बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में ज़ारी मज़दूर आन्दोलन के समर्थन में व राजकीय दमन के विरोध में, मई दिवस के अवसर पर और 1857 विद्रोह की 169वीं वर्षगाँठ के अवसर पर किये गये कार्यक्रमों की संक्षिप्त रिपोर्ट

बिगुल संवाददाता

बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन द्वारा 12 व 27 अप्रैल बवाना सेक्टर 5 व बवाना जे.जे. कॉलोनी में नोएडा, गुड़गाँव-मानेसर और फ़रीदाबाद और नोएडा में पुलिस द्वारा किये जा रहे मज़दूरों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं के दमन के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन

इस विरोध प्रदर्शन में यूनियन के साथी आशीष ने अपनी बात रखते हुए बताया कि गुड़गाँव-मानेसर से लेकर फरीदाबाद और नोएडा तक मज़दूर बढ़ती महँगाई, घटती वास्तविक मज़दूरी, असुरक्षा और काम के बढ़ते घण्टों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द कर रहे हैं और सड़कों पर उतरकर हड़ताल में शामिल हो रहें हैं। ऐसे में फ़ासीवादी भाजपा-आरएसएस का मज़दूर-विरोधी चरित्र मज़दूरों के सामने साफ़ होता जा रहा है। मानेसर में पुलिस और पुलिस के दमनकारी विभाग ‘सीआईए’ स्टाफ़ ने शान्तिपूर्ण तरीके से चल रही हड़ताल में मज़दूरों का जिस प्रकार दमन किया और उनकी जायज़ माँगों को कुचल दिया इससे हरियाणा की भाजपा सरकार का रवैया साफ़ हो गया। वह मुनाफ़े की मशीनरी की प्रचालन में किसी प्रकार की बाधा नहीं चाहती चाहे इसके लिए मज़दूरों की हड्डियों का चूरा ही क्यों न बनाना पड़े। मज़दूरों के संघर्षों की श्रृंखला की शुरुआत वास्तव में फ़रवरी में बरौनी और फिर पानीपत में ही हो गयी थी। इसके बाद सूरत, भरूच, सालेम तक मज़दूरों का असन्तोष फूटा और हड़तालें हुईं। अप्रैल में यह संघर्ष मानेसर और फिर नोएडा, फरीदाबाद से लेकर पंजाब और उत्तराखण्ड तक पहुँच चुका है। साथी आशीष ने यह भी बताया कि 5 अप्रैल को ऑटोमोबाइल इण्डस्ट्री कॉण्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन (AICWU) के कार्यकर्ता शाम मूर्ति और 9 अप्रैल को मज़दूर कार्यकर्ता वीरेन्द्र को भी ग़ैर-क़ानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया और देर रात तक थाने में बैठाकर प्रताड़ित किया गया। वीरेन्द्र के साथ मारपीट की गयी और उनकी पत्नी के साथ बदसलूकी की गयी। वीरेन्द्र को लम्बे समय तक डराने-धमकाने के बाद उनसे बन्दूक की नोक पर खाली काग़ज़ पर हस्ताक्षर कराये गये और कहा गया कि उन्हें आगे भी जाँच-पड़ताल के लिए थाने आना पड़ेगा। इसके अलावा, 7 अप्रैल को बिगुल मज़दूर दस्ते से जुड़े साथी सनी और सार्थक को ज़ोर-ज़बरदस्ती करते हुए मानेसर में हड़ताल-स्थल से उठा लिया गया। इसी तरह बेलसोनिका यूनियन के महासचिव अजीत सिंह और इन्क़लाबी मज़दूर केन्द्र के सदस्यों को भी हरियाणा पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। अब तक हरियाणा पुलिस ने 55 मज़दूरों पर झूठे इल्ज़ाम लगाकर एफ़आईआर दर्ज की है और उन्हें जेल भेज दिया गया है।

नोएडा में चालीस हज़ार से अधिक मज़दूर हड़ताल में शामिल हुए। ऐसे सबूत तमाम मीडिया रिपोर्टों में सामने आ रहे हैं जो नोएडा पुलिस की हिंसा में सन्देहास्पद भूमिका की ओर इशारा करते हैं और साथ ही गिरफ्तार किये गये सामाजिक कार्यकर्ताओं की बेगुनाही की ओर इशारा करते हैं। देश भर में यह माँग उठ रही है कि मामले की सच्ची जाँच स्वयं उत्तर प्रदेश पुलिस नहीं कर सकती, बल्कि कोई उच्च स्तरीय न्यायिक आयोग ही कर सकता है क्योंकि यह प्रतीत होता है कि बेगुनाह सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हिंसा का झूठा आरोप उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा मढ़ दिया गया है। इसके अलावा पुलिस ने आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु, आकृति, सृष्टि एवं मनीषा तथा सैकड़ों मज़दूरों को भी गिरफ़्तार किया। तमाम मीडिया संस्थानों में आयी रपटों के अनुसार ये गिरफ़्तारियाँ ग़ैर-क़ानूनी तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करके उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की गयी हैं। गिरफ़्तारी के दौरान कई जगहों पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से छापेमारियाँ की गयी, बिना सीज़र मेमो दिये सामानों को ज़ब्त कर लिया गया, लोगों को अगवा किया गया और 24 घण्टों के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश भी नहीं किया और न ही गिरफ्तार लोगों के परिजनों, सहकर्मियों, वक़ीलों या उनके द्वारा नामित व्यक्तियों को कोई सूचना दी गयी। पुलिस ने सैकड़ों मज़दूरों को भी अगवा किया और प्रताड़ित किया जिस पर बीबीसी से लेकर दि वायर तक मीडिया में कई रिपोर्टें आ चुकी हैं। इस दौरान गोदी मीडिया ने बेशर्मी की सारी हदों को पार करते हुए इस आन्दोलन को तथा कार्यकर्ताओं को तरह-तरह से बदनाम करने का काम किया और किसी जाँच या मुक़दमे के बिना ही उन्हें दोषी व अपराधी ठहरा दिया ताकि मज़दूर आन्दोलन को बदनाम और ग़ैर-क़ानूनी बनाकर पेश किया जा सके। इस दमन-चक्र के पीछे योगी सरकार और यूपी पुलिस की यही मंशा है कि मज़दूरों के हर तरह के प्रतिरोध को कुचला जाये ताकि भविष्य में पूँजीपतियों की लूट के ख़िलाफ़ किसी प्रकार का प्रतिरोध ना खड़ा हो सके। आशीष ने कहा कि सरकार जितना भी ज़ोर लगाये पर इस खुली लूट के ख़िलाफ़ उठने वाली न्यायसंगत आवाज़ों का दमन नहीं कर सकती। जब तक न्याय नहीं होगा, तब तक मज़दूर और मेहनतकश चुप नहीं बैठेंगे।

बवाना औद्योगिक क्षेत्र में मई दिवस के अवसर पर किया गया सभा का आयोजन!

2 मई को बवाना औद्योगिक क्षेत्र के सेक्टर 3 व सेक्‍टर 4 में 140वें मई दिवस के अवसर पर सभा का आयोजन किया गया। सभा को सम्बोधित करते हुए वक्ता साथी प्रसेनजीत ने बताया कि इस बार हम मई दिवस ऐसे समय में मना रहे हैं जबकि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखण्ड, राजस्थान के मज़दूरों ने अपने जुझारू संघर्षों से फिर से यह साबित कर दिया है कि वे पूँजी की ग़ुलामी सहने वाले महज़ ‘बोलने वाले औज़ार’ नहीं हैं। जब हक़ और इन्साफ़ की लड़ाई में साथ देने की क़ीमत हमारे साथी, सैकड़ों मज़दूर भाइयों के साथ फ़र्ज़ी मुक़दमों, मानसिक-शारीरिक उत्पीड़न और जेलों में बन्द होने के रूप में चुका रहे हैं तो इस मई दिवस को हमें इन साथियों की इंसाफ़ की आवाज़ को बुलन्द करने के नाम करना होगा। आज संसदीय वाम पार्टियों की केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों ने मई दिवस को देश के अधिकांश मज़दूरों के लिए महज़ एक रस्मअदायगी का मौक़ा बनाकर रख दिया है। अधिकतम मज़दूरों को मई दिवस के महत्व के बारे में नहीं पता है और न ही उन्हें इसके गौरवशाली इतिहास के बारे में पता है। ऐसे वक़्त में मज़दूर दिवस पर शिकागो के शहीदों को याद करते हुए ‘मज़दूर वर्ग के राजनीतिक चेतना में प्रवेश’ करने के इस दिन को याद करना बेहद ज़रूरी बन जाता है। एक बार फिर अनौपचारिकीकरण, भयावह कार्यस्थिति, बेहिसाब काम के घण्टे और मज़दूर-विरोधी तमाम नीतियों जैसी चुनौतियाँ दुनिया के मज़दूरों के सामने खड़ी हैं। 1886 के मज़दूर आन्दोलन के बाद मज़दूरों ने जो हक़ जीते थे, जैसे कि आठ घण्टे काम का हक़, न्यूनतम वेतन का हक़, सामाजिक सुरक्षा का हक़, वे सभी आज नवउदारवाद के दौर में मज़दूरों से छीने जा चुके हैं। फ़ासीवादी मोदी सरकार के नये लेबर कोड वास्तव में मज़दूरों के अधिकारों को रद्द करने का नवीनतम क़दम है। हमारे देश में 90 फ़ीसदी से ज्यादा मज़दूरों को सभी श्रम अधिकारों से वंचित करके उन्हीं जीवन-स्थितियों और कार्य-स्थितियों में धकेला जा रहा है, जिसमें मज़दूर डेढ़ सौ साल पहले थे।

