फ़ासीवादी सत्ता के डर और प्रलोभन के जाल में लगातार फँसते बुर्जुआ विपक्षी पार्टियों के नेता
तृणमूल काँग्रेस (टीएमसी) में मची भगदड़ के मायने
शिशिर, आशीष
पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को भाजपा ने क़रारी शिक़स्त दी। इस चुनावी हार के बाद टीएमसी में जारी टूट-फूट पर बात करने से पहले प. बंगाल के विधानसभा चुनाव पर थोड़ी चर्चा कर लेते हैं। प. बंगाल के चुनाव परिणाम में 294 विधानसभा सीटों में भाजपा को 207 सीटें और टीएमसी को केवल 80 सीटें मिली। कई विशेषज्ञ भाजपा की इस प्रचण्ड जीत के पीछे केन्द्रीय चुनाव आयोग (केंचुआ) की पक्षपातपूर्ण भूमिका और अदालतों की उदासीनता को ज़िम्मेदार मानते हैं, जिसमें निश्चित ही सच्चाई है, जैसा कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले केंचुआ ने विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर मनमाने तरीक़े से 27 लाख लोगों के नामों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया। कई सीटों में भाजपा की जीत का अन्तर एसआईआर के तहत मतदाता सूची से हटाये गये मतदाताओं की संख्या से कम है, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि इसके बिना भाजपा के लिए प. बंगाल चुनावों में बहुमत प्राप्त करना लगभगत असम्भव था।
इस दौरान एसआईआर के अलावा भी कई ऐसे तथ्य सामने आये जो केंचुआ के निष्पक्षता पर गहरे सवाल उठाते हैं। सूबे में सत्ताप्राप्ति के लिए भाजपा के नेताओं ने बंगाल की विचारणीय मुस्लिम आबादी को बांग्लादेशी घुसपैठियों के रूप में प्रस्तुत करके उनके ख़िलाफ़ बेहिसाब साम्प्रदायिक ज़हर फैलाया, जिसकी बदौलत वे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में काफ़ी हद तक कामयाब रहे। इसके अलावा, भाजपा के पीछे देश के पूँजीपति वर्ग की अकूत धनशक्ति भी खड़ी है, जो पूँजीवादी चुनावों में हमेशा ही बहुत-सी चीज़ों का फ़ैसला कर देती है। यह बात आज सबको पता है कि वर्तमान समय में चुनावी चन्दा हासिल करने में भाजपा को कोई भी पार्टी टक्कर नहीं दे सकती। इन्हीं चन्दों के बदौलत बंगाल के चुनाव में भाजपा ने धनबल का भरपूर इस्तेमाल किया। इन सबके अलावा, ममता बनर्जी के 15 वर्ष के मुख्यमन्त्रित्व काल में हुए ज़बर्दस्त भ्रष्टाचार और निहायत ही निरंकुश व तानाशाहाना प्रशासन तथा टीएमसी के नेताओं की गुण्डागर्दी के प्रति लोगों का गुस्सा, टीएमसी की हार के पीछे की एक महत्वपूर्ण वजह रही।
मगर सिलसिला तृणमूल की हार पर ही ख़त्म नहीं हुआ। चुनावों के नतीजे आने व नयी सरकार के बनने के बाद से तृणमूल कांग्रेस की दिक़्क़तें ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही हैं, बल्कि इस समय वह अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। असल में फ़ासीवादी भाजपा के सत्तासीन होते ही अर्ध-फ़ासीवादी तृणमूल कांग्रेस का ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ढहना अप्रत्याशित नहीं, स्वाभाविक परिघटना है। आगे हम इसके ढाँचागत कारणों पर विचार करेंगे।
