नौसेना विद्रोह – देश के मेहनतकशों की ऐतिहासिक विरासत

अजित

हमारी हड़ताल हमारे राष्ट्र के जीवन की एक ऐतिहासिक घटना रही है। पहली बार सेना के जवानों और आम आदमी का ख़ून सड़कों पर एक साथ, एक लक्ष्य के लिए बहा। हम फ़ौजी इसे कभी नहीं भूलेंगे। हम यह भी जानते हैं कि हमारे भाई-बहन भी इसे नहीं भूलेंगे। हमारी महान जनता ज़िन्दाबाद! जयहिन्द!’’

ये शब्द थे नौसेना विद्रोह के उन सिपाहियों के जिन्होंने अंग्रेज़ी हुक़ूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत का बिगुल फूँका था। यह विद्रोह भारत के इतिहास की एक ऐसी घटना थी जिसने तत्कालीन अंग्रेज़ी सरकार समेत देशी नेताओं तक की नींद हराम कर दी थी।

इस ऐतिहासिक घटना के बीज उस समय पड़े जब जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नौसेना का विस्तार किया जा रहा था। देश के हर कोने से लोगों को नौसेना में शामिल किया गया। पूरे देश के ही समान नौसेना में भी भारतीय लोगों के साथ नस्ली भेदभाव तथा दुर्व्यवहार किया जाता था। समान काम के लिए अंग्रेज़ नौसैनिकों को अधिक वेतन मिलता था। अंग्रेज़ नौसैनिकों तथा भारतीय नौसैनिकों को मिलने वाली सुविधाओं में भी बहुत अन्तर था। ज़ाहिर है, इसे लेकर भारतीय नौसैनिकों के बीच गुस्सा और असन्तोष था। 18 फ़रवरी 1946 को बेहतर खाने की माँग को लेकर बम्बई के ‘तलवार’ नामक जहाज़ पर नौसैनिकों ने हड़ताल कर दी। यह हड़ताल बम्बई पर तैनात नौसेना के 22 जहाज़ों तक फैल गयी। विद्रोहियों ने एम. एस खान के नेतृत्व में ‘नेवल सेण्ट्रल कमिटी’ का गठन किया। जहाज़ों से यूनियन जैक (ब्रिटेन का झण्डा) उतार कर काँग्रेस, मुस्लिम लीग तथा कम्युनिस्ट पार्टी के झण्डे लगा दिये गये। ‘रॉयल इण्डियन नेवी’ का नाम बदलकर ‘इण्डियन नेशनल नेवी’ कर दिया गया।

