योगी राज का असली खेल: अपराधियों को बेल, बेगुनाहों को जेल!
नीशू
हाल ही में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के आरोपियों के ख़िलाफ़ चल रहे केस वापस ले लिये जिसके तहत नफ़रती भाषण व नफ़रती अपराधों के आरोपी 25 भाजपा नेताओं समेत कई कट्टर हिन्दुत्ववादी नेताओं को अपराध मुक्त कर दिया गया। ज़िले की विशेष सांसद-विधायक अदालत ने उत्तर प्रदेश के मौजूदा मंत्री कपिल देव अग्रवाल, पूर्व केन्द्रीय मंत्री संजीव बलियान और राज्य के पूर्व मंत्री सुरेश राणा, अशोक कंसल, सोहनवीर सिंह, विश्व हिन्दू परिषद की नेता साध्वी प्राची तथा महन्त यति नरसिंहानन्द जैसे साम्प्रदायिक दंगाइयों के ख़िलाफ़ मुक़दमे वापस लेने की मंज़ूरी दे दी। भाजपा के इन नेताओं के ख़िलाफ़ महापंचायत में भाषणों के ज़रिये साम्प्रदायिक तनाव भड़काने का आरोप था। मालूम हो कि सितम्बर 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में हुए दंगों और इसके बाद आसपास के ज़िलों में हुई हिंसा में 62 से अधिक लोगों की नृशंस हत्या कर दी गयी थी और 50 हज़ार से ज़्यादा लोगों को घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
उत्तर प्रदेश की फ़ासीवादी भाजपा सरकार साम्प्रदायिक गुण्डों व अपराधियों को अपने शरण में लेकर उन पर दर्ज आपराधिक मुक़दमों को ख़त्म कर गुण्डा राज “ख़त्म” करने का झूठा प्रचार कर रही है। आँकड़ों को ग़ायब कर “उत्तम प्रदेश” की फ़र्ज़ी छवि गढ़ने की कोशिश कर रही है। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय में राजनीति के अपराधीकरण की एक रिपोर्ट पेश की गयी। ‘एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक़, लोकसभा के 543 में से 251 और राज्यसभा के 233 में से 75 सदस्यों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज हैं।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवन्त रेड्डी पर 89 केस हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी पर 29 और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर 19 मामले दर्ज हैं। मज़ेदार बात यह है कि उत्तर प्रदेश का कोई आँकड़ा नहीं मिला क्योंकि उत्तर प्रदेश को “अपराध मुक्त” कर दिया है! इसकी घोषणा योगी सरकार ने कुर्सी सम्भालते ही कर दी थी!
योगी आदित्यनाथ ने साल 2017 में राज्य विधानसभा में घोषणा की कि राज्य सरकार जल्द ही “विभिन्न दलों के राजनेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं” के ख़िलाफ़ दर्ज लगभग 20,000 आपराधिक मामले वापस ले लेगी। इसके लिए यूपी सरकार ने ‘उत्तर प्रदेश दण्ड विधि (अपराधों का शमन एवं मुक़दमों का समापन) (संशोधन) विधेयक, 2017’ पेश किया जोकि बिना किसी विरोध के पारित हो गया। लेकिन वास्तव में यह विभिन्न राजनेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बजाय मुख्यतः भाजपा से जुड़े नेताओं और साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादी गुण्डों को योगी आदित्यनाथ द्वारा दिया गया आश्वासन था कि “टेंशन नहीं लेने का- मैं हूँ न!”
