नोएडा और मानेसर में गिरफ्तार मज़दूरों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व छात्रों को रिहा करो! सभी अन्यायपूर्ण मुक़दमे वापस लो!
नोएडा में हुई हिंसा में उत्तर प्रदेश पुलिस की कथित भूमिका की उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच करो!

सम्पादकीय अग्रलेख

देश के अलग-अलग हिस्सों में पिछले कुछ महीनों के दौरान मज़दूर वेतन बढ़ोत्तरी, डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान, छह दिनों के कार्य सप्ताह और अन्य श्रम अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरे हैं, विरोध-प्रदर्शन किये हैं और हड़तालें आयोजित की हैं। इस श्रृंखला की शुरुआत 2 फ़रवरी को बरौनी में रिफ़ाइनरी में मज़दूरों की हड़ताल के साथ हुई थी। इसके बाद, पानीपत में भी रिफ़ाइनरी में 23 फ़रवरी को हज़ारों मज़दूरों ने हड़ताल की। फिर सूरत में आर्सेलर मित्तल निपन कम्पनी में, भरूच में पेट्रो-केमिकल प्लाण्ट में, सालेम में आईओसीएल प्लाण्ट में, और वडोदरा में मज़दूरों ने हड़तालें कीं। इनके अलावा भी कई छोटी हड़तालें अलग-अलग जगहों पर हुईं। 2 अप्रैल को हड़तालों की लहर मानेसर, गुड़गाँव पहुँची जहाँ कई गारमेण्ट व ऑटोमोबाइल कारखानों में मज़दूरों ने वाजिब माँगों को उठाते हुए हड़तालें आयोजित कीं। और फिर अन्तत: 8 अप्रैल को नोएडा के विभिन्न प्लाण्टों के मज़दूर इंसानों जैसे जीवन की माँगों को लेकर हड़ताल पर उतर गये। हर जगह मज़दूरों को पुलिसिया दमन का सामना करना पड़ा और उन्होंने बहादुरी से इसका प्रतिरोध किया। इन सभी राज्यों में राज्य सरकारों ने खुलेआम कम्पनियों, मालिकान और प्रबन्धन के हितों की नुमाइन्दगी की। लेकिन मज़दूरों ने भी हर जगह दमन का डटकर मुक़ाबला किया और अपने जायज़ हक़ों के लिए संघर्ष को जारी रखा।

नतीजतन, हरियाणा में नायब सिंह सैनी की भाजपा सरकार को न्यूनतम वेतन में 35 प्रतिशत बढ़ोत्तरी का ऐलान करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में, जहाँ 2012 से न्यूनतम वेतन नहीं बढ़ाया गया था (हालाँकि नियमत: सरकार को हर तीन वर्ष पर बढ़ती महँगाई के अनुसार न्यूनतम मज़दूरी में बढ़ोत्तरी करनी होती है), योगी आदित्यनाथ की सरकार ने वेतन में 21 प्रतिशत की मामूली बढ़ोत्तरी की। इन बढ़ोत्तरियों के बाद भी मज़दूर अपने परिवार का गुज़ारा भुखमरी और कुपोषण की रेखा पर खड़े होकर ही कर सकते हैं और साथ ही 12 घण्टे की कमरतोड़ मेहनत उनके लिए एक मजबूरी होगी और आठ घण्टे के कार्यदिवस का उनके लिए कोई अर्थ नहीं होगा।

हरियाणा में न्यूनतम मज़दूरी अकुशल मज़दूर के लिए रु. 11,274 से बढ़ाकर रु. 15,220, अर्द्धकुशल मज़दूर के लिए रु. 12,430 से रु. 16,780, कुशल मज़दूर के लिए रु. 13,704 से रु. 18,500 और अतिकुशल मज़दूर के लिए रु. 14,389 से रु. 19,425 तक बढ़ा दी गयी। लेकिन यह मज़दूरों की माँग से कहीं कम था जो कम-से-कम रु. 25,000 न्यूनतम वेतन की माँग उठा रहे थे। वास्तव में, देखा जाय तो रु. 25,000 में भी आज के समय में एक मज़दूर अपने परिवार का गुज़ारा कैसे करेगा यह सोचने की बात है। उत्तर प्रदेश में तो बढ़ोत्तरी मज़दूरों के साथ एक और भी बुरा और भद्दा मज़ाक था। यहाँ अकुशल मज़दूर के लिए न्यूनतम मज़दूरी को रु. 11,313 से बढ़ाकर रु. 13,690, अर्द्धकुशल मज़दूर के लिए रु. 12,445 से रु. 15,059 और कुशल मज़दूर के लिए रु. 13,940 से रु. 16,868 कर दी गयी। यह बढ़ोत्तरी विशेष तौर पर नोएडा और ग़ाज़ियाबाद के लिए थी। उत्तर प्रदेश के बाक़ी ज़िलों में तो यह बढ़ोत्तरी और भी कम रही। दरअसल, अगर आज के उपभोक्ता कीमत सूचकांक को देखें तो रु. 30,000 प्रति माह से कम पर कोई मज़दूर ढंग से अपने परिवार का गुज़ारा नहीं चला सकता। लेकिन 12 घण्टे की कमरतोड़ मेहनत के बाद भी इतनी कम न्यूनतम मज़दूरी में मज़दूर महीने का रु. 30,000 नहीं कमा पाते।

न्यूनतम मज़दूरी में इस मज़ाकिया होने की हद तक कम बढ़ोत्तरी का नतीजा यह है कि स्वैच्छिक ओवरटाइम वास्तव में स्वैच्छिक नहीं हो सकता। क्योंकि इतनी कम मज़दूरी मिलेगी तो मज़दूर को ओवरटाइम तो करना ही पड़ेगा और वह ख़ुद ही ओवरटाइम माँगेगा और अपने आपको इंसानी ज़िन्दगी की शर्तों से भी वंचित करेगा। पूरे देश में आम तौर पर अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूर और औपचारिक क्षेत्र के अनौपचारिक मज़दूर, यानी हर जगह जो ठेका, दिहाड़ी और कैजुअल के तौर पर काम करने वाले मज़दूर हैं, उनके लिए 12 घण्टे काम करना एक प्रकार से अनिवार्य है। इसके बिना वे अपनी और अपने परिवार की गुज़र-बसर कर ही नहीं सकते। वैसे तो उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भाजपा सरकारों ने वायदा किया है कि तमाम कम्पनियाँ और मालिकान व प्रबन्धन ओवरटाइम का भुगतान डबल रेट से करेंगे, लेकिन वास्तव में ऐसा होगा या नहीं, यह तो समय ही बतायेगा। मन्दी के समय में पूँजीपति वर्ग अपने मुनाफ़े में किसी भी प्रकार की कमी नहीं चाहता है। अगर वह डबल रेट से ओवरटाइम के भुगतान को लागू नहीं करता तो इन पूँजीपतियों की चहेती भाजपा सरकारें वास्तव में इसे लागू करवाने के लिए कुछ करेंगी या नहीं, यह भी एक बड़ा सवाल है। ऊपर से हरियाणा और उत्तर प्रदेश में कितने कारखाना मालिक व कम्पनियाँ वाकई नयी वेतन दरों के अनुसार मज़दूरों को भुगतान करेंगी, यह भी अभी स्पष्ट नहीं है। कुछ जगहों से यह ख़बरें अभी से आ रही हैं कि घोषित बढ़ोत्तरी से बेहद कम बढ़ोत्तरी करके मज़दूरों को मज़दूरी दी जा रही है। मज़दूरों में इसे लेकर भारी असन्तोष मौजूद है। आज तक तो भाजपा सरकार ने श्रम कानूनों को लगातार खुलेआम तोड़ने वाली कम्पनियों और मालिकान-प्रबन्धन पर कोई कार्रवाई नहीं की। दिखावे के लिए योगी सरकार ने कुछ ठेकेदारों के लाईसेंस रद्द किये हैं। लेकिन कम्पनियों और उनके प्रबन्धन व मालिकान पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी। कभी कोई पूँजीवादी सरकार ऐसा करती भी नहीं है। यानी हर प्रकार के क़ानून को खुलेआम तोड़ने की मालिकों के वर्ग को पूरी आज़ादी है, लेकिन मज़दूर अगर प्रतिरोध करते हैं, हड़ताल करते हैं या आन्दोलन करते हैं तो तत्काल उन्हें अपराधी घोषित कर दिया जाता है और उनका बर्बर पुलिसिया दमन किया जाता है, जैसा कि योगी आदित्यनाथ की सरकार पुलिस ने नोएडा में किया है।

