मोदी सरकार के मज़दूर-विरोधी चार लेबर कोडों पर लगी न्यायिक मुहर
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘उद्योग’ की परिभाषा को बदलने के लिए दिया गया मज़दूर-विरोधी फैसला
मालिकों-उद्योगपतियों को शोषण की छूट देने के लिए की गयी यह एक और कवायद है!
मज़दूर अधिकारों की क़ीमत पर ही सही, “उद्योग का भविष्य” चमकते रहना चाहिए!
बिगुल संवाददाता
पिछले कुछ समय में हमारे देश के न्यायालयों ने एक के बाद एक कई ऐसे फैसले दिये हैं जिससे कि वे ‘न्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी कम बल्कि ‘अन्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी करते अधिक नज़र आये हैं। कई मसले देश की सुर्खियों में आये जो सीधे तौर पर न्यायालयों के जन-विरोधी चरित्र को दिखा रहे थे मगर ऐसे कई मसले सुर्खियों से भी ग़ायब रहे जो इस देश की आम मेहनतकश आबादी की ज़िंदगियों का फ़ैसला करते थे! इसी तरह का एक मसला बीते 20 अगस्त को चीफ़ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की खण्डपीठ द्वारा सुना गया। मामला उद्योग, उद्योगपतियों और मज़दूरों से जुड़ा हुआ था।
मोदी सरकार द्वारा नवम्बर 2025 में लागू किये गये चार लेबर कोड के दूसरे कोड ‘इण्डस्ट्रियल रिलेशन कोड यानी औद्योगिक सम्बन्ध संहिता’ में ‘उद्योग’ की परिभाषा पर फिर से विचार करने के लिये एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गयी थी।
यूपी, पंजाब, महाराष्ट्र के कुछ वरिष्ठ वकीलों और सॉलिसिटर जनरल द्वारा दायर इस याचिका में यह माँग की गयी थी कि 1978 के सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के तहत चली आ रही ‘उद्योग’ की परिभाषा पर पुनर्विचार किया जाये।
पुनर्विचार याचिका की सुनवाई करते हुए अधिकांश न्यायाधीशों का कहना था कि नवम्बर 2025 में लागू हुए ‘औद्योगिक सम्बन्ध संहिता’ के तहत ‘उद्योग’ पर 1947 के औद्योगिक विवाद क़ानून और 1978 के फ़ैसले में की गयी व्याख्या का कोई “बोझ” नहीं पड़ना चाहिए। इसके पीछे मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त के तर्क से अधिकांश न्यायाधीश सहमत थे कि “उद्योग के भविष्य” के लिए, उसकी तरक्की और विकास के लिए, 1978 के नियमों की बाधा को हटा देना चाहिए! यह “बाधा” कुछ और नहीं बल्कि श्रम क़ानूनों व उद्योग के नियमों के तहत वहाँ काम करने वाले मज़दूरों-कर्मचारियों को मिलने वाले अधिकार थे जो काग़ज़ी तौर पर ही सही पर मौजूद थे और यदा-कदा संघर्षों के बूते लागू करवा लिए जाते थे।
सुनवाई के दौरान कुल छः न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकान्त के तर्क़ से सहमत थे जबकि तीन ने इसका विरोध किया। जस्टिस बी. वी नागरत्ना, दीपांकर दत्ता और उज्ज्वल भूइयां ने इस बदलाव से असहमति जताते हुए यह कहा कि आज पहले से कहीं अधिक ज़रूरत इस बात की है कि 1978 मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गयी ‘उद्योग’ की परिभाषा को शामिल किया जाये और साथ ही लागू किया जाये ताकि मज़दूरों के अधिकारों का हनन न हो सके।
उन्होंने साफ़ तौर पर चेताया कि नये बदलावों के बाद निजी क्षेत्रों में काम करने वाले मज़दूरों के हकों को छीना भी जायेगा जिससे लोगों में असुरक्षा बढ़ेगी और यह “औद्योगिक अशान्ति” को जन्म देगा। यह भी ग़ौरतलब है कि लेबर कोड आने के बाद से कई स्थानों पर “औद्योगिक शान्ति” भंग हुई है और मज़दूर स्वतःस्फूर्त तरीक़े से आन्दोलन के रास्ते पर अग्रसर हुए हैं। मगर छः न्यायाधीशों यानी बहुसंख्या द्वारा ‘उद्योग’ की परिभाषा में बदलाव का समर्थन करने की वजह से 1978 के फ़ैसले को लागू करने की क़ानूनी बाध्यता को बीते दिनों हटा दिया गया।
1978 के क़ानून के मुताबिक क्या थी ‘उद्योग‘ की परिभाषा? क्यों नये बदलाव मज़दूर–विरोधी हैं?