‘द वायर’ में छपी एक ख़बर के मुताबिक़ घोषणा के बाद बाक़ायदा अभियान चलाकर नफ़रती भाषण व नफ़रती अपराधों के सभी आरोपियों को बरी करवाने का सिलसिला चला और इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री ने ख़ुद अपनेआप से ही की और प्रदेश की “योगी सरकार ने योगी आदित्यनाथ को दोषमुक्त क़रार देकर बख़्श दिया”! ‘उत्तर प्रदेश दण्ड विधि (अपराधों का शमन एवं मुक़दमों का समापन) (संशोधन) विधेयक, 2017’ पेश करने से ठीक एक दिन पहले योगी आदित्यनाथ ने 2007 में गोरखपुर में दिये गये अपने भड़काऊ भाषण से जुड़े अपराधिक मामले को वापस ले लिया। इसके बाद तो प्रदेश उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से लेकर आगरा के भाजपा सांसद राम शंकर कठेरिया के ख़िलाफ़ 12 मामले वापस लिये गये। मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के आरोपियों के ख़िलाफ़ दायर 131 मामले वापस ले लिये गये। 20,000 आपराधिक मामले वापस लेने का यह तर्क दिया गया कि इस क़दम का उद्देश्य लम्बित मामलों की संख्या को कम करना है!
वहीं दूसरी तरफ़ उत्तर प्रदेश की जेलों में विचाराधीन क़ैदियों की संख्या देश में सबसे ज़्यादा है। यहाँ 55,000 क़ैदी हैं, जो कुल विचाराधीन क़ैदियों का लगभग एक-चौथाई हिस्सा है। जेल की वास्तविक क्षमता से कई गुना ज़्यादा संख्या में क़ैदियों को अमानवीय परिस्थितियों में ठूँसा गया है। बहुत से क़ैदी तो छोटे-मोटे जुर्म में सालों से जेलों में बन्द है।
‘नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड’ के मुताबिक़, उत्तर प्रदेश में 13% मामले 10 साल से ज़्यादा समय से और 24% मामले 5 से 10 साल के बीच से अटके हुए हैं।
भारतीय न्यायपालिका व कार्यपालिका का किस हद तक फ़ासीवादीकरण हो चुका है यह आज देश की आम मेहनतकश जनता के सामने है। भारतीय फ़ासीवादी कितना भी “हिन्दू हृदय सम्राट”, “विकास”, “अच्छे दिन” का ढोल बजा लें, इनकी असलियत परत दर परत हर बीतते दिन के साथ खुलती जा रही है। अपने पूँजीपति आकाओं के मुनाफ़े के रास्ते में आने वाले हर प्रकार के गतिरोध (पढ़ें, जनता का प्रतिरोध) को निर्ममतापूर्वक हटाने का काम इसलिए ही तो इतनी मुस्तैदी से भाजपा सरकार कर रही है। एक तरफ़ तो मुज़फ़्फ़रनगर के दंगाइयों व अपराधियों के ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमे वापस लिये जा रहे हैं, उन्हें बरी किया जा रहा है, बलात्कारियों का फूल-मालाओं से स्वागत किया जा रहा है, स्वतन्त्र भारद्वाज जैसे नफ़रती गुबरैलों को भाजपा के बड़े नेताओं द्वारा संरक्षण दिया जा रहा है; वहीं दूसरी तरफ़ इंसाफपसन्द नागरिकों, छात्रों और मज़दूरों को जेलों में डाला जा रहा है, उनपर नक़ली, फ़र्ज़ी मुक़दमे थोपे जा रहे हैं, उनकी रिहाई को ही असम्भव बनाया जा रहा है।
आज देश का लगभग हर मज़दूर जानता है कि जब बेहिसाब बढ़ती महँगाई के ख़िलाफ़ अप्रैल में नोएडा के मज़दूरों ने वेतन बढ़ोत्तरी की बेहद बुनियादी और जायज़ माँग को लेकर आन्दोलन किया तो योगी सरकार ने बर्बर दमन करते हुए हज़ारों बेगुनाह मज़दूरों और उनके न्यायपूर्ण संघर्ष का समर्थन करने वाले इंसाफ़पसन्द छात्रों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों को जेल में डाल दिया। यहाँ तक कि उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका) जैसा काला क़ानून थोप दिया। मज़दूरों के आन्दोलन को बदनाम करने के लिए ‘पाकिस्तान का कनेक्शन’ जोड़ दिया गया।
