बर्बरता के नित नये प्रतिमान गढ़ने में लगी पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार!
कोलकाता में मेहनतकशों की एक बस्ती का पानी किया बन्द!
मजबूरी में हुगली नदी का गन्दा पानी इस्तेमाल करके बीमार पड़ रहे लोग!!
शिशिर
कहते हैं कि इतिहास से सीखने की त्रुटिनिवारक गतिविधि सिर्फ़ क्रान्तिकारी ताक़तें ही नहीं, फ़ासीवादी भी करते हैं। हमारे देश के हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादियों ने 20वीं सदी के दौरान हिटलर और मुसोलिनी के अंजाम से सीखा है और इसीलिए 21वीं सदी के फ़ासीवाद की ख़ासियत है कि वह बुर्जुआ जनवाद को अन्दर से निरन्तर खोखला करते हुए उसके खोल को बचाये रखता है या वह यातना शिविर बनाकर एक साथ बड़ी तादाद में अल्पसंख्यकों का क़त्लेआम करने जैसी कार्रवाई नहीं करता। लेकिन पूँजीपति वर्ग की सेवा के लिए तत्पर फ़ासीवादी, अल्पसंख्यकों पर और सामान्य तौर पर समूची ग़रीब आबादी पर ज़ुल्म ढाने का कोई न कोई तरीक़ा ईजाद करते ही रहते हैं। आम मेहनतकशों को कभी नोटबन्दी की मार झेलनी पड़ती है, तो कभी तालाबन्दी की। लगातार बढ़ती हुई तेल और गैस की क़ीमतों का बोझ भी सबसे ज़्यादा उन्हीं के सर आता है। एसआईआर जैसी कवायदों के ज़रिये लोगों को दर-दर भटकने के लिए मजबूर किया जाता है। पश्चिम बंगाल में भी चुनाव जीतने के बाद से ही फ़ासीवादियों के आतंकी कारनामे रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं।
यह बात भी सच है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के दुःशासन और आतंक के चलते फ़ासीवादी अपने साम्प्रदायिक प्रचार को जनता के एक हिस्से तक ले जा पाने और उसे वोट में परिवर्तित करने में कामयाब रहे थे। कई लोगों ने भाजपा को “विकास” के नाम पर वोट दिया था। लेकिन अभी से कई लोगों ने भाजपा को वोट देने के अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है, क्योंकि संघी-भाजपाई फ़ासीवादियों की बर्बरता अब सारी हदें पार कर रही है! पहले वे सड़क किनारे सामान बेचने वालों के पीछे पड़े और उनकी दुकानें बुलडोज़र से गिराकर उनकी रोज़ी-रोटी छीन ली! अब उन्होंने ज्योतिनगर नाम की मेहनतकशों की बस्ती में रहने वाले लोगों का पीने और नहाने का पानी भी बन्द कर दिया है! उत्तरी कोलकाता के काशीपुर इलाक़े में मौजूद इस बस्ती के निवासियों के लिए 29 जुलाई, 2026 से पानी की आपूर्ति बन्द कर दी गयी है। कोई भी अधिकारी बताने को तैयार नहीं है कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ! क्या इसलिए कि राज्य सरकार ज्योतिनगर के निवासियों पर साम्प्रदायिक हमला करके उन्हें वहाँ से भगाना चाहती है और उस ज़मीन को किसी बड़े पूँजीपति परजीवी को बेचना चाहती है? आम लोगों में तो यही बात फैली है कि सुवेन्दु अधिकारी की सरकार मिलेनियम पार्क से लेकर सर्वमंगला घाट तक की, क़रीब छः किमी लम्बी ज़मीन किसी पूँजीपति के हाथों बेचना चाहती है। इसके लिए उन्होंने सर्वमंगला घाट के छोर से शुरू होने वाली बस्ती ज्योतिनगर से शुरुआत की है जहाँ की कुल आबादी की बहुतायत मुसलमानों की है और इसलिए अधिकारी की भाजपा सरकार ने अंग्रेज़ों के नक़्शेक़दम पर चलते हुए धर्म के नाम पर जनता को “बाँटो और राज करो” का हथकण्डा अपनाया है।