मज़दूरों में जो गुस्सा और असन्तोष मौजूद है, उसे दमन के बूते स्थायी तौर पर दबा देने का मुग़ालता पूरे देश में तमाम राज्य सरकारें और केन्द्र सरकार पाले बैठी हैं। लेकिन अगर मज़दूर दो वक़्त की रोटी भी ढंग से नहीं खा पायेगा, अपने बच्चों का दवाइलाज नहीं करा पायेगा, कमरे का किराया नहीं दे पायेगा, रसोई गैस नहीं ख़रीद पायेगा, तो सिवाय लड़ने के उसके पास रास्ता ही क्या बचता है? क्या आदित्यनाथ की फ़ासीवादी भाजपा सरकार को यह लगता है कि मज़दूर 13 से 16 हज़ार रुपये महीने में अपनी और अपने परिवार की गुज़र-बसर कर सकता है? अगर हाँ, तो उनको इतने वेतन में एक साल गुज़ार कर देखना चाहिए।

पूँजीवादी व्यवस्था की आन्तरिक गति से नियमित अन्तराल पर बार-बार पैदा होने वाली आम वैश्विक मन्दी के दौर में पूँजीपति आर्थिक संकट का पूरा बोझ मज़दूरों पर डालता है। इस बार भी उसने ऐसा ही किया है। पश्चिम एशिया में साम्राज्यवादी अमेरिका और नस्लवादी औपनिवेशिक राज्य इज़रायल द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध के फलस्वरूप रसोई गैस की किल्लत पैदा हो गयी है और उसकी क़ीमतों में भारी बढ़ोत्तरी की गयी है और पूँजीपति वर्ग की मन्दी गहरा गयी है। मज़दूरों को तो सरकारी दरों पर रसोई गैस मिलती भी नहीं और उन्हें दूनी-चौगुनी दरों पर रसोई गैस काला बाज़ारियों से ख़रीदनी पड़ती है। इसके कारण हालत यह हुई है कि शहरों में रहना और काम करना ही मज़दूरों के लिए मुश्किल हो गया है और हज़ारोंलाखों की तादाद में मज़दूर अपने गाँवों को भी लौट गये हैं। पश्चिम एशिया के देशों में काम करने वाली एक भारी मज़दूर आबादी लाखों की संख्या में स्वदेश वापस लौटी है। नतीजतन, कोविड काल के विपरीत इस बार उतनी आबादी को भी खेती का क्षेत्र नहीं सोख सकता है, जितना कि लॉकडाउन के समय उसने सोखा था। ऊपर से खेती का क्षेत्र भी फर्टिलाइज़र आदि की कमी के कारण और भी गहरे संकट की कगार पर खड़ा है। कोविड के समय भी मेहनतकशों की एक भारी आबादी जो शहरों से गाँवों तक पहुँच पायी थी, वह भुखमरी और कुपोषण के हालात में जी रही थी और इस बार स्थिति और भी ख़राब होने की आशंका है। कोविड के समय लाखों की संख्या में तो मज़दूर वापस लौट ही नहीं पाये और या तो महामारी के कारण या गाँव जाने के रास्ते में ही जान गवाँ बैठे। इस बार स्थिति अधिक बुरी होने का ख़तरा है। भारत सरकार ने साम्राज्यवादी ताक़तों द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध के दौरान जिस प्रकार की विदेश नीति अपनायी, उसने भारत का गैस व तेल संकट और भी भयंकर बना देने की ज़मीन तैयार कर दी है। इसका ख़ामियाज़ा भी देश की मेहनतकश जनता को ही भुगतना है।

इसी समय 1 अप्रैल से मोदी सरकार ने नये लेबर कोड भी लागू कर दिये हैं, जो प्रभावत: मज़दूरों के सभी अधिकारों को छीन लेते हैं। जो अधिकार कागज़ों पर बने हुए हैं, उन्हें भी व्यावहारिक तौर पर हासिल कर पाने को मज़दूरों और कर्मचारियों के लिए लगभग असम्भव बना दिया है। इसके ख़िलाफ़ 12 फ़रवरी को देश की केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों ने अपनी दन्त-नखविहीनता दिखाते हुए फिर से एक दिन की रस्मी हड़ताल आयोजित की थी और उसमें भी अधिकांश स्थानों पर इन केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों ने हड़तालें की ही नहीं! अधिकांश जगहों पर वे काली पट्टियाँ बाँध कर काम करने का आह्वान कर रहे थे। तो यह भला हड़ताल कैसे हुई? देश की संसदीय वाम पार्टियों से जुड़ी ट्रेड यूनियनों की यही समझौतापरस्ती है जिसके कारण वे मज़दूरों का विश्वास खो चुकी हैं। वे बन्द दरवाज़ों के पीछे मोदी सरकार से समझौते कर रही हैं और मज़दूरों को एक जुझारू व निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार करने और उसमें उन्हें नेतृत्व देने के बजाय उनके संघर्षों को विनियमित कर उन सीमाओं में क़ैद रखने का काम कर रही हैं, जो देश के पूँजीपति वर्ग और उनकी सरकारों के लिए सुविधाजनक हो।