बहरहाल, अब भाजपा ने टीएमसी को मात देकर पश्चिम बंगाल की सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया है। खेतों में सिंचाई के दौरान जैसे चूहे बिलबिलाकर अपने बिल से बाहर भागते हैं ठीक वैसी ही दशा टीएमसी के नेताओं की है। विधानसभा चुनाव में मिली हार के चन्द दिनों बाद ही टीएमसी में भगदड़ मचने लगी। ऋतुब्रत बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी के अधिकांश विधायक बाग़ी हो गये। इस घटना को लेकर कई लोगों का मानना है कि बीजेपी ने बंगाल में पक्ष के साथ-साथ अपने हिसाब से विपक्ष का प्रबन्ध भी कर लिया। विधानसभा में लगे झटके से टीएमसी अभी उबर भी नहीं पायी थी कि लोकसभा के 28 में से 20 सांसदों ने बग़ावत कर दी। बाग़ी सांसदों की मीटिंग भाजपा के केन्द्रीय मन्त्री भूपेन्द्र यादव के सरकारी आवास पर हुई, इससे सीधा स्पष्ट होता है कि टीएमसी सांसदों के टूट के पीछे भाजपा का ही हाथ था। विधानसभा चुनावों तक तृणमूल के राज्यसभा में 13 सांसद थे, जिनमें से तीन अब तक इस्तीफ़ा दे चुके हैं और आगे भी इस तादाद के बढ़ते जाने की पूरी सम्भावना है।
इस बार के विधानसभा चुनावों में तृणमूल के टिकट पर कुल 80 विधायक जीतकर आये थे, उनमें से 58 विधायक ऋतुब्रत बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल से अलग हो चुके हैं और भाजपा की मिलीभगत से नेता विपक्ष की कुर्सी हथियाते हुए तृणमूल कांग्रेस की हालत लचर बना दी है। बाग़ी सांसदों के गुट ने भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को समर्थन देने की घोषणा की है। यह तथ्य भी इस टूट के पीछे भाजपा की भूमिका को पुष्ट करते हैं। भाजपा को इस कृत्य के दोष से बचाने और एण्टी डिफ़ेक्शन लॉ यानी दलबदल विरोधी क़ानून से बचाने के लिए बाग़ी सांसदों ने नेशनल सिटीज़न्स पार्टी ऑफ़ इण्डिया (एनसीपीआई) नामक एक पार्टी में विलय की घोषणा कर दी। इसी बीच राज्यसभा में टीएमसी के तीन सांसदों ने पार्टी और राज्यसभा से इस्तीफ़ा दे दिया। लोकसभा में टीएमसी के बाग़ी सांसदों में भारतीय लिबरल तबके की चहेती, भाजपा को पानी पी पीकर कोसने वाली और बंगाल विधानसभा के चुनाव में टीएमसी की पोस्टर गर्ल सायोनी घोष भी शामिल है।
टीएमसी की दुर्गति पर मध्य वर्ग का एक हिस्सा मानो मूर्छित ही हो गया हो! मुख्यधारा में आ रही ख़बरों के मुताबिक़, कई लोग इसे पाला बदल रहे नेताओं की ग़द्दारी या मौक़ापरस्ती क़रार दे रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि ये नेता भाजपा के द्वारा निशाना बनाये जाने से बचने के लिए ऐसा कर रहे हैं। कुछ अन्य ने इसकी यह भी व्याख्या की है तृणमूल महज़ ममता के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द सिमटा दल है जिसमें लोग महज़ सत्ता से क़रीबी के लिए साथ में थे। वहीं कुछ दूसरे इसे अभिषेक बनर्जी के निहायत ही तानाशाही रवैये का नतीजा मान रहे हैं और उनके द्वारा नेताओं को दरकिनार करके IPAC नामक संस्था की मदद से कम्प्यूटर-आधारित डेटा विश्लेषण के हिसाब से काम करने की कार्यपद्धति को ज़िम्मेदार मान रहे हैं। इनमें से कुछ बातें आंशिक रूप से सच हो सकती हैं। लेकिन ये इस परिघटना की सम्पूर्ण तस्वीर सामने नहीं लातीं और जो दिख रहा है उसे ही सारभूत सच मान लेने वाला सतही विश्लेषण पेश करती हैं। सर्वहारा दृष्टिकोण से देखा जाये तो यही कहा जा सकता है कि टीएमसी भी पूँजीवादी शासक वर्ग की एक पार्टी है जो मुख्यतः प. बंगाल के स्थानीय पूँजीपतियों और धनी किसानों का प्रतिनिधित्व करती है और यह स्वयं कोई उदारपंथी पूँजीवादी दल नहीं है, बल्कि एक दक्षिणपंथी सर्वसत्तावादी पूँजीवादी दल है। इसके अलावा अडानी और कुछ बड़े पूँजीपति घरानों से भी टीएमसी नेताओं के मधुर सम्बन्ध हैं। इसे समझने के लिए हमें शुरुआत करनी होगी तृणमूल कांग्रेस के इतिहास से।
