Category Archives: कारख़ाना इलाक़ों से

लेबर चौक : मज़दूरों की खुली मण्डी

अगर आपको गाँवों में लगने वाले जानवरों के मेले में कभी जाने का मौका मिला हो तो आप यहाँ के दृश्य का अनुमान लगा सकते हैं। जैसे मेले में बैल की पूँछ उठाकर, कन्धे टटोलकर उसके मेहनती होने की जाँच-पड़ताल की जाती है वैसे ही ‘लेबर चौक’ पर मालिक-ठेकेदार लोग ऑंखों से परखते हैं। कई बेशर्म ठेकेदार तो हाथ से भी जाँचने की कोशिश करते हैं। हमने स्कूल की किताब में पढ़ा था कि बहुत साल पहले ग़ुलामों को चौराहे पर ख़रीदा-बेचा जाता था। दुनिया बदल गयी, इन्सान कहाँ से कहाँ पहुँच गया, लेकिन हम मज़दूर फिर से उसी ग़ुलामी की हालत में धकेल दिये गये हैं।

पहले अद्धा दो फिर होगा इलाज

मैं एक मज़दूर हूँ और लुधियाना में करीब 10-11 साल से काम कर रहा हूँ। मेरा छोटा भाई जगन्नाथ सात-आठ साल से यहाँ काम कर रहा है। पिछले नौ महीने से वह न्यू शन फैक्टरी, फोकल प्वाइण्ट, फेस-8 में काम कर रहा था। इसी वर्ष 21 जनवरी को अचानक काम के दौरान उसके बायें हाथ की एक उँगली टूट गयी। फैक्टरी वाले उसे एक नज़दीकी प्राईवेट अस्पताल में भर्ती करवा दिये। मालिक की इस अस्पताल से साँठ-गाँठ थी। दो दिन तक उसी अस्पताल में इलाज करवाकर उसे छुट्टी दे दी गयी। चार दिन घर पर दवाई हुई। 27 जनवरी को मेरे छोटे भाई का ई.एस.आई. कार्ड बनाया गया लेकिन उसे 30 जनवरी को ही दिया गया। मेरे भाई को कहा गया कि अब वो अपना इलाज ई.एस.आई. से करवाये। ई.एस.आई. डिस्पेंसरी में पर्ची बनवाने के लिए लम्बी लाइन लगी थी। पर्ची बनाने वाला बार-बार उठकर इधर-उधर घूम रहा था। मैंने कहा सर जी जल्दी पर्ची बना दीजिये मेरे छोटे भाई की उँगली बहुत दर्द कर रही है। लेकिन उस समय 1 बज गया था। पर्ची बनाने वाले ने कहा कि अब तो वो खाना खाने जायेगा। वो करीब ढाई बजे आया और बोला अब नहीं बनेगा क्योंकि उनके स्टाफ के किसी व्यक्ति का रिटायरमेंट पार्टी है। तुम लोग अगले दिन आना। मैंने कहा कि सर जी डॉक्टर साहब से मिलना बहुत ज़रूरी है नहीं तो उँगली ख़राब हो जायेगी। करीब 10 मिनट तक हमको रोके रखने के बाद पर्ची बनाने वाले ने कहा कि अगर आज ही पर्ची बनवाना है तो एक अंग्रेजी अधिया लाकर देना होगा। वो पहले ही दारू पी रखा था। मैंने कहा कि आप तो पहले ही पिये हुए हो कल पी लीजियेगा। मेरी बात पर वो गुस्से में बोला कि आज तेरी पर्ची नहीं मिलेगी, कल सुबह आकर ले लेना। हम दोनों अगली सुबह 9 बजे वहाँ पहुँचे। करीब 11 बजे कोई दूसरा व्यक्ति पर्ची बनाने के लिए आया। चार बजे डॉक्टर आया। उसने एक हफ़्ते की दवा लिख दी। ई.एस.आई. स्टोर में दवा लेने गये तो वहाँ हमें पूरी दवा नहीं दी गयी। बाकी दवा हमें बाहर मेडिकल स्टोर से लेने के लिए कहा गया। अब हमें दवाइयाँ बाहर से लेनी पड़ रही हैं और इलाज भी बाहर से कराना पड़ रहा है। हमारा दो हफ्ते में करीब दो हज़ार रुपये खर्चा हो चुका है। जो छुट्टी का पैसा मिलना था उसके लिए आज-कल करके दौड़ाया जा रहा है। लगभग एक महीना होने वाला है लेकिन पैसा नहीं मिल रहा। पूछो तो कहते हैं कि जल्दी है तो पहले दो सौ रुपया महीना देना पड़ेगा। हमने कहा कि हमारे पास तो दवा करवाने के लिए पैसा नहीं है आपको कहाँ से दें। इस बात को सुनकर हमें कहा गया कि यहाँ नेतागिरी नहीं चलेगी। फिर कहा गया कि इलाज यहाँ पर नहीं अब पुलिस चौकी में होगा।

