सूरत में साप्ताहिक छुट्टी, वेतन बढ़ोत्तरी और आठ घण्टे के काम की माँग को लेकर आन्दोलनरत हैं मज़दूर!
बिगुल संवाददाता
हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड के बाद अब गुजरात के मज़दूर अपनी माँगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। 17 और 18 अगस्त को सूरत के अमरोली इलाक़े में मज़दूरों ने अपनी माँगों को लेकर हड़ताल की। टेक्सटाइल उद्योग में काम करने वाले इन मज़दूरों की माँग यह है कि उन्हें साप्ताहिक छुट्टी दी जाये और काम के घण्टे 12 से कम करके 8 किये जायें। इसके अलावा न्यूनतम मज़दूरी में बढ़ोतरी की जाये। मालूम हो कि गुजरात के इस औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों की एक बड़ी आबादी प्रवासी मज़दूरों की है। बिहार, यूपी, ओडिशा से काम की तलाश में आये इन मज़दूरों से 15-18 हज़ार के मासिक वेतन पर जानवरों की तरह काम कराया जाता है। 12 घण्टे फ़ैक्टरी के भीतर काम करने के बाद 3-4 घण्टे घर आने-जाने में लग जाते हैं। इसके बाद न तो शरीर को आराम मिल पाता है और न पर्याप्त भोजन। बेहतर शिक्षा और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी दूर की कौड़ी हैं। फैक्टरी, कारखाने में श्रम कानून लागू नहीं होते हैं। टेक्सटाइल मज़दूरों का कहना है कि काम के पीक सीज़न के दौरान मालिक मन-मुताबिक काम करवाता है और मना करने वाले मज़दूरों को काम से निकाल दिया जाता है। मजबूरन लोगों को दिन-रात जानवरों की तरह खटना पड़ता है। ये हालात सिर्फ़ गुजरात के मज़दूरों के नहीं हैं। देशभर में कमोबेश यही हालात हैं और पिछले 12 सालों में मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी और नारकीय हुई है। श्रम क़ानूनों के ज़रिये जो थोड़े-बहुत अधिकार मज़दूर हासिल कर पाते थे उसे भी भाजपा सरकार ने छीनने का काम किया है। चार लेबर कोड लागू करके पूँजीपतियों, मालिकों को लूट और शोषण की पूरी क़ानूनी आज़ादी दे दी गयी है। यूनियन बनाने के अधिकार को वस्तुतः समाप्त कर दिया गया है। इसके साथ ही, पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के दौरान मोदी सरकार की बदइंतज़ामी, लापरवाही और जन-विरोधी नीतियों ने मेहनतकशों के जीवन के संकट को और अधिक गहराने का काम किया है। यही कारण था कि पानीपत, मानेसर, मेरठ, नोएडा, उत्तराखण्ड से लेकर कई अन्य जगहों पर स्वतः स्फूर्त तरीक़े से मज़दूर अपनी वाजिब माँगों के लिए सड़कों पर उतरने के लिए विवश हुए। आन्दोलन के दवाब में आकर सरकार को वेतन बढ़ोत्तरी व अन्य माँगों पर संज्ञान लेने के लिए मजबूर भी होना पड़ा। मगर इसके साथ ही, भाजपा सरकार अपनी नाकामी और पूँजीपरस्त नीतियों को ढकने के लिए मज़दूरों के आन्दोलन को बदनाम करने में लग गयी। हरियाणा के मानेसर से लेकर उत्तराखण्ड और विशेषकर नोएडा में हमने देखा कि किस तरह से शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों व सामाजिक कार्यकर्ताओं पर झूठे मुक़दमे लगाये गये। मज़दूरों व कार्यकर्ताओं को “सबक सिखाने के मक़सद से” उनपर हिंसा भड़काने, हत्या करने, निजी सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाने तक के गम्भीर आरोप लगा कर उन्हें जेलों में बन्द कर दिया गया। नोएडा के आन्दोलन में इस बात के साफ़ सबूत होने के