मोदी सरकार की ई-20 नीति के ख़िलाफ़ लोगों का बढ़ता गुस्सा

आशीष

मोदी सरकार द्वारा आनन-फानन में देश स्तर पर पेट्रोल में बीस फ़ीसदी इथेनॉल मिश्रित करने की नीति यानी ई-20 नीति लागू कर दी गयी है। यह निर्णय कुछ मायने में ऐसा ही है जैसे सरकार ने एकाएक नोटबन्दी की घोषणा कर लोगों को लाइन में खड़ा कर दिया था या फिर कोरोना महामारी के दौरान जनता पर अनियोजित तरीक़े से लॉकडाउन थोप दिया था। इन तीनों ही स्थितियों में सरकार ने जनता के सामने कोई विकल्प नहीं रखा और इन नीतियों को लागू करने से पहले आवश्यक तैयारी करना भी ज़रूरी नहीं समझा। जो गाड़ियाँ इथेनॉल के हिसाब से नहीं बनी या ई-10 के हिसाब से बनी थी उनके चालकों के लिए सरकार ने कोई विकल्प नहीं छोड़ा। इस साल 1 अप्रैल से ही देशभर में ई-20 को अनिवार्य कर दिया गया। इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियों के ऊपर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब देने के बजाय मोदी सरकार अपनी लफ्फाज़ी के ज़रिये और ई-20 के फ़ायदे बताकर लोगों के सवालों को ख़ारिज करने का प्रयास रही है।

ई-20 लागू होने के बाद ‘दिल्ली टैक्सी एण्ड टूरिस्ट ट्रांसपोर्टर्स एण्ड टूर ऑपरेटर एसोसिएशन’ के अध्यक्ष संजय सम्राट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वाहन चालकों की परेशानियाँ बताते हुए कहा कि कई वाहन मालिकों की शिकायत है कि इस तरह के ईंधन के इस्तेमाल से गाड़ियों का माइलेज प्रभावित हो रहा है और इंजन के रखरखाव पर अतिरिक्त ख़र्च बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ई-20 के कारण उत्पन्न समस्याओं को लेकर अपनी चिन्ताओं को साझा किया। विकास दास नामक एक व्यक्ति ने कहा कि उनकी मोटरसाइकिल का माइलेज 35 किलोमीटर प्रति लीटर से घटकर 20 पर आ गया और उन्हें अपनी बाइक का ऑयल फ़िल्टर भी बदलवाना पड़ा, इनमें उन्हें पन्द्रह हज़ार रुपये का घाटा लगा। ओमप्रकाश नारायण नामक एक व्यक्ति ने कहा कि उनकी मोटरसाइकिल का इंजेक्टर ख़राब हो रहा है और स्टार्टर में समस्या आ रही है। एक व्यक्ति ने कहा कि उसकी स्कूटी का इंजन दो बार खोलना पड़ा, अब उसके पास कोई विकल्प नहीं है, वह अपनी स्कूटी बेच देगा। प्रमोद पाण्डेय नामक एक व्यक्ति ने कहा कि उसकी कार की माइलेज 5 किलोमीटर तक कम हो गयी है। मंजुल प्रताप सिंह नामक एक व्यक्ति ने बताया कि ई-20 के कारण उनकी कार में लगातार इलेक्ट्रॉनिक कण्ट्रोल वॉर्निंग आ रही है। ड्राइविंग के दौरान गाड़ी बार-बार बन्द हो जाती है। उन्होंने दावा किया कि एक शोरूम द्वारा फ्यूलपम्प बदलने के लिए उन्हें दस दिन इन्तज़ार करने को कहा गया क्योंकि वर्कशॉप ई-20 की शिकायतों के कारण बुक हैं।

ई-20 के कुप्रभावों को लेकर जितने लोगों ने सवाल उठाया है सबका ज़िक्र यहाँ कर पाना असम्भव है। कितनी बड़ी आबादी सरकार की ई-20 नीति से परेशान है, इसका अनुमान देश के तीन सौ से अधिक ज़िले में ‘लोकल सर्कल्स’ के द्वारा किये गये कुछ सर्वे से लगाया जा सकता है। इसी साल जून के हालिया सर्वे में 66 फ़ीसदी लोगों ने दस प्रतिशत या उससे अधिक माइलेज घटने की बात कही। इसी सर्वे के मुताबिक़ जून में ही 55 फ़ीसदी लोगों ने ई-20 से गाड़ियों में घिसावट, ख़राबी और सर्विसिंग और रिपेयरिंग पर ख़र्च का अतिरिक्त बोझ बढ़ने की बात कही है। सर्वे में लोग गाड़ियों के ईंधन पम्प, इंजेक्टर, रबर सील, ईंधन लाइन आदि में ख़राबी की बात कह रहे थे। यह  सर्वे 2023 से पहले की गाड़ियों के ऊपर केन्द्रित था लेकिन इसके बाद की गाड़ियों पर भी ई-20 के ख़राब प्रभाव को लेकर लोगों ने सवाल उठाये हैं।

