मुक्तिबोध के स्मृति दिवस (11 सितम्बर) के मौक़े पर
साहित्य में पक्षधरता, विश्वबोध और मानव-मूल्य
गजानन माधव मुक्तिबोध
साहित्य में पक्षधरता का प्रश्न हमेशा से रहा है और रहेगा। पक्षधरता का सम्बन्ध मनुष्य के विश्वबोध और सद्-असद्-विवेक बुद्धि अर्थात् अन्तरात्मा के विवेक से है। हिन्दी में आत्मा की बात की जाती है, विभिन्न सन्दर्भों के अनुसार उसके विभिन्न अर्थ भी हैं। हिन्दी में आभ्यन्तर जगत, अन्तरतम, अन्तर, हृदय आदि का प्रयोग भी है। उन सबका सार-रूप अर्थ है-मनुष्य का अन्तर्मन, या कहिए मनो-जगत्, जिसमें बुद्धि, कल्पना, संवेदना, भावना आदि की प्रक्रियाएँ चलती हैं। किन्तु, अन्तरात्मा एक विशेष अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसका अर्थ है-मनुष्य की कानशैन्स, अर्थात् वह भावनापूर्ण सद्सदविवेक बुद्धि जो मनुष्य को बुरे कामों से रोकती है, और अच्छे कामों की ओर प्रवृत्त करती है।…
संक्षेप में, पक्षधरता के प्रश्न को अन्तरात्मा के प्रश्न से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। (हाँ, जिस प्रकार मिथ्या ज्ञान हो सकता है, उसी प्रकार ग़लत ढंग की अन्तरात्मा या अन-अन्तरात्मा भी हो सकती है।) यदि पक्षधरता है, तो अन्तरात्मा का पक्ष होना चाहिए, अर्थात् मानव मूल्यों की चरम उत्कर्ष स्थिति के रसात्मक बोध का पक्ष होना चाहिए। किन्तु, मनुष्य अपने जीवन में, आत्मरक्षा के लिए, ग़लत ढंग के समझौते कर रखता है। व्यक्ति के प्रति अपनी निष्ठा-स्वार्थ-बुद्धि के कारण-कभी-कभी सर्वोच्च स्थान पा लेती है, न कि न्याय बुद्धि। फिर, इस प्रकार के ग़लत ढंग के समझौतों का घेरा उसकी सहानुभूति-शक्ति, उसकी संवेदनात्मक ज्ञान-शक्ति को धुंधला कर देती है। परिणामतः, उसकी (सत्यस्पर्शी) भावनाएँ, वास्तविक मानव-अस्तित्व पर प्रकाश न डालते हुए, उसकी अपनी व्यक्तिगत मनोवृत्ति, स्थिति के औचित्य के प्रतिपादन करने का एक सैद्धान्तिक प्रयास बन जाती है और उसकी अन्तरात्मा क्षोण बन जाती है।
संक्षेप में, चेतना के स्तर का प्रश्न है। यह नैतिक, बौद्धिक और भावनात्मक स्थितियों के एकीभूत रूप का प्रश्न है। अन्तरात्मा के विकास का प्रश्न है। समाज के पिछड़ेपन में, विभिन्न दिशाओं से प्रवहमान वायु-धाराओं के प्रभावों की उस स्थिति का प्रश्न है, जो व्यक्ति की उसकी अपनी संकुचित निजता की रक्षा करती है।
हिन्दी में इस समय काव्य में अन्तरात्मा अपने पूरे विश्वबोध और समग्रानु-भूति को लेकर हलचल करती हुई-सी, उपस्थित हुई-सी, दिखायी नहीं देती। यह युग डिस्सोसिएशन्स का युग है। मूलतः, सृजन प्रक्रिया में, भाव-कल्पना-बुद्धि का योग होता है। साथ ही वह मानव यथार्थ के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में होता है। यह मानव-यथार्थ एक जीवन तथ्य, एक ऐतिहासिक क्रम के क्षण के रूप में कवि के सम्मुख प्रस्तुत होता है। मनुष्य के सारे व्यक्तित्व की प्रतिक्रिया उसके प्रति होनी चाहिए। और यह प्रश्न मुख्य है कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व की यह प्रतिक्रिया किस दृष्टि से की जाती है, किस पक्ष से की जाती है, किस प्रकार की जाती है।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026














Recent Comments