कविता – वे मुंतज़िर हैं

मेहजबीं

हमारी बिरादरी का कोई जेल में बंद है
उसने मज़दूरों के साथ स्वर में स्वर मिला
लिया था
अख़बार के लिए एक फीचर लिखकर भेजा था
कुछ कविताएं भेजीं थी पत्रिका में

आधी रात को पुलिस उठा ले गयी है
उसका लेपटॉप फोन डायरी भी अपने कब्जे
में कर लिया है
फेसबुक पर कल से यह ख़बर लटकी हुई है
इसी ख़बर के ऊपर नीचे लटके हुए हैं
काव्य गोष्ठी के इस्तिहार
किताबों के लोकार्पण के निमंत्रण
फलाना ढिमकाना सम्मान के समाचार

हस्बे मामूल मैंने सभी को लाइक कर दिया है
कहीं शुभकामनाएं कहीं दुखद समाचार
लिख दिया है
जेल वाला समाचार स्मृति से धीरे-धीरे
इरेज हो गया है
काव्य गोष्ठी का इस्तहार अपनी ओर खींच रहा है
मैं अहसास ए कमतरी में मुब्तिला हो रही हूं

आज एक हफ्ता हो गया है फलाना ढिमकाना
को जेल में बंद हुए
इस बीच मैंने दस कविताएं लिख डाली हैं
एक पत्रिका में इस महीने मेरी कविताएं
आने वाली हैं
दो जगह से कविता पाठ का निमंत्रण भी
मिला है
मैंने जेल वाली पोस्ट को शेयर किया है
अपने प्रकाशित होने वाली पोस्ट को सब जगह शेयर किया है
अपने निमंत्रण समाचार को स्टेटस पर लगा दिया है

आटे में नमक के बराबर प्रगतिशील जमात के लोग कवियों लेखकों को जेल से बाहर निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं
बाक़ी के शेष काव्य गोष्ठी सेमिनार आयोजित कर रहे हैं
निमंत्रण भेज रहे हैं निमंत्रण स्वीकार
कर रहे हैं

मंच पर चढ़ कर प्रगति‍शील कवि
कह रहा है
बहुत भयावह स्थिति है इस दौर में कविता नहीं लिखी जाएंगी तो कब लिखी जाएंगी
कविता पाठ चल रहा है वे पहना रहे हैं एक-दूसरे को शॉल
वे दे रहे हैं एक-दूसरे को गुलदस्ते
बीच-बीच में ठहाकों और चाए समोसे
का वक़्फा चल रहा है

इस मेहफिल से दूर जेलखाने में एक मख़लूक़ खा रही है सूखी रोटी मन
मार कर
वे मुंतज़िर हैं नई सुबह की ज़ियारत के
वे मुंतज़िर हैं समतामूलक समाज के
वे उनसे उम्मीद लगा कर बैठे हैं जो जेल से बाहर ज़मीनी स्तर पर एक-दूसरे के हाथों में मशाल थामे हुए हैं !!

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026