इन शिकायतों पर ध्यान देने के बजाय भाजपा के नेता-मंत्री ऐसे-ऐसे बयान दे रहे हैं कि मानों वे लोगों के ज़ख्मों पर नमक रगड़ने का काम कर रहे हों। केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने पिछले साल अपने एक इण्टरव्यू में  ई-20 से इंजन को नुक़सान होने के दावों को पूरी तरह निराधार (कम्प्लीटली फॉल्स) बताया था और कहा था कि पेट्रोलियम लॉबी ग़लत सूचना फैला रही है। उन्होंने यह भी कहा कि पुराने वाहनों पर परीक्षण किये गये हैं और तकनीकी स्तर पर चीज़ों को प्रमाणित किया गया है। अगर वास्तव में ऐसा कोई परीक्षण किया गया है तो उसकी रिपोर्ट भी सार्वजनिक की जानी चाहिए लेकिन सरकार ने अब तक ऐसी कोई भी रिपोर्ट लोगों के समक्ष पेश नहीं की है। ई-20 के ऊपर लोगों के सवालों को गडकरी पेट्रोलियम लॉबी का पेड अभियान बताकर ख़ारिज करने की कोशिश कर रहे हैं। गडकरी कहते हैं कि कोई एक भी गाड़ी दिखा दे जो ई-20 से ख़राब हुई हो। कहावत है कि ‘सावन के अन्धे को सब हरा दिखता है’। यही हालत यहाँ माननीय मंत्री जी की है! लोग सोशल मीडिया, यूट्यूब आदि पर मौजूद वैकल्पिक मीडिया में लगातर ई-20 के दुष्प्रभावों के बारे में बोल रहे हैं। कई लोग तो मंत्री जी को सोशल मीडिया प्लैटफ़ार्म ‘एक्स’ पर ट्वीट कर टैग भी कर रहे लेकिन उन्हें एक भी ई-20 से ख़राब वाहन नहीं मिला या शायद वह इसे देखना नहीं चाहते। कहीं ऐसा तो नहीं कि गडकरी जी को सब हरा-हरा इसलिए दिख रहा है क्योंकि इथेनॉल बनाने वाली कम्पनियों में उनके बेटों की कम्पनी भी शामिल है!

वैसे नितिन गडकरी भारत सरकार के सड़क-परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय के मंत्री हैं। ईंधन के मसले से उनका सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं है। फिर भी वह इथेनॉल के सबसे बड़े ब्राण्ड एम्बेसडर बने हुए हैं! अपने हालिया बयानों में गडकरी ने माइलेज में मामूली गिरावट की बात को स्वीकार किया। अगर गिरावट मामूली भी हो तो इसे जनता के ऊपर जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता। इसी मसले पर भाजपा सांसद जनार्दन मिश्रा ने हालिया दिनों में एक घटिया क़िस्म का बयान दिया (यानी की एक भाजपाई बयान दिया!)। उन्होंने कहा “अगर शुद्ध पेट्रोल चाहिए, तो वह कहाँ से आयेगा-तुम्हारे बाप के यहाँ से आयेगा क्या?”  केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा “जैव ईंधन (बायोफ्यूल) से इंजनों को नुक़सान पहुँचने की जितनी भी कहानियाँ आप सुनते हैं, वे पूरी तरह से बकवास हैं।” उपभोक्ताओं को ई-20 से होने वाले परेशानियों पर पुरी कहते हैं-“यह तथ्यों को ग़लत तरीक़े से पेश करना है और मैं इससे भी अधिक कड़े शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहता।” ई-20 से परेशान लोगों के प्रति सरकार का सरोकार कितना है यह भाजपा के नेता-मंत्रियों के इन बयानों से साफ़ तौर पर ज़ाहिर हो जाता है।

इथेनॉल पेट्रोल से अलग पदार्थ है। गन्ना और मक्का जैसी फसलों से इसे बनाया जाता है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार इथेनॉल जलने पर पेट्रोल जितनी ऊर्जा नहीं देता। इथेनॉल की ईंधन क्षमता पेट्रोल के मुक़ाबले लगभग 33 प्रतिशत कम है। इस आधार पर देखें तो गाड़ियों की माइलेज गिरने की बात जो कही जा रही है उसे झुठलाया नहीं जा सकता। इसी तरह जो गाड़ी ई-20 के हिसाब से नहीं बनी है उसमें अगर ख़राबी की बात सामने आ रही है तो यह किसी लॉबी का प्रचार नहीं है, लोगों की एक वास्तविक समस्या है।

