संसद में खुलासा : विदेशों में हर दिन 20 से अधिक भारतीय मज़दूरों की मौत

गुरुदास सिधानी

भारत में ऐतिहासिक तौर पर मज़दूरों की कार्य और जीवन-स्थितियाँ बहुत अच्छी नहीं रही है। चाहे वह औपनिवेशिक काल हो या स्वतन्त्र भारत का समय, हर दौर में मज़दूरों का जमकर शोषण हुआ है और धन्नासेठों ने उनकी मेहनत की लूट से अपनी तिजोरियाँ भरी हैं। हमारे देश में पूँजीपति वर्ग और उनकी सरकारों की मज़दूर-विरोधी नीतियों के विरुद्ध मज़दूरों के प्रतिरोध, आन्दोलनों, हड़तालों और संघर्षों का एक जीवन्त इतिहास भी है। मज़दूरों ने जो भी श्रम अधिकार हासिल किये हैं वे इन संघर्षों के बूते ही हासिल किये हैं।

वर्तमान समय में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, जहाँ मज़दूरों की ज़िन्दगी दिन-प्रतिदिन मुनाफे़ की भेंट चढ़ रही है। कहने को तो भारत सरकार और राज्य सरकारों ने मज़दूरों के अधिकारों के लिए लम्बे-चौड़े क़ानून बनाये हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका आकलन किया जाये तो वे काग़ज़ के टुकड़ों पर लिखे महज़ शब्द ही प्रतीत होते हैं, जिन्हें धरातल पर आने से पहले ही तोड़-मरोड़ दिया जाता है। और अब मोदी सरकार के लेबर कोड आने के साथ तो काग़ज़ों से भी मज़दूरों के ये श्रम अधिकार प्रभावत: मिटाये जा चुके हैं। वैसे भी फैक्ट्री और कारखानों के मालिक जब अलग-अलग चुनावी पार्टियों को करोड़ों रुपये का चन्दा देते हैं, तो यह मान लेना कठिन हो जाता है कि ये क़ानून उनके ख़िलाफ़ जाकर मज़दूरों को कभी न्याय दिला सकते हैं।

वैसे तो हमेशा से ही ऐसा होता रहा है, पर वर्तमान समय में कारखानों में दुर्घटनाएँ एक आम बात हैं, जिनमें मज़दूर कभी आग की भेंट चढ़ जाते हैं तो कभी ज़हरीली गैस के सम्पर्क में आकर अपनी जान गँवा देते हैं। यदि सरकारी आँकड़ों को ही देखें, जिन्हें सरकार ने स्वयं संसद में पेश किया है, तो यह सामने आता है कि भारत की रजिस्टर्ड फैक्ट्रियों में प्रतिदिन औसतन 3 मज़दूरों की मौत होती है। इनमें से भी सभी घटनाओं की सूचना दर्ज नहीं होती। यदि सभी घटनाएँ दर्ज की जाएँ, तो यह आँकड़ा इससे कई गुना अधिक हो सकता है। यह आँकड़ा केवल रजिस्टर्ड फैक्ट्री मज़दूरों का है। वास्तव में, भारत में केवल लगभग 10 प्रतिशत मज़दूर ही रजिस्टर्ड फैक्ट्रियों में कार्यरत हैं। शेष 90 प्रतिशत मज़दूर अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े हुए हैं, जहाँ सुरक्षा मानकों में कमी और न्यूनतम ख़र्च की नीति के कारण वे आये-दिन दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। फैक्ट्रियों में मज़दूरों को पर्याप्त प्रशिक्षण दिये बिना तथा उचित सुरक्षा उपकरणों के अभाव में ही काम पर लगा दिया जाता है। मालिक वर्ग की अधिक से अधिक उत्पादन करने और मुनाफे़ की अन्धी दौड़ मज़दूरों को अपनी जान से हाथ धोने के लिए मजबूर कर रही है।

भारत के मज़दूरों की यह दयनीय स्थिति केवल देश के भीतर ही नहीं है, बल्कि विदेशों में रोज़गार की तलाश में गए भारतीयों के लिए यह स्थिति और भी गम्भीर रूप में मौजूद है। आम लोगों को यह लगता है कि विदेशों में जाकर उनकी स्थिति सुधर जायेगी और वहाँ के कानून अधिक प्रभावी होंगे, मज़दूरी अधिक होगी, अधिक श्रम अधिकार होंगे, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत और बेहद भयावह है। विदेश मामलों के राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह द्वारा राज्यसभा में दिए गए लिखित उत्तर के अनुसार, पिछले पांच वर्षों (2021-2025) में विदेशों में 37,740 भारतीय श्रमिकों की मृत्यु हुई है। इसका अर्थ है कि प्रतिदिन औसतन 20 से अधिक भारतीय कामगार अपनी जान गँवा रहे हैं। हालाँकि यह आँकड़े केवल उन्हीं मामलों पर आधारित हैं जो आधिकारिक रूप से दर्ज किये गये हैं। वास्तविकता इससे कहीं अधिक गम्भीर हो सकती है, क्योंकि अनेक घटनाएँ या तो दर्ज ही नहीं हो पातीं या फिर पूँजीपतियों और उनकी सरकारों द्वारा उन्हें दबा दिया जाता है। ऐसे में यह मानना ग़लत नहीं होगा कि मज़दूरों की मौतों का वास्तविक आँकड़ा इससे कहीं अधिक हो सकता है। आँकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक 8,234 मौतें वर्ष 2021 में हुईं। 2022 में यह संख्या घटकर 6,614 हुई, लेकिन इसके बाद फिर लगातार वृद्धि दर्ज की गई। 2023 में 7,291, 2024 में 7,747 और 2025 में 7,854 मज़दूरों की मौत हुई। देशवार आँकड़ों पर नज़र डालें तो कुल मौतों में से लगभग 86 प्रतिशत खाड़ी देशों में हुई हैं। इनमें संयुक्त अरब अमीरात (12,380) और सऊदी अरब (11,757) सबसे ऊपर हैं। इनके बाद कुवैत (3,890), ओमान (2,821), मलेशिया (1,915) और क़तर (1,760) का स्थान है। ये वे देश हैं जहाँ पूँजीवाद का सबसे अमानवीय और विकृत मॉडल लागू है और मज़दूरों की स्थिति ग़ुलामों जैसी है। विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों को भारतीय नागरिकों से दुर्व्यवहार, शोषण और कार्यस्थल से जुड़ी कुल 80,985 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। इनमें सबसे अधिक शिकायतें संयुक्त अरब अमीरात (16,965) से आईं, इसके बाद कुवैत (15,234), ओमान (13,295) और सऊदी अरब (12,988) का स्थान रहा।