संशोधनवादी माकपा के द्वारा नवउदारवादी नीतियों को पश्चिम बंगाल में लागू करने की कोशिशों के तहत नन्दीग्राम-सिंगूर में ग़रीब किसानों की ज़मीन छीने जाने की घटना माकपा के कुकर्मों के लम्बे इतिहास के ख़िलाफ़ जनता के गुस्से का फ़्लैश पॉइण्ट बनी और ममता बनर्जी ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए अपने आप को माकपा के विकल्प के रूप में पेश किया और 2011 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल ने भारी तादाद में सीटें हासिल करते हुए जीत दर्ज की। इससे पहले, 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध में जब राष्ट्रीय स्तर पर जनता में कांग्रेस की उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों, नरसिंह राव की सरकार के दौरान हुए हवाला घोटाले और हर्षद मेहता घोटाले जैसे तमाम घोटालों, फ़ासीवादी ताक़तों के द्वारा बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के दौरान व उपरान्त राव सरकार की अकर्मण्यता इत्यादि के ख़िलाफ़ गुस्सा भरा हुआ था, और जब ऐसे में अपने प्रान्तीय हितों के बरक्स पूँजीवादी राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए अपनी सक्रिय राजनीतिक प्रासंगिकता को बरक़रार रखने के लिए कांग्रेस पार्टी केन्द्र में संसदीय वाम दलों की भागीदारी वाली संयुक्त मोर्चे की सरकारों को बाहर से समर्थन दे रही थी और जिसके चलते पश्चिम बंगाल के अन्दर वाम मोर्चा की सरकार के ख़िलाफ़ उसके स्वर कुछ नरम पड़े थे; उस दौर में संशोधनवादी वाम मोर्चा की सरकार के ख़िलाफ़ बुर्जुआ दायरे के भीतर विरोध का निर्वात पैदा हुआ। ठीक ऐसे सन्दर्भ में 1997 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना कर उसी निर्वात को भरने का काम किया था। इससे तृणमूल न सिर्फ़ ख़ुद को प्रान्तीय स्तर पर वाम मोर्चे की सरकार के ख़िलाफ़ एक सम्भावित विकल्प के रूप में पेश करने में कामयाब रही, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस-विरोधी भावना का फ़ायदा उठाने के लिए उसने भाजपा-नीत गठबन्धन का दामन थामा और अपने इस क़दम के साथ साम्प्रदायिक फ़ासीवादी भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल में पहली बार विधान सभा और लोकसभा सीटें जीतने का मार्ग प्रशस्त किया।
1990 के दशक के उत्तरार्ध में पूँजीवाद का आर्थिक संकट साफ़ तौर पर भारतीय राज्यसत्ता के लिए एक राजनीतिक संकट की शक्ल अख़्तियार कर चुका था और 1996 से लेकर 1998 के बीच केन्द्र में कई बार गठबन्धन सरकारों का बनना और बिगड़ना इसी बात को ज़ाहिर करता है। ऐसे में भारत के बुर्जुआ वर्ग ने अपने दीर्घकालिक राजनीतिक हितों के सामूहिकीकरण के लिए फ़ासीवादी भाजपा को बार-बार मौक़ा दिया और आख़िरकार 1999 के कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि में अन्ध-राष्ट्रवाद की लहर चलाकर फ़ासीवादी भाजपा-नीत गठबन्धन लोकसभा चुनावों में निर्णायक जीत दर्ज करने में कामयाब रहा। मगर सत्ता में आने के दो सालों के अन्दर ही स्वयम्भू-राष्ट्रवादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण एक स्टिंग ऑपरेशन के दौरान कैमरे पर एक