आपस की बात
ये कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है

भोला सिंह चौहान,करावल नगर, दिल्ली 

मैं करावल नगर, दिल्ली में रहता हूँ। यहाँ मैं रिक्शा चलाने का काम करता हूँ। यह चिट्ठी मैंने अपनी बेटी से लिखवायी है क्योंकि मुझे लिखना-पढ़ना नहीं आता। जब मैं छह साल का था उस समय से ही मज़दूरी करना शुरू कर दिया था। बचपन में फ़रीदाबाद के एक मालिक की भैंस चराया करता था और उसके बदले मालिक मुझे सिर्फ़ खाना दिया करता था। कुछ वर्ष बाद बेहतर काम की तलाश में मैं रोलिंग मिल में काम करने लगा। यहाँ पर ठेकेदार हमसे हाड़-तोड़ मेहनत करवाता था; बदले में कुछ पैसा देता था, बाकी पैसे बाद में देने का वादा करता था। कुछ समय बाद वह मेरा पिछला बकाया पैसा लेकर भाग गया। इसके बाद मैं सोनीपत आ गया और वहाँ एक बड़े किसान के यहाँ खेत मज़दूरी करने लगा। वहाँ भी दिन-रात खटने के बाद भी जिन्दगी बड़ी मुश्किल से कट रही थी।

बेहतर जिन्दगी की तलाश में दिल्ली के मण्डोली इलाके में हैण्ड मशीन की फैक्ट्री में काम करने लगा। यहाँ दस साल तक मालिक बहला-फुसलाकर और कभी मीठी-मीठी बातें बोलकर काम करवाता रहा। यहाँ भी मालिक पूरे पैसे नहीं देता था। भूखे-प्यासे रहकर मैने एक हैण्ड मशीन खरीद ली पर उसे वहाँ के बड़े मालिकों ने चलने ही नहीं दिया। उसके बाद मैंने रिक्शा ले लिया। रिक्शा भी कई बार चोरी हो गया। जब मैं चोरी की रिपोर्ट लिखवाने थाने गया तो वहाँ चोर का नाम और पता बताने के बाद भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। राशन कार्ड बनवाने के लिए महीनों चक्कर काटता रहा, कई जगह पैसे भी दिये लेकिन सब बेकार रहा।

इस बीच मेरी पत्नी बीमार पड़ गयी; उसे दिखाने के लिए सरकारी अस्पताल ले गया, वहाँ डॉक्टरों ने इलाज में लापरवाही की जिसके कारण मेरी पत्नी नहीं बच सकी। कुछ रिश्तेदार हैं जो थोड़े पैसे वाले हैं; उन पर भी विश्वास किया और वहाँ से भी धोखा ही मिला।

अपनी ज़ि‍न्दगी के अनुभव से मुझे विश्वास हो गया है कि सभी पूँजीपति एक जैसे ही होते हैं और जब तक यह व्यवस्था क़ायम रहेगी तब तक हम मज़दूरों को दर-दर भटकना पड़ेगा, गालियाँ, डण्डे खाने पड़ेंगे और जान भी गँवानी पड़ेगी। इसलिए जितनी जल्दी हो इस व्यवस्था को बदल दो। पूँजीवाद मुर्दाबाद!

 

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2012