करोड़ों लोगों के वोट देने के बुनियादी राजनीतिक अधिकार छीनने वाली एसआईआर (SIR) की क़वायद पर सर्वोच्च न्यायालय की मुहर!
पहले जनता सरकार को चुनती थी, अब सरकार जनता को चुन रही है!

आकाश

गत 27 मई को सर्वोच्च न्यायालय की दो जजों की बेंच —जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त और जस्टिस जॉयमल्य बागची शामिल थे— ने केन्द्रीय चुनाव आयोग (केचुआ) द्वारा देशभर में की जा रही स्पेशल इंटेसिव रिवीज़न (एसआईआर) (SIR) की बेहद विवादास्पद क़वायद पर अपनी अन्तिम मुहर लगा दी। इसके साथ ही केचुआ के लिए देश के तमाम हिस्सों में इस ख़तरनाक जनविरोधी क़वायद को बेरोकटोक अमल में लाने का रास्ता पूरी तरह से साफ़ हो गया है। ग़ौरतलब है कि अब तक एसआईआर की क़वायद कुल 14 राज्यों/केन्द्र-शासित प्रदेशों में की जा चुकी है जिसके नतीजे के तौर पर करोड़ों लोगों के वोट देने के अधिकार पर तलवार लटक रही है। इनमें 5 करोड़ ऐसे लोग भी शामिल हैं जिनका नाम 2024-25 तक मतदाता सूची में था परन्तु अब उनका नाम सूची से इस आधार पर हटा दिया है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में नामौजूद थे, कहीं और पलायन कर चुके थे, उनकी मृत्यु हो चुकी थी, उनका नाम सूची में एक से अधिक बार आया था या फिर उनके नाम की वर्तनी में कोई विसंगति पायी गयी थी। इतने बड़े पैमाने पर लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाने की वजह से एसआईआर की यह क़वायद शुरू से ही सवालों के घेरे में रही है, परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने इन सवालात को दरकिनार करते हुए केचुआ को पूरे देश में एसआईआर जैसी अन्यायपूर्ण क़वायद को जारी रखने की ख़ुली छूट दे दी है। ग़ौरतलब है कि इस समय देश के 19 राज्यों/केन्द्र-शासित प्रदेशों में एसआईआर किया जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक़ एसआईआर की क़वायद के बाद पूरे देश में क़रीब 10 करोड़ लोगों के मतदान के अधिकार पर ख़तरा मँडराने की सम्भावना है। कहने की ज़रूरत नहीं कि इनमें अधिकांश आबादी ग़रीब मेहनतकश और मुस्लिम पृष्ठभूमि और साथ ही मेहनतकश दलितों के बीच से आती है।

एसआईआर की प्रक्रिया क्यों अन्यायपूर्ण है?

केचुआ और केन्द्र सरकार एसआईआर के पीछे यह तर्क दे रहे हैं कि यह मतदाता सूची की विसंगतियों को दूर करने और अवैध मतदाताओं को सूची से हटाने की सामान्य और ज़रूरी प्रक्रिया है जो आज़ादी के बाद कई बार की जा चुकी है। यह सच है कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया पहले भी कई बार की जा चुकी है, परन्तु इस बार एसआईआर के नाम पर जो प्रक्रिया देशभर में की जा रही है वह अभूतपूर्व है। जहाँ पहले मतदाता सूची में संशोधन का मक़सद यह होता था कि देश के किसी भी वयस्क नागरिक को उसके मतदान के बुनियादी अधिकार से वंचित न रखा जाए, वहीं इस बार एसआईआर का मक़सद कुछ चुनिन्दा दस्तावेज़ों के आधार पर लोगों का मतदाता होना या न होना तय करना है। इस प्रकार एसआईआर की प्रक्रिया में मतदाता होना साबित करने का बोझ नागरिक पर है जबकि पहले यह सुनिश्चित करना राज्य की ज़िम्मेदारी होती थी कि हर वयस्क नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाये। यही वजह है कि आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि मतदाता सूची के संशोधन के बाद मतदाताओं की संख्या में गिरावट आयी है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों में एसआईआर के तहत 10 प्रतिशत से भी ज़्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाये गए हैं। यह अपने आप में दिखाता है कि एसआईआर की प्रक्रिया कितनी अन्यायपूर्ण है क्योंकि आबादी बढ़ने की वजह से वास्तव में मतदाता सूची में नाम बढ़ने चाहिए। पहले मतदाता सूची में किये गये संशोधनों में यही होता आया था कि संशोधन के बाद मतदाताओं की संख्या में इज़ाफ़ा होता था। परन्तु इस बार इज़ाफ़ा तो दूर, जिन लोगों के नाम पहले से मौजूद थे और जो लोग पहले लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में वोट भी देते आए थे उनके नाम भी मतदाता सूची से हटा दिये गये हैं।

ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि मामला सिर्फ़ मतदान के बुनियादी राजनीतिक अधिकार का ही नहीं है। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा कि एसआईआर का नागरिकता से कोई सम्बन्ध नहीं है, परन्तु जिन लोगों का नाम मतदाता सूची से निकाला जा रहा है उनकी नागरिकता निश्चय ही सन्देह के घेरे में आ जाएगी। मसलन पश्चिम बंगाल भाजपा की सरकार बनते ही मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने घोषणा कर दी कि जिन लोगों का नाम एसआईआर के तहत मतदाता सूची से हटाया गया है उनको सरकार की कल्याणकारी स्कीमों का लाभ नहीं मिलेगा। यही नहीं, जिनके नाम मतदाता सूची में नहीं हैं उनको बांग्लादेशी घुसपैठिये के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ज़ाहिरा तौर पर इस आबादी में से अधिकांश लोग बांग्लादेश के नहीं हैं क्योंकि वे पीढ़ियों से इस देश में रहते आए हैं। उनका नाम सिर्फ़ इस वजह से हटा दिया गया क्योंकि उनके पास पर्याप्त दस्तावेज़ मौजूद नहीं थे या फिर उनके दस्तावेज़ों में नाम की वर्तनी जैसी कुछ विसंगतियाँ थीं। इस प्रकार एक बड़ी आबादी के सामने राज्यविहीन हो जाने का ख़तरा पैदा हो गया है। हैरत की बात है कि महामहिम माननीय न्यायाधीशों को इस सरासर नाइंसाफ़ी में कहीं कुछ गड़बड़ी नहीं दिखाई दी और उन्होंने आँख मूँदकर केचुआ और सरकार की दलीलों को स्वीकार कर लिया।

एसआईआर: एक फ़ासीवादी राजनीतिक हथकण्डा

अगर हम एसआईआर के पीछे की राजनीति को समझने की कोशिश करें तो यह बात आसानी से समझ में आ जाएगी कि यह मतदाता सूची में संशोधन करने की साधारण प्रक्रिया मात्र नहीं है बल्कि एक फ़ासीवादी राजनीतिक हथकण्डा है। इसके ज़रिये इस देश के फ़ासीवादी हुक़्मरान इस देश पर लम्बे समय तक अपना एकछत्र राज्य क़ायम करने की योजना बना रहे हैं। ग़ौरतलब है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में फ़ासीवादी भाजपा का विजय रथ दलदल में फँस गया था। 400 पार का नारा लगाने वाले फ़ासिस्ट अपने दम पर पूर्ण बहुमत भी नहीं हासिल कर सके थे। परन्तु उसके बाद हुए कई राज्यों के विधान सभा चुनावों में फ़ासीवादियों को लगातार एक के बाद एक कई आश्चर्यजनक जीतें हासिल हुईं। इन सभी विधानसभा चुनावों में चुनाव और मतदाता सूची से जुड़ी धाँधलियाँ सुर्खियों में रहीं। हरियाणा और महाराष्ट्र के विधान सभा चुनावों में ईवीएम में छेड़छाड़ से लेकर वोट चोरी तक के आरोप बहुत मुखर रूप में सामने आये। उसके बाद बिहार के विधानसभा चुनाव से एसआईआर का मुद्दा सुर्खियों में रहा। बिहार में किये गए एसआईआर में क़रीब 47 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिये गये। पश्चिम बंगाल में हालत इससे भी भयावह रही। वहाँ केचुआ द्वारा जारी पहली सूची में क़रीब 91 लाख लोगों का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया। इनमें से क़रीब 60 लाख लोगों को नामौजूद और मृत बताया गया जबकि 34 लाख ज़िन्दा और मौजूद वोटरों का भविष्य अधर में डाल दिया गया। इसमें 27 लाख लोगों को केवल इस आधार पर मतदाता सूची से निकाल दिया गया कि उनके नाम की वर्तनी उनके दस्तावेज़ों से मेल नहीं खाती है। पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव से पहले जब इतने बड़े पैमाने पर वोट के अधिकार से वंचित करने का मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा तो एक न्यायाधीश महोदय ने टिप्पणी की कि इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, अगर वे इस बार वोट नहीं दे पाएँगे तो अगली बार वोट कर सकते हैं!