मुम्बई में नौसेनिकों को गिरफ़्तार करके ले जाती हुई पुलिस

आमूलगामी आन्दोलन और समझौते के बीच ऊहापोह में 20 फ़रवरी को कमाण्डर के आदेश का पालन करते हुए नौसैनिक बैरकों और कैसलों में वापस लौट गए। वहाँ सेना ने उन्हें घेर लिया तथा उनकी घेरेबन्दी कर दी। जब नौसैनिकों ने घेरेबन्दी तोड़ने की कोशिश की तो सेना के साथ उनकी लड़ाई छिड़ गयी। यह ख़बर अन्य जगहों पर भी पहुँची तथा वहाँ भी नौसैनिकों ने हड़ताल कर दी। 22 फ़रवरी तक यह विद्रोह देशभर के नौसेना केन्द्रों तथा समुद्र पर खड़े जहाज़ों तक फैल गया। बम्बई, कलकत्ता, कराची तथा अण्डमान व निकोबार द्वीप समूह के क़रीब 20,000 नाविकों ने इसमें भागीदारी की। नाविकों के समर्थन में देश के मज़दूरों तथा छात्रों ने भी हड़ताल की। बम्बई में क़रीब 3 लाख मज़दूरों ने अपना काम बन्द कर दिया। बैरकों, जहाज़ों समेत देश के अलग-अलग शहरों की स्थिति नाज़ुक होती जा रही थी। इसे देखकर अलग से सेना की टुकड़ियों को तैनात किया गया। नौसैनिकों तथा जनता ने पुलिस से लोहा लिया। सड़कों पर बैरिकेड खड़े कर लड़ाइयाँ हुईं। अंग्रेज़ कमाण्डर गॉडफ्रे ने वायुयान से जहाज़ों को उड़ाने की धमकी दी तो नौसैनिकों ने जहाज़ों पर लगे तोपों को बम्बई शहर की तरफ़ मोड़कर होटल ताज़ तथा गेटवे ऑफ इण्डिया को उड़ाने की बात कही। अंग्रेज़ों ने नौसैनिकों की रसद को रोक दिया तो बम्बई शहर में समुद्र किनारे जनता रसद लेकर तैयार हो गयी थी। सरकारी आँकड़ों के अनुसार सेना के साथ हुई झड़पों में क़रीब 228 लोगों की जान गयी और क़रीब 1000 लोग घायल हुए। लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। नौसेना विद्रोह के साथ देश की जनता का खड़ा हो जाना, उनके समर्थन में मज़दूरों द्वारा हड़तालें किया जाना, छात्रों-युवाओं द्वारा प्रदर्शन किया जाना, दिखला रहा था कि नौसेना विद्रोह ने एक ऐसी तात्कालिक घटना का काम किया था, जिसने औपनिवेशिक शोषण और उत्पीड़न के जुए तले कसमसा रही भारतीय जनता के सब्र के प्याले को छलका दिया था। इसी दौर में एक ओर हड़तालों की लहर जारी थी, तेलंगाना किसान विद्रोह की शुरुआत होने को थी, देश के अन्य हिस्सों में भी कई जनविद्रोह पनप रहे थे। 1946 से 1947 और फिर 1947 से 1950 का दौर एक ऐसा दौर था जिसमें भारत ऐसी दहलीज़ पर खड़ा था कि अगर भारतीय कम्युनिस्ट तैयार होते तो देश एक जनवादी क्रान्ति का साक्षी बन सकता था। इस पूरे दौर में नौसेना विद्रोह एक विशेष महत्व रखने वाला अध्याय था।

इस पूरे घटनाक्रम में हम देख सकते हैं कि नौसैनिकों के साथ देश की जनता कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रही थी लेकिन इसी समय हमारे देश के नेतागणों का क्या रुख़ था, यह भी महत्वपूर्ण बात है। नौसैनिकों ने हर पार्टी का समर्थन के लिए आह्वान किया लेकिन सिर्फ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें समर्थन दिया। यह समर्थन सिर्फ़ ज़ुबानी नहीं था बल्कि बम्बई में उन्होंने इस विद्रोह के समर्थन में आम हड़ताल का आह्वान किया जिसमें 3 लाख मज़दूरों ने भागीदारी की। कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने शुरुआत में इस विद्रोह में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखायी लेकिन मामला जब गम्भीर रूप लेने लगा तो कांग्रेस ने हस्तक्षेप किया। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के अरुणा आसफ़ अली तथा अच्युत पटवर्धन ने विद्रोहियों का समर्थन किया लेकिन गाँधी, नेहरू, पटेल सभी ने इसकी निन्दा की। सरदार पटेल ने जिन्ना की मदद से समझौता करवाया। समझौता इस आश्वासन पर किया गया था कि विद्रोहियों को कोई सज़ा नहीं होगी लेकिन जल्द ही यह आश्वासन भुला दिया गया था। 23 फ़रवरी को पूँजीपति वर्ग के नेताओं की मध्यस्थता के बाद यह विद्रोह वापस ले लिया गया था।