मई दिवस के शहीदों की अगुवाई में मज़दूरों ने अपने वक़्त में कारख़ानों का चक्का जाम कर दिया था। शहादत, दमन-उत्पीड़न के बाद भी मज़दूर डटे रहे और पूरे मज़दूर वर्ग की तरफ़ से उन्होंने अन्ततः पूँजीपतियों की सरकारों से 8 घण्टे काम का हक़ लड़कर छीन लिया था। लेकिन वर्तमान समय में पूँजी की अपनी गति के चलते पूँजीवादी दुनिया लम्बे आर्थिक संकट से गुज़र रही है। इस स्थिति से निपटने के लिए 1990 के दशक से ही मज़दूरों के हक़ों-अधिकारों पर लगातार हमले “श्रम क़ानूनों में सुधार” के नाम पर किये जा रहे थे। लेकिन पूँजीपति वर्ग इससे संतुष्ट न था। नतीजतन, मेहनतकश जनता की मेहनत को सस्ते दामों पर चूसने और जन-असन्तोष को कुचलने के लिए पूँजीपति वर्ग ने फ़ासीवादी भाजपा को सत्ता सौंप दी ताकि नवउदारवाद की मज़दूर-विरोधी नीतियों के विरुद्ध उठने वाली विरोध की हर आवाज़ को बेरहमी से कुचला जा सके और मज़दूर-मेहनतकश आबादी को धर्म के नाम पर बाँटकर उसकी शक्ति को तोड़ा जा सके। उसके बाद से मोदी सरकार ने अरबों रुपये के चन्दे के बदले पूँजीपतियों के पक्ष में मज़दूरों को ग़ुलामों की तरह खटाने के लिए क़ानूनी इन्तज़ामात करने और साम्प्रयिकता की आग में उन्हें झोंकने में पूरा ज़ोर लगा दिया है। मज़दूरों के काम के घण्टे, ओवरटाइम, न्यूनतम मज़दूरी, पीएफ-ईएसआई, हड़ताल करने और यूनियन बनाने, कार्यस्थल पर मानवीय स्थिति आदि से सम्बन्धित सभी अधिकारों को बेमानी बना देने के लिए कुख़्यात ‘चार लेबर कोड’ लागू कर दिये गये। नतीजतन, व्यापक मेहनतकश जनता का जीवन बद से बदतर होता जा रहा है। देश के सभी हिस्सों में मज़दूर वर्ग की ऐसी ही स्थिति है, इसलिए मज़दूरों के इस आन्दोलन से फ़ासिस्ट बौखला गये हैं। उन्हें पूरे देश में इस तरह के संघर्ष के फूट पड़ने का डर सता रहा है। चूँकि फ़ासिस्टों के कुकर्म भयंकर जनविरोधी हैं, इसलिए इस आन्दोलन से प्रेरणा लेकर आम जनता के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष उठ खड़े होने का भय उनमें व्याप्त है। इसीलिए मई दिवस के इतिहास को दोहराते हुए फ़ासिस्टों और उनकी पुलिस ने मज़दूर आन्दोलन को कुचलने की साज़िश रची। सरकार द्वारा की जा रही इन तमाम घटिया कार्रवाइयों, दमन-उत्पीड़न के बावजूद जायज़ माँगों और इंसाफ़ के लिए मज़दूर संघर्ष नहीं थमेगा। क्योंकि मज़दूर ज़िन्दा रहने की बुनियादी शर्तों के लिए लड़ रहे हैं। मज़दूरों की यह लड़ाई बिल्कुल जायज़ है और मज़दूरों के जायज़ संघर्षों को कभी दबाया नहीं जा सकता। जैसा कि शिकागो के मई दिवस के शहीद स्पाइस ने फाँसी चढ़ने से पहले क़रीब 140 साल पहले कहा था – “आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो लेकिन यहाँ-वहाँ, तुम्हारे पीछे, तुम्हारे सामने, हर ओर लपटें भड़क उठेंगी। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी नहीं बुझा पाओगे।”

देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857 की बग़ावत की 169 वीं वर्षगाँठ (10 मई ) के अवसर पर चलाया गयाहिन्दूमुस्लिम एकता अभियानऔर किया गया जनसभा का आयोजन

देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857 की बग़ावत की 169वीं वर्षगाँठ (10 मई) के अवसर पर बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन द्वारा ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता अभियान’ चलाया गया। इसके तहत 6-7-8 मई को बवाना औद्योगिक क्षेत्र के सेक्टर 1, 3 और 5 में पर्चा वितरण किया गया और 9 मई को होने वाली जनसभा के लिए मेट्रो विहार में घर-घर जाकर अभियान चलाया गया व पोस्टर लगाये गये। 9 मई के कार्यक्रम को रोकने के लिए दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस ने पूरी कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद जनसभा का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। 7 मई से ही स्पेशल सेल और दिल्ली पुलिस के लोग यूनियन के कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने का काम करने में लगे हुए थे और कह रहे थे कि यह कार्यक्रम रद्द करो। वे मौखिक तौर पर इस कार्यक्रम को रद्द करने का दबाव बना रहे थे और लिखित में कोई भी निषेधाज्ञा देने से इंकार कर रहे थे। देश के फ़ासीवादी हुक़्मरान किस क़दर जनता के संघर्षों से भयाक्रान्त  हैं यह इस बात से समझा जा सकता है कि देश की जनता को अपनी आज़ादी की पहली लड़ाई को याद करने से रोका जा रहा है, जब जनता एकजुट होकर अंग्रेज़ों के औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध लड़ी थी! 8 मई को यूनियन के फ़ोन नम्बर पर दिल्ली पुलिस व स्पेशल सेल के लोग डराने-धमकाने के लिए फोन कर रहे थे। इसके बाद, 9 मई की सुबह ही दिल्ली पुलिस के लोग सादी वर्दी में यूनियन के कार्यकर्ता आशीष को बवाना के मेट्रो विहार से एक निजी गाड़ी में उठाकर ले गये। जनदवाब के कारण उन्हें देर शाम को रिहा किया गया। शाम को तयशुदा कार्यक्रम के आधार पर 1857 विद्रोह की वर्षगाँठ पर धूमधाम से मज़दूरों ने यूनियन के नेतृत्व में सभा का आयोजन किया। सभा में बात रखते हुए साथी भारत ने मज़दूरों को बताया कि दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस चाहे कितनी भी कोशिश करें, हम उनके द्वारा किये जा रहे ऐसे ग़ैर-क़ानूनी कृत्यों से नहीं डरेंगे। अपने शहीदों को याद करना और कार्यक्रम करना हमारा संवैधानिक अधिकार है और अपने अधिकारों के लिए लड़ना हम जारी रखेंगे। साथ ही नोएडा और मानेसर में भी मज़दूर आन्दोलन और कार्यकर्ताओं के दमन पर बात रखी गयी।