‘बैंगलोर वाटर सप्लाई एण्ड सीवेज बोर्ड वर्सेज़ राजप्पा केस 1978’ की सुनवाई करते हुए जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर की अध्यक्षता में सात न्यायाधीशों की खण्डपीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण फ़ैसला देते हुए ‘उद्योग’ के दायरे को परिभाषित किया था। इसके बाद से औद्योगिक विवादों के मसलों में यह न्यायिक नज़ीर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी जो कि मज़दूरों के पक्ष को भी ध्यान में रख लेता था। इस फ़ैसले के तहत जो नियम बने उनके मुताबिक़ “कोई भी गतिविधि जो इंसानी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए व्यवस्थित और संगठित तौर पर वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन करती हो, जिसमें नियोक्ता और कर्मचारी शामिल हो”, वह ‘उद्योग’ के दायरे में आती थी।
इसके तहत अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और नगर पालिकाओं को भी ‘उद्योग’ के दायरे में शामिल किया था और सिर्फ़ मुख्य सरकारी तंत्र मसलन न्यायपालिका, क़ानून-व्यवस्था, रक्षा सेक्टर को ही इस परिभाषा से बाहर रखा गया था। उद्योग की यह चली आ रही व्याख्या इसलिए ज़रूरी थी क्योंकि इससे ही यह तय होता था कि उद्योग में कार्यरत मज़दूरों-कर्मचारियों पर औद्योगिक सम्बन्ध विषयक क़ानून लागू होंगे या नहीं और वह सामाजिक सुरक्षा व अन्य लाभ के दायरे में आते हैं या नहीं। पुरानी परिभाषा के तहत आने वाले ‘उद्योग’ में अगर किसी मज़दूर या कर्मचारी को कोई समस्या आती है तो उसे सामूहिक मोलभाव का अधिकार था, यूनियन बनाने से लेकर हड़ताल करने का अधिकार था और श्रम क़ानूनों के उल्लंघन के ख़िलाफ़ न्यायालय का रुख करने के प्रावधान हासिल थे।
इसलिए, उद्योग की परिभाषा में किये जा रहे मौजूदा बदलाव के पीछे की मंशा को हमें समझना होगा। हालिया फ़ैसले में, उच्चतम न्यायालय ने सरकार को यह छूट दे दी है जिसमें वह उद्योग को अपने हिसाब से परिभाषित कर सकती है और ‘औद्योगिक सम्बन्ध संहिता’ को भी लागू करने, न करने का मनमानापन कर सकती है।
हम जानते हैं कि पुराने तमाम श्रम क़ानूनों का फ़ायदा भी बड़ी मज़दूर आबादी शायद ही उठा पाती थी लेकिन कभी-कभार अपनी एकता के दम पर वह कुछ अधिकारों को हासिल करने के लिए मालिकों को झुका देती थी। भाजपा सरकार ने काग़ज़ों पर मौजूद इन नियमों को भी ख़त्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
नये फ़ैसले ने उन क़ानूनों को मानने की बाध्यता सीधे तौर पर ख़त्म कर दी है जो किसी औद्योगिक संस्थान को लागू करने पड़ते थे।
इस बदलाव के बाद ठेकाकरण को बढ़ावा मिलेगा, आय की असुरक्षा बढ़ेगी, यूनियन बनाने, हड़ताल करने का अधिकार प्रभावतः ख़त्म होगा और कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों का उल्लंघन खुलेआम होगा। “उद्योग के बेहतर भविष्य” के नाम पर की जा रही यह तब्दीलियाँ असल में उद्योगपतियों, पूंजीपतियों को लूट और शोषण की पूरी आज़ादी देंगे। दरअसल सर्वोच्च न्यायालय का हालिया फैसला मोदी सरकार के मज़दूर-विरोधी लेबर कोडों पर न्यायिक मुहर लगाता है।
औद्योगिक सम्बन्ध संहिता 2020 क्या है? मोदी सरकार इसे लागू करने की जल्दबाज़ी में क्यों है?