बावजूद कि हिंसा भड़काने में पुलिस की भूमिका थी, जैसा कि कई स्वतंत्र मीडिया संस्थानों, पत्रकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने खुलासा किया, कोई कार्यवाही नहीं हुई। व्हाट्सएप पर प्लानिंग से लेकर नेपाल, चीन, पाकिस्तान की साज़िश को ढूँढ निकालने वाली मोदी सरकार और उनकी पुलिस को पिछले लम्बे समय से जारी मज़दूरों के शोषण और ग़ुलामी की भनक भी नहीं लगी! मालिकों द्वारा न्यूनतम मज़दूरी न देने पर, 8 घण्टे से अधिक काम कराने पर, छुट्टी व काम के दौरान ब्रेक की व्यवस्था न होने पर, कार्यस्थल पर होने वाले दुर्व्यवहार और मौत जैसे गम्भीर मुद्दों पर कभी पुलिस और प्रशासन द्वारा कोई क़दम नहीं उठाया गया मगर जैसे ही मज़दूर अपनी आवाज़ उठाते हुए सड़कों पर उतरे उनके ऊपर फ़र्ज़ी मुक़दमे लगाने में पुलिस-प्रशासन को ज़रा भी समय नहीं लगा। मालिकों की हितैषी मोदी सरकार और पूरे प्रशासन का मज़दूर-विरोधी रवैया पिछले कुछ महीनों में नंगे तौर पर सामने आया है। सूरत के मज़दूरों के आन्दोलन के साथ भी यह फ़ासीवादी सरकार अपना घिसा-पिटा ‘टूलकिट’ इस्तेमाल कर रही है। व्हाट्सएप के ज़रिये आन्दोलन में हिंसा भड़काने की प्लानिंग के आरोप में अब तक 26 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है। ये घटनाएँ इस बात को साफ़ करती हैं कि आज़ादी के 79 वर्ष बाद भी मज़दूरों की ज़िन्दगी में कोई गुणात्मक तब्दीली नहीं आयी है। आज भी एक बड़ी आबादी जानवरों की तरह ग़ुलामी करने के लिए मजबूर है। इंसानों जैसी ज़िन्दगी जीने का हक़ और अपनी बुनियादी माँगें उठाने पर उन्हें डराया, धमकाया और झूठे मुक़दमों के तहत जेलों में बन्द किया जा रहा है। मोदी सरकार के राज में विरोध करने, अपनी न्यायसंगत माँगों को लेकर हड़ताल-प्रदर्शन करने, यूनियन बनाने के अधिकार को न सिर्फ़ ख़त्म किया जा रहा है बल्कि उसे अपराध की श्रेणी में डाला जा रहा है। यह सब कुछ फ़ासीवादी मोदी सरकार अपने पूँजीपति आकाओं को खुश करने के लिए कर रही है। देश के लाखों-करोड़ों मज़दूरों की ज़िन्दगी दाँव पर लगाकर, मालिकों के मुनाफ़े को बचाने के लिए सभी नियमों व क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ा रही है।
ऐसे में, यह ज़रूरी है कि हम अपनी माँगों के लिए एकजुट हो और फ़ासीवादी सरकार को मज़दूर-विरोधी नीतियों को वापस लेने पर मजबूर करें। अपने औद्योगिक सेक्टर और इलाक़े के आधार पर यूनियन खड़ी करें और अपनी एकता को मजबूत करें। मज़दूर वर्ग की एकजुटता ही फ़ासीवादी निज़ाम को चुनौती दे सकती है और हमारी माँगें मानने के लिए झुका सकती है। ‘मज़दूर बिगुल’ सूरत के संघर्षरत टेक्सटाइल मज़दूरों की सभी माँगों का समर्थन करता है और शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर लगाये गये फ़र्ज़ी मुक़दमे वापस लेने की माँग करता है। साथ ही, मज़दूरों का आह्वान करता है कि वेतन बढ़ोत्तरी, 8 घण्टे के काम, साप्ताहिक छुट्टी की माँग के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए मज़दूर-विरोधी चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ भी अपनी आवाज़ बुलन्द करें।
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026














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