बिहार के जमुई में 15 वर्षीय युवती के साथ हुए यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ चुप्पी तोड़ो!
गुण्डों द्वारा की जा रही हिंसा और “नैतिक पुलिसिंग” के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाओ!
बिहार मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस्तीफ़ा दो!

स्त्री मुक्ति लीग का बयान

बिहार के जमुई में 19 सितम्बर को एक 15 वर्षीय लड़की और उसका दोस्त मोटरसाइकिल पर जा रहे थे, तभी 6-7 लोगों ने उनका पीछा किया, जिनमें से कुछ ने अपने चेहरे भगवा कपड़े से ढके हुए थे। इन लोगों द्वारा लड़की के साथ यौन उत्पीड़न किया गया और उसे अभद्र तरीक़े से छुआ गया, जबकि लड़के को हमलावरों ने बुरी तरह पीटा। अपराधियों ने बेशर्मी से इस घटना का वीडियो भी बनाया और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया, जहाँ यह काफ़ी वायरल हो गया। इस घटना की क्रूरता ने वीडियो देखने वाले हर व्यक्ति को स्तब्ध कर दिया है।

इस भयावह घटना ने एक बार फिर हमारे देश में स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर गम्भीर सवाल खड़े कर दिये हैं। इन गुण्डों को लोगों पर हमला करने और उन्हें प्रताड़ित करने का अधिकार किसने दिया? “हमारी संस्कृति” की रक्षा के नाम पर ऐसे गुण्डों को सड़कों पर खुलेआम घूमने की छूट देने के लिए कौन ज़िम्मेदार है? 2026 में भी शाम के 7 बजे भी महिलाऍं सड़कों पर सुरक्षित क्यों नहीं हैं? महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और हमलों में इतनी वृद्धि क्यों हो रही है? इसके लिए कौन जवाबदेह होगा?

जमुई की घटना को अलग-थलग करके नहीं देखना चाहिए। लम्बे समय से “नैतिक पुलिसिंग” का एक सुनियोजित सिलसिला चल रहा है, जहाँ नन्दन यादव (इस घटना में शामिल में हमलावर अपराधी) जैसे लोग “संस्कृति की रक्षा” के नाम पर लोगों को धमकाने और उन पर हमला करने का ज़िम्मा खुद पर ले लेते हैं। वर्षों से बजरंग दल जैसे समूह, जो आरएसएस-भाजपा से सम्बद्ध एक फ़ासीवादी संगठन है, इस तरह की “नैतिक पुलिसिंग” में शामिल रहे हैं। उदाहरण के लिए, वैलेन्टाइन डे पर बजरंग दल के गुण्डे सार्वजनिक स्थानों पर गश्त लगाते हैं और भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर युवा जोड़ों को धमकाते हैं। अधिकतर मामलों में, इस तरह की कार्रवाई में धमकियाँ और हिंसा शामिल होती है। ऐसी घटनाओं के वीडियो और अन्य सबूतों के बावजूद, इन गुण्डों पर कोई सख़्त कार्रवाई नहीं की गयी है। इन संगठनों के ख़िलाफ़ अक्सर कार्रवाई में कमी दिखायी देती रही है। उदाहरण के तौर पर, राजकोट में फ़रवरी 2026 में वैलेन्टाइन डे के मौक़े पर गश्त के दौरान पुलिस ने विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के गुण्डों का साथ दिया था। हाल ही में पुणे के सिंहगढ़ क़िले में समस्त हिन्दू बन्धव सेना के आठ सदस्यों के ख़िलाफ़ “हिन्दू संस्कृति” की रक्षा के नाम पर एक युवती के शॉर्ट्स पहनने पर आपत्ति जताने के आरोप में मामला दर्ज किया गया। समूह पर एक अन्य दम्पति के साथ दुर्व्यवहार करने और नैतिक पुलिसिंग करने का प्रयास करने का भी आरोप है।

बिहार के जमुई से भाजपा विधायक श्रेयसी सिंह ने हालिया घटना के बाद कहा कि “नैतिक पुलिसिंग को शालीन और सम्मानजनक तरीक़े से अंजाम दिया जा सकता है”! साथ ही, यौन हिंसा से जुड़े मामलों में आरोपी या दोषी ठहराये गये पुरुषों को राजनीतिक समर्थन मिलता रहता है। उदाहरण के लिए, भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह ने उन्नाव बलात्कार मामले में दोषी ठहराये गये कुलदीप सिंह सेंगर का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। सिंह स्वयं 2026 में महिला पहलवानों से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में बरी हो गये थे, जिसके बाद उनके समर्थकों ने उनका भव्य स्वागत किया था। स्वामी चिन्मयानन्द, प्रज्ज्वल रेवन्ना, आसाराम बापू, राम रहीम जैसे लोगों को भी राजनीतिक समर्थन मिलता रहता है।

