देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम 1857 की बग़ावत के अवसर पर शाहबाद डेरी में आयोजित किये गये कार्यक्रम

देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम 1857 की बग़ावत की 169वीं वर्षगाँठ (10 मई) के अवसर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता अभियान के तहत भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) द्वारा शाहबाद डेरी (दिल्ली) इलाक़े में अभियान चलाया गया। इस दौरान घर-घर जाकर, गली मीटिंग और पर्चा वितरण के ज़रिये 1857 कि विरासत से लोगों को अवगत कराया गया। इसी कड़ी में 10 मई को शाहबाद डेरी के महाराणा प्रताप चौक पर जनसभा का आयोजन किया गया। जनसभा की शुरुआत क्रान्तिकारी नारों के साथ की गयी। इसके बाद साथी नौरीन ने सभा का संचालन करते हुए कार्यक्रम की रुपरेखा और आज के वक़्त में 1857 की क्या प्रासंगिकता है और हमें इससे क्या सीखना चाहिए, पर बात रखी।

इसके बाद साथी अदिति ने 1857 के संग्राम के बारे में विस्तार से बताया। इस विद्रोह की सबसे अहम बात क्या थी? हम आज भला 169 साल पुरानी इस घटना को क्यों याद कर रहे हैं? इसलिए क्योंकि इस विद्रोह में एक ख़ास बात देखने में आयी। यह बात थी देश के हिन्दुओं और मुसलमानों की फ़ौलादी एकता। इसके बाद से ही अंग्रेज़ों ने यह सबक लिया कि अगर देश के मेहनतकश हिन्दू और मुसलमान साथ होकर लड़ेंगे, तो उनकी हुक़ूमत के बस बचे-खुचे दिन ही बाक़ी होंगे। नतीजतन, ब्रिटिश शासन ने स्वयं ऐसे धार्मिक कट्टरपंथी संगठनों को प्रश्रय और बढ़ावा देने की शुरुआत की जो ग़ुलामी और शोषण के विरुद्ध भारतीय जनता के संघर्ष को हिन्दू-मुसलमान के नाम पर तोड़ दें। 1857 के जनविद्रोह से घबराकर अंग्रेज़ों ने जनता कि एकता को तोड़ने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ की न नीति अपनाई। इसी नीति को आज आगे बढ़ाने का काम नये तौर-तरीक़ों के साथ आरएसएस और मोदी सरकार कर रही है। आज के फ़ासीवादी दौर में मोदी सरकार लगातार लोगों को हिन्दू-मुसलमान के नाम पर बाँट रही है। ‘लव जिहाद’, गोरक्षा की नौटंकी जैसे नक़ली और झूठे मुद्दे उठाकर लोगों को उनके जीवन के वास्तविक मुद्दों जैसे महँगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, चिकित्सा आदि से भटका रही है। ऐसे वक़्त में ये और भी ज़रूरी हो जाता है कि 1857 के विद्रोह के बारे में जाना जाये और इससे प्रेरणा लेकर हिन्दू मुस्लिम एकता स्थापित की जाये।

इसके बाद साथी ज्योति ने देशभर में चल रहे मज़दूर आन्दोलन और सरकार द्वारा मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं के बर्बर दमन के बारे में बताया। आज सत्ता में एक ऐसी सरकार है जो पूरी तरह से पूँजीपरस्त है। मोदी सरकार दिन-रात मज़दूरों का शोषण करके पूँजीपतियों की तिजोरियाँ भरने में व्यस्त है। जब मज़दूर अपने हक़ की बात करते हैं तो उनके ऊपर लाठियाँ बरसाई जाती हैं। जेलों में बन्द किया जाता है। इसका उदाहरण अभी हाल ही में गुड़गाँव-मानेसर और नोएडा में देखने को मिला है। इस बात की तमाम रिपोर्टें और प्रमाण सामने आ रहे हैं कि वेतन बढ़ोत्तरी कि माँग कर रहे मज़दूरों और उनकी माँगों का समर्थन कर रहे मज़दूर कार्यकर्ताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से अगवा करके उनका बर्बर दमन किया जा रहा है। सरेआम दिन-दहाड़े सादी वर्दी में उत्तर प्रदेश पुलिस के लोग किसी को उसके घर से तो किसी को मेट्रो स्टेशन से अगवा कर ले रहे हैं। सारी क़ानूनी प्रक्रियाओं को रौंदते हुए यूपी पुलिस 40 घण्टे से ज़्यादा बीत जाने के बाद अगवा किये गये कार्यकर्ताओं को मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर रही है जबकि क़ानूनन उन्हें 24 घण्टे के भीतर नज़दीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था। इसके अलावा, अब तक सामने आयी रपटों व ख़बरों के अनुसार यह सवाल खड़ा हो रहा है कि मज़दूरों के शान्तिपूर्ण आन्दोलन को बदनाम करने के लिए कहीं कोई साजिश तो नहीं की गयी है? और इसमें नोएडा पुलिस की संदेहास्पद भूमिका क्या है? इसकी उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच की आवश्यकता है। आम मेहनतकश जनता के टैक्स से चलने वाली ये सरकारें मालिकों के लिए काम कर रही है। इस महँगाई के दौर में 10-12 हज़ार रुपये महीना में मज़दूरों को 12 घण्टे खटाया जा रहा है। आज भगतसिंह की बात शब्दशः सच साबित हो रही है जिसमें वह कहते हैं कि ‘इससे क्या फ़र्क़ पड़ेगा, यदि लार्ड इरविन की जगह सर तेज़ बहादुर सप्रू आ जायें।’

देश कोई कागज़ पर बना नक़्शा नहीं होता, बल्कि उसमें रहने वाले मेहनतकश लोगों से बनता है। आज फ़ासीवादी मोदी सरकार उन्हीं लोगों को शिक्षा, नौकरी, आवास, स्वास्थ्य का अधिकार नहीं दे पा रही है, तो उन्हें धर्म के नाम पर लड़वा रही है और जो उसके विरुद्ध आवाज़ उठाता है, उसे “देश का दुश्मन” बता देती है। “अर्बन नक्सल”, “बांग्लादेशी”, “पाकिस्तानी”, “आतंकवादी” कहकर उनका मीडिया ट्रायल चलाया जाता है। यह बात हमें समझनी होगी कि आज फ़ासीवादी मोदी सरकार हमारे देश को साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा की आग में झोंक रही है। हमें 1857 कि विरासत से प्रेरणा लेकर फिर से हिन्दू-मुसलमान और अन्य सभी धर्मों की आबादी की फ़ौलादी एकता बनानी होगी और एकजुट होकर इस सरकार की जनविरोधी व मज़दूर-विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ संघर्ष करना होगा।

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026