वैसे भारत सरकार द्वारा इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल नीति की शुरुआत साल 2003 में हुई थी लेकिन भाजपा ने सत्ता में आने के बाद इस काम को बड़ी तेज़ी से  आगे बढ़ाया। वर्ष 2003 में सरकार का लक्ष्य था देश के कई राज्यों में पेट्रोल में 5 फ़ीसदी तक इथेनॉल मिश्रित करना लेकिन वर्ष 2013-14 तक यह अधिकतम 1.5  फ़ीसदी तक था। वर्ष 2019 में सरकार ने इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लगभग पूरे देश में लागू कर दिया। मोदी सरकार का अगला लक्ष्य था 2030 तक देश में ई-20 को लागू करना लेकिन इसे समय से पाँच साल पहले ही कर लिया गया। सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है। कहा यह जा रहा है कि जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल आदि) पर निर्भरता कम करने के लिए जैव ईंधन (बायोफ्यूल) को अपनाना देश के लिए आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। सरकार के अनुसार वर्ष 2014-15 से मई 2026 तक कच्चे तेल के आयात की आवश्यकता 310 लाख करोड़ मीट्रिक टन तक कम हुई है और 1.90 लाख करोड़ विदेशी मुद्रा की बचत हुई है। एक महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि इसका लाभ किसको मिला? क्या इसकी लाभार्थी आम आबादी है या हमेशा मुफ़्त की मलाई खाने वाले धनपशुओं की जमात? ‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ के विश्लेषण से पता चलता है कि जब से पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के काम में तेज़ी आयी है, तब से गाड़ियों का माइलेज कम हो गया है। इसी घटे हुए माइलेज की भरपाई के लिए आम लोगों को पिछले तीन सालों में – 1 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2026 के बीच – क़रीब 88,234 करोड़ रुपये ज़्यादा ख़र्च करने पड़े हैं। यह एक ऐसा ख़र्च है जो भारतीय उपभोगताओं को भविष्य में भी हर साल लगातार उठाना पड़ेगा। अगर सरकार पेट्रोल में इथेनॉल का प्रतिशत और बढ़ाती है, तो आम जनता पर यह आर्थिक बोझ और भी बढ़ जायेगा।

मोदी सरकार ई-20 को लेकर उठ रहे सवालों को बकवास या प्रोपेगेण्डा बोलकर इन सच्चाइयों से अपना पिण्ड नहीं छुड़ा सकती। यह भी दावा किया जाता है कि अमेरिका, ब्राज़ील आदि देशों में भी इथेनॉल का इस्तेमाल हो रहा है, मगर यह भी सच है कि उनमें से अनेक देशों में इथेनॉल मिश्रित तेल पर सब्सिडी भी दी जाती है, नतीजतन यह इन देशों में सस्ता भी मिलता है। सनद रहे कि साल 2018 में भी नितिन गडकरी ने दावा किया था कि इथेनॉल मिश्रण से पेट्रोल की क़ीमत 55 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल की क़ीमत 50 रुपये प्रति लीटर तक कम हो सकती है। इथेनॉल का इस्तेमाल कर लाखो-करोड़ों रुपये बचाने के बाद भी पेट्रोल क़ीमतें कहाँ कम हुई!

ई-20 को सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए ज़रूरी बता रही है। हालाँकि इथेनॉल के उत्पादन में बहुत अधिक पानी व कोयला इस्तेमाल हो रहा है।  इससे वायु प्रदूषण के साथ-साथ जल प्रदूषण भी बढ़ रहा है। इसलिए इथेनॉल को ‘इको फ्रेण्डली’ या पर्यावरण के अनुकूल बताने का दावा पूरी तरह से सही नहीं है। कुछ पल के लिए अगर यह मान भी लें कि इथेनॉल-युक्त ईंधन के प्रयोग से प्रदूषण में कुछ कमी होती है, तब भी जिस सरकार के कार्यकाल में बड़े पैमाने पर जंगलों का सफ़ाया हो रहा है, प्राकृतिक संसाधनों को पूँजीपतियों के हाथ कौड़ियों के भाव बेचकर कुदरत का दोहन हो रहा है, औद्योगिक प्रदूषण में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, वहाँ पर्यावरण को बचाने के नाम पर जबरन ई-20 थोपने को उचित बताया जाना बहानेबाज़ी ही प्रतीत होती है। इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल अनिवार्य बनाने का लाभ महाराष्ट्र के साखर सम्राटों, उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों के निजी मिल मालिकों और इथेनॉल बनाने वाली कम्पनियों को ही हो रहा है। इसका नुक़सान आम उपभोक्ताओं के हिस्से में डाल दिया गया है। मोदी सरकार की ई-20 नीति पूँजीपरस्त और आम उपभोक्ताओं के हितों की अवहेलना करने वाली नीति है। बीतते समय के साथ सरकार की इस जनविरोधी नीति के प्रति लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026

 

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