बस्ती के निवासियों ने राज्य प्रशासन से भी सम्पर्क करने की कोशिश की है, लेकिन उन्हें अधिकारियों से बार-बार निराशा ही हाथ लगी है। समस्या की शुरुआत में, वे सम्बन्धित नगरपालिका अधिकारी के पास एक अर्ज़ी लेकर गये थे और उन्हें चार-पाँच दिनों के भीतर आपूर्ति बहाल करने का भरोसा भी दिया गया था, लेकिन कुछ नहीं किया गया। इलाक़े की लगभग 10 महिलाओं ने काशीपुर-बेलगाछिया विधानसभा सीट के स्थानीय भाजपा विधायक रितेश तिवारी से भी मुलाकात की, जिन्होंने उनकी गुहार को यह कहकर ख़ारिज़ कर दिया कि न तो आपूर्ति बन्द करने के पीछे उनका हाथ था और न ही वे इसे बहाल करने में कोई मदद कर सकते हैं। इस समय हमें उनके उस घटिया साम्प्रदायिक भाषण को याद करना चाहिए जो उन्होंने अपनी विधानसभा सीट के मुस्लिम निवासियों को धमकाते हुए दिया था। उन्होंने कहा था कि वे मुसलमानों के लिए कोई काम नहीं करेंगे क्योंकि उन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया था। उन्होंने यहाँ तक धमकी दी थी कि भले ही वे अपने नेता मोदी के “सबका साथ, सबका विकास” के दृष्टिकोण से सहमत हैं, लेकिन वे “सबका हिसाब” भी करेंगे, जैसा कि मोदी ने ख़ुद 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान कहा था।
जब लोग अस्थायी व्यवस्था के तौर पर टैंकर से पानी की आपूर्ति के लिए नगरपालिका से सम्पर्क करते हैं, तो ज्योतिनगर बस्ती का नाम सुनते ही नगरपालिका तुरन्त मना कर देती है। नगरपालिका ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया है कि पानी की आपूर्ति में लगातार रुकावट की वजह क्या है। यह बस्ती चिटपुर स्टैण्ड बैंक रोड पर लगभग 400 मीटर लम्बाई में फैली हुई है। इस छोटे से हिस्से के दोनों तरफ़ के इलाक़ो में पानी की आपूर्ति सामान्य रूप से चल रही है। इस ख़ास हिस्से में मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं। हालाँकि कोई किसी भी धर्म का हो, पूरी बस्ती में ज़्यादातर मेहनत-मज़दूरी करने वाले लोग ही रहते हैं, जैसे कि रिक्शा चलाने वाले या दिहाड़ी मज़दूर आदि। बस्ती के दक्षिण की तरफ़ कई छोटी मैन्युफ़ैक्चरिंग इकाइयाँ और गोदाम हैं और दूसरी तरफ़ गन शेल रोड के किनारे शुरुआत में हथियारों का एक बड़ा सरकारी कारख़ाना, एक प्रिंटिंग प्रेस कारख़ाना, कुछ अपार्टमेण्ट कॉम्प्लेक्स, मेहनतकशों की कुछ बस्तियाँ, और रोज़मर्रा के सामान बेचने वाली कुछ छोटी-मोटी दुकानें हैं। ज्योतिनगर बस्ती के दोनों तरफ़ के निवासियों के बीच संघ परिवार का साम्प्रदायिक प्रचार फैलाया गया है कि ज्योतिनगर के निवासी “बांग्लादेशी” हैं।
अभी की स्थिति यह है कि आसपास के इलाक़ों में छोटे से मध्यम आकार के व्यवसायों – जैसे कबाड़ी के अलग-अलग सामान की रीसाइक्लिंग करने वाली इकाइयाँ, सीमेण्ट गोदाम वग़ैरह – में काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूरों का एक बड़ा हिस्सा ज्योतिनगर बस्ती से ही आता है। एक तरफ़, छोटी से मध्यम स्तर की मैन्युफ़ैक्चरिंग इकाइयों पर बड़ी कम्पनियों के बढ़ते असर के कारण लगातार बर्बाद होने का ख़तरा मण्डरा रहा है और दूसरी तरफ़, उद्यमी मध्यम वर्ग का यह हिस्सा अपनी विशिष्ट सामाजिक स्थिति के कारण मेहनतकश लोगों के प्रति नफ़रत रखता है। यह नफ़रत मज़दूरी को कम रखने और श्रम शक्ति का ज़्यादा से ज़्यादा शोषण करने की उनकी दीर्घकालिक ज़रूरत से पैदा होती है, जिसके लिए वे ग़ैर-आर्थिक दमनकारी तरीक़ों का भी इस्तेमाल करते हैं। निम्न-बुर्जुआ वर्ग, चाहे वह वेतनभोगी पेशेवर हिस्से से आता हो या उद्यमी हिस्से से, का निचला हिस्सा जहाँ हमेशा इस डर और चिन्ता में रहता है कि कहीं वह भी दिहाड़ी मज़दूर न बन जाये और अपनी इस आर्थिक अनिश्चितता के चलते क्रान्तिकारी प्रचार के अभाव में फ़ासीवादी प्रतिक्रिया का हिस्सा बनता है, वहीं उसका ऊपरी वेतनभोगी हिस्सा बेशी मूल्य के कुल अधिग्रहण के एक हिस्से की मलाई चाटता है, यानी अपनी श्रम शक्ति के मूल्य से ज़्यादा कमाता है और इस तरह शासक वर्गों के दैनिक कामकाज के कर्ताधर्ता के तौर पर उनके साथ स्वाभाविक क़रीबी बनने की