आगे जनसभा में बात रखते हुए साथी नौरीन ने कहा कि 1857 की बग़ावत हमारी विरासत है। 10 मई 1857 को लुटेरी अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध यह विद्रोह शुरू हुआ था। 1857 की बग़ावत अंग्रेजी राज के ख़िलाफ़ देश की जनता का बहादुरी भरा संघर्ष था, जिसमें हिन्दू, मुसलमान, सभी ने शिरक़त की। धार्मिक बँटवारे को छोड़ एकजुटता की मिसाल कायम करते हुए भारत की जनता ने दमनकारी अंग्रेज़ी राज की चूलें हिला दीं। आज के समय में इसे याद करने का एक ख़ास महत्व है। 1857 के विद्रोह के कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी का ‘कम्पनी राज’ चला गया और शासन को ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। जनता के लम्बे संघर्ष के बाद बर्तानवी सरकार का औपनिवेशिक राज 1947 में चला गया। लेकिन 1947 में आज़ाद हिन्दुस्तान की गद्दी पर जो बैठे, वे देश के करोड़ों मज़दूरों, ग़रीब किसानों व मेहनतकशों के नुमाइन्दे नहीं थे, बल्कि शहीदे आज़म भगतसिंह के अनुसार सेठ ठाकुरदास-पुरुषोत्तमदास जैसे लोगों के नुमाइन्दे थे। आज मोदी सरकार के शासन के दौरान पूँजीपतियों के समूचे वर्ग की जिस बेशर्मी और नंगई से सेवा की गयी है, उससे तो भारत के इतिहास की अतीत की सभी सरकारें शर्मा जायेंगी। मोदी सरकार ने एक नया “कम्पनी राज” यानी अडानी-अम्बानी-टाटा-बिड़ला-वेदान्ता आदि देसी लुटेरों का राज क़ायम कर दिया है। 1857 में अंग्रेज़ों के कम्पनी राज के ख़िलाफ़ देश की मेहनतकश जनता ने बग़ावत की थी। आज देश की मेहनतकश जनता को इस नये “कम्पनी राज” के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करने की आवश्यकता है।

1857 की बग़ावत को याद करने की दूसरी वजह है इस जनविद्रोह द्वारा स्थापित की गयी हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल। इस विद्रोह से हमें सीखते हुए यह गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि धर्म का राजनीति से कोई रिश्ता नहीं होना चाहिए। जनता की सही राजनीति का अर्थ है मेहनतकश वर्गों के हितों की सेवा के लिए नीतियों व योजनाओं का निर्माण और उसे लागू करवाने का संघर्ष, चाहे इसके लिए समाज और सत्ता में एक आमूलगामी क्रान्तिकारी परिवर्तन ही क्यों न करना पड़े। धर्म सबका निजी मसला है। हम अलग-अलग धर्मों के होते हुए भी जनता की सही राजनीति पर एक हो सकते हैं और हमें होना ही चाहिए।

भगतसिंह ने अपने लेख ‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ में हमें यही सन्देश दिया है। हमें समझना होगा कि धन्नासेठों और इनकी बेशर्मी से व तानाशाहाना तरीक़े से सेवा करने वाली फ़ासीवादी मोदी सरकार आज मेहनतकश जनता की बर्बादी के लिए प्रमुख तौर पर ज़िम्मेदार है और इसके विरुद्ध फ़ैसलाकुन संघर्ष आज का सबसे प्रमुख कार्यभार है।

सेठों-व्यापारियों के धन पर चलने वाली किसी भी चुनावी पार्टी से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है। इसलिए दूरगामी लड़ाई तो मुनाफ़े पर टिकी समूची पूँजीवादी व्यवस्था को बदलने की है। यह तभी हो सकता है जब हम रोज़गार के अधिकार के लिए, महँगाई से आज़ादी के लिए, साम्प्रदायिकता से मुक्ति के लिए एक जुझारू जनान्दोलन खड़ा करें, जो धर्म और जाति के बँटवारों और दीवारों को गिरा दे।

आइए, 1857 के अपने शहीदों से, आज़ादी के लिए लड़ने वाले क्रान्तिकारियों से सीखते हुए जुझारू जनएकजुटता क़ायम करें। ऐसी एकजुटता के सामने हर ताक़त बौनी है। साथी नौरीन ने बताया कि ‘हिन्दू-मुस्लिम एकजुटता अभियान’ का उद्येश्य देश की सभी मेहनतकश जनता को उनके असली मुद्दों पर एकजुट करना है।

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026