इस दौरान भारतीय नेताओं के बयान भी काफ़ी कुछ बताते हैं। पटेल ने 1 मार्च 1946 को एक कांग्रेसी नेता को लिखा, ‘‘सेना में अनुशासन को छोड़ा नहीं जा सकता… स्वतन्त्र भारत में भी हमें सेना की आवश्यकता होगी। जवाहर लाल नेहरू भी इस बात के कायल थे कि ‘‘हिंसा के उच्श्रृंखल उद्रेक को रोकने की आवश्यकता है।’’ गाँधी जी ने भी ‘बुरा और अशोभनीय’ उदाहरण क़ायम करने के लिए नौसैनिकों की निन्दा की व उन्हें ‘‘शिक्षा’’ दी कि यदि नाविकों को कोई शिक़ायत है, तो वे चुपचाप नौकरी छोड़ सकते हैं। गाँधी जी ने यह भी कहा कि ‘‘हिंसात्मक कार्रवाईयों के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों का एक होना एक अपवित्र बात है…-’’ 30 मई, 1946 को अंग्रेज वायसराय वेवेल ने अपनी निजी टिप्पणी में लिखा था, ‘‘हमें हर क़ीमत पर हिन्दुओं और मुसलमानों से एकसाथ उलझने से बचना चाहिए।’’

राजनीतिक रूप से अनुभवहीन नौसैनिकों और उनके नेतृत्व को देश के राष्ट्रीय आन्दोलन के बुर्जुआ नेतृत्व के प्रति भरोसा और उम्मीदें थीं। कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति उनके बेहद अच्छी भावना और बहुत से नौसैनिकों की करीबी थी। लेकिन आन्दोलन पूर्ण रूप से एक सूझ-बूझ वाले क्रान्तिकारी नेतृत्व में नहीं था। भारत के पूँजीपति वर्ग का राजनीतिक नेतृत्व एक ओर अंग्रेज़ों से राजनीतिक आज़ादी चाहता था, लेकिन दूसरी ओर वह जनता के किसी भी रैडिकल, क्रान्तिकारी व जुझारू आन्दोलन से भयाक्रान्त रहता था, चाहे वह मज़दूरों का हो, सैनिकों का हो या फिर ग़रीब किसानों का। जब भी ऐसा कोई आन्दोलन शुरू होता था, तो उन्हें यह दुस्वप्न सताने लगता था कि अगर ऐसे आन्दोलनों को किनारे कर जनता की पहलकदमी को पूरी तरह पूँजीवादी वैधिकता और वैधानिकता यानी कानूनवाद की सीमा के भीतर और उनके वर्ग हितों की सीमा के भीतर न लाया गया तो आज़ादी के बाद भी वे पूँजीपति वर्ग के शासन के लिए ख़तरा बन सकते हैं। इसलिए जब तक जनता के जनान्दोलन पूँजीपति वर्ग की पार्टियों कांग्रेस व मुस्लिम लीग के हाथों में रहता था, तब तक वे राजनीतिक आज़ादी के लिए ज़्यादा मुखर स्वर में बोलते थे, लेकिन जब जनता के जनान्दोलन उनके नियन्त्रण से बाहर जाते थे, तो वे साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन से भी समझौतापरस्ती करते थे। नौसेना विद्रोह के समय भी इन पूँजीवादी नेताओं ने अपना यही चरित्र प्रदर्शित किया।