इस तरह यौन उत्पीड़न के कई आरोपी और दोषी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ताधारी पार्टी से जुड़े हुए हैं। वास्तव में भाजपा ही वह पार्टी है जिसके सबसे अधिक सांसद और विधायक स्त्री-विरोधी अत्याचारों के आरोपी हैं। हाल ही में, भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने गरबा में मुसलमानों की भागीदारी के बारे में कहा कि मुस्लिम पुरुषों को अपनी बहनों और बेटियों को लाना चाहिए और “हमारे लड़के” तैयार हैं। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को सीधे तौर पर बलात्कार की धमकी दी। एक फ़ासीवादी संगठन के नेताओं के लिए ऐसी बातों से कोई समस्या नहीं होती क्योंकि उनके विचारक सावरकर ने खुद लिखा है कि “बलात्कार को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।” ये वही लोग हैं जिन्होंने कभी “बहुत हुआ नारी पर वार, अबकी बार मोदी सरकार” और “बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ” जैसे नारे लगाये थे और उनका छात्र संगठन एबीवीपी कहता है, “नारी के सम्मान में, एबीवीपी मैदान में”। हक़ीक़त तो यह है कि ये फ़ासीवादी केवल तभी किसी महिला की “परवाह” करते हैं जब अपराधी मुस्लिम हो या जहाँ भी उन्हें अपनी गन्दी फ़ासीवादी साम्प्रदायिक राजनीति को अंजाम देने का मौक़ा मिले!

एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार, 2024 में पूरे भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के 4,41,534 मामले दर्ज किये गये। आये दिन महिलाओं को उनके पहनावे, आने-जाने के स्थान, घर लौटने के समय, बात करने के तरीक़े और यहाँ तक कि सार्वजनिक स्थानों पर उनके व्यवहार पर भी प्रतिबन्धों का सामना करना पड़ता है। महिलाओं को देर से घर न आने, पुरुषों से बात न करने, जोर से न हँसने, “खुले” कपड़े न पहनने और हिंसा से बचने के लिए लगातार अपने व्यवहार में बदलाव करने की सलाह दी जाती है। हिंसा करने वालों से सवाल करने के बजाय, समाज अक्सर महिलाओं पर “सुरक्षित रहने” का बोझ डाल देता है।

इससे हम फिर से उसी मूलभूत प्रश्न पर लौट आते हैं: महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की जड़ में क्या है? और समाज हिंसा करने वालों को जवाबदेह ठहराने के बजाय महिलाओं को नियंत्रित करना क्यों जारी रखता है? जवाब है पितृसत्ता। यह कोई घिसा-पिटा जुमला नहीं, बल्कि एक जीती-जागती और भयावह सच्चाई है, जो महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की जड़ में है। राहुल गांधी पितृसत्ता से लड़ने और “महिला सशक्तिकरण” को बढ़ावा देने की बातें तो करते हैं, लेकिन कांग्रेस के नेताओं द्वारा दिये गये महिला-विरोधी बयानों को पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर देते हैं। इस तथ्य को अनदेखा कर देते हैं कि उनकी अपनी पार्टी में भी ऐसे सांसद और विधायक हैं जिन पर महिलाओं के ख़िलाफ़ अत्याचार के आरोप हैं। राहुल गांधी या पूँजीपति वर्ग का कोई भी प्रतिनिधि कभी भी पितृसत्ता के ख़िलाफ़ सही मायने में लड़ाई नहीं लड़ सकता।

हमारे लिए, पितृसत्ता से लड़ना उस पूँजीवादी व्यवस्था से लड़ने से अलग नहीं है जो महिलाओं को बेगार खटाकर मुनाफ़ा कमाती है। पूँजीवाद के अन्तर्गत मुनाफ़े के लालच में मानवीय सम्बन्धों और यहाँ तक कि इंसानी जीवन को भी एक ख़रीदने-बेचने वाली वस्तु में तब्दील कर दिया जाता है। इस व्यवस्था में महिलाओं का श्रम, शरीर और जीवन भी एक “वस्तु” से अधिक कुछ नहीं होता है।

अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सत्ताधारी दल को बदलने मात्र से महिलाओं को मुक्ति नहीं मिल सकती। स्त्री मुक्ति के संघर्ष को पितृसत्ता और उस पूँजीवादी व्यवस्था, दोनों को चुनौती देनी होगी जो महिलाओं के दमन को बढ़ावा देती है और उससे मुनाफ़ा कमाती है। हम सबको एकजुट होकर पूँजीवादी पितृसत्ता के विरुद्ध लड़ना होगा और पीड़ितों के लिए न्याय तथा दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की माँग करनी होगी!

स्त्री मुक्ति लीग की माँगें:

  1. दोषियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई और गुण्डों द्वारा पीटे गये लड़के और लड़की को शीघ्र न्याय मिले।
  2. बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी घटना की ज़िम्मेदारी लें और इस्तीफ़ा दें।

पूँजीवादी पितृसत्ता का नाश हो!

पूँजीवाद हो बर्बाद! फ़ासीवाद मुर्दाबाद!

मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026

 

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