मोदी सरकार द्वारा लागू किये गये चार लेबर कोड में दूसरा कोड ‘औद्योगिक सम्बन्ध संहिता’ है। ‘औद्योगिक सम्बन्ध संहिता 2020’ को पुराने श्रम क़ानूनों यानी औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 और औद्योगिक रोज़गार अधिनियम 1946 को हटाकर उनकी जगह लाया गया है। ‘उद्योग’ की परिभाषा में परिवर्तन का काम मोदी सरकार ने इस कोड में पहले ही कर दिया था जिसे अब न्यायिक तौर पर वैध ठहरा दिया गया है। नये कोड में, किसी धर्मार्थ, सामाजिक या परोपकारी सेवा में पूरी तरह या पर्याप्त रूप से लगे संगठनों के स्वामित्व या प्रबन्धन वाले संस्थानों को उद्योग की परिभाषा से बाहर रखा गया है। उदाहरण के लिए, कुछ राज्यों में स्कूलों में मध्याह्न भोजन देने का ठेका समाज सेवा करने वाले धर्मार्थ, परोपकारी संगठनों को दिया गया है। इसलिए इन्हें अब एक उद्योग के रूप में नहीं माना जायेगा और नतीजतन इस भोजन को तैयार करने और परोसने के काम में लगे मज़दूरो को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जायेगा। अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, मन्दिर के ट्रस्टों, आश्रमों आदि मे कार्यरत मज़दूरों के मामले में भी ऐसा होगा, जिनके स्वामित्व या प्रबन्धन का दावा धर्मार्थ संगठनों द्वारा किया जाता है। यहाँ तक कि बाबा राम देव के कॉर्पोरेट उद्योग सम्भवतः इस श्रेणी में आ सकते हैं क्योंकि किसी भी गतिविधि को केन्द्र सरकार द्वारा उद्योग नहीं होने के रूप में अधिसूचित किया जा सकता है!
‘उद्योग’ की परिभाषा में मिली इस छूट से जहाँ एक तरफ़ मज़दूरों के हक़ क़ानूनी तौर पर भी ख़त्म किये जायेंगे वहीं दूसरी तरफ़ मालिकों, उद्योगपतियों को खुली छूट होगी कि वे अपने पूँजी के साम्राज्य को अपने हिसाब से परिभाषित कर सकें और बिना किसी बाधा के मुनाफ़े का पहिया सरपट दौड़ा सकें। इसके लिए ही मोदी सरकार ने नये लेबर कोड में सभी प्रावधान किये हैं। मसलन, नये कोड के तहत लेबर कोर्ट को वस्तुतः ख़त्म कर दिया गया है और इसकी जगह केवल राष्ट्रीय न्यायाधिकरण या एक क्षेत्र के लिए औद्योगिक न्यायाधिकरण होंगे। पुराने औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम के तहत, लेबर कोर्ट और औद्योगिक न्यायाधिकरणों की अध्यक्षता न्यायिक अधिकारियों (जजों) द्वारा की जाती थी। नयी संहिता में, औद्योगिक न्यायाधिकरणों में 2 सदस्य होंगे एक न्यायिक और एक प्रशासनिक। कुछ मुद्दों पर वे अकेले भी मामलों को सुन सकते हैं और फ़ैसला कर सकते है यानी प्रशासनिक सदस्य (कोई सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी) अकेले मज़दूरो के मुद्दो पर निर्णय ले सकता है, जिसका प्रभावी रूप से अर्थ है कि मज़दूरों के पक्ष में निर्णय की सम्भावना न के बराबर हो जाती है। मज़दूरों-कर्मचारियों का एक नगण्य हिस्सा ही अपनी मुश्किलों को लेकर न्यायालय पहुँच पाता था और उन मसलों में भी फ़ैसला कामगारों के पक्ष में आये इसकी कोई गारण्टी नहीं होती थी।