एक तरफ़ नौसैनिकों व जनता का वीरतापूर्ण संघर्ष और कुर्बानी वहीं दूसरी तरफ़ देश के नेताओं का असंवेदनशील तथा समझौतापरस्त रवैया हमें बहुत कुछ सिखाता है। आज़ादी के आन्दोलन के तत्कालीन समय में जब देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे अपने चरम पर थे, नौसैनिकों के इस विद्रोह ने जनता की एकजुटता की मिसाल पेश की थी। अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को इस विद्रोह ने नाकाम कर दिया और दिखा दिया कि देश के हिन्दू और मुस्लिम साथ मिलकर लड़े तो यह शासकों के लिए कितना गम्भीर ख़तरा हो सकता है। इसके साथ ही इस विद्रोह पर बुर्जुआ वर्ग की तमाम पार्टियों के रवैये ने उनके असल चरित्र को उघाड़ कर सामने रख दिया। आज़ाद भारत में भी काँग्रेस के नेतागण एक ऐसी सेना चाहते थे जो कभी अन्याय के विरुद्ध आवाज़ न उठाये और केवल मुँह पर ताले डालकर आज्ञा का पालन करती रहे। वह जानते थे कि आज़ादी के बाद भी भारत में मुठ्ठी भर पूँजीपतियों के शासन को देश की मेहनतकश जनता के ऊपर थोपे रखने के लिए एक “आज्ञाकारी” सेना की आवश्यकता होगी। आज भी सेना में मेहनतकश घरों से जाने वाले जवानों की स्थिति जानवरों से भी बदतर है। सेना की व्यापक आबादी को जनता से काटकर रखने के लिए उन्हें किसी भी प्रकार से जनता से मिलने-जुलने नहीं दिया जाता। उन्हें किसी उत्पादक गतिविधि में न लगाकर, उत्पीड़क क़वायदों में लगाये रखा जाता है, ताकि उनके मन में एक आकारहीन सा गुस्सा और असन्तोष पनपता रहे। इसके अलावा, अधिकारियों के नौकर की तरह इस्तेमाल किया जाना, घटिया खाना दिया जाना, लगातार अपमानित किया जाना, बैरकों की जीवन-स्थिति को भयंकर बनाकर रखना सेना में आज भी शासक वर्गों द्वारा किया जाता है। “राष्ट्रवाद” और “देशभक्ति” का फटा ढोल पीटने के बावजूद सेना के भीतर मौजूद वर्ग विभाजन और आम जवानों की जीवन-स्थिति सच्चाई का बयान कर देती है।

नौसेना विद्रोह का संघर्ष हमें दिखाता है कि किस तरह वास्तविक संघर्ष संगठित होने पर अंग्रेज़ों के साथ-साथ देसी हुक़्मरानों की भी नींद उड़ गयी थी। काँग्रेस के नेतृत्व में लड़ी गयी आज़ादी की लड़ाई में काँग्रेस ने कभी भी जनता की पहलक़दमी को निर्बंध होने नहीं दिया और उसको इसी व्यवस्था के भीतर सीमित करती रही तथा ‘समझौता-दबाव-समझौता’ की नीति के तहत राजनीतिक आज़ादी की लड़ाई को लड़ती रही। यदि जनता अपनी पहलक़दमी पर कोई आन्दोलन करती तो काँग्रेस उसके साथ वहीं रुख़ अपनाती थी जो उसने नौसेना विद्रोह के साथ अपनाया।

इन तमाम बातों की रोशनी में आज हमें नौसेना विद्रोह को याद करना होगा क्योंकि आज़ादी की लड़ाई के एक अति आवश्यक अध्याय को बहुत कम महत्व देते हुए लगभग भुला दिया गया है।

इसी व्यवस्था की सेवा करने वाली आज का पूँजीवादी मीडिया तथा शिक्षा प्रणाली हमें जनता के वीरतापूर्ण संघर्षों से परिचित नहीं होने दे रही है। आज हमें न केवल जनता के असली संघर्षों के इतिहास से परिचित होना है बल्कि उससे ज़रूरी सबक लेते हुए आज भी अपने असली मुद्दों पर एकजुट होकर जुझारू संघर्ष खड़ा करना है। आज सत्ता में बैठी फ़ासीवादी सरकार जनता को जाति-धर्म में बाँट रही है। ऐसे में नौसेना विद्रोह के दौरान स्थापित एकता हमारे लिए प्रकाशस्तम्भ का काम कर सकती है।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2025


 

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