रक्षा सौदे में रिश्वत लेते हुए पकड़े गये, भाजपा के एक सहयोगी दल से आने वाले जॉर्ज फ़र्नांडीज़ का ताबूत घोटाले में नाम सामने आया और भाजपा के द्वारा कांग्रेस से भी ज़्यादा तेज़ी से लागू की गयी उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के चलते जनता के अच्छे-ख़ासे हिस्से में असंतोष फैला। इसी साल, यानी, सन 2001 में तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में अपना पहला विधान सभा चुनाव लड़ने जा रही थी। जनता का मिज़ाज भाँपते हुए ममता बनर्जी ने राजद गठबन्धन से अलग होकर बंगाल में वाम मोर्चे के ख़िलाफ़ कांग्रेस के साथ गठबन्धन किया।
इस रणकौशलात्मक चाल से तृणमूल वाम मोर्चे को हरा तो नहीं सकी, लेकिन बंगाल में वाम मोर्चे के ख़िलाफ़ निर्णायक रूप से मुख्य विरोधी दल के रूप में उभरी और चुनावों के तीन महीने के बाद ही भाजपा के ख़िलाफ़ घोटालों की चर्चा में कुछ कमी आते ही ममता बनर्जी ने एक बार फिर से केन्द्र सरकार में सत्ता की मलाई चाटने के लिए भाजपा और तृणमूल कांग्रेस को “स्वाभाविक सहयोगी” क़रार दिया और उसी साल आगे चलकर दोबारा राजग गठबन्धन का हिस्सा बनीं। आगे चलकर, 2004 के लोकसभा चुनावों में और 2006 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में राजग गठबन्धन की क़रारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस, भाजपा पर तृणमूल को मुस्लिम वोटबैंक से दूर करने की तोहमत लगाते हुए राजग से अलग हो गयी और बंगाल की जनता की निगाह में, ख़ासकर चुनावी हिसाब-किताब के हिसाब से अहम वहाँ की 25% अल्पसंख्यक आबादी की निगाह में ख़ुद को वाम मोर्चे के ख़िलाफ़ एक सच्चे धर्मनिरपेक्ष विरोधी दल के रूप में पेश करने की कोशिश की।
भारत में जो तमाम ग़ैर-फ़ासीवादी बुर्जुआ दल हैं उनकी “धर्मनिरपेक्षता” में मुसलमान आबादी महज़ एक वोटबैंक तक ही सीमित है। धर्म को राजनीति और राजकीय मामलों से पूरी तरह अलग रखकर सही मायने में वैज्ञानिक धर्मनिरपेक्षता की जगह, “सर्वधर्म समभाव” के गाँधीवादी आदर्श-सूत्र के रूप में धर्मनिरपेक्षता के एक भौण्डे व छद्म संस्करण की परम्परा का यही हश्र होना था। “सर्वधर्म समभाव” का अर्थ है सभी धर्मों के प्रति समान भाव, यानी सभी को समान राजकीय संरक्षण। भारत जोकि एक पूँजीवादी मुल्क है, उसमें इस तरह की नीति का परिणाम अन्ततोगत्वा इसी रूप में आ सकता था कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल सभी धर्मों के कट्टरपंथियों को समान रूप से संरक्षण देते हैं और ऐसी स्थिति में फ़ासीवादी भाजपा हिन्दुओं की बहुसंख्या को आधार बनाते हुए इस “समान संरक्षण” को “धर्मनिरपेक्ष” दलों की एक साज़िश क़रार देती है और समाज में साम्प्रदायिक बहुसंख्यावाद का ज़हर बोती है। राजीव गाँधी की कांग्रेस सरकार के द्वारा अल्पसंख्यक कठमुल्लावादी ताक़तों को शह देने के इरादे से शाहबानो मामले में संसद में बहुमत का दुरुपयोग करते हुए उच्चतम न्यायालय का सही फैसला पलटना और उसके बाद हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक फ़ासीवादी प्रचार का प्रति-सन्तुलन करने के नाम अयोध्या में बाबरी मस्जिद स्थल पर राम मन्दिर का ताला खोलकर बहुसंख्यक आबादी से आने वाली कठमुल्लावादी ताक़तों को सहयोजित करना, आदि धर्मनिरपेक्षता के भारतीय संस्करण की स्वाभाविक परिणति थी जिसका फ़ायदा