वजह से वह फ़ासीवादी प्रचार के असर में सापेक्षतः जल्दी आता है और ऊपरी उद्यमी हिस्सा बड़ा पूँजीपति बनने की चाहत पाले हुए, “कारोबार करने में आसानी” के नारे के तहत ख़ासकर संकटकाल में फ़ासीवादियों का समर्थन आधार बनता है। टुटपुंजिया वर्ग से आने वाले ये तबके, अपनी वर्ग स्थिति के कारण, फ़ासीवादी प्रचार के असर में आकर, अपना गुस्सा असली वजह—यानी पूँजीवाद और उसके बड़े खिलाड़ियों—पर निकालने के बजाय मज़दूरों और मेहनतकश लोगों पर निकालते हैं। संघ परिवार का तंत्र अपने अनवरत साम्प्रदायिक प्रचार के ज़रिये ज्योतिनगर के मेहनतकश लोगों के प्रति नफ़रत फैलाता रहा है, क्योंकि “बांग्लादेशी” वाली बात यूँ ही नहीं फैली है। मध्यम वर्ग के ऐसे ही एक छोटे उद्यमी ने बस इतना माना कि पानी की आपूर्ति रोकना “बांग्लादेशियों” के लिए भी कुछ ज़्यादा ही सख़्त क़दम है” और इसके पहले वह ऐलान कर चुका था कि “बांग्लादेशियों” को हटाना ही चाहिए, भले ही इसके कारण उनका अपना कारोबार ही क्यों न बन्द हो जाये, जो पूरी तरह से ज्योतिनगर के मज़दूरों के भरोसे चलता है। अपने कारोबार के बन्द होने को लेकर उसका यह रवैया उसकी “बेपरवाही” से ज़्यादा उसके जल्द ही बर्बाद हो जाने की प्रबल आशंका की स्वीकार्यता और उससे उपजी निराशा को दर्शाता है; और यह बर्बादी इसलिए होने वाली है क्योंकि पूँजीवाद में एक आम नियम के तहत बड़ी पूँजी अक्सर छोटी पूँजी को निगल जाती है।
शुरू में बस्ती की बिजली आपूर्ति काटने की भी कोशिशें हुईं। लेकिन कुछ दिनों बाद इसे बहाल कर दिया गया—ज्योतिनगर के निवासियों की फ़िक्र करते हुए नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि बस्ती की सड़क से गुज़रने वाले ट्रकों और सामान ढोने वाली गाड़ियों (जो पास के छोटे मैन्युफ़ैक्चररों और सप्लायरों का सामान ढोती हैं) को शाम के समय दुर्घटना का डर था।
क्या हमें यह पूछने की ज़रूरत है कि नगरनिगम के अधिकारियों को आपूर्ति काटने और ज्योतिनगर के निवासियों के साथ बिलकुल भी सहयोग न करने के आदेश देने के पीछे कौन से लोग हैं? लोग यह शक़ क्यों न करें कि इसमें स्थानीय बीजेपी विधायक रितेश तिवारी शामिल हैं, जिन्होंने पहले ही अपने क्षेत्र के मुस्लिम निवासियों को धमकी दी है कि वे “सबका हिसाब” लेंगे? पश्चिम बंगाल राज्य में किस दल की सरकार है? 600 से 700 परिवारों की पानी की आपूर्ति काटना और इतने लम्बे समय तक उसे बहाल न करना, नगरनिगम, स्थानीय पुलिस, राज्य प्रशासन और सत्ताधारी दल के बीच की मिलीभगत को दिखाता है। सिर्फ़ संघ परिवार जैसा फ़ासीवादी संगठन ही इतनी निर्ममता के साथ ऐसा घिनौना काम कर सकता है। सुवेन्दु अधिकारी सरकार का यह फ़र्ज़ है कि वह राज्य के नागरिकों को पानी, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ मुहैया कराये, बिना इस बात की परवाह किये कि किसने किसे वोट दिया। इसलिए पश्चिम बंगाल राज्य सरकार ही इस घिनौने और अमानवीय काम के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है। साथ ही हमें यह बड़ा सवाल भी पूछना चाहिए कि भारत के तथाकथित “लोकतांत्रिक” और “धर्मनिरपेक्ष” संविधान का क्या मतलब है, अगर संविधान में मौलिक अधिकार के तौर पर दिये गये जीने के अधिकार से ज्योतिनगर के निवासियों को लगातार साफ़ पानी की आपूर्ति न देकर वंचित किया जा रहा है, और अगर नागरिकों को अपनी पसन्द की पार्टी को वोट देने के लोकतांत्रिक अधिकार से सामूहिक सज़ा के तौर पर वंचित किया जा रहा है—सिर्फ़ इस आधार पर कि उन्होंने सत्ताधारी दल को वोट नहीं दिया? इसलिए ज्योतिनगर के निवासियों का यह शक़ कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि उन्हें यह