदूरों के प्रति मुख्यधारा की मीडिया की सहनशीलता खत्म होती जा रही है। सिंगूर से लेकर लालगढ़ तक की रिपोर्टों में मीडिया के नजरियों को देखा जा सकता है। गुड़गांव में मजदूरों का इतना बड़ा प्रदर्शन हुआ, लेकिन वे कैमरों के लिए हंगामेदार और नज़रें खीचने वाली तस्वीरें ही बन सके। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ ने तो इनकी उपेक्षाओं पर लिखा भी, लेकिन यह सही है कि हमारे समय की मीडिया में मजूदरों से जुड़े मुद्दे आकर्षक नहीं हैं। लेकिन जब ब्लॉग है तो चिंता की बात नहीं। बिगुल नाम के एक ब्लॉग पर जाइये वहां तमाम मजदूर आंदोलनों की खबरें हैं। क्लिक कीजिए-http://bigulakhbar.blogspot.com। आपको गोरखपुर में चल रहे मजदूर आंदोलन की खबरें मिलेंगी। बिगुल का एक नारा भी है- नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक। बिगुल बता रहा है कि गोरखपुर में करो या मरो का संघर्ष चल रहा है। प्रशासन मिल मालिकों के साथ है। मजदूरों का हौसला बढ़ाने के लिए कात्यायनी ने बुद्धिजीवियों से अपील की है। कहा गया है कि कुछ मजदूरों पर नक्सली उग्रवादी होने का आरोप लगा कर मारा-पीटा जा रहा है। संघर्ष किसलिए छिड़ा है? मजदूर चाहते हैं कि गोरखपुर के दो कारखाने श्रम कानून लागू करें। अब ये काम तो प्रशासन को करना चाहिए था, लेकिन हो क्या रहा है। चिदंबरम को यह भी देखना चाहिए।
बिगुल ब्लॉग पर ‘हिन्दुस्तान’ अखबार की ही एक ख़बर छपी है। आदित्यनाथ योगी का बयान है। औद्योगिक अशांति माओवादियों की साजिश है। सरकार और सांसद इससे आगे सोच ही नहीं सकते। श्रम कानूनों को लागू करवाने की बात कभी नहीं करेंगे। मैंने कुछ नौजवान लड़कों को देखा है। वो मेट्रो में काम कर रहे सफाईकर्मियों के अधिकारों के लिए मेट्रो भवन पर प्रदर्शन कर रहे थे। ऐसे प्रदर्शनों में अब दस लोग ही आते हैं। शायद इसलिए भी बड़ी खबर नहीं बनती होगी। पूर्वाग्रह थोपने की जल्दबाजी इसलिए की जाती है, ताकि मांग और मुद्दे पर पर्दा डाल सके। कोई नई बात नहीं है। बिगुल जिस तरह मजदूर आंदोलन की खबरों को संजो रहा है, उसका अध्ययन होना चाहिए।
ये और बात है कि हस्ताक्षर अभियानों से अब दबाव की राजनीति पुरानी पड़ती जा रही है। घर बैठे लोगों को उनके डेस्कटॉप से उठा कर लाना मुश्किल काम है। क्लिक कर आप समर्थक तो बन जाते हैं, लेकिन मजदूरों के आंदोलन पर वैसा असर नहीं पड़ता जैसे मंगलौर में राम सेने के खिलाफ दिल्ली की एक लड़की ने अपने फेसबुक पर पिंक-चड्डी कें पेन चला दिया। वो एक टोटका था जो चल निकला। घंटे भर के भीतर वह लड़की नारीवादी मध्यमवर्गीय आक्रोश का प्रतीक बन गई और तमाम स्टूडियो में नारीवाद के हक में दुनिया को ललकारती हुई आ गई। मजदूर सिर्फ भीड़ बन कर रह जाते हैं। दिल्ली के शाहाबाद में एक एम्ब्रॉयडरी में मशीनों को कहीं और शिफ्ट कर देने और मजदूरों को हटा देने को लेकर संघर्ष की रिपोर्ट है। बिगुल दस्ता समर्थन करने जाता है, लेकिन पुलिस के हाथों पीट दिया जाता है। पुलिस हमेशा मजदूरों को ही क्यों पीटती है।
ब्लॉग पर आठ-दस मजदूरों की तस्वीर छपी है। झंडा बैनर के साथ। मंदी के दौर में लाखों लोग निकाल दिये गए, लेकिन कहीं भी कोई प्रदर्शन नहीं हुआ। मध्यमवर्गीय कामगार या एक्जिक्यूटिव मालिक से सहानुभूति और पैकेज लेकर ही विदा हुए। लेकिन मजदूरों के साथ ऐसा नहीं होता। दिहाड़ी पर काम करते हैं और अगले दिन फेंक दिये जाते हैं। गुड़गांव और गोरखपुर के मजदूर क्या करें। चार साल पहले गुड़गांव में मजदूरों पर पुलिस ने बर्बरता की तो संसद में हंगामा हो गया। उसके बाद से कंपनियों ने पुलिस की जगह पहलवानों को भर लिया है।
बिगुल इन्हीं मजदूरों की बात कर रहा है। बताता है कि कैसे लुधियाना के एक मजदूर रामचरण का हाथ मशीन से कट गया। मालिक ने नौ दिनों तक इलाज तो करवाया लेकिन उसके बाद सादे कागज पर अंगूठा लगवा कर गायब हो गया। कोई मुआवजा तक नहीं दिया। हर दिन मजदूरों की अनदेखी हो रही है। नक्सल कह कर उन्हें और परेशान किया जाने लगता है।
बिगुल पर शहरी बेरोजगारों के लिए भी रोजगार गारंटी योजना की बात हो रही है। सरकार के ही आंकड़ें कहते हैं कि शहरों में बेरोजगारी और भुखमरी गांवों से कहीं ज्यादा है। दिशा छात्र संगठन और बिगुल शहरी रोजगार गारंटी योजना को लेकर एक अभियान भी चला रहा है। इनकी मांग है कि शहरी बेरोजगारों को 200 दिन काम दिया जाए।
अच्छी बात ये है कि बिगुल अकेला नहीं है। मजदूरों-किसानों और आदिवासियों के अधिकारों की बात करने वाले अब कई वेबसाइट और ब्लॉग बन गए हैं। जनचेतना, दायित्वबोध, बर्बरता के विरुद्ध, ललकार जैसे नाम हैं।
ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

Hindustan - Article on Bigul_28.10.09