अन्ततः फ़ासीवादी ताक़तों को ही मिला, जैसा कि इतिहास ने साबित किया है। पूँजीवादी चुनावी गणित में जोड़-तोड़ की राजनीति में ज़ोरआज़माइश के लिए स्वाभाविक ही तृणमूल कांग्रेस ने भी इस छद्म-धर्मनिरपेक्षता को ही आगे बढ़ाया। इमामों और मुअज़्ज़िनों को मासिक वेतन देना हो या पुरोहितों को मासिक नगद मानदेय व मुफ़्त में घर देने की बात हो, तृणमूल कांग्रेस ने अपनी चुनावी गणित के हिसाब से हमेशा छद्म-धर्मनिरपेक्षता का ही अनुसरण किया।
सामाजिक फ़ासीवादी माकपा को टक्कर देने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने जहाँ एक तरफ़ सिंगूर-नन्दीग्राम जैसे ज़मीनी आन्दोलनों को हथियार बनाते हुए माकपा के लम्बे शासनकाल के कुकर्मों के ख़िलाफ़ फैले रोष को सहयोजित किया, वहीं दूसरी ओर स्थानीय दबंगों, माफ़ियानों-सरगनाओं, क्लब-नेताओं का तन्त्र तैयार किया, सत्ता में आने के बाद राज्य के पारा (मुहल्ला) क्लबों को सीधे राज्य फ़ण्डिंग उपलब्ध करवाई, माकपा की ज़मीनी कैडर के अच्छे-ख़ासे हिस्से को तृणमूल में शामिल किया, माकपा के हार्माद के नाम से बदनाम हथियारबन्द गुण्डों के दस्ते ज्यों के त्यों सहयोजित किये, बहुत बड़े पैमाने पर बूथ-स्तर के एजेण्ट तैयार किये। कुल मिलाकर, एक जनवाद-रिक्त काडर-ढाँचा खड़ा करने का प्रयास किया गया। मगर इस काडर को एकीकृत करने के पीछे राज्य-संरक्षण था, कोई विचारधारा नहीं, जैसा कि फ़ासीवादी काडर-आधारित पार्टियों में होता है। इसलिए जैसे ही तृणमूल हारी, और राजकीय संरक्षण ख़त्म हुआ, तृणमूल की दुकान चलाने वाले तमाम लोगों ने रातों-रात भाजपा की शरण ली।
असल में, तृणमूल का इस तरह भरभराकर गिरना कहीं से भी अप्रत्याशित नहीं है। फ़ासीवादी भाजपा के उलट, तृणमूल कांग्रेस के काडर किसी विचारधारा पर साथ नहीं आये थे। ऐसे में, किसी वास्तविक फ़ासीवादी दल की मौजूदगी में तृणमूल और शिवसेना जैसे अर्ध-फ़ासीवादी या सर्वसत्तावादी दक्षिणपन्थी और अधिनायकवादी दलों का बर्बाद होना स्वाभाविक है। साम्प्रदायिकता को टक्कर सच्ची वैज्ञानिक धर्मनिरपेक्षता के आधार पर ही दिया जा सकता है। छद्म-धर्मनिरपेक्षता से फ़ासीवादी साम्प्रदायिकता के उभार में ही मदद मिलती है, और अतीत के कई अन्य उदाहरणों के समान पश्चिम बंगाल में भी ठीक यही हुआ।
इसके अलावा, पूँजीवाद के गहराते संकट के दौर में बुर्जुआ वर्ग के पास उपलब्ध विकल्पों में अगर फ़ासीवादी और विभिन्न अर्ध-फ़ासीवादी, धुर-दक्षिणपंथी व सर्वसत्तावादी दल विकल्प के तौर पर मौजूद हों, और अगर उस समय उक्त फ़ासीवादी दल अपनी सांगठनिक दशा और राजनीतिक पहुँच के हिसाब से अन्य सभी दलों को टक्कर देने और पिछाड़ने के लिए तैयार हो, तो ऐसे में बुर्जुआ वर्ग के द्वारा उस फ़ासीवादी दल को ही प्राथमिकता से चुने जाने की प्रबल सम्भावना होती है। ऐसा इसलिए भी होता है कि प्रतिरोध के डर से और लोकप्रियता गिरने के डर से तृणमूल जैसा अर्ध-फ़ासीवादी दल जो नहीं कर सकता था, उसे फ़ासीवादी संघ परिवार नंगे तौर पर कर सकता है। इसकी एक बानगी तब मिली जब भाजपा ने बड़ी पूँजी के फ़ायदे के लिए बंगाल का चुनाव जीतकर आते ही जगह-जगह रेहड़ी-खोमचे वालों या छोटा-मोटा कोई और काम करने वालों की दुकानों पर बुल्जडोज़र चलवाया और भाजपा मुख्यमन्त्री सुवेन्दु ने ऐलान कर दिया कि वह टाटा को प. बंगाल वापस लायेंगे!
