सर्वहारा वर्ग के महान शिक्षक कार्ल मार्क्स के 208वें जन्मदिवस (5 मई 2026) के अवसर पर
जब तक इंसानों के हाथों इंसानों का शोषण जारी रहेगा, तब तक मार्क्स के क्रान्तिकारी विचार शासक वर्गों को दु:स्वप्न देते रहेंगे

सुजय

1883 में कार्ल मार्क्स की मृत्यु के बाद से लगभग हर साल पूँजीपति वर्ग और उसके भाड़े के टट्टू और कलमघसीट काग़ज़ गन्दे करते हुए ये ऐलान करते हैं कि समाजवाद की मृत्यु हो गयी, कम्युनिज़्म की मृत्यु हो गयी, मार्क्सवाद का अन्त हो गया। लेकिन मार्क्सवाद और कम्युनिज़्म का दु:स्वप्न उन्हें सताना नहीं छोड़ता है। 1991 में संशोधनवादी सोवियत यूनियन के पतन के बाद से मार्क्सवाद और कम्युनिज़्म के अन्त का शोर और भी अधिक कानफाड़ू हो गया था। पूँजीपति वर्ग का एक भाड़े का कलमघसीट फ्रांसिस फुकोयामा यह घोषणा कर रहा था कि ‘इतिहास का अन्त’ हो गया क्योंकि अब इतिहास में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होगा, कम्युनिज़्म की मृत्यु हो गयी है और अब पूँजीवाद अजर और अमर रहेगा। लेकिन उसके इस ऐलान को भी तीन दशक से अधिक का समय बीत चुका है और पूँजीवादी व्यवस्था कोमा में पड़े मरीज़ के समान शैय्या पर पड़ी है। दुनिया में आज भी मज़दूर वर्ग अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है, समाजवाद के लिए लड़ रहा है, मार्क्स और अपने अन्य महान शिक्षकों को याद कर रहा है। अगर मार्क्सवाद की 1991 में ही अन्तिम मृत्यु हो गयी थी, तो उसके बाद बीते 35 वर्षों के दौरान भी हर वर्ष पूँजीपति वर्ग के भाड़े के बुद्धिजीवी और कलमघसीट मार्क्सवाद के विरुद्ध दर्जनों किताबें, लेख आदि क्यों लिखते रहते हैं? उन्हें तो अब शान्ति और सन्तोष के साथ बैठकर आराम फ़रमाना चाहिए! लेकिन मार्क्सवाद के विरुद्ध वे बदस्तूर काग़ज़ काले किये जा रहे हैं! आख़िर उन्हें डर किस बात का है?

यह सच है कि आज मज़दूर वर्ग की ताक़तें बिखराव और हार के एक लम्बे दौर से गुज़र रही हैं। यह सच है कि दुनिया के तमाम देशों में आज कोई देशव्यापी क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी मौजूद नहीं है। यह सच है कि मज़दूर वर्ग के बरसों पहले जीते गये आर्थिक अधिकारों पर दुनिया के तमाम देशों में मौजूद प्रतिक्रियावादी पूँजीवादी सत्ताएँ लगातार हमला कर रही हैं और उन्हें छीन रही हैं, मसलन, आठ घण्टे काम का हक़, जीवनयापन योग्य मज़दूरी का हक़, डबल रेट से ओवरटाइम के भुगतान का हक़, आदि। साथ ही, उनके राजनीतिक अधिकारों पर भी हमला किया जा रहा है, मसलन, हड़ताल करने का हक़, यूनियन बनाने का हक़, आदि। भारत में मोदी सरकार के नये लेबर कोड वास्तव में यही कर रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद मज़दूर वर्ग ग़ुलामों की तरह इन हमलों के सामने नतमस्तक नहीं है। वह पीठ झुका कर ग़ुलामों के समान कोड़े खाने को तैयार नहीं है। दुनिया के हरेक देश में वह इस बुरी हालत में भी प्रतिरोध कर रहा है, लड़ रहा है। हमारे देश में भी पिछले कुछ महीनों में तमाम स्वत:सफूर्त मज़दूर संघर्ष व हड़तालें इसी तथ्य की गवाही दे रही हैं।

