मोदी राज में जीडीपी वृद्धि के आँकड़ों में व्यापक हेराफेरी! यह महज़ आँकड़ों की बाज़ीगरी नहीं बल्कि खुली डकैती है!
अमित
तुम्हारी फ़ाइलों में
गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आँकड़े झूठे हैं
यह दावा किताबी है
— अदम गोण्डवी
पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विदेश यात्रा के दौरान ही यह घोषणा कर दी कि उनकी सरकार के “अथक प्रयास” और देश में बैठे कुछ “निराशावादी” लोगों के नकारात्मक रवैये के बावजूद देश विकास की छलाँगें लगा रहा है और इस वित्त वर्ष यानी 2026-27 की पहली तिमाही में जीडीपी 7.8 प्रतिशत की ऊँचाई को छू रही है! लेकिन मज़ेदार बात यह रही कि इस ज़बरदस्त विकास के बावजूद मोदी जी ने जनता से अपील की कि वे विदेश न जायें, सोना न ख़रीदें और स्वदेशी अपनायें! किसी और मामले का तो नहीं पता लेकिन प्रधानमंत्री मोदी व फ़ासीवादी भाजपा सरकार ने झूठ और फ़रेब के मामले में अपने वैचारिक पूर्वजों हिटलर और गोएबल्स को भी पीछे छोड़ दिया है! आँकड़ों की बाज़ीगरी में तो इन्होंने और भी ऊँचे मुक़ाम हासिल किये हैं। फ़रेब का आलम यह है कि दुनिया की कोई भी संस्था भारत सरकार के आँकड़ों पर विश्वास नहीं कर रही है। यहाँ तक कि साम्राज्यवादी संस्था ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष’ (आईएमएफ़) ने भारत सरकार के आँकड़े को ‘सी ग्रेड’ की रेटिंग दी है, जिसका मतलब यह हुआ कि भारत के आँकड़ें विश्वसनीय नहीं माने जा सकते।
बहरहाल मोदी सरकार के हवाई दावे एक तरफ़, अपने जीवन के वास्तविक हालात से हर किसी को मालूम है कि देश में आर्थिक तबाही मची हुई है, बेरोज़गारी अपने चरम पर है, हालिया नीति आयोग की ही रिपोर्ट के अनुसार, 15-29 वर्ष के 8.4 करोड़ युवा न तो रोज़गारशुदा हैं , न ही शिक्षा में हैं। पिछले 10-12 वर्षों में वास्तविक मज़दूरी में कोई वृद्धि नहीं हुई है। पिछले 10 वर्षों में क़रीब 94 हज़ार सरकारी स्कूल बन्द हुए हैं और लोग शिक्षा व्यवस्था की दहलीज़ से बाहर हुए हैं, और यही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का भी है। यही आलम महँगाई का भी है जो कि विकराल रूप धारण कर चुकी है। लेकिन मोदी सरकार की फ़ाइलों में पूरे देश का रंग गुलाबी है और जनता लहालोट हो उठी है! बस, कुछ “दिमाग़ी नक्सल” जनता को बरगलाने का काम करते रहते हैं!
आइये ‘जीडीपी ग्रोथ’ के इस फ़र्ज़ी व झूठे आँकड़े का पर्दाफ़ाश परत दर परत करते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की इस घोषणा के बाद कि देश का जीडीपी इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही, यानी अप्रैल से जून 2026 में 7.8 प्रतिशत की दर से विकसित हुआ, मोदी सरकार के ही पूर्व वित्त सचिव सुभाष चन्द्र गर्ग ने इस पर गम्भीर सवाल खड़ा करते हुए बताया कि अंकित विकास दर 7.8 प्रतिशत नहीं बल्कि मात्र 2.6 प्रतिशत है। अगर मुद्रास्फीति को इसमें शामिल किया जाये तो वास्तविक विकास दर लगभग शून्य प्रतिशत के क़रीब होगी! उनका कहना था कि सरकार ने आँकड़ों की बाज़ीगरी करके पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आँकड़ों में भारी संशोधन कर के उसे क़रीब 86 लाख करोड़ रुपये से घटा कर क़रीब 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया है, और इससे अंकित विकास दर क़रीब 11 प्रतिशत और वास्तविक विकास दर क़रीब 7.8 प्रतिशत प्रतीत होती है। ख़ैर, सुभाष चन्द्र गर्ग ने मोदी सरकार की ‘जीडीपी ग्रोथ’ सम्बन्धी आँकड़ों के गुब्बारे की तो आते ही हवा निकाल दी, हालाँकि असली सवाल अभी भी मोदी सरकार द्वारा जीडीपी की गणना के लिए इस्तेमाल की जा रही पद्धति का है जिसपर कई अर्थशास्त्रियों प्रश्नचिह्न खड़े किये हैं। इस पर हम थोड़ा और विस्तार से चर्चा करते हैं। लेकिन उससे पहले समझते है कि क्या जीडीपी वृद्धि का मतलब आम मेहनतकश जनता की जीवन स्थिति में बेहतरी होती है?
जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद एक निश्चित अवधि में किसी भी देश के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है। जीडीपी यह नहीं बताता कि उत्पादित मूल्य समाज में किस प्रकार वितरित हो रहा है और इसकी वृद्धि से किसे लाभ मिल रहा है। हम जानते हैं कि यह समस्त मूल्य मज़दूर वर्ग अपनी मेहनत से पैदा करता है लेकिन इसका फ़ायदा उसे नहीं मिलता है। अगर जीडीपी की दर मोदी राज में कुलांचे भर रही है तो फिर क्यों देश की कुल सम्पत्ति का 40 प्रतिशत ऊपर के 1 प्रतिशत के पास है और नीचे की आधी आबादी के पास महज़ 3 प्रतिशत है? क्यों मज़दूर वर्ग की वास्तविक मज़दूरी में कोई वृद्धि नहीं हो रही है? ज़ाहिर सी बात है कि पूँजीवादी समाज में जीडीपी का कोई भी आँकड़ा समाज की प्रगति की वास्तविक तस्वीर नहीं पेश कर सकता है। सच तो यह है कि इस ग़ैर-बराबरी वाली मुनाफ़े पर खड़ी व्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद का बड़ा हिस्सा जनता के हिस्से में नहीं बल्कि पूँजीपतियों की तिजोरियों में जा रहा है। साथ ही, जीडीपी आर्थिक प्रगति का इसलिए भी कोई सटीक सूचक नहीं है क्योंकि इसकी गणना में ऐसे कई घटक शामिल किये जाते हैं जो अनुत्पादक हैं, यानी जो समाज में नया मूल्य पैदा नहीं करते, भले ही वे पूँजीवाद के संचालन के लिए उपयोगी हो सकते हैं, मसलन वाणिज्यिक बिक्री, राज्य के प्रशासनिक कार्य आदि। इसके अलावा, भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले लम्बे समय से मुनाफ़े की दर के संकट से बुरी तरह प्रभावित है। अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में रुपये की गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था की ख़राब स्थिति का एक और संकेतक है। बावजूद इसके, मोदी जी जीडीपी में वृद्धि के हवाई गोले छोड़ रहे हैं और हमें जश्न मनाने को कह रहे हैं!
बहरहाल, इस वित्तीय वर्ष, यानी 2026-27, की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के जीडीपी वृद्धि के जो आँकड़े मोदी सरकार ने प्रस्तुत किये हैं वे भी इस वर्ष के वास्तविक आँकड़े नहीं हैं बल्कि पिछले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही के आँकड़े के अनुसार इस वित्त वर्ष के अनुमानित आँकड़े हैं। और यह भी सिर्फ संगठित क्षेत्र के आँकड़े हैं। जबकि इस वर्ष ईरान-अमेरिका युद्ध की वजह से सप्लाई चेन बुरी तरह से बाधित रही, ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित रही, उद्योग-व्यापार ठप्प पड़ा रहा, गैस सिलिण्डर से लेकर ज़रूरी ईंधन की भारी किल्लत थी, इनकी क़ीमतों में बेइंतहा उछाल देखने को मिला और यही वजह थी कि नोएडा से लेकर गुड़गाँव, मानेसर, सूरत सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वतःस्फूर्त मज़दूर आन्दोलनों का उभार देखने को मिला जिसका अप्रत्याशित बर्बरतापूर्ण दमन विशेषकर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने किया। ऐसे में यह कैसे सम्भव है कि जीडीपी के विकास की ट्रेन 7.8 प्रतिशत की गति से दौड़ती रहे? ज़ाहिर सी बात है कि यह आँकड़ा वास्तविक सच्चाई को बिल्कुल भी प्रदर्शित नहीं करता!