मज़दूरों की लूट के लिए मालिकों के कैसे-कैसे हथकण्डे

यहीं पर मैंने देखा कि पीस रेट पर काम करने वाले कारीगरों को लूटने के लिए मालिक कैसी-कैसी तिकड़म करते थे। कारीगर सुबह जल्दी आकर लूम पर जुट जाते थे कि ज़्यादा पीस बना लेंगे तो ज़्यादा कमा लेंगे। लेकिन मालिक के चमचे फ़ोरमैन और मैनेजर आख़िर किसलिये थे? कारीगर अगर 9 या 10 चादर तैयार कर लेता था तो उसमें से 3-4 चादर मामूली फाल्ट निकाकर रिजेक्ट कर देते थे। उसका एक भी पैसा मज़दूर को नहीं मिलता था हालाँकि मालिक तो उसे बेच ही लेता था। लम्बाई में आध-पौना इंच की कमी-बेशी हो जाये तो माल रिजेक्ट। अगर बहुत हिसाब से कारीगर लम्बाई का ध्यान रखे, तो वज़न में 10-20 ग्राम कमी-बेशी निकालकर रिजेक्ट कर देते। यही हाल कढ़ाई के कारीगरों का होता था। कुछ न कुछ नुक्स निकालकर रोज़ पैसे काट लेते थे। ‘हरीसन्स एंड हरलाज’ नाम की इस कम्पनी में 3000 मज़दूर थे। जोड़ लीजिये कि अगर रोज़ 30-35 रुपये की औसत कटौती हो तो महीने में मालिक की कितनी बचत होती होगी। यहीं पर शीना एक्सपोर्ट कम्पनी में तो कुल मिलाकर 20 हज़ार से ऊपर आदमी काम करते हैं। हरीसन्स और शीना दोनों कम्पनियों का सारा माल एक्सपोर्ट के लिए जाता है। मैंने सुना है कि कोई-कोई कढ़ाईदार चादर विदेश में 3-3 लाख रुपये में बिकती है। लेकिन एक चादर पर काम करने वाले सारे कारीगरों को मिलाकर 250 रुपये भी नहीं मिलते।

क़ानून गया तेल लेने, यहाँ तो मालिक की मर्ज़ी ही क़ानून है!

ऐसे उदाहरण तो ढेरों हैं, लेकिन मेरा मक़सद उदाहरण गिनाना नहीं बल्कि यह है कि लोगों को पता चले कि चमचमाती इमारतों, महँगी लम्बी गाड़ियों, चौड़ी सड़कों, आलीशान होटलों, कोठियों वाले देश में हम जैसे मज़दूरों की क्या औक़ात है। और यह भी, कि सरकार कितने ही क़ानून बना ले लेकिन मालिकों के लिए उन क़ानूनों का कोई मतलब नहीं। क़ानून का पालन भी हम जैसे मज़दूरों और ग़रीबों को ही करना पड़ता है!

मज़दूर स्त्रियों का फ़ैक्ट्री जाना मज़दूर वर्ग के लिए अच्छी बात है!

हमारे आसपास ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिनमें स्त्रियों ने मजबूरी में फ़ैक्ट्री जाना शुरू किया या अपनी आज़ादी के लिए गर्व से यह रास्ता चुना। मज़दूर मुक्ति के लिए ज़रूरी है कि स्त्रियाँ आत्मनिर्भर हों, और पुरुषों के कन्धे से कन्ध मिलाकर चलें। यदि हम आधी आबादी को क़ैद करके रखेंगे या ग़ुलाम बनाकर रखेंगे तो हम भी पूँजीवाद की बेड़ियों से आज़ाद नहीं हो पायेंगे। इसलिए मज़दूर स्त्रियों का फ़ैक्ट्री जाना मज़दूर वर्ग के लिए अच्छी बात है।

डीएमकेयू ने क़ानूनी संघर्ष में एक क़दम आगे बढ़ाया।

जैसा कि आप जानते ही होगें कि दिल्ली मेट्रो रेल में क़रीब 70 फ़ीसदी आबादी ठेका मज़दूरों की है जिसमें मुख्यत: सफ़ाईकर्मी, गार्ड तथा टिकट व मेण्टेनेंस ऑपरेटर हैं। इस मज़दूर आबादी का शोषण चमकते मेट्रो स्टेशनों के पीछे छिपा रहता है। ठेका मज़दूरों को न तो न्यूनतम वेतन, न ही ईएसआई कार्ड और साप्ताहिक अवकाश जैसी बुनियादी सुविधायें ही मिलती हैं जिसके ख़िलाफ़ 2008 में सफ़ाईकर्मियों ने एकजुट होकर ‘दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन’ का गठन कर अपने हक़-अधिकारों के संघर्ष की शुरुआत की थी। यूनियन ने उस बीच ‘मेट्रो भवन’ के समक्ष कई प्रदर्शन भी किये। इन प्रदर्शन से बौखलाये डीएमआरसी और सरकारी प्रशासन का तानाशाही पूर्ण रवैया भी खुलकर सामने आया जिसके तहत 5 मई के प्रदर्शन में क़ानूनी जायज़ माँगों का ज्ञापन देने गये 46 मज़दूरों को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। लेकिन इस दमनपूर्ण कार्रवाई के बावजूद मज़दूरों ने संघर्ष जारी रखा।

