वर्ष 2019 : दुनियाभर में व्‍यवस्‍था-विरोधी व्‍यापक जनान्‍दोलनों का वर्ष
लेकिन क्‍या ये आन्‍दोलन व्‍यवस्‍था बदल सकेंगे?

– आनन्द सिंह

वर्ष 2019 में एशिया, अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका व यूरोप के कई देशों में बहुत बड़ी तादाद में जनता सड़कों पर उतरी। ये जनान्‍दोलन इतने व्‍यापक थे कि तमाम प्रतिष्ठित बुर्जुआ मीडिया हाउस और थिंकटैंक भी 2019 को वैश्विक विद्रोह का वर्ष घोषित कर रहे हैं। ज़ाहिरा तौर पर वे ऐसा शासक वर्ग को चेताने की मंशा से कर रहे हैं। लेकिन हमें मज़दूर वर्ग के दृष्टिकोण से इन जनान्‍दोलनों का महत्‍व समझना होगा और इनमें निहित सम्‍भावनाओ पर विचार करना होगा। इस साल हांगकांग, इराक़, ईरान, लेबनान, मिस्र, चिले, सूडान, अल्‍जीरिया और फ़्रांस आदि की सड़कों पर विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ा। इन आन्‍दोलनों की तात्‍कालिक वजहें भले ही अलग-अलग रही हों, लेकिन इन्‍हें विश्‍व-पूँजीवाद के संकट से काटकर नहीं देखा जाना चाहिए।

हांगकांग की सड़कों पर उमड़े जनसैलाब की तात्‍कालिक वजह विवादास्‍पद सुपुर्दगी क़ानून था जिसके तहत हांगकांग में होने वाले किसी भी अपराध के लिए अभियुक्‍त को चीन को सुपुर्द किया जा सकता था और उस पर चीन की कुख्‍़यात अदालतों में मुक़दमा चलाया जा सकता था जहाँ 90 प्रतिशत मामलों में अभियुक्‍त को दोषी ठहराकर सज़ा दे दी जाती है। हांगकांग के लोगों को यह अपने शहर के आन्‍तरिक मामलों में हस्‍तक्षेप लगा और उसके ख़ि‍लाफ़ जनता सड़कों पर उतर पड़ी। इस आन्‍दोलन में बड़ी संख्‍या युवाओं और किशोरों की थी। शहर की ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर भी लाखों लोग सड़कों पर उतरे। इस जनान्‍दोलन को बर्बरतापूर्वक पुलिसिया दमन से कुचल देने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं और आन्‍दोलनकारियों ने पुलिस की आँखों में धूल झोंकने के शानदार नये-नये प्रयोग भी आज़माये। हाँलाकि इस जनसैलाब के आक्रोश की आग पर ठण्‍डे पानी के छींटे डालने के लिए हांगकांग के प्रशासन ने विवादास्‍पद सुपुर्दगी क़ानून वापस ले लिया, लेकिन उसके बाद भी यह जनान्‍दोलन थमा नहीं, बल्कि उसने और व्‍यापक रूप अख़्तियार कर लिया। बाद में प्रदर्शनकारी पुलिस के बर्बर दमन और हांगकांग में चीन के बढ़ते प्रभाव के ख़ि‍लाफ़ प्रदर्शन करने लगे। ग़ौरतलब है कि इन प्रदर्शनों में इतने बड़े पैमाने पर जनभागीदारी को हांगकांग में चल रहे आर्थिक संकट की पृष्‍ठभूमि में रखकर ही समझा जा सकता है। हांगकांग की गिनती दुनियाभर में आर्थिक असमानता वाले शहरों में सबसे ऊपर के पायदानों में होती है। साथ ही दुनिया के सबसे महँगे शहरों में भी हांगकांग की गिनती होती है। वहाँ सिर्फ़ ग़रीब ही नहीं बल्कि औसत मध्‍यवर्ग के लोग भी बड़ी मुश्किल से इन हालातों को झेल रहे हैं। ऐसे में चीन का हस्‍तक्षेप उनके ज़ख़्म में नमक डालने का काम करता है।

लेबनान की सड़कों पर भी इस साल विराट जनसैलाब देखने को आया। वहाँ की सरकार द्वारा व्‍हाट्सऐप के इस्‍तेमाल पर लगाये गये भारी कर के बाद उमड़े इस जनान्‍दोलन ने देखते ही देखते आर्थिक तंगी और संकट के ख़ि‍लाफ़ जनविद्रोह का रूप ले लिया। आन्‍दोलन के कुछ दिनों में क़रीब 13 लाख लोग यानी वहाँ की कुल आबादी के 20 फ़ीसदी लोग सड़कों पर उतरे। 2005 की ‘देवदार क्रान्ति’ के बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्‍या में लोग बेरूत और त्रिपोली की सड़कों पर उतरे। लेबनान की भी अर्थव्‍यवस्‍था ढहने की कगार पर है। वहाँ का राष्‍ट्रीय क़र्ज़ जीडीपी का 150 फ़ीसदी से भी ज़्यादा पहुँच चुका है और वहाँ की मुद्रा का लगातार अवमूल्‍यन होता जा रहा है। महँगाई और बेरोज़गारी चरम पर है।