भाजपा ने प. बंगाल में टीएमसी के साथ जो किया वह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। ऐसा वह पहले भी करती रही है। भाजपा के ऐसे जनवाद विरोधी कुकर्म को गोदी मीडिया हमेशा “ऑपरेशन लोटस” जैसे लच्छेदार शब्दों की चाशनी में परोसकर पेश करता रहा है। पिछले दिनों भाजपा ने आम आदमी पार्टी के 10 राज्यसभा सांसदों में 7 को तोड़कर अपने दल में शामिल कर लिया। आप के इन 7 बाग़ी सांसदों में से कइयों के यहाँ ईडी का छापा पड़ा था। ईडी के छापे के बाद सभी भाजपा में शामिल हो गये। 2022 में भाजपा ने शिवसेना के सांसदों और विधायकों को तोड़कर अपने खेमे में मिला लिया था। इस टूट के बाद महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे को मुख्यमन्त्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था और सत्ता भी उसके हाथ से चली गयी थी। इस घटना के बाद उद्धव ठाकरे की जगह बाग़ी गुट के नेता एकनाथ शिंदे का सत्ता और शिवसेना के सिम्बल क़ब्ज़ा हो गया। कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आजकल एक बार फिर से उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों को तोड़ने की क़वायद चल रही है, जो फ़िलहाल कामयाब होती ही दिख रही है। 2023 में महाराष्ट्र में ही शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में उनके भतीजे अजित पवार के नेतृत्व में टूट हुई। इस टूट के बाद अजित पवार तत्कालीन भाजपा गठबन्धन की सरकार में उपमुख्यमन्त्री बने और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सिम्बल पर क़ब्ज़ा भी कर लिया। अतीत में जिस अजित पवार को नरेन्द्र मोदी और भाजपा के अन्य नेता भ्रष्टाचारी बताकर जेल में चक्की पिसवाने की बात करते थे, सत्ता-सुख के लिए उसी “भ्रष्टाचारी” का स्वागत रेड कार्पेट बिछाकर किया। यह भी भाजपा के दोमुँहेपन के प्रातिनिधिक उदाहरणों में एक है। 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के 22 विधायक बाग़ी हो गये, कमलनाथ की सरकार गिर गयी और मध्यप्रदेश में भाजपा के शिवराजसिंह चौहान मुख्यमन्त्री बने।
इन घटनाओं में भाजपा द्वारा बुर्जुआ विपक्षी पार्टियों में तोड़फोड़ मचाने को, केवल बुर्जुआ वर्ग के एक मज़बूत धड़े द्वारा सापेक्षतः कमज़ोर धड़े की बाँहें मरोड़ने के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसे जनता के नज़रिये से भी देखा जाना चाहिए। पूँजीवादी चुनावों में जनता बेहद सीमित तौर ही सही पर अपने जनवादी अधिकारों का प्रयोग करती है। भाजपा जब किसी भी पार्टी के विधायकों-सांसदों या किसी अन्य चुने हुए जनप्रतिनिधियों को तोड़कर अपने पाले में शामिल करती है, तो यह जनता के जनवादी अधिकारों पर भी हमला है। हमें हर प्रकार जनवादी अधिकार के हनन का विरोध करना चाहिए।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि भाजपा केवल विपक्षी पार्टियों को कमज़ोर नहीं करती बल्कि उसके प्रकोप से कई बार उनके सहयोगी भी नहीं बच पाते, पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और बिहार में जनता दल यूनाइटेड (जदयू) इसके अच्छे उदाहरण है। बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि ठीक वे दल जो भाजपा के प्रति सहयोग-सहकार का रुख़ अपनाते रहे हैं, ताकि क्षेत्रीय राजनीति में कांग्रेस को प्रतिसन्तुलित करने का काम किया जा सके, अन्तत: भाजपा द्वारा तोड़ दिये जाते हैं, या निगल लिये जाते हैं। कौन भूल सकता है कि ममता बनर्जी ने भाजपा को अपना “नैसर्गिक मित्र और सहयोगी” बताया था? कौन नहीं जानता कि देश में धुर-दक्षिणपंथी और फ़ासीवादी राजनीति को आगे बढ़ाने में अगर किसी दल ने भाजपा का सबसे लम्बे समय तक साथ दिया वह बाल ठाकरे और ठाकरे परिवार की शिवसेना थी? किसे नहीं याद कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को परिणति तक पहुँचाने के लिए भाजपा के साथ सहयोग किया था और कांग्रेस में फूट डाली थी? और क्या किसी को इसमें शक़ है कि शिरोमणि अकाली दल की आज जो गत बनी है, उसमें सबसे ज़्यादा योगदान उसके द्वारा भाजपा के साथ की गयी गलबँहियाँ हैं?