लेकिन शासक वर्ग के ये सारे क़दम, चाहे वे पुलिसिया दमन के हों या समझौतापरस्त ट्रेड यूनियनों द्वारा मज़दूरों के संघर्ष को सीमित करने के हों, श्रम और पूँजी के अन्तरविरोध को हमेशा पूँजीपति वर्ग के लिए सुविधाजनक दायरों में क़ैद नहीं रख सकते। यही कारण है कि जब मज़दूरों के लिए 10 हज़ार से 15 हज़ार वेतन में जीवनयापन असम्भव हो गया, जब वर्षों से उनके भीतर पनप रहा गुस्सा और असन्तोष, अरसे से उन पर थोपी जा रही ज़िल्लत एक सीमा से आगे चली गयी तो उनके धैर्य का प्याला अब छलकने लगा है। देश में जगह-जगह मज़दूर रह-रहकर अपनी जायज़ क़ानूनी माँगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं और पूँजीपति वर्ग की नुमाइन्दगी करने वाली तमाम सरकारों और विशेष तौर पर उनकी चहेती भाजपा सरकारों द्वारा उनके दमन के तमाम प्रयासों के बावजूद वे पीछे नहीं हट रहे हैं। तात्कालिक तौर पर, मज़दूरी में की गयी मामूली बढ़ोत्तरी और पुलिसिया दमन के कारण जगह-जगह कुछ समय के लिए संघर्ष स्थगित ज़रूर हुए हैं, लेकिन उन्हें समाप्त मान लेना एक भूल होगी। ये मज़दूरों के मौजूदा जीवन की कार्य स्थितियाँ ही हैं, जिनके कारण वे आन्दोलन का रास्ता अपनाने को बाध्य हैं। अगर किसी को लगता है कि वे किसी के भड़काने पर आन्दोलन के रास्ते पर जा रहे हैं, तो वह समूचे मज़दूर वर्ग का नवजातीकरण करने की मूर्खतापूर्ण सोच से ग्रस्त है। जब तक न्याय नहीं है, जब तक कोई सुनवाई नहीं हैं, तब तक मज़दूर पीठ झुका कर ग़ुलामों के समान आख़िर कब तक काम कर सकते हैं? यह बात कहीं न कहीं एक हद तक हुक्मरानों की अक़्ल में भी घुसी है और वे मामूली वेतन बढ़ोत्तरी करके, तरह-तरह के वायदे और जुमलेबाज़ी करके और सरकारी प्रचार करके मज़दूरों को शान्त करने का प्रयास कर रहे हैं।

लेकिन इसके साथ जो दूसरी चीज़ शासक वर्ग कर रहे हैं वह है फ़ासीवादी दमन का आतंक फैलाना। इसका सबसे नंगा प्रदर्शन उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की फ़ासीवादी सरकार ने किया है। इसलिए नोएडा के मज़दूर संघर्ष और उसके पुलिसिया दमन पर अलग से बात करना आवश्यक है। हरियाणा में भी सरकार ने दमन का रास्ता अख़्तियार किया है, लेकिन उत्तर प्रदेश में नोएडा में यह दमन कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर हुआ है।

नोएडा में 11 अप्रैल को नोएडा पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने मज़दूर हड़ताल को व्यवस्थित और शान्तिपूर्ण तरीक़े से चलाने वाले चार श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं रूपेश राय, सृष्टि गुप्ता, आकृति चौधरी और मनीषा चौहान को बोटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन, नोएडा से शाम 7 बजे गिरफ्तार कर लिया। रूपेश रॉय एकता संघर्ष समिति (कुलेसरा, नोएडा) और ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ नामक मंच से जुड़े हैं, सृष्टि गुप्ता एक छात्र व युवा कलाकार हैं, प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स लीग से जुड़ी हैं और श्रम अधिकारों के लिए भी काम करती रही हैं, आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र हैं, दिशा छात्र संगठन से जुड़ी हैं और छात्र व श्रम अधिकार कार्यकर्ता हैं, और मनीषा चौहान एक गारमेण्ट मज़दूर और श्रम अधिकार कार्यकर्ता हैं और एकता संघर्ष समिति से जुड़ी हैं।

इस गिरफ्तारी के दौरान, उत्तर प्रदेश पुलिस ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय गिरफ्तारी के दौरान लागू किये जाने वाले किसी भी दिशानिर्देश का पालन नहीं किया। तीन स्त्री कार्यकर्ताओं को सूरज डूबने के बाद गिरफ्तार किया गया। लेकिन गिरफ्तार करने वाली उत्तर प्रदेश की टीम में कोई भी महिला पुलिसकर्मी नहीं थी। ये पुलिस वाले वर्दी और नाम का प्लेट भी नहीं पहने हुए थे। उन्होंने बिना किसी वारण्ट, नोटिस या पूर्वसूचना के रूपेश, सृष्टि, आकृति और मनीषा को बोटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से अगवा कर लिया। वास्तव में, यह गिरफ्तारी नहीं थी, बल्कि अगवा किया जाना था। उत्तर प्रदेश पुलिस की इस ग़ैरक़ानूनी हरक़त का वीडियो बाक़ायदा ऑनलाइन मौजूद है, लेकिन उत्तर प्रदेश प्रशासन इस पर आँख मूँदे बैठा है। इसकी तुलना मज़दूरों के आन्दोलन से करें: अगर मज़दूर अपने जायज़ हक़ों के लिए भी हड़ताल करते हैं, तो प्रशासन से लेकर पुलिस और न्यायपालिका तक स्वयं हरक़त में जाते हैं! लेकिन मालिक से लेकर पुलिस तक खुलेआम क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ायें, कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

इन गिरफ्तार कार्यकर्ताओं पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने मज़दूरों को हिंसा के लिए उकसाने का आरोप लगाकर उन पर कई एफ़.आई.आर. दर्ज़ कर दीं। लम्बे समय तक इन कार्यकर्ताओं के साथियों, वक़ीलों और परिजनों को नोएडा फ़ेज़ 2 पुलिस थाने पर उनके बारे में कोई सूचना नहीं दी गयी। उस रात थाने पर नोएडा कमिश्नर लक्ष्मी सिंह भी कुछ समय के लिए मौजूद थीं। उन्होंने भी इन कार्यकर्ताओं के परिजनों, वकील व साथियों को कोई जानकारी नहीं दी। थाने के बाहर दर्जनों मज़दूर व समर्थक बार-बार इन गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के बारे में जानकारी की माँग करते रहे लेकिन उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गयी। पुलिस रात आते-आते इस बात से ही इंकार करने लगी कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने रूपेश, सृष्टि, आकृति और मनीषा को गिरफ्तार भी किया है! जब गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के साथियों ने पुलिस को बाक़ायदा गिरफ्तारी किये जाने का वीडियो दिखाया और उत्तर प्रदेश पुलिस की उस गाड़ी का नम्बर प्लेट वीडियो में दिखाया जिसे इन कार्यकर्ताओं को अगवा करने में इस्तेमाल किया गया था, तो उनकी बोलती बन्द हो गयी। स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश पुलिस मज़दूरों को दबाने के लिए हर क़ानून की खुलेआम धज्जियाँ उड़ा रही थी।

अगले दिन गिरफ्तार किये गये चारों श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं को उनके परिजनों या वक़ीलों को सूचना दिये बिना नोएडा के सूरजपुर जिला न्यायालय में पेश किया गया और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इसके पहले न तो गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के मित्रों, साथियों या परिजनों को गिरफ्तारी के बारे में सूचित किया गया और न ही उनके वक़ील को। यह एक बार फिर से उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा क़ानून का सीधे तौर पर उल्लंघन था, जो इन गिरफ्तारियों को ही ग़ैरक़ानूनी बना देता है। मोदी सरकार द्वारा लागू की गयी दमनकारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के सेक्शन 48 के अनुसार पुलिस द्वारा किसी को भी गिरफ्तार किये जाने पर उसके मित्र, परिजन या गिरफ्तार किये गये व्यक्ति द्वारा बताये गये किसी व्यक्ति को सूचित करना और उसे गिरफ्तारी का कारण और आधार बताना पुलिस के लिए अनिवार्य है। क्या उत्तर प्रदेश पुलिस ने ऐसा किया? नहीं। अगर कोई मज़दूरों के पक्ष में आवाज़ उठाता है, तो देश का सारा संविधान और क़ानून न जाने कहाँ चला जाता है!