जगह छोड़ने पर मजबूर किया जा सके और गंगा (हुगली) के किनारे वाली ज़मीन अडानी को बेची जा सके, पूरी तरह से जायज़ है! जिस तरह से भाजपा सरकार अम्बानी और अडानी जैसे पूँजीपतियों की सेवा में दण्डवत होकर काम कर रही है, उसे देखते हुए यह शक़ बेबुनियाद नहीं है! उन्होंने बार-बार दिखाया है कि वे अपने आकाओं की सेवा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं! मुस्लिम अल्पसंख्यकों को दुश्मन के तौर पर पेश करना और धर्म के नाम पर लोगों को बाँटना उनका पुराना तरीक़ा रहा है और यहाँ भी ऐसा ही होता दिख रहा है।
मौजूदा हालात में, भाजपा-संघ द्वारा इलाक़े में फैलायी गयी साम्प्रदायिक नफ़रत के कारण ज्योतिनगर के निवासियों को पूरी तरह से साम्प्रदायिक और बर्बर तरीक़े से अलग-थलग कर दिया गया है। यहाँ तक कि 10 साल के बच्चों को भी पीने का पानी लाने के लिए लगभग एक किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। निवासियों को नहाने और शौचालय समेत साफ-सफ़ाई के कामों के लिए बहुत ज़्यादा प्रदूषित हुगली नदी का पानी इस्तेमाल करने पर मजबूर होना पड़ता है। ज़ाहिर है, इससे त्वचा के संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं, और बच्चों व बुज़ुर्गों को सबसे ज़्यादा ख़तरा है। लेकिन सुवेन्दु अधिकारी सरकार के अमानवीय फ़ासीवादी शासन ने अब तक कोई क़दम नहीं उठाया है और निवासियों को लगातार बेहद पीड़ादायक स्थिति में रखा है।
ऐसे में आज हर इन्साफ़पसन्द शख़्स को माँग करनी होगी कि ज्योतिनगर बस्ती में पानी की आपूर्ति फ़ौरन बहाल की जाये, इलाक़े में बीमार पड़े सभी लोगों को तुरन्त आपातकालीन चिकित्सकीय इलाज मुहैया कराया जाये, पानी की आपूर्ति में लगातार रुकावट और इस तरह ज्योतिनगर के नागरिकों को एक बहुत ही बुनियादी मानवाधिकार से वंचित रखने के मामले की उच्च-स्तरीय न्यायिक जाँच की जाये, इसके लिए ज़िम्मेदार निचले से लेकर ऊँचे स्तर तक के सभी दोषियों की पहचान की जाये और उन्हें कड़ी सज़ा दी जाये, स्थानीय काशीपुर-बेलगाछिया विधायक, रितेश तिवारी को उनके साम्प्रदायिक बयानों (कि वे मुसलमानों के लिए काम नहीं करेंगे) के लिए तुरन्त गिरफ़्तार किया जाये और पानी की आपूर्ति रोकने के पूरे मामले में उनकी भूमिका की जाँच की जाये, और राज्य के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ज्योतिनगर बस्ती के निवासियों से सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगें कि उनकी सरकार इस तरह की आपराधिक हरक़त को रोकने में पूरी तरह नाक़ाम रही है।
आज हमारे आसपास जब कई हज़ार लोगों के साथ इतनी बड़ी वारदात हो रही हो और फिर भी अगर यह बात हमें अन्दर तक नहीं झकझोरती, तो हमें ख़ुद से पूछना चाहिए कि क्या हममें थोड़ी भी इंसानियत बची है या भाजपा-संघ के साम्प्रदायिक फ़ासीवादी प्रचार ने हमें एक जीती जागती लाश में तब्दील कर दिया है?
हमें पूछना चाहिए कि क्या हमने अपना दिमाग़ संघ परिवार के हवाले कर दिया है या हम अभी भी सोच-समझ सकते हैं? क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम अपने सहनागरिकों के साथ खड़े हों और पूरी ताक़त से आवाज़ उठायें कि राज्य प्रशासन की हिम्मत कैसे हुई उन्हें पानी से वंचित करने की, जो एक बहुत ही बुनियादी और सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया मानवाधिकार है? क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम ज्योतिनगर के अपने भाइयों और बहनों के समर्थन में हर जगह बड़ी तादाद में सड़कों पर उतरें?
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026














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