‘औद्योगिक सम्बन्ध संहिता 2020’ का सबसे बड़ा हमला पक्के रोज़गार के अधिकार पर है। उद्योग की परिभाषा बदलने के साथ-साथ रोज़गार की गारण्टी की परिभाषा भी बदल दी जायेगी और ज़मीनी तौर पर इसकी शुरुआत काफ़ी पहले हो चुकी है। इस कोड के तहत सरकार स्थायी रोज़गार को ही समाप्त कर रही है और उसके स्थान पर अल्पकालिक अनुबन्धों वाले निश्चित अवधि के रोज़गार (फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट) को स्थायी कर रही है। सरल शब्दों में कहें तो, नयी संहिता स्थायी और मूल (पेरिनियल और कोर) कामों में ‘स्थायी अस्थायित्व’ को वैध बना देती है तथा स्थिर रोज़गार को नष्ट करके, ठेका प्रथा को वैधता प्रदान करती है। यही वजह है की पूँजीपतियों की सबसे चहेती नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने पूँजीपति मित्रों को खुश करने के लिए ‘औद्योगिक विवाद एक्ट 1947’ को ‘औद्योगिक सम्बन्ध संहिता’ बना दिया क्योंकि उनके हिसाब से मज़दूरों और पूँजीपतियों के बीच तो कोई विवाद वास्तव में है ही नहीं! उनके बीच दोस्ताना सम्बन्ध है और इसी वज़ह से पिछले 12 सालों में न्यूनतम मज़दूरी की बढ़ोतरी करना मालिकों ने ज़रूरी नहीं समझा और न ही उन्हें 14-16 घण्टे मज़दूरों को खटवाने में कोई समस्या दिखायी देती है!
फ़ासीवादी मोदी सरकार को सत्ता में पहुँचाने का काम यूँ ही देश के पूंजीपतियों ने नहीं किया है। अभूतपूर्व आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रही पूँजीवादी व्यवस्था में मालिकों के मुनाफ़े की दर को बरक़रार रखने के लिये जो हथकण्डे अपनाये जा सकते हैं, उसे इस फ़ासीवादी हुकूमत से बेहतर शायद ही कोई अंजाम दे सकता था। चार लेबर कोड लागू करके पूँजीपतियों, मालिकों, कम्पनियों और प्रबन्धन को पहले ही मज़दूरों-कर्मचारियों को लूटने की पूरी खुली छूट दे दी गयी थी। “ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस” के नाम पर सभी तरह के श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर दिया था, निजीकरण और ठेकाकरण को वैध बना दिया गया। ‘उद्योग’ शब्द को अपने हिसाब से परिभाषित करने की छूट देना सीधे तौर पर पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचायेगा। अपने उद्योग में किसी भी तरह के औद्योगिक व श्रम क़ानूनों को लागू करने की बची-खुची बाध्यता को भी पूँजीपति वर्ग के लिए ख़त्म कर देगा। मोदी सरकार पूँजी के हितों की रक्षा के लिए बिना समय गँवाए इन मज़दूर-विरोधी नीतियों को लागू कर रही है।
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला एक बार फ़िर यह साबित करता है कि पूँजीवादी लोकतंत्र में न्यायालय व न्यायिक व्यवस्था भी अन्तिम तौर पर पूँजीपति वर्ग के हितों की ही सेवा में संलग्न होते हैं। मौजूदा फ़ासीवादी दौर में तो अब न्यायालय खुले तौर पर मालिकों-उद्योगपतियों के पक्ष में और मज़दूरों के हितों के विरुद्ध एक के बाद एक फैसले दे रहे हैं। चार लेबर कोड मज़दूर वर्ग के वर्षों के संघर्ष से हासिल अधिकारों पर किया गया अबतक का सबसे बड़ा फ़ासीवादी हमला है। इसके ख़िलाफ़ संघर्ष खड़ा करना आज बेहद ज़रूरी है। हमें यह भी समझना होगा की यह संघर्ष न तो न्यायालय के भरोसे रहकर लड़ा जा सकता है और न केवल किसी एक-दो दिवसीय प्रदर्शन और हड़ताल के ज़रिये। इसके लिए देश के मज़दूरों-कर्मचारियों को एकजुट होकर अनिश्चितकालीन संघर्ष की तैयारी करनी होगी वरना ग़ुलामी का नया दस्तावेज़ हमारी लाशों पर मालिकों का मुनाफ़ा सुनिश्चित करेगा।
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026














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