अन्तिम सूची में जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाये गये हैं उनमें मुस्लिमों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है। कई विशेषज्ञों ने यह दिखाया है कि भाजपा द्वारा जीती गई सीटों में लगभग आधी सीटों में भाजपा की जीत का अन्तर मतदाता सूची से हटाये गये मतदाताओं की संख्या से कम था। यह दिखाता है कि एसआईआर का मक़सद राजनीतिक है। वास्तव में एसआईआर के ज़रिये भाजपा का मक़सद उन मतदाताओं को मतदाता सूची से निकाल बाहर करने का है जो भाजपा के ख़िलाफ़ वोट करते हैं। इसके ज़रिये वह बांग्लादेशी घुसपैठिये का मुद्दा भी लगातार चर्चा में बनाये रखना चाहती है ताकि उसके शासन की विफलताओं से लोगों का ध्यान भटकाये रखा जा सके। एक प्रकार एसआईआर चोर दरवाज़े से एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिजन्स) लागू करने का कुत्सित प्रयास है। चूँकि जब उन्होंने देशव्यापी स्तर पर एनआरसी करने की प्रक्रिया शुरू की थी तो उसके ख़िलाफ़ देशभर में एक विशाल जनान्दोलन खड़ा हो गया था, इसलिए अब उसी मक़सद को दूसरे तरीक़े से पूरा करने की रणनीति आज़मायी जा रही है।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि एसआईआर वास्तव में भाजपा द्वारा अपने गिरते हुए जनाधार की सूरत में भी लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने के तमाम हथकण्डों में से एक है। अगर हम एसआईआर को भाजपा की अन्य आगामी हथकण्डों—परिसीमन, एक देश एक वोट और क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ना— के साथ देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले दिनों में येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहने की उसकी रणनीति क्या है। पहले जनता सरकार को चुनती थी अब सरकार जनता को चुनेगी।

एसआईआर जैसी घोर जनविरोधी क़वायद का इतने आसानी से अमल में लाना एक बार फिर से यह दिखाता है कि फ़ासीवादियों ने भारत के बुर्जुआ लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं पर आन्तरिक रूप से क़ब्ज़ा कर लिया है। चुनाव आयोग, सीबाईआई, ईडी और यहाँ तक कि न्यायपालिका भी आमतौर पर भाजपा की मर्ज़ी के अनुसार काम कर रहे हैं। महज़ चुनावी राजनीति के दम पर फ़ासीवाद को पटखनी देना पहले भी मुमकिन नहीं था, अब जबकि भाजपा साम, दाम, दण्ड, भेद हर तिकड़म से इस देश की चुनावी राजनीति पर अपना एकछत्र राज्य क़ाम करने की तैयारी कर रही है, तब यह दिन के उजाले की तरह साफ़ होता जा रहा है कि एक जुझारू जनान्दोलन खड़ा करके ही फ़ासीवाद को निर्णायाक मात दी जा सकती है।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2026