फ़ासीवाद किसी एक धर्म या समुदाय के “हितैषी” होने का दावा करता है लेकिन वह चाकरी हमेशा पूँजी की ही करता है। दरअसल उत्तर प्रदेश के मज़दूर आन्दोलन का बर्बर दमन करके योगी आदित्यनाथ ने यही किया। फ़ैक्टरी मालिकों की जमात में मज़दूर आन्दोलन से मची खलबली को शान्त करने की मंशा से ही योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूँजीपति वर्ग के प्रति अपनी पक्षधरता और वफ़ादारी का रिपोर्ट कार्ड पेश किया ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में भरपूर चन्दा हासिल किया जा सके।
बहरहाल, मुज़फ़्फ़रनगर की विशेष अदालत ने यह कहते हुए मामला वापस लेने की मंजूरी दे दी कि इससे अभियुक्त को “अधिक समर्पण के साथ जनता और समाज की सेवा करने” का अवसर मिलेगा, वर्तमान में परिस्थितियाँ “बदल गयी” हैं और आज समाज में कोई “साम्प्रदायिक अस्थिरता नहीं” है! लेकिन भाजपा की असलियत आख़िर हम मज़दूरों-मेहनतकशों से बेहतर कौन जानता है? मेहनतकश आबादी को लूटो-खसोटो और पूँजीपतियों को आबाद करो- यही भाजपा की नीति है। देश भर में महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार सातवें आसमान पर है। छात्र-नौजवान डिग्रियाँ लेकर भटक रहे हैं लेकिन वैकेंसी नहीं निकाली जा रही। तमाम सरकारी विभागों में ठेके-संविदा पर मज़दूर खट रहे हैं। लेकिन भाजपा नेताओं की “मुसलमानों को सबक़ सिखाने” की साम्प्रदायिक बयानबाज़ी जारी है। अभी हाल ही में मुज़फ़्फ़रनगर दंगों से सम्बन्धित होर्डिंग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बस अड्डे पर लगी पायी गयी जिस पर ‘न भूले हैं न भूलेंगे’ जैसे चुनौतीपूर्ण नारे लिखे थे।
उत्तर प्रदेश में भाजपा के दस साल मज़दूरों, ग़रीब किसानों, छात्रों-नौजवानों, मुसलमानों, दलितों व स्त्रियों के लिये सबसे घातक सिद्ध हुए हैं। दलितों-अल्पसंख्यकों पर हमलों का ग्राफ़ बढ़ता जा रहा है। एक बात तो भाजपा को भी पता है कि 2027 का चुनाव जीतना आसान नहीं है इसलिए एसआईआर के ज़रिये वोटर लिस्ट से नाम हटवाने, 50,000 रुपये का लालच देकर महिलाओं का वोट ख़रीदने से लेकर नफ़रती भाषणों के ज़रिये जनता को आपस में लड़वाने तक की सारी कोशिशें जारी हैं। जन सरोकार से ग़द्दारी कर चुकी बिकाऊ मीडिया मन्दिर-मस्जिद की बहसें शुरू कर चुकी है। दावा किया जा रहा है कि जो राम को लाये हैं वही कृष्ण को लायेंगे! लेकिन मेहनतकश साथियों को यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि हमारी आस्था का इस्तेमाल करके यही भाजपाई मन्दिर का चन्दा तक चुराकर खा जाते हैं।
मन्दिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम में बाँटकर हमें हमारी ज़िन्दगी के वास्तविक मुद्दों से भटका देते हैं, वे मुद्दे जिनसे हर रोज़ हमारा और हमारे परिवार का सामना होता है, चाहे वह दवा-इलाज का मसला हो, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई हो या फिर बढ़ती महँगाई हो। और जब हम अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाते हैं तो जेलों में ठूँस दिया जाता है। लेकिन यह केवल तभी तक होता है जब तक हम एकजुट नहीं हैं।
इतिहास का एक सबक़ यह भी है कि जिन भी देशों में मज़दूरों ने एकजुट होकर अपने असली मुद्दों को लेकर संघर्ष किया है वहाँ न सिर्फ़ जीत हासिल की है बल्कि ऐसी तमाम साम्प्रदायिक फ़िरकापरस्त ताक़तों को इतिहास की कचरा पेटी में पहुँचाने का काम भी किया है।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026















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