करावलनगर में इलाक़ाई मज़दूर यूनियन की पहली सफल हड़ताल

इस हड़ताल की सबसे ख़ास बात यह थी कि हालाँकि यह बड़े पैमाने पर नहीं थी, लेकिन इसमें जिस पेशे और कारख़ानों के मज़दूरों ने हड़ताल की थी, उससे ज़्यादा संख्या में अन्य पेशों के मज़दूरों ने भागीदारी की। अगर अन्य पेशों के मज़दूर भागीदारी न करते तो अकेले पेपर प्लेट मज़दूरों की लड़ाई का सफल होना मुश्‍क़िल हो सकता था। इलाक़ाई मज़दूर यूनियन बनने के बाद यह पहला प्रयोग था जिसमें मज़दूरों की इलाक़ाई एकजुटता के आधार पर एक हड़ताल जीती गयी। आज जब पूरे देश में ही बड़े कारख़ानों को छोटे कारख़ानों में तोड़ा जा रहा है, मज़दूरों को काम करने की जगह पर बिखराया जा रहा है, तो कारख़ाना-आधारित संघर्षों का सफल हो पाना मुश्‍क़िल होता जा रहा है। ऐसे में, ‘बिगुल’ पहले भी मज़दूरों की इलाक़ाई और पेशागत एकता के बारे में बार-बार लिखता रहा है। यह ऐसी ही एक हड़ताल थी जिसमें एक इलाक़े के मज़दूरों ने पेशे और कारख़ाने के भेद भुलाकर एक पेशे के कारख़ाना मालिकों के ख़िलाफ़ एकजुटता क़ायम की और हड़ताल को सफल बनाया।

मालिक की मिठास के आगे ज़हर भी फेल

यह हालत हर फ़ैक्ट्री की है। मेरी उम्र ज़्यादा तो नहीं है, लेकिन पिछले 4 सालों में करीब 15 फ़ैक्ट्री में काम का अनुभव है। हर फ़ैक्ट्री का मालिक बड़ा मृदुभाषी मीठा दिखता है, मगर इनकी मिठास के आगे ”विष फेल” है।

मारुति सुज़ुकी के मज़दूर फ़िर जुझारू संघर्ष की राह पर

आन्दोलन के समर्थन में प्रचार करने के दौरान हमने ख़ुद देखा है कि गुड़गाँव-मानेसर- धारूहेड़ा से लेकर भिवाड़ी तक के मजदूर तहेदिल से इस लड़ाई के साथ हैं। लेकिन उन्हें साथ लेने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है। जून की हड़ताल की ही तरह इस बार भी व्यापक मजदूर आबादी को आन्दोलन से जोड़ने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया है। मारुति के आन्दोलन में उठे मुद्दे गुड़गाँव के सभी मजदूरों के साझा मुद्दे हैं – लगभग हर कारखाने में अमानवीय वर्कलोड, जबरन ओवरटाइम, वेतन से कटौती, ठेकेदारी, यूनियन अधिकारों का हनन और लगभग ग़ुलामी जैसे माहौल में काम कराने से मजदूर त्रस्त हैं और समय-समय पर इन माँगों को लेकर लड़ते रहे हैं। बुनियादी श्रम क़ानूनों का भी पालन लगभग कहीं नहीं होता। इन माँगों पर अगर मारुति के मजदूरों की ओर से गुडगाँव-मानेसर और आसपास के लाखों मज़दूरों का आह्वान किया जाता और केन्द्रीय यूनियनें ईमानदारी से तथा अपनी पूरी ताक़त से उसका साथ देतीं तो एक व्यापक जन-गोलबन्दी की जा सकती थी। इसका स्वरूप कुछ भी हो सकता था – जैसे, इसे एक ज़बर्दस्त मजदूर सत्याग्रह का रूप दिया जा सकता था।

लुधियाना में टेक्सटाइल मज़दूरों की पंचायत

मज़दूरों का सच्चा संगठन वही होता है जिसमें हर स्तर पर जनवाद को लागू किया जाता हो। उन्होंने कहा कि टेक्सटाइल मज़दूर पंचायत का आयोजन बहुत सराहनीय क़दम है जिसमें मज़दूरों को खुलकर अपनी बात कहने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि दलाल संगठनों के नेता कभी ऐसा नहीं करते हैं।