दिल्ली में मज़दूर माँग-पत्रक आन्दोलन-2011 क़ी शुरुआत
पूँजी का आकाश चूमता महल मज़दूरों को निचोड़कर बनाया जाता है, उनके अकथ दुखों-तकलीफों के सागर में खड़ा किया जाता है। मज़दूर यदि निचुड़कर हड्डियों का कंकालभर रह जाये तो पूँजीपति उन हड्डियों का भी पाउडर पीसकर बाज़ार में बेच देगा। इसलिए हमारा कहना है कि मज़दूर वर्ग के पास लड़ने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। आज अगर हम लड़ेंगे नहीं तो आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास में दफन हमारी हड्डियों को खोदकर बाहर निकालेंगी और कहेंगी – ‘देखो ये उन ग़ुलामों की हड्डियाँ हैं, जिन्होंने अपनी ग़ुलामी के ख़िलाफ बग़ावत नहीं की।


















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