दूसरी तरफ़, अन्तिम जीत की तमाम घोषणाओं के बावजूद पूँजीवाद के मौजूदा हालात मार्क्स की भविष्यवाणियों को शब्दश: सही साबित कर रहे हैं। मार्क्स ने बताया था कि पूँजीवादी व्यवस्था नियमित अन्तराल पर असमाधेय आर्थिक संकटों का शिकार होती रहेगी और इससे बचने का उसके पास कोई रास्ता नहीं है। चक्रीय क्रम से आने वाले ये आर्थिक संकट कालान्तर में लम्बे होते जायेंगे, जबकि पूँजीवादी समृद्धि या तेज़ी के दौर छोटे होते जायेंगे। इन लम्बे होते आर्थिक संकटों के चक्र युद्ध, महामारी, पर्यावरणीय विनाश, बरबादी और तबाही को जन्म देंगे क्योंकि संकट के दौर में राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पूँजीपति वर्ग की आपसी प्रतिस्पर्द्धा अधिक से अधिक तीव्र रूप धारण करती जायेगी और मुनाफ़े के बचे-खुचे अवसरों के लिए उनमें मार-काट और कुत्ताघसीटी होगी। तबाही और बरबादी के फलस्वरूप आम मेहनतकश जनता सड़कों पर उतरने और अन्याय के विरुद्ध विद्रोह करने को बाध्य होगी, अपनी जायज़ माँगों और हक़ों को लेकर लड़ेगी, पूँजीवादी व्यवस्था की घिनौनी असलियत को अपने संघर्षों के सकारात्मक और नकारात्मक अनुभवों से समझती जायेगी। मार्क्स ने बताया था कि पूँजीवाद चक्रीय क्रम में आने वाले इन आर्थिक संकटों व मन्दियों से कभी निजात नहीं पा सकता है। क्यों?

इसलिए क्योंकि पूँजीवादी व्यवस्था मुनाफ़े की अन्धी हवस पर आधारित है और पूँजीपति वर्ग अधिक से अधिक मुनाफ़ा हासिल करने के लिए आपस में प्रतिस्पर्द्धा करता रहता है। वह सर्वहारा वर्ग और आम मेहनतकश जनता के विरुद्ध एकजुट हो जाता है, लेकिन आपस में भी पूँजीपतियों के बीच गलाकाटू प्रतिस्पर्द्धा जारी रहती है। इसी को मार्क्स ने पूँजीपति वर्ग का “शत्रुतापूर्ण भाईचारा” कहा था। आपसी प्रतिस्पर्द्धा में पूँजीपति अपनी लागत को कम-से-कम करना चाहता है, ताकि अपने प्रतिद्वन्द्वी पूँजीपतियों को हरा सके, क्योंकि सारी प्रतियोगिता ही अपने माल को अपनी प्रतिस्पर्द्धी से कम क़ीमत पर बेचने की होती है। इस प्रतिस्पर्द्धा में छोटी पूँजी और मँझोली पूँजी पिछड़ती जाती है और या तो बुरी हालत में अपना अस्तित्व बनाये रखने की कोशिश करती रहती है या समाप्त हो जाती है। होता यह है कि छोटी और मँझोली पूँजियों को बड़ी पूँजियाँ निगलती जाती हैं। नतीजा यह होता है कि पूँजी का संघनन और संकेन्द्रण होता है, यानी पूँजी संचय के ज़रिये अधिक कुशल पूँजियों का आकार बढ़ता है और उनके द्वारा छोटी व मँझोली पूँजियों के निगल लिये जाने के कारण पूँजी पहले से कम हाथों में केन्द्रित होती जाती है।

लेकिन यह करने के लिए पूँजीपतियों को लगातार उन्नत से उन्नत मशीनों व तकनोलॉजी को लगाना पड़ता है, जिससे कि मज़दूरों के श्रम की उत्पादकता को बढ़ाया जा सके और प्रति इकाई लागत को कम करके क़ीमत प्रतिस्पर्द्धा में अपने प्रतिद्वन्द्वियों को हराया जा सके। नतीजतन, कुल पूँजी निवेश में जीवित श्रम यानी मज़दूरों को रखने पर ख़र्च होने वाली पूँजी की मात्रा घटती जाती है, जबकि मशीनों व यन्त्रों पर यानी मृत श्रम पर लगने वाली पूँजी की मात्रा बढ़ती जाती है। लेकिन दिक्कत यह है कि नया मूल्य जीवