जनता के मुद्दों से मुँह मोड़ चुके पूँजीवादी मीडिया के दौर में ‘मज़दूर बिगुल’ उम्मीद जगाता है
– अम्बरीश, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
हम मनुष्यों के हर दिन की शुरुआत बीते कल की घटनाओं को जानने की उत्सुकता के साथ शुरू होती है। लेकिन जैसे ही दरवाज़े पर पड़े आजकल के अख़बारों का मुखपृष्ठ देखता हूँ तो मेहनतकश जनता की रोज़मर्रा की समस्याओं या समाज के लिए उपयोगी ख़बरों की जगह हिन्दुत्व के नाम पर रंग-बिरंगे सुनहरे अक्षरों में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाले शब्द लिखे होते हैं। अख़बारों का यह चरित्र धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक देश कहलाने वाले भारत के लोकतंत्र के चौथे खम्भे की ढोल की पोल खोल देता है।
23 नवम्बर दिन सोमवार को हिन्दुस्तान अख़बार (प्रयागराज) के मुख्य पृष्ठ (पूरा पेज) की शुरुआत इन लाइनों से होती है – “भारतवर्ष के हिन्दू राष्ट्र के रूप में स्थापित होने की जन मंगल कामना एवं हिन्दू समाज के जन कल्याण हेतु माँ भगवती का सतचण्डी यज्ञ एवं अनुष्ठान” (व्यक्ति और कार्यक्रम स्थल के नाम के साथ)।
मुख्यधारा की चाटुकार पत्रकारिता के इस काले समय में आज आम मेहनतकश आबादी से जुड़े मुद्दे जैसे बेरोज़गारी, महँगाई, संगठित और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली मज़दूर आबादी की समस्याओं, निजीकरण, छात्र-युवा विरोधी नीतियों, बढ़ते स्त्री-विरोधी अपराध और अन्य सामाजिक मुद्दों पर विस्तृत ख़बरें और लेख ‘मज़दूर बिगुल’ अख़बार में होते हैं, इससे लगता है कि सत्ता के तलवाचाट अख़बारों के बीच ‘मज़दूर बिगुल’ अख़बार ही मेहनतकश आबादी का अपना अख़बार है।
अक्टूबर के अंक में छपे लेख ‘इस लोकतंत्र के तीसरे और चौथे खम्भे यानी न्यायपालिका और मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता की असलियत’ पर विस्तृत रूप से चर्चा करने के लिए मज़दूर बिगुल के सम्पादक मण्डल का बहुत-बहुत आभार और उम्मीद है कि आने वाले समय में भी मज़दूर बिगुल अख़बार मेहनतकश के प्रति अपने कर्तव्य का पूर्ण रूप से निर्वहन करता रहेगा।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2020













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