क़र्ज़ माफ़ी के साथ पूँजीपति हुए मालामाल!
बिगुल संवाददाता
पुणे स्थित आरटीआई कार्यकर्ता विवेक वेलंकर द्वारा दायर आरटीआई आवेदन के जवाब में एक गम्भीर मामला सामने आया है। सरकारी बैंक, बैंक ऑफ़ बड़ौदा (बीओबी) ने वित्त वर्ष 2020-21 से वित्त वर्ष 2025-26 तक छह वित्तीय वर्षों में 100 करोड़ रुपये और उससे अधिक के बकाया ऋण वाले उधारकर्ताओं के 35,715 करोड़ रुपये के ऋण को बट्टे खाते में डाल दिया है, जबकि इन खातों से 28% से कम की यानी 9,946 करोड़ की ही वसूली की गयी।
वित्त वर्ष 2020-21 और वित्त वर्ष 2021-22 में सबसे बड़ा ‘राइट-ऑफ़’ दर्ज किया गया, जब क्रमशः 11,916 करोड़ रुपये और 11,261 करोड़ रुपये तकनीकी रूप से बट्टे खाते में डाले गये। साथ ही चौकानें वाली बात यह है कि बैंक ऑफ बड़ौदा ने आरटीआई अधिनियम के तहत छूट का हवाला देते हुए उन बड़े उधारकर्ताओं के नामों का खुलासा करने से इंकार कर दिया, जिनके ऋण तकनीकी रूप से माफ़ कर दिये गये थे। बैंक ऑफ बड़ौदा ने अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि यह जानकारी व्यक्तिगत प्रकृति की है तथा तीसरे पक्ष की जानकारी से सम्बन्धित है तथा इसके प्रकटीकरण से गोपनीयता का अनुचित उल्लंघन होगा। इसमें आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 8 (1) (जे) का हवाला दिया गया।
यह रकम कितनी बड़ी है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर ये सारे क़र्ज़दार अपना क़र्ज़ा लौटा देते तो शिक्षा-स्वास्थ्य पर ख़र्च राशि का बड़ा हिस्सा इसी से निकल आता। इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। पूँजीपतियों के टुकड़ों पर पलने वाली मीडिया में इस व्यवस्था के पैरोकारों द्वारा हल्ला मचा-मचाकर लोगों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया जाता है कि अर्थव्यवस्था में घाटे के लिए ख़ुद आम लोग ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वे अपने पूरे टैक्स नहीं चुकाते, बिल नहीं भरते, या शिक्षा, अस्पताल, खेती आदि में सरकारी सब्सिडी बहुत अधिक है, आदि-आदि।
देश की ग़रीब जनता कुल टैक्सों का तीन-चौथाई से भी ज़्यादा परोक्ष करों के रूप में देती है। मगर इसका भारी हिस्सा नेताशाही और अफ़सरशाही की ऐय्याशियों पर और धन्नासेठों को तमाम तरह की छूटें और रियायतें देने पर ख़र्च हो जाता है। इतने से भी उनका पेट नहीं भरता तो वे बैंकों से भारी क़र्जे़ लेकर उसे डकार जाते हैं! ग़रीबों के क़र्जे़ वसूल करने के लिए उनकी झोपड़ी तक नीलाम करवा देने वाली सरकार अपने इन माई-बापों से एक पैसा नहीं वसूल पाती और फिर कई साल बाद उन्हें माफ़ कर दिया जाता है। दरअसल इस सारी रकम पर जनता का हक़ होता है। करोड़ों लोगों की छोटी-छोटी बचतों से बैंकों को जो भारी कमाई होती है, उसी में से वे पूँजीपति वर्ग के लिए यह दरियादिली दिखाते हैं!
एक तरफ़ मोदी सरकार दिनदहाड़े हमसे लूटकर अपने आक़ाओं पर खुलेआम माल लुटा रही है; दूसरी तरफ़ हमारी आय भारतीय रुपये की तरह लगातार गिरती जा रही है। आम आबादी की लगातार घटती हुई कमाई का आलम अब यह है कि सबसे ग़रीब 20 प्रतिशत भारतीय परिवारों की सालाना आय पाँच साल में 52 प्रतिशत तक घट गयी है। पिछले दशक में बेरोज़गारी अपने चरम पर है। एक रिपोर्ट के अनुसार अगर आप रु. 25,000 कमाते हैं तो आप भारत के ऊपरी 10 प्रतिशत आबादी में आते हैं! मज़दूरों का 57 प्रतिशत भारत में रु. 10,000 से कम कमाता है और समस्त उजरती श्रमिकों की बात करें तो उनकी औसत आय रु.16,000 है। निश्चित तौर पर, इसमें सबसे कम कमाने वाले मज़दूर वे हैं जो कि अनौपचारिक व असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और कुल मज़दूर आबादी का क़रीब 93 प्रतिशत बनते हैं।
मोदी सरकार के राज में बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से पूँजीपतियों के क़र्ज़ क्यों माफ़ हो रहे हैं? दरअसल, इस पूँजीवादी व्यवस्था का आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। पूँजीपतियों के मुनाफ़े की दर में गिरावट हो रही है। इस संकट के दौर में भी पूँजीपतियों के मुनाफ़ा की दर को बनाये रखा जा सके, इसके लिए सरकार संकट का बोझ आम मेहनतकश जनता पर डाल रही है। एक तरफ़ हमारी मज़दूरी गर्त में धँसती जा रही है और महँगाई आसमान छू रही है और दूसरी तरफ़ पूँजीपतियों के क़र्ज़ों को माफ़ किया जा रहा है।
यह संकट पूँजीपतियों के मुनाफ़े की अन्धी हवस से पैदा होता है लेकिन इसका बोझ मेहनतकश आबादी उठाती है।
अगर हम ये हालात बदलना चाहते हैं, तो इसके लिए हमें लम्बी लड़ाई की तैयारी करनी होगी। साथ ही तात्कालिक मुद्दे जैसे प्रगतिशील कराधान प्रणाली लागू करके धनिक वर्गों पर टैक्स लगाकर महँगाई को कम करने, सार्वभौमिक राशन वितरण प्रणाली लागू करने, रोज़गार अधिकार की गारण्टी हासिल करने जैसे मुद्दों पर इस सरकार को घेरना होगा।
स्पष्ट है कि आमूलगामी क्रान्तिकारी परिवर्तन तभी आ सकता है जब तक कि इस पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़कर फेंका नहीं जाता क्योंकि इस व्यवस्था में सभी सरकारें, और विशेष तौर पर मौजूदा फ़ासीवादी मोदी सरकार, पूँजीपति वर्ग के हितों की रक्षा करने के लिए ही बैठी हैं और यही इनका सर्वोपरि कार्यभार है। पूँजीपतियों की क़र्ज़ माफ़ी, सार्वजनिक उद्यमों का बेचा जाना, श्रम क़ानूनों की व्यवस्था को ख़त्म करना आदि इसी कार्यभार के निर्वाह में उठाये गये क़दम है।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026














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