तेलंगाना में फ़ार्मा-केमिकल फैक्ट्री में आग लगने से 34 मज़दूरों की मौत, 35 घायल
फ़ैक्ट्री मालिकों के मुनाफ़े की बेलगाम हवस ज़िम्मेदार है इन दर्दनाक मौतों के लिए

हैदराबाद के निकट स्थित संगारेड्डी ज़िले के पटनचेरू औद्योगिक क्षेत्र में आज सुबह सिगाची फ़ार्मा-केमिकल फ़ैक्ट्री में एक भीषण विस्फोट के बाद भीषण आग लगने की वजह से कम से कम 34 मज़दूरों की मौत हो गई और 35 से ज़्यादा मज़दूर गम्भीर रूप से ज़ख़्मी हो गए। विस्फोट के बाद पूरे इलाक़े में आपाधापी मच गई और कई मज़दूरों का कोई अता-पता नहीं है। ख़बरों के मुताबिक़ जिस फ़ैक्‍ट्री में आग लगी उसमें आज सुबह 63 मज़दूरों ने हाजिरी लगायी थी। विस्‍फोट इतना भीषण था कि उसकी वजह से कई मज़दूर 100 मीटर की दूरी तक जा गिरे। विस्‍फोट के कारणों का अभी तक कुछ पता नहीं चला है। पहले मीडिया में ख़बर यह आ रही थी कि विस्‍फोट रिएक्‍टर में हुआ, परन्‍तु बाद में यह पता चला कि विस्‍फोट फ़ैक्‍ट्री के ड्राइंग यूनिट में हुआ था। हर औद्योग‍िक दुर्घटना की ही तरह इस बार भी प्रधानमंत्री से लेकर मुख्‍यमंत्री तक ट्वीट करके घड़‍ियाली आँसू बहा चुके हैं। परन्‍तु इन सियासी रहनुमाओं से कोई यह पूछने वाला नहीं है कि ऐसी भीषण दुर्घटनाएँ आखिर इतने नियमित अन्‍तराल पर क्‍यों घटित हो रही हैं। ज्ञात हो कि पटनचेरू एशिया का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है जो औद्योगिक दुर्घटनाओं के लिए कुख्‍यात है। यहाँ केमिकल और फ़ार्मा कम्‍पनियों की बहुतायत है जिनमें आए दिन आग लगने जैसी दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ तेलंगाना में हर दो दिन में कम से कम एक औद्योगिक दुर्घटना होती है। 2021-2023 के बीच प्रदेश में 600 से ज्‍़यादा औद्योगिक दुर्घटनाएँ रिपोर्ट की गईं जिनमें 1100 से ज्‍़यादा लोगों की मौत हुई। ये दुर्घटनाएँ अधिकांशत: जीडीमेटला, बोलाराम, पश्‍मीलाराम और पटनचेरू जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में घटित हुईं। यह एक खुला रहस्‍य है कि ऐसी औद्योगिक दुर्घटनाएँ कार्यस्‍थल पर मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति उदासीनता, सुरक्षा मानकों की खुले-आम अवहेलना करना और मज़दूरों को पर्याप्‍त प्रशिक्षण न मुहैया कराने और नियमित रूप से निरीक्षण न करने की वजह से होती हैं। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक तेलंगाना में 4130 उच्‍च-जोखिम वाली फ़ैक्ट्रियाँ हैं, परन्‍तु सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश में मात्र 20 इंस्‍पेक्‍टर और ज्‍वाइंट इंस्‍पेक्‍टर हैं। इसका नतीजा यह होता है कि फ़ैक्ट्रियों का निरीक्षण बमुश्किल साल या दो साल में एक बार हो पाता है