देश की अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र में क़रीब 94 प्रतिशत लोग काम करते हैं और जीडीपी में इस क्षेत्र का योगदान क़रीब 45 प्रतिशत है, वहीं संगठित क्षेत्र में क़रीब 6 प्रतिशत लोग काम करते हैं और इसका जीडीपी में क़रीब 55 प्रतिशत का हिस्सा है। यह बात जगज़ाहिर है कि पिछले 10 सालों में, यानी पहले नोटबन्दी, फिर जीएसटी, और फिर कोविड संकट ने असंगठित क्षेत्र को बुरी तरीक़े से तोड़ कर रख दिया है। वैसे भी आम तौर पर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अपनी गलाकाटू आन्तरिक प्रतिस्पर्धा के कारण और अधिक मशीनीकरण की ओर जाती है जिसके कारण श्रम प्रधान उद्योग पूँजी प्रधान से पिछड़ता ही जाता है। लेकिन विशेष तौर पर पिछले 10 वर्षों की आर्थिक मन्दी ने तो इस क्षेत्र को और भी बुरे तरीक़े से प्रभावित किया है। जीडीपी की गणना में संगठित क्षेत्र के आँकड़े लिए जाते हैं और यह मान कर चला जाता है कि असंगठित क्षेत्र भी इसी गति से विकास कर रहा है। यानी संगठित क्षेत्र के आँकड़े को असंगठित क्षेत्र पर आरोपित कर दिया जाता है। लेकिन असंगठित क्षेत्र का संकट काफ़ी व्यापक है और वास्तव में यह क्षेत्र संकुचित हो रहा है। जैसा कि अर्थशास्त्री अरुण कुमार बताते हैं, इस वजह से देश की वास्तविक अर्थव्यवस्था पिछले दशक में 2-2.5 प्रतिशत की दर से ही आगे बढ़ रही है।
मोदी राज में जीडीपी के आँकड़ों में विसंगतियों (डिस्क्रेपेंसीज़) का भारी इज़ाफ़ा हुआ है। जीडीपी को दो पक्षों से मापा जा सकता है। एक उत्पादन खाते के पक्ष से और दूसरा व्यय खाते के पक्ष से। आदर्श स्थिति में ये दोनों बराबर होने चाहिए। इसका सीधा कारण यह है कि प्रत्येक वस्तु जो उत्पादित होती है वह बिक्री के ज़रिये ही अपने मूल्य को वास्तविकृत कर पाती है, यानी सरल शब्दों में कहें तो प्रत्येक बिक्री अपने आप में एक ख़रीद भी होती है और यह एक दूसरे के बराबर होती है। लेकिन व्यवहार में ये बराबर नहीं होते हैं और इनके बीच विसंगतियाँ मौजूद होती हैं, जिसके कई कारण हैं जिनमें से दोनों के बीच समय का अन्तर, क़ीमत में उतार-चढ़ाव आदि कारण शामिल हैं। लेकिन ये विसंगतियाँ अगर बहुत ज़्यादा होंगी तो आँकड़े की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जायेगी। जैसा कि अर्थशास्त्री अरुण ने दिखलाया है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में पहली तिमाही में उत्पादन के आँकड़े के अनुसार 7.8 प्रतिशत विकास दर थी जबकि व्यय के आँकड़े के अनुसार यह केवल 1.4 प्रतिशत रही। ज़ाहिर सी बात है यह विसंगति काफ़ी ज़्यादा है और यह सरकार द्वारा पेश जीडीपी वृद्धि के आँकड़ों से बिल्कुल मेल नहीं खाती है।
जैसा कि हम ऊपर चर्चा कर चुके हैं जीडीपी की गणना में केवल वास्तविक उत्पादन को शामिल नहीं किया जाता है। जीडीपी की गणना में उत्पादक क्षेत्र के अलावा ग़ैर-उत्पादक क्षेत्र की भी गणना की जाती है। पूँजीवाद के अन्तर्गत मूल्य सिर्फ़ उत्पादक श्रम ही पैदा करता है और उत्पादक क्षेत्र में उत्पादित मूल्य ही अनुत्पादक क्षेत्र में हस्तान्तरित होता है। इसलिए इस हिसाब से देखें तो जीडीपी की गणना में एक क़िस्म की “डबल काउण्टिंग” होती है। इसलिए सीधे तौर पर जीडीपी की दर उत्पादक क्षेत्र में मुनाफ़े की दर को प्रदर्शित नहीं करती है। हालाँकि फिर भी अगर जीडीपी की दर 7-8 फ़ीसदी है तो इसका मतलब पूँजीवादी मानकों से ही सही इतना तो ज़रूर हैं कि अर्थव्यवस्था ठीक-ठाक पटरी पर चल रही है, निवेश की दर स्वस्थ है, अगर निवेश मौजूद है तो रोज़गार की स्थिति भी अच्छी है, रोज़गार की स्थिति अगर बेहतर है तो मज़दूरी और घरेलू उपभोग में भी तेज़ी होगी। लेकिन आज इन मानकों पर अगर नज़र दौड़ायें तो देखेंगे कि स्थिति बेहद संगीन है।