इसी बीच, उत्तर प्रदेश पुलिस और नोएडा से गयी स्पेशल टास्क फोर्स के लोग 10 अप्रैल से ही ‘मज़दूर बिगुल’ के सोशल मीडिया पेजों से नोएडा व मानेसर में मज़दूर हड़तालों की रिपोर्टिंग को हटवाने का दबाव बनाने के लिए बार-बार लखनऊ स्थित पुस्तक प्रतिष्ठान ‘जनचेतना’ का दौरा कर रहे थे, क्योंकि ‘जनचेतना’ इस मज़दूर अख़बार का प्रमुख वितरक है। 13 अप्रैल को उन्होंनेजनचेतनासे प्रसिद्ध कवयित्री, आलोचक, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता कात्यायनी, जानेमाने वरिष्ठ पत्रकार, अनुवादक, भगतसिंह उनके साथियों की संकलित रचनाओं के सम्पादक जनबुद्धिजीवी सत्यम वर्मा, औरअमर उजालाके लखनऊ संस्करण के भूतपूर्व सम्पादक संजय श्रीवास्तव को हिरासत में ले लिया, बिना कोई पूछताछ का नोटिस दिये, बिना उनके मोबाइल फ़ोनों की जाँच का नोटिस दिये उनसे पूछताछ की और उनके मोबाइल फ़ोनों की भी अनधिकृत जाँच की। उनका दावा था कि वे नोएडा में 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के सामने हुई (तमाम मीडिया संस्थानों द्वारा पेश प्रमाणों के आधार पर कथित तौर पर स्वयं उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा ही भड़काई गयी) हिंसा के बारे में पूछताछ कर रहे हैं! लेकिन अगर ऐसी कोई पूछताछ करनी भी हो, अगर किसी के मोबाइल फ़ोन जैसी निजी वस्तु की जाँच करनी भी हो, तो क़ानून के अनुसार उसका एक उपयुक्त तरीक़ा होता है। क्या पुलिस ने इन तौर-तरीक़ों का पालन किया? नहीं! इन बुद्धिजीवियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं का दोष सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने ऑनलाइन सोशल मीडिया पर नोएडा व मानेसर में हो रहे मज़दूर संघर्षों का समर्थन किया था। 13 अप्रैल को रात में ‘जनचेतना’ के वॉलण्टियर व सामाजिक कार्यकर्ता लालचन्द्र को भी पुलिस पूछताछ के नाम पर ले जाती है। इन सभी को उसी दिन रिहा कर दिया जाता है। ग़ौरतलब है कि यह सारी कार्रवाई पुलिस क़ानूनी तौर पर स्थापित प्रक्रियाओं का उल्लंघन करते हुए करती है।

इसके बाद, 17 अप्रैल की शाम एस.टी.एफ़. की टीम फिर से ‘जनचेतना’ पहुँचती है। ‘जनचेतना’ पुस्तक प्रतिष्ठान ‘अनुराग ट्रस्ट’ नामक पंजीकृत ट्रस्ट की इमारत में चलता है, जहाँ ‘जनचेतना’ एक किरायेदार है। पुलिस पहले घण्टों तक कात्यायनी, सत्यम वर्मा, प्रसिद्ध कलाकार रामबाबू और अन्य कई लोगों को जबरन वहाँ बिठाकर रखती है और एक अन्य श्रम अधिकार कार्यकर्ता आदित्य आनन्द के बारे में पूछताछ करती है, बिगुल मज़दूर दस्ता के बारे में पूछताछ करती है, और फिर केवल इमारत की एक मंज़िल का सर्च वारण्ट होने के बावजूद पूरी इमारत की छानबीन करती है, लोगों के निजी कमरों में जाती है और वहाँ से बहुतसा सामान ज़ब्त करती है, जिसमें कई कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फ़ोन, क़ानूनी कागज़ात, किताबें आदि शामिल थीं। ज़ब्त सामान का एक समुचित मेमो व उपयुक्त रूप से बनाया गया मेमो तक नहीं दिया गया। इसी समय, साथी सत्यम वर्मा को पुलिस हिरासत में ले लेती है। यह शाम को क़रीब 8 बजे होता है। तीन घण्टे तक पुलिस सत्यम वर्मा को कहाँ ले जाती है, उसकी कोई जानकारी पुलिस तो सत्यम के साथियों को देती है, उनके वक़ीलों को और ही उनके परिजनों को। इसके बाद, रात 11 बजे के बाद पुलिस सत्यम वर्मा को उनके निवास स्थान पर लेकर जाती है और बिना किसी सर्च वारण्ट के उनके कमरे की तलाशी लेती है और वहाँ से भी उनका निजी कम्प्यूटर, लैपटॉप, डायरियाँ और नोटबुक उठा ले जाती है। साथी कात्यायनी द्वारा पूछे जाने पर कि वे सत्यम को कहाँ ले जा रही है, पुलिस कोई जवाब नहीं देती है। उत्तर प्रदेश पुलिस का यह सारा कुकर्म सी.सी.टी.वी. फुटेज कुछ नागरिकों द्वारा रिकार्ड किये गये वीडियो में मौजूद है कि 17 तारीख़ की रात साथी सत्यम वर्मा को किस ग़ैरक़ानूनी तौरतरीक़े से उत्तर प्रदेश पुलिस ने अगवा किया। तो गिरफ्तारी का कोई आधार बताया गया, ही किसी परिजन, मित्र या वक़ील को इसकी सूचना दी गयी। सत्यम वर्मा को क़रीब 40 घण्टे के बाद पुलिस नोएडा के सूरजपुर कोर्ट में पेश करती है और फिर उन्हें भी जेल भेज दिया जाता है। मोदी सरकार की फ़ासीवादी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के ही अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घण्टे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होता है। क्या सत्यम वर्मा को 24 घण्टे के भीतर लखनऊ में निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया? नहीं। क्या उन्हें 24 घण्टे के भीतर किसी भी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया? नहीं। यहाँ तक कि नोएडा में उन्हें 18 अप्रैल की रात एक निजी सैफ्रन लिविंग हॉस्टल में रात भर रखा गया और वह भी हथकड़ी में। देश के एक जाने-माने अग्रणी जनबुद्धिजीवी, अनुवादक, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता के साथ सारे क़ानूनों को ताक पर रखकर उत्तर प्रदेश पुलिस अपराधियों जैसा बर्ताव करती है। अगले दिन 19 अप्रैल को 40 घण्टे से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद उन्हें नोएडा के सूरजपुर जिला न्यायालय में पेश कर कई फ़र्जी मुकदमे लगाकर जेल भेज दिया गया। उनका दोष क्या था? मेहनतकश जनता और मज़दूरों का पक्ष चुनना। सत्यम वर्मा की जीवनसाथी शाकम्भरी द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका के अनुसार उत्तर प्रदेश पुलिस कम्पनियों, मालिकान और प्रबन्धन के इशारों पर मज़दूरों के आन्दोलन को दबाने के लिए खुलेआम देश के संविधान, क़ानून और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों की धज्जियाँ उड़ा रही है।