अब ये सारे लोग और उनकी पार्टियाँ कहाँ हैं, यह सभी को पता है। वैसे भी किसी देश की राजनीति में जब भी कई दक्षिणपंथी दल होते हैं, तो उसमें से फ़ासीवादी पार्टी ही अन्त में जीवित रहती है और उसके बड़े गन्दे नाले में सारे छोटे गन्दे नाले कालान्तर में समाहित हो जाते हैं। इसलिए शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस (जो ख़ुद एक धुर-दक्षिणपंथी सर्वसत्तावादी पार्टी है) का भाजपा द्वारा तोड़ और निगल लिया जाना न तो कोई आश्चर्य की बात है, न ही दुख की। ये पार्टियाँ और इसके नेता फ़ासीवाद के साथ गलबँहियाँ करने और उसे मदद पहुँचाने की सज़ा भुगत रहे हैं। उनके साथ एक प्रकार से काव्यात्मक न्याय हो गया है!
विपक्षी पार्टियों के नेता भाजपा के जाल में कैसे फँसते हैं? इसमें बहुत-से कारक हैं। सत्ता में भागीदारी का लालच और ईडी, सीबीआई और अन्य सरकारी एजेंसियों का डर दिखाकर भाजपा विपक्षी पार्टियों के नेताओं को तोड़कर अपने में मिलाती है। इसके अलावा, पूँजी की शक्तिमत्ता का भाजपा के साथ खड़ा होना एक अहम कारक है। ऐसा कोई भी नेता नहीं है जिसके पेट में एकदम से “राष्ट्र-प्रेम” का मरोड़ उठता है और वह भाजपा का दामन थाम लेता है। अलग-अलग नेताओं की दुखती रख के अनुसार उन्हें पैसे और शासन सत्ता में पदों का प्रलोभन दिया जाता है या तमाम सरकारी एजेंसियों द्वारा छापे और मुक़दमों व गिरफ़्तारी का डर दिखाया जाता है। इन सबकी भौतिक ज़मीन मौजूद होती है क्योंकि ये सभी नेता दूध के कितने धुले हैं, यह तो सभी को पता है! भाजपा के नेता घपलों-घोटालों में उतने ही या उससे ज़्यादा लिप्त होते हैं, लेकिन जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहेका!? साथ ही, जो नेता भाजपा के पाले में चला जाता है, उन पर ये एजेंसिया अपना शिकंजा कसना बन्द कर देती हैं। हेमन्ता बिस्वा शर्मा, अर्जुन मुण्डा, शुवेन्दु अधिकारी, अजित पवार सहित और भी ढेरों उदाहरण हैं, जिनके भाजपा से साँठगाँठ होने के बाद ईडी और सीबीआई शान्त होकर बैठ गयी।
हालिया दिनों में टीएमसी के बाग़ी नेताओं ने जो “आया राम गया राम” का खेल खेला है, इसके क्या मायने हैं? इसपर कई विशेषज्ञ मानते हैं कि लोकसभा में परिसीमन विधेयक यानी लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करने वाले विधेयक को पारित कराने की ताक़त संसद के दोनों सदनों में मोदी सरकार के पास नहीं है। विपक्षी पार्टियों में तोड़-फोड़ के ज़रिये भाजपा आने वाले दिनों में परिसीमन विधेयक और ऐसे विधेयकों को पारित करवाने के लिए जुगत लगा रही है। कई लोग भविष्यवाणी रहें हैं कि टीएमसी में टूट तो इस कड़ी का पहला अध्याय है, आगे और भी पार्टियों के नेताओं को निशाना बनाया जायेगा। टीएमसी में टूट के बाद बाग़ियों ने ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के निरंकुश कार्यशैली पर सवाल उठाया और ख़ुद को असली टीएमसी बताकर पार्टी पर दावा ठोकने की बात कही है। सम्भावना है कि भविष्य में चुनाव आयोग और भाजपा के सहयोग से बाग़ियों को टीएमसी पार्टी और उसके सिम्बल पर भी नियंत्रण प्राप्त हो जाये। यह बात सच है कि परिसीमन विधेयक, एक देश एक चुनाव आदि जैसे ढाँचागत फ़ासीवादी बदलाव लाने के लिए भाजपा को राज्यसभा में पर्याप्त संख्या की आवश्यकता है और तमाम विपक्षी पार्टियों में तोड़-फोड़कर उन्हें आनन-फ़ानन में “राष्ट्रवादी” बनाने के पीछे इस आवश्यकता का काफ़ी हाथ है।
लेकिन हमारा विश्लेषण इससे आगे जाना चाहिए। सवाल केवल इस तात्कालिक आवश्यकता का नहीं है। प. बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी व उनकी पार्टी टीएमसी की हार और बाद में टीएमसी में टूट से भारत की लिबरल जमात सदमे में है। ऐसे लोग हमेशा उम्मीद करते हैं कि चुनावों में भाजपा को हराकर फ़ासीवाद को निर्णायक तौर पर हराया जा सकता है, जबकि अनुभव बताते हैं कि ऐसा सोचना ‘आकाश-कुसुम की अभिलाषा’ करने के समान है। और अब तो तात्कालिक तौर पर भाजपा की चुनावी पराजय के भी सारे रास्ते समूची राज्यसत्ता की मशीनरी पर कब्ज़ा करके मोदी-शाह नीत भाजपा समाप्त करती जा रही है। प. बंगाल में फ़ासीवादी भाजपा की जो जीत हुई है यह वास्तव में समाज में फैल रहे प्रतिक्रयावादी फ़ासीवादी आन्दोलन और राज्यसत्ता पर फ़ासीवादी शक्तियों द्वारा आन्तरिक कब्ज़े की ही एक अभिव्यक्ति है। संघ परिवार के नेतृत्व में चल रहा यह प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन वास्तव में पूँजीवाद के आर्थिक संकट, बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी आदि का ही नतीजा है। क्रान्तिकारी ताक़तों की कमज़ोरी और बिखराव का लाभ प्रतिक्रियावादी ताक़तें उठा रही हैं। ऐसे में मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में एक शक्तिशाली क्रान्तिकारी जन-आन्दोलन के ज़रिये ही फ़ासीवाद को निर्णायक शिकस्त दी जा सकती है।
एक बात और जो हमें नहीं भूलनी चाहिए कि फ़ासीवादी किसी भी प्रकार की भलमनसाहत या “नैतिकता” की मध्यवर्गीय याचनाओं और अपीलों से कभी प्रभावित नहीं होते। आर.एस.एस. के गुरू गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी अवर नेशनहुड डिफ़ाइण्ड’ में जर्मन नात्सियों व हिटलर की प्रशंसा की थी। भारतीय फ़ासीवादियों के विचारधारात्मक पितामह हिटलर ने भी जर्मनी में विपक्षी पार्टियों को जैसे-तैसे करके ठिकाने लगाया था। एक योग्य वंशज की भाँति भारतीय फ़ासीवादी भी अपने पुरखों के नक़्शे-क़दम पर चल रहे हैं। बल्कि कुछ मामलों में वे योजनाबद्धता, अपने इतिहास से सीखने, रणकौशल बनाने, धैर्य से लम्बी रणनीति पर सुचिन्तित अमल करने के मामले में हिटलर और मुसोलिनी से आगे जा चुके हैं।
आज के दौर की फ़ासीवाद-विरोधी जन-रणनीति को भी इन परिवर्तनों को समझकर जनता को फ़ासीवाद द्वारा थोपे जा रहे अन्याय, दमन और भयंकर असमानता के विरुद्ध जागृत, लामबन्द और गोलबन्द करना होगा।
मज़दूर बिगुल, जून 2026













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