उत्पादक पूँजी के निवेश का संकट बढ़ता ही जा रहा है। कॉर्पोरेट टैक्स में छूट व तमाम लोन माफ़ी के बावजूद मैन्यूफैक्चरिंग में निवेश पिछले 5 वर्षों में अपने न्यूनतम स्तर पर है। ट्रैक्टर उत्पादन, डीज़ल की खपत आदि में कमी देखने को मिली है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भारी कमी होना इस चीज को पुष्ट करता है। शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 2024-25 में अपने शिखर (2020 में 44 बिलियन डॉलर) का सिर्फ़ 1 प्रतिशत से भी कम यानी केवल 344 मिलियन डॉलर तक रह गया है! यानी अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ गति से सरपट दौड़ लगा रही है तो निवेश में इतनी भारी गिरावट क्यों है?
मुनाफ़े के दर के संकट से जूझ रही पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में निवेश का संकट लाज़िमी है, क्योंकि पूँजीपति का मक़सद अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाना होता है, अगर उत्पादक अर्थव्यवस्था में स्वस्थ मुनाफ़े की दर मौजूद नहीं होगी तो इसका सीधा असर निवेश पर पड़ेगा। निवेश के संकट के साथ बेरोज़गारी ने विकराल रूप धारण किया हुआ है। एक आँकड़े के अनुसार, 25 वर्ष की आयु तक के शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी दर 40 प्रतिशत तक है जबकि 25-29 वर्ष की आयु वर्ग के बीच 20 प्रतिशत है। अपने ज़िन्दगी के अनुभव से भी हम आसानी से समझ सकते हैं कि बेरोज़गारी का संकट भयावह है। लेकिन फिर वही सवाल उठता है कि अगर जीडीपी में इतनी तेज़ गति से वृद्धि हो रही है तो फिर इतनी बेरोज़गारी क्यों है?
बेरोज़गारी के संकट के साथ मज़दूरी के संकट ने भी विकराल रूप धारण किया हुआ है। एक तरफ़ बेरोज़गारों की फ़ौज खड़ी है और दूसरी तरफ़ रोज़गारशुदा लोग बढ़ते काम के घण्टों के दवाब को झेल रहे हैं और साथ ही उनकी वास्तविक मज़दूरी में या तो कोई वृद्धि नहीं हुई है या फिर मामूली-सी बढ़ोत्तरी हुई है। वहीं किसी-किसी क्षेत्र में तो मज़दूरी में कमी भी देखी गयी है। ज्यां द्रेज और अरिन्दम दास ने एक अध्ययन में यह दिखलाया है कि 2015-16 से 2022-23 के बीच खेतिहर मज़दूरी में मात्र 0.1 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि हुई है और व्यापार को छोड़ अन्य सेवा क्षेत्रों में तो यह आँकड़ा -0.8 प्रतिशत रहा है, यानी वास्तविक मज़दूरी में कमी आयी है! ज़ाहिर सी बात है कि अर्थव्यवस्था में तेज़ी के मोदी सरकार के दावों में कोई दम नहीं है, बल्कि असल बात तो यह है कि अर्थव्यवस्था मन्दी के दौर से गुज़र रही है। मोदी सरकार का मक़सद है कि ऐसे हवाई दावों से जनता को गुमराह किया जाये ताकि लोगों को ऐसा प्रतीत हो कि सब चंगा सी! हालाँकि हमारी ज़िन्दगी की असिलियत ऐसे सभी हवाई दावों की कलई खोल देती है।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026















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