17 अप्रैल की ही रात एक अन्य श्रम अधिकार कार्यकर्ता आदित्य आनन्द को तमिलनाडु के तिरुचिरपल्ली से अन्तरराज्यीय गिरफ्तारी के सर्वोच्च न्यायालय के सभी दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किया। यहाँ तक कि मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरई पीठ के  समक्ष आदित्य आनन्द के वकीलों द्वारा दायर याचिका में इस गिरफ्तारी को उचित प्रक्रिया का उल्लंघन करके की गयी गिरफ्तारी बताया है और इस बेंच ने इस मसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में उठाने की बात कही है। आदित्य आनन्द उन श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं में से एक थे जो नोएडा में मज़दूरों की हड़ताल को शान्तिपूर्ण बनाये रखने का हरसम्भव प्रयास कर रहे थे जैसा कि अब तक सार्वजनिक हो चुके वीडियो से ज़ाहिर है। आदित्य आनन्द पेशे से एक इंजीनियर हैं और जमशेदपुर एनआईटी के छात्र रहे हैं। कम उम्र से ही उन्होंने भगतसिंह के विचारों को मानना शुरू कर दिया था और वे हमेशा ही जनता के तमाम संघर्षों में शामिल रहते थे, चाहे वे छात्रों के हों, युवाओं के हों, स्त्रियों के हों या फिर मज़दूरों के। बच्चों के बीच भी उन्होंने शैक्षणिक और रचनात्मक कार्य किये हैं और साथ ही कला और विज्ञान की गतिविधियों में भी लगातार शामिल रहे हैं। आदित्य आनन्द को उत्तर प्रदेश पुलिस 14 अप्रैल से ही नोएडा की हिंसा का “मास्टरमाइण्ड” बता रही थी (ये “मास्टरमाइण्ड”, “किंगपिन” आदि जैसे बाज़ारू शब्द उत्तर प्रदेश पुलिस और दलाल गोदी मीडिया, दोनों के ही प्रिय शब्द हैं!) और गोदी मीडिया बिना कोई जाँच किये कभी पाकिस्तान का एजेण्ट तो कभी नक्सली आतंकवादी बताने की कोशिश कर रही थी। आदित्य आनन्द की तस्वीरें गोदी मीडिया के चैनल फिल्मी संगीत के साथ नेशनल टेलीविज़न पर चला रहे थे और इस प्रकार उनके ख़िलाफ़ एक मॉब लिंचिंग जैसा माहौल देश में बनाने की कुत्सित कोशिश गोदी मीडिया के कई चैनल व अख़बार लगातार कर रहे थे, जिस बात को आदित्य आनन्द के भाई द्वारा दायर याचिकाओं में भी इंगित किया गया है। जब अभी तक जाँच ही नहीं की गयी थी, तो पुलिस को पहले से ही कैसे पता था कि आदित्य आनन्द हिंसा कामास्टरमाइण्डहै, पाकिस्तानी एजेण्ट है, नक्सली है, आदि? क्या पुलिस ने इसके पक्ष में कोई भी सबूत पेश किये थे? क्या आदित्य आनन्द की कॉल डिटेल्स या उनके मोबाइल की लोकेशन से पुलिस साबित कर सकती है कि वह 13 अप्रैल को नोएडा में थे या नहीं? क्या उनका कोई वीडियो या व्हाट्सऐप ग्रुप में ऐसा कोई सन्देश पुलिस दिखा सकती है जो आदित्य को हिंसा भड़काते हुए दिखाये? नहीं। वास्तव में, पुलिस के झूठे दावों के विपरीत सारे सबूत मौजूद हैं और पब्लिक डोमेन में हैं। आदित्य आनन्द का व्हाट्सऐप ग्रुप में पड़ा वीडियो भी सार्वजनिक तौर पर ऑनलाइन मौजूद है जिसमें आदित्य आनन्द मज़दूरों को बता रहे हैं कि हड़ताल करना उनका संवैधानिक अधिकार है लेकिन उन्हें हर हालत में अपनी हड़ताल को शान्तिपूर्ण तरीक़े से चलाना चाहिए और किसी भी हालत में हिंसा भड़काने के प्रयासों को नाकाम कर देना चाहिए। फ़ेसबुक पर बाक़ायदा वीडियो मौजूद है जिसमें आदित्य आनन्द और रूपेश राय मज़दूरों को अपनी हड़ताल को शान्तिपूर्ण तरीक़े से जारी रखने की शपथ दिलवा रहे हैं। तो फिर पुलिस ने उन्हें क्यों गिरफ्तार किया? आप स्वयं सोचें!

आदित्य को 17 अप्रैल की रात गिरफ्तार कर पुलिस तमिलनाडु में किसी मजिस्ट्रेट से ट्रांज़िट रिमाण्ड लिये बिना नोएडा ले आयी, जैसा कि मदुरई बेंच के समक्ष दायर याचिका में आदित्य आनन्द के भाई द्वारा दावा किया गया है । वास्तव में, गिरफ्तारी के बारे में तमिलनाडु पुलिस को सूचित ही नहीं किया गया था और रेलवे पुलिस की मदद से उत्तर प्रदेश एस.टी.एफ़. के लोगों ने गिरफ्तारी की थी। ये सभी अन्तरराज्यीय गिरफ्तारी के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये दिशा-निर्देशों का उल्लंघन था, जिस पर मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरई पीठ ने भी टिप्पणी की है।

इसके बाद 18 अप्रैल को जाने-माने छात्र कार्यकर्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ में अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ चुके हिमांशु ठाकुर को उत्तर प्रदेश पुलिस ने शालीमार बाग, दिल्ली के उनके निवास स्थान से गिरफ्तार कर लिया। उनके ऊपर भी नोएडा हिंसा में “मास्टरमाइण्ड” होने का आरोप लगा दिया गया! इस गिरफ्तारी को भी आम तौर पर गिरफ्तारी पर डी.के. बोस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये दिशानिर्देशों का उल्लंघन करके अंजाम दिया गया। उन्हें दिल्ली में किसी भी निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया। उन्हें कोई पूर्व सूचना या नोटिस नहीं दिया गया था और ही उनके निवास स्थान की तलाशी का कोई सर्च वारण्ट पुलिस के पास था। इन सारे नियमोंक़ानूनों का उल्लंघन करते हुए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। हिमांशु ठाकुर ‘दिशा छात्र संगठन’ से जुड़े हुए हैं और पिछले कुछ वर्षों से आम तौर पर जनता के विभिन्न संघर्षों में एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर जाते रहे हैं। उनका भी दोष सिर्फ़ इतना था कि वे नोएडा के मज़दूरों के जायज़ संघर्षों का समर्थन करने के लिए नोएडा गये थे।

हिरासत में लिए जाने के बाद पुलिस ने रूपेश राय के साथ मारपीट की, आदित्य आनन्द के साथ 15-20 पुलिसवालों ने एक अज्ञात स्थान पर 2 घण्टे तक मारपीट की, और हिमांशु ठाकुर को भी चमड़े की बेल्ट से हाथ पर मारा गया। इसके बाद, पुलिस कस्टडी में भी आदित्य आनन्द के साथ पुलिस ने बुरी तरह से मारपीट की। इसके बाद, जब कोर्ट में आदित्य आनन्द ने मजिस्ट्रेट के सामने चिल्लाकर कस्टडी में पुलिस द्वारा की गयी हिंसा का बयान किया तो मजिस्ट्रेट को मजबूर होकर डीसीपी जाँच का आदेश देना पड़ा। लेकिन इतिहास से मिले अनुभवों के आधार पर बात करें तो ऐसी जाँचों से ज्यादा कुछ निकलेगा या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है। पुलिस अपनी ही जाँच कितनी वस्तुपरकता से करती है, यह सारी दुनिया जानती है। कस्टडी में होने वाली हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट के वकील कॉलिन गोंज़ाल्वेस द्वारा एक याचिका दायर की गयी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस प्रशासन के अधिकारियों को 8 मई को नोटिस जारी किया। इसी दौरान, आदित्य आनन्द को गुड़गाँव पुलिस ने मानेसर में हुई हिंसा का भी “मास्टरमाइण्ड” बताना शुरू कर दिया और वहाँ की एफ़.आई.आर. में भी उनका नाम शामिल कर दिया।

पुलिस ने उपरोक्त सातों गिरफ्तार मज़दूर कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों छात्रों (सत्यम, आदित्य, रूपेश, हिमांशु, सृष्टि, आकृति, मनीषा) के बारे में अब तक कोर्ट में कोई भी सबूत पेश नहीं किया और बस तारीख़ों पर तरीख़ें माँगी हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश पुलिस ने गोदी मीडिया के ज़रिये एक मीडिया ट्रायल चलाने की पूरी कोशिश की ताकि बिना किसी जाँच या मुकदमे के ही इन कार्यकर्ताओं को दोषी ठहरा दिया जाय। कभी पाकिस्तान लिंक की बात की गयी, कभी नक्सलवाद का झूठा आरोप लगाया गया, तो कभी ‘बाहरी तत्वों’ आदि की बात की गयी। लेकिन पुलिस और गोदी मीडिया का कोई दुष्प्रचार जनता के बीच जड़ें नहीं जमा पा रहा है और जनता लगातार पुलिस की भूमिका पर ही सवाल उठा रही है।

इस बीच, इन गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के लिए शुरू किये गये अभियानकारवाँद्वारा सबूतों के साथ इस बात का खुलासा किया गया ख़ुद उत्तर प्रदेश पुलिस ने शान्तिपूर्ण रूप से जारी मज़दूर हड़ताल को हिंस्र बनाने की साज़िश की थी ताकि फिर हड़ताल का दमन करने का वैधीकरण जनता के सामने हासिल किया जा सके।कारवाँके सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रेस वार्ता करके समूचे प्रेस को सबूत दिखाये कि व्हाट्सऐप ग्रुपों में उत्तर प्रदेश पुलिस के लोग, यहाँ तक कि एक पुलिस अधिकारी का ड्राइवर और एक सबइंस्पेक्टर बीना, तक घुसे हुए थे और वे भड़काऊ तस्वीरें, स्क्रीनशॉट, मैसेज ऑडियो इन ग्रुपों में डाल रहे थे। इस बात के प्रमाण भी कुछ प्रत्यक्षदर्शी मज़दूरों ने रखे हैं कि नोएडा में 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के समक्ष हुई हिंसा पुलिस द्वारा ही भड़काई गयी थी। 13 अप्रैल के दिन नाइट शिफ़्ट में काम करने वाले सैंकड़ों स्त्री व पुरुष मज़दूर कारखाने से जब बाहर निकल कर घर वापस लौट रहे थे, तो पुलिस ने उन्हें घर जाने से रोक दिया और कारखाने में बन्द करने का प्रयास किया। पुलिस वाले यह बोल रहे थे कि “तुम लोग बाहर निकलकर प्रदर्शन करोगे” और इसलिए उन्हें बन्द रखने का प्रयास किया जा रहा था। रात भर के काम से थके मज़दूरों ने इस बात को मानने से इंकार किया तो पुलिस ने महिला मज़दूरों को बुरी तरह से मारना शुरू कर दिया। इसके बाद, बाक़ी मज़दूरों के धैर्य का प्याला भी छलक गया और फिर हिंसा की वारदात हुई। कारवाँ पत्रिका द्वारा पेश किये गये वीडियो अनुसार वास्तव में, हिंसा की शुरुआत ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने की थी।

दूसरी बात, 11 अप्रैल और फिर 17 और 18 अप्रैल को गिरफ्तार किये गये श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और छात्र कार्यकर्ताओं में से एक भी व्यक्ति 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के आसपास भी मौजूद नहीं था। रूपेश, सृष्टि, आकृति और मनीषा तो 11 अप्रैल से ही हिरासत और फिर जेल में थे, भला वे 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के सामने कैसे हो सकते थे। सत्यम वर्मा तो पिछले 12 वर्षों से नोएडा गये ही नहीं थे और नोएडा में जारी मज़दूर आन्दोलन के पूरे समय के दौरान वे लखनऊ में थे! इसके अलावा, हिमांशु ठाकुर भी मदरसन कम्पनी के क़रीब भी मौजूद नहीं थे। ऐसे में, हिंसा भड़काने में इन कार्यकर्ताओं की कोई भी भूमिका साबित करना पुलिस के लिए असम्भव है। यही वजह है कि पुलिस ने इतनी पेशियाँ ज़िला व सेशन अदालत में होने के बावजूद इनके ख़िलाफ़ एक सबूत भी पेश नहीं कर पायी है। उल्टे पुलिस के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के सबूत सामने आने लगे हैं। 7 मई को जनसत्ता अख़बार और एक्सप्रेस ग्रुप के यूट्यूब समाचार चैनल ने भी इस सच्चाई को रिपोर्ट किया। बाद में , ‘ हिन्दूऔरटाइम्स ऑफ इण्डियाने भी हिंसा भड़काने में उत्तर प्रदेश पुलिस की भूमिका पर सबूतों के आधार पर गहरे सवालिया निशान खड़े किये। जनता में भी यह सच्चाई तेज़ी से फैली। इन ख़बरों और रपटों का ही नतीजा था कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने आनन-फ़ानन में कुछ मीडिया संस्थानों व सोशल मीडिया आईडी पर इन ख़बरों को दिखाने या शेयर करने के लिए एफआईआर कर दी। इसके बावजूद, ये ख़बरें जनता के बीच फैल चुकी थीं और जनता का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश पुलिस की नोएडा हिंसा में सन्देहास्पद भूमिका पर सवाल खड़े कर रहा था।

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश प्रशासन को अपना चेहरा बचाने के लिए नोएडा हिंसा की जाँच में उत्तर प्रदेश की आई.जी. अधिकारी और नोएडा की कमिश्नर लक्ष्मी सिंह (जोकि भाजपा विधायक राजेश्वर सिंह की पत्नी भी हैं!) को पृष्ठभूमि में करना पड़ा और उसने एक मजिस्ट्रेट स्तर की जाँच का आदेश दिया है, जिसकी अगुवाई अपर पुलिस कमिश्नर अजय कुमार कर रहे हैं। लेकिन यह एक्जि़क्यूटिव मजिस्ट्रेट स्तर की ही जाँच है और एक पुलिसिया जाँच ही है। जब उत्तर प्रदेश पुलिस की हिंसा में भूमिका ही कठघरे में खड़ी है, तो उत्तर प्रदेश पुलिस का अधिकारी ही स्वयं जाँच कैसे कर सकता है? ऐसी जाँच से निष्पक्ष रहने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस पूरे मसले की अपेक्षाकृत साफ़ जाँच केवल सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में बनी कोई स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम या कोई उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच आयोग ही कर सकता है। इसके अलावा, किसी भी जाँच से कोई विशेष उम्मीद नहीं की जा सकती। आम तौर पर अब तक ऐसी जाँचें तरहम-बरहम कर पुलिस को ही बचाती हैं और अक्सर बेगुनाहों को फँसा देती हैं। यह जाँच इससे अलग कुछ कर पायेगी, इसकी गुंजाइश भी न के बराबर ही है।

अब जो तथ्य सामने चुके हैं उसके आधार पर अब तक उत्तर प्रदेश पुलिस ने कोई जाँच क्यों नहीं कीख़ुद को पुलिस अधिकारी का ड्राइवर बताने वाले अनिल ने मज़दूरों के ग्रुप में घुसपैठ की और फिर उसमें ऐसी सामग्री डाली जो हिंसा के लिए भड़काती थी, उसके ऊपर एक महीने तक कोई जाँच क्यों नहीं बैठी? और यही काम करने वाली सब इंस्पेक्टर बीना के लिए नोएडा पुलिस झूठी दलीलें दे रही है! ये पुलिस वाले किस पुलिस अधिकारी के आदेशों पर मज़ूदरों को हिंसा के लिए भड़का रहे थे, अभी तक इसका खुलासा क्यों नहीं किया गया है? इन सारे सवालों पर उत्तर प्रदेश पुलिस के बयान सन्देहास्पद क्यों हैं? गोदी मीडिया के दलाल चैनलों ने इस सच्चाई को अब तक क्यों नहीं दिखलाया? अब मजिस्ट्रेट जाँच बिठायी गयी है और जाँचकर्ता अधिकारी ने जनता से प्रमाण और गवाही माँगी है! पहले वे अभी से सावर्जनिक रूप से मौजूद उन सबूतों की जाँच क्यों नहीं करते हैं, जो उत्तर प्रदेश पुलिस की सन्देहास्पद भूमिका पर सवाल उठाती है? इन सारे सवालों का जवाब हम मज़दूर और मेहनतकश जानते हैं, जब मुद्दई और मुंसिफ़ ख़ुद मालिकों और प्रबन्धन के इशारे पर काम करने वाली उत्तर प्रदेश सरकार और उसकी पुलिस ही हो, तो आप किस प्रकार की निष्पक्ष जाँच और कार्रवाई की उम्मीद कर सकते हैं?

इन सभी तथ्यों से सवाल उठता है कि जब मज़दूरों का स्वत:स्फूर्त आन्दोलन नोएडा में शुरू हुआ तो कथित तौर पर उसे कम्पनियों के मालिकान और प्रबन्धन के इशारों पर तुड़वाने के लिए योगी सरकार और उसकी उत्तर प्रदेश पुलिस काटूलकिट’, याटेम्पलेटक्या था?

सामने आ रहे तथ्यों और ख़बरों से ऐसा प्रतीत होता है कि यह वही साज़िश थी जो पुलिस शान्तिपूर्ण तरीक़े से अपनी हड़ताल चला रहे मज़दूरों के संघर्ष को तोड़ने और कुचलने के लिए हमेशा ही अपनाती रही है, चाहे वे 1886 में शिकागो के मई दिवस का आन्दोलन रहा हो या आज नोएडा के मज़दूरों का आन्दोलन हो। जो हुआ है, उसके पहले जो हुआ था, उसे समझना यहाँ ज़रूरी है।

कुछ ही समय पहले योगी सरकार ने नोएडा में निवेशकों का सम्मेलन किया था, जिसमें पूँजीपतियों को यह कहकर निवेश करने के लिए लुभाया गया था कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा व ग़ाज़ियाबाद में “औद्योगिक शान्ति” बनायी जायेगी, पूँजीपतियों को “धंधा करने की पूरी सहूलियत” हासिल होगी। इसका अर्थ साफ़ है: नोएडा में एक दशक से भी ज़्यादा समय से न्यूनतम मज़दूरी नहीं बढ़ायी गयी थी, ट्रेड यूनियनें प्रभावतः दृश्य से अन्तर्धान हो चुकी थीं, मज़दूरों के पास अपनी शिकायतों को दर्ज कराने, अपनी माँगों के लिए संघर्ष करने के तमाम मंच अनुपस्थित थे; नोएडा के श्रम न्यायालय में एक लाख केस लम्बित हैं। यही वह स्थिति है जो पूँजीपतियों से निवेश को आमंत्रित करने के लिए पैदा की गयी है। लेकिन पूँजीपतियों को किये गये योगी सरकार के वायदे नोएडा में मज़दूरों के स्वत:स्फूर्त हड़ताल के साथ धरे के धरे रह गये। 2027 में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव है। लिहाज़ा, योगी आदित्यनाथ को किसी भी क़ीमत पर यह हड़ताल कुचलनी थी ताकि वह अगले साल के चुनावों में पूँजीपतियों की लॉबी का आर्थिक समर्थन प्राप्त कर सके, करोड़ों रुपये के चन्दे हासिल कर सके। भाजपा साम्प्रदायिकता, पूँजी की शक्ति और राज्यसत्ता के सभी उपकरणों में आन्तरिक घुसपैठ के बूते ही चुनावों को चुरा रही है। इन तीनों कारकों के मिश्रण के बिना उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाजपा की स्थिति ख़राब भी हो सकती है। ऐसे में, पूँजीपतियों के सामने एक रिपोर्ट कार्ड पेश करना उत्तर प्रदेश के भाजपा नेतृत्व सरकार के लिए ज़रूरी था। ऐसा प्रतीत होता है कि इसीलिए हड़ताल को जल्द से जल्द तोड़ना आवश्यक था।

अब तक आये सबूतों और रपटों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि इसी के लिए मज़दूरों द्वारा शान्तिपूर्ण तरीक़े से जारी हड़ताल में हिंसा भड़कायी गयी इसमें उत्तर प्रदेश पुलिस की भूमिका पर अब गहरे सवालिया निशान खड़े हो चुके हैं और जिनकी उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच से ही सच्चाई सामने आ सकती है। एक बार हड़तालों या मज़दूर आन्दोलनों में इस प्रकार हिंसा भड़का दी जाती है, तो उसका दमन करने और उस दमन को जनता के समक्ष वैध ठहराने का उपकरण सरकारों को मिल जाता है।

मज़दूरों के व्हाट्सऐप ग्रुप में खुद को एक डिप्टी कमिश्नर का ड्राइवर बताने वाला व्यक्ति और एक सबइंस्पेक्टर कर ही क्या रहे थे? वे हिंसा भड़काने वाले उकसाऊ सन्देश क्यों डाल रहे थे? इस पर उत्तर प्रदेश पुलिस एक महीने तक चुप्पी क्यों साधे रही? उत्तर प्रदेश की पूँजीपतियों के संघों, उत्तर प्रदेश प्रशासन और पुलिस को यह पता था कि अगर मज़दूरों की हड़ताल कुछ भी दिन शान्तिपूर्ण तरीक़े से चल गयी, तो उनके लिए मुश्किल हो जायेगी और उन्हें मज़दूरों की माँगों के सामने झुकना भी पड़ सकता है। इसलिए 8 अप्रैल को मज़दूरों की हड़ताल शुरू होने के समय से ही पुलिस ने कभी मज़दूरों के नेताओं को भीड़ के बीच से पकड़ने की कोशिश की, तो कभी बिना किसी उकसावे के मज़दूरों पर बल प्रयोग किया। लेकिन रूपेश राय, आदित्य आनन्द, सृष्टि, आकृति, मनीषा जैसे श्रम अधिकार व सामाजिक कार्यकर्ता सतत प्रयासरत थे कि मज़दूर अपनी हड़ताल और आन्दोलन को शान्तिपूर्ण तरीके से जारी रखें। रूपेश, आदित्य आनन्द और आकृति चौधरी के ऐसे वीडियो भी सोशल मीडिया व सार्वजनिक डोमेन में मौजूद हैं।

ग़ौरतलब है कि जब तक 11 अप्रैल की गिरफ्तारियाँ नहीं हुईं तब तक नोएडा में किसी एक जगह भी कोई हिंसक वारदात नहीं हुई और हड़ताल शान्तिपूर्ण तरीक़े से जारी रही। और जब आन्दोलन को अनुशासन, व्यवस्था और संगठन के रास्ते पर बनाये रखने वाले ये श्रम अधिकार कार्यकर्ता रास्ते से हटा दिये गये और गिरफ्तार कर लिये गये, तब जाकर 13 अप्रैल को पहली बार हिंसक वारदात मदरसन कम्पनी के सामने हुई। यह किस प्रकार से पुलिस के उकसावे के कारण हुई, उसका हम पहले ही ज़िक्र कर चुके हैं। अब तक आये सबूतों और प्रमाणों से एक ‘टूलकिट’ उभरता प्रतीत होता है। नतीजतन, समूचे प्रकरण की उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच होना अपरिहार्य है जिससे कि हिंसा भड़काने के असली दोषियों की पहचान हो सके।

पुलिस ने अब तक गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की ज़मानत की अर्जियों का विरोध करते हुए अदालत में जो लिखित आवेदन किये हैं, अगर कोई उसे पढ़ ले तो इस पुलिस प्रशासन की मानसिक स्थिति पर उसे हँसी भी सकती है। एक आवेदन में लिखा है कि 13 अप्रैल को रूपेश, आदित्य और हिमांशु के साथ मदरसन कम्पनी के बाहर मज़दूरों को हिंसा के लिए भड़का रहे थे और सत्यम वर्मा ऑनलाइन मज़दूरों को भड़का रहे थे! लेकिन 13 अप्रैल को तो सत्यम वर्मा से लखनऊ के हसनगंज थाने में उत्तर प्रदेश पुलिस पूछताछ कर रही थी और उनका फ़ोन ज़ब्त कर लिया गया था! तो फिर वे नोएडा में कैसे हो सकते थे या फिर वे ऑनलाइन कोई भड़काऊ सन्देश कैसे भेज सकते थे? और रूपेश, सृष्टि, आकृति मनीषा 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी नोएडा के बाहर कैसे हो सकते थे, वे तो 11 अप्रैल से पुलिस हिरासत और फिर जेल में हैं? और हिमांशु 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी के बाहर था तो पुलिस उसकी लोकेशन के विवरण साझा क्यों नहीं कर रही है? यह है पुलिस की जाँच!

स्पष्ट है, उत्तर प्रदेश सरकार का पुलिस प्रशासन पूँजीवादी व्यवस्था का वह डेढ़ सौ साल पुराना ‘टूलकिट’ ही लागू कर रहा है, जो इसके अमेरिकी पुरखों ने 1886 में मई दिवस के शहीदों एंजेल, स्पाइस, फिशर और पार्संस को फँसाने के लिए लागू किया था।

डेढ़ सौ साल में ये लोग कुछ नया भी ईजाद नहीं कर पाये हैं! तब अमेरिकी पुलिस ने हेमार्केट में खुद के ही दलालों द्वारा बम फिंकवाकर बेगुनाह मज़दूर नेताओं को फँसाया था ताकि मज़दूरों के संघर्ष को तोड़ा जा सके।

बाद में अमेरिकी पूँजीवादी अदालत तक को मानना पड़ा था कि मई दिवस के शहीद बेगुनाह थे। बाद में इसे मानने में पूँजीवाद को कोई ख़ास नुक़सान भी नहीं था। आज तक दुनिया भर में पूँजीवादी व्यवस्था की पुलिस मज़दूरों और मज़दूर नेताओं के ख़िलाफ़ इन्हीं तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करती है। लेकिन मज़दूरों का संघर्ष तो तब रुका था अब रुका है और ही तब तक रुकेगा जब तक इंसान द्वारा इंसान का शोषण जारी रहेगा।

देश भर में इंसाफ़पसन्द लोगों और जनता ने पुलिस के इस ‘टूलकिट’ को समझ लिया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में नोएडा आन्दोलन के गिरफ्तार मज़दूरों, लेबर कार्यकर्ताओं, उनके समर्थन में उतरे बुद्धिजीवियों, छात्र कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए प्रदर्शन, प्रेस सम्मेलन, आदि हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस की संदेहास्पद भूमिका समूची जनता के सामने बेनक़ाब हो रही है। यह समूची पूँजीवादी व्यवस्था और मौजूदा फ़ासीवादी शासन को भी बेनक़ाब कर रहा है।

जनता इन चीज़ों को भूलती नहीं है। इस प्रकार का दमन न तो जनता के संघर्षों को कभी दबा पाया है, न ही दबा पायेगा। इस संघर्ष में तात्कालिक तौर पर कभी ज्वार तो कभी भाटा आते रहेंगे। लेकिन श्रम और पूँजी का अन्तरविरोध जब तक बना रहेगा, जब तक पूँजीवादी व्यवस्था बनी रहेगी, जब तक धन्नासेठों के हाथों मेहनतकशों का शोषण जारी रहेगा, तब तक यह संघर्ष भी जारी रहेगा। यह इतिहास का नियम है, कोई माने या न माने, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026