खाड़ी देशों के बाहर भी स्थिति चिन्ताजनक है। मलेशिया में 8,333 और मालदीव में 2,981 शिकायतें दर्ज की गयीं। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में 2024-25 के दौरान शिकायतों में तेज़ वृद्धि देखी गयी। म्यांमार में 2025 में 2,548 शिकायतें दर्ज की गईं, जबकि कम्बोडिया में 2,531 शिकायतों के मुकाबले 31 मौतें और लाओस में 2,416 शिकायतों के मुक़ाबले 11 मौतें दर्ज की गईं। यह उल्लेखनीय है कि श्रम-सम्बन्धी समस्याओं में लगातार वृद्धि हुई है। 2021 में जहाँ 11,632 शिक़ायतें दर्ज की गयी थीं, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 22,479 हो गई, जो कि लगभग दोगुनी है।

आखिर सवाल यह है कि इतनी कठिनाइयों और खतरों के बावजूद भारतीय कामगार विदेश जाने के लिए मजबूर क्यों होते हैं? पहला कारण है रोजगार की कमी। देश में हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिल पाता, खासकर मज़दूर वर्ग को। दूसरा कारण है कम वेतन। भारत में महीनों मेहनत करने के बाद भी जितनी कमाई होती है, उतनी सैलरी उन्हें संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों में एक माह में मिल जाती है, हालाँकि इसके बदले में मज़दूरों की अपनी सभी स्वतन्त्रताएँ गिरवी रखनी पड़ती हैं। अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए विदेश जाने वाले मज़दूर ये कुर्बानियाँ करने को बाध्य होते हैं। तीसरा कारण है पारिवारिक जिम्मेदारियाँ। बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता का इलाज और घर चलाने का दबाव। चौथा कारण है कर्ज़ और आर्थिक मजबूरी। कई लोग उधार लेकर विदेश जाते हैं ताकि अधिक कमाकर उस कर्ज़ और पुराने कर्जों को चुका सकें। पाँचवाँ कारण है बेहतर भविष्य का सपना, जो उन्हें अपना देश छोड़ने पर मजबूर कर देता है। और छठा कारण है कबूतरबाज़ी करवाने वाले एजेण्टों के झूठे वादे, जो सुनहरे सपने दिखाकर लोगों को ऐसी जगह भेज देते हैं जहाँ हक़ीक़त बिल्कुल अलग होती है। यानी, साफ़ है कि विदेश जाना इन लोगों की पसन्द कम और मजबूरी ज्यादा है। अब असली सवाल यहीं से शुरू होते हैं। क्या हमारे देश के मज़दूरों की ज़िंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि हर दिन 20 मौतें भी हमें झकझोर नहीं पा रहीं? अगर मौजूदा व्यवस्था सही और सन्तोषजनक है, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर मौतें क्यों हो रही हैं? 80 हज़ार से ज्यादा शिक़ायतों के बावजूद हालात सुधरने के बजाय और ख़राब क्यों हो रहे हैं? क्या विदेश भेजने से पहले मज़दूरों की सुरक्षा की कोई ठोस गारण्टी की जाती है, या सिर्फ कागज़ों में सब कुछ पूरा दिखाकर खानापूरी कर ली जाती है? क्यों भारतीय कामगारों को आज भी अपने ही बुनियादी और न्यूनतम अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है? क्या जिन देशों के साथ समझौते किए गए हैं, उनका ज़मीनी स्तर पर कोई असर दिखता है? क्या विश्वगुरू मोदी ने इस बाबत कुछ भी किया है? भारतीय दूतावासों की भूमिका कितनी प्रभावी है, और कितने लोगों को वास्तव में न्याय मिल पाता है? क्या मज़दूरों की मौत के बाद उनके परिवारों को उचित सहायता मिलती है, या वे अकेले ही संघर्ष करते रह जाते हैं? आख़िर कब तक भारत का आम मज़दूर अपने सपनों की क़ीमत देश और विदेश दोनों ही जगहों पर अपनी जान देकर चुकाता रहेगा? ये वे सवाल हैं जो हर कामगार के दिल को झकझोर देते हैं।

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026