119वें जन्मदिवस (28 सितम्बर) के मौक़े पर शहीद-ए-आज़म भगतसिंह की संस्मृतियाँ
भगतसिंह जब भी कानपुर आता तो अन्य पुस्तकों के साथ नौजवान भारत सभा का कुछ न कुछ साहित्य अपने साथ अवश्य लाता था; राधामोहन गोकुलजी और सत्यभक्त के सम्पर्क ने कानपुर के हम सभी साथियों में समाजवाद की ओर रुझान पैदा कर दिया था। शचीन्द्रनाथ सान्याल के माध्यम से श्री राधामोहन गोकुलजी और सत्यभक्त से भगतसिंह का सम्पर्क काकोरी काण्ड से पहले ही स्थापित हो चुका था और यह चारों समाजवाद तथा कम्युनिज़्म पर काफ़ी विचार-विनिमय कर चुके थे। स्वर्गीय श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के नेतृत्व में हम लोगों ने कानपुर मज़दूर सभा में भी दिलचस्पी लेनी आरम्भ कर दी थी। आगे चलकर भगतसिंह ने हमारे उस रुझान को बल दिया और समाजवाद का अध्ययन तथा उस पर बहस आदि करने की प्रेरणा प्रदान की।
उनका कहना था कि अंग्रेज़ी दासता के विरुद्ध संघर्ष तो हमारे युद्ध का पहला मोर्चा है। अन्तिम लड़ाई तो हमें शोषण के विरुद्ध ही लड़नी पड़ेगी। चाहे वह शोषण मनुष्य द्वारा मनुष्य का हो या एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का हो। यह लड़ाई जनता के सहयोग के बग़ैर नहीं लड़ी जा सकती। इसलिए हमें हर सम्भव उपायों से जनता के अधिक से अधिक निकट पहुँचने का प्रयास करते रहना चाहिए। नौजवान भारत सभा की स्थापना, मज़दूर सभा में काम, पत्र-पत्रिकाओं में लेख-मालाएँ, मैजिक लैटर्न का प्रयोग, पर्चे और पैम्पलेट आदि इसी प्रयास के अंग थे।
भगतसिंह से पहले प्रचार तथा जनसम्पर्क की दिशा में इतना बड़ा तथा संगठित क़दम क्रान्तिकारियों ने नहीं उठाया था। यहाँ तक कि पकड़े जाने के बाद अदालत तक को उसने मुख्यतया अपने विचारों के प्रचार के साधन के रूप में ही इस्तेमाल किया। वह अच्छा योद्धा ही नहीं अच्छा प्रचारक भी था।
प्रचार के दो मुख्य साधन हैं, वाणी तथा लेखनी। भगतसिंह का दोनों पर समान अधिकार था। आमने-सामने की बातचीत में कुशल होने के साथ ही वह अच्छा वक्ता भी था। नौजवानों तथा विद्यार्थियों के बीच मैजिक लैटर्न पर उसके भाषण तो विशेष रूप से लोकप्रिय थे।
और कलम का धनी तो वह था ही। हिन्दी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी पर उसका समान अधिकार था। उन दिनों कॉमरेड मोहन सिंह जोश अमृतसर में ‘किरती’ नाम से गुरुमुखी तथा उर्दू में एक मासिक पत्रिका निकालते थे। भगतसिंह उनमें नियमित रूप से लिखता था। विभिन्न नामों से ‘किरती’ में क्रान्तिकारी शहीदों की जो जीवनियाँ प्रकाशित हुई थीं उनमें से अधिकांश भगतसिंह की ही क़लम की देन थीं। हिन्दी में उसने अधिकतर ‘प्रताप’ तथा ‘प्रभा’ (कानपुर), ‘महारथी’ (दिल्ली) और ‘चाँद’ (इलाहाबाद) में ही लिखा।
अंग्रेज़ी में लिखे हुए उसके लेख, अदालती वक्तव्य, पत्र, पर्चे आदि उसकी सशक्त शैली के प्रमाण हैं। नौजवान भारत सभा के घोषणा-पत्र का अंग्रेज़ी मसविदा भगवती चरण ने भगतसिंह के साथ मिलकर 1928 में तैयार किया था। भाषा, शैली तथा देश के उस समय के राजनीतिक स्तर को देखते हुए विचारों की परिपक्वता की दृष्टि से उस घोषणा-पत्र का आज भी एक ऐतिहासिक महत्व है। असेम्बली में बम फेंकने के बाद पकड़े जाने पर अदालत में उसने जो बयान दिया था वह तो उसी समय एक अन्तरराष्ट्रीय ख्याति का दस्तावेज़ बन गया था।
उसे पढ़ने-लिखने का भी बेहद शौक था। वह जब भी कानपुर आता तो अपने साथ दो-चार पुस्तकें अवश्य लाता। बाद में फ़रार जीवन में जब उसके साथ रहने का अवसर मिला तो देखा कि पिस्तौल और पुस्तक का उसका चौबीस घण्टे का साथ था। मुझे एक भी अवसर याद नहीं पड़ता जब मैंने उसके पास कोई न कोई पुस्तक न देखी हो।
1923-1924 में भगतसिंह के पिता उसका विवाह करने पर तुले गये थे। पिता की ज़िद से बचने के लिए वह भागकर कानपुर चला आया। कुछ दिन दिल्ली भी रहा। यहाँ उसने बड़ी मुसीबतों में दिन बिताये। दिल्ली, कानपुर से जब वह लाहौर वापस गया तो उसकी पगड़ी का स्थान एक छोटे अँगोछे ने ले लिया था। उसकी कमीज़ उसके शरीर का साथ छोड़ गयी थी और अब उसका बन्द गले का खद्दर का कोट कमीज़ का काम देख रहा था। कोट की आस्तीनें फट जाने पर उसने पायजामे की टाँग आस्तीन की जगह जोड़ ली थीं और पायजामे का स्थान उसकी चादर ने ले लिया था जिसे वह लुंगी की तरह इस्तेमाल करने लगा था। लेकिन इस हालत में भी उसके कोट की जेब में कोई न कोई पुस्तक अवश्य रहती थी।
भगतसिंह को सौन्दर्य, संगीत तथा कला से भी बेहद प्यार था। आगरा केन्द्र पर जब कभी पंजाब से सुखदेव आ जाता तो दोनों एक दूसरे में ऐसे खो जाते मानो और कोई हो ही नहीं। उस समय पंजाब कांग्रेस की गतिविधि, उसके नेताओं की आपसी पैंतरेबाज़ियाँ, नौजवान भारत सभा का काम, बुद्धिजीवियों का मानसिक चढ़ाव-उतार, क्रान्तिकारी आन्दोलन की समस्याएँ, मज़दूरों के संघर्ष आदि विषयों से लेकर किसने क्या पढ़ा है, पठित पुस्तकों के लेखकों की शैली और उनके विचार, नयी पिक्चर्स, अभिनेताओं की ऐक्टिंग आदि तक सभी बातों पर बहस होती।
(भगतसिंह के साथी शिव वर्मा द्वारा क्रान्तिकारी शहीदों के संस्मरणात्मक रेखाचित्र ‘संस्मृतियों‘ से साभार)
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026














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