इसी प्रकार चिले में भी राजधानी सैंटियागो के मेट्रो रेल के टिकट के किराये में बढ़ोत्‍तरी के विरोध में शुरू हुए छात्रों-युवाओं के आन्‍दोलन ने जल्द ही एक व्‍यवस्‍था-विरोधी व्‍यापक रूप ले लिया। इस आन्‍दोलन के निशाने पर भी अर्थव्‍यवस्‍था का संकट, मज़दूरी में कटौती, कल्‍याणकारी योजनाओं में कटौती, लचर सार्वजनिक सुविधाएँ जैसे मुद्दे थे। इसकी व्‍यापकता का अन्‍दाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि चिले की दक्षिणपन्थी सरकार को उसको कुचलने के लिए हज़ारों फ़ौजियों को सैंटियागो की सड़कों पर उतारना पड़ा। लेकिन उससे आन्‍दोलन और व्‍यापक हो गया। अन्‍ततः वहाँ की सरकार को घुटने टेकने पड़े।

इसके अलावा पिछले साल इराक़, इरान, स्‍पेन, फ़्रांस, अल्‍जीरिया, सूडान में भी ज़बर्दस्‍त आन्‍दोलन देखने में आये और उनका बर्बर दमन करने की रक्‍तपातपूर्ण कोशिशों में सैकड़ों लोगों को जान गँवानी पड़ी। तमाम बुर्जुआ विश्‍लेषक इन आन्‍दोलनों के भड़कने की अलग-अलग वजह होने के आधार पर ये दावा कर रहे हैं कि इनमें कोई समानता नहीं खोजी जा सकती है और इनके आधार पर कोई सामान्‍य निष्‍कर्ष नहीं निकाला जा सकता। ये बात सच है कि उपरोक्‍त आन्‍दोलनों के भड़कने के तात्‍कालिक कारण अलग-अलग देशों में अलग-अलग रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि इनमें एक चीज़ साझा है कि वे सभी पूँजीवादी संकट और दमनकारी पूँजीवादी राज्‍यसत्‍ता के विरुद्ध जनविद्रोह की अभिव्‍यक्तियाँ हैं। इतिहास में अक्‍सर ऐसा देखने में आया है कि सामाजिक-आर्थिक संकट के परिवेश में एक मामूली-सी लगने वाली घटना भी एक बड़े आन्‍दोलन को ट्रिगर कर सकती है। ठीक यही बात इन आन्‍दोलनों पर भी लागू होती है। भूमण्‍डलीकरण के युग में आज पूँजीवाद सच्‍चे अर्थों में एक वैश्विक उत्‍पादन प्रणाली का रूप अख़्तियार कर चुका है। ऐसे में पूँजीवाद के संकट के भूमण्‍डलीकृत रूप के हम गवाह हैं। विश्‍व पूँजीवाद 2007-08 से जिस संकट के भँवर में फँसा हुआ है उससे अभी तक बाहर नहीं निकल पाया है। मुनाफ़े की गिरती दर के इस संकट का असर समूची दुनिया में मन्‍दी, छँटनी, बेरोज़गारी, महँगाई के रूप में देखने को आ रहा है। ये बात सच है कि उत्‍पादक शक्तियों के विकास की अलग-अलग मंज़िलों में होने और अलग-अलग इतिहास होने के कारण संकट का असर भी अलग-अलग-देशों में अलग-अलग होता है। लेकिन भूमण्‍डलीकरण के युग में न सिर्फ़ संकट का सार्वभौमिकीकरण हो रहा है बल्कि वैश्‍विक स्‍तर पर सूचनाओं, विरोध के तौर-तरीक़ों का भी आदान-प्रदान अभूतपूर्व रूप से हो रहा है।

एक अन्‍य चीज़ जो इन विरोध प्रदर्शनों में साझा है वह यह है कि इन सभी आन्‍दोलनों में स्‍वतःस्‍फूर्तता का पहलू बहुत अधिक है। इन आन्‍दोलनों में संगठनबद्धता, सुसंगत विचारधारा और नेतृत्‍व का अभाव स्‍पष्‍ट रूप से देखा जा सकता है। इस वजह से इन आन्‍दोलनों में भीड़ तो बहुत दिखती है लेकिन शासक वर्ग के लिए इस भीड़ को क़ाबू में करना भी आसान हो जाता है। जब दमन से बात नहीं बनती तो शासक वर्ग कूटनीतिक पैंतरा फेंककर आन्‍दोलनकारियों की कुछ तात्‍कालिक माँगों को मान लेते हैं और किसी दीर्घकालिक रणनीति के अभाव में ये आन्‍दोलन समय के साथ क्षीण हो जाते हैं। बेश्‍क ये स्‍वतःस्‍फूर्त आन्‍दोलन संकटग्रस्‍त पूँजीवादी व्‍यवस्‍था के ख़ि‍लाफ़ विद्रोह की अभिव्‍यक्तियाँ हैं, परन्‍तु ये ख़ुद-ब-ख़ुद व्‍यवस्‍था परिवर्तन नहीं कर सकते हैं। दूसरे अर्थों में संगठन, विचारधारा और नेतृत्‍व के अभाव में ये विद्रोह क्रान्ति की दिशा में नहीं बढ़ सकते हैं। वे वैकल्पिक व्‍यवस्‍था नहीं निर्मित कर सकते हैं क्‍योंकि उनके पास विकल्‍प का कोई ख़ाका नहीं है। ऐसे में मेहनतकश वर्ग की नुमाइंदगी करने वालों का यह दायित्‍व बन जाता है कि ऐसे आन्‍दोलनों के साथ एकजुटता ज़ाहिर करने के साथ ही साथ लोगों को एक वैकल्पिक व्‍यवस्‍था के निर्माण हेतु जनक्रान्ति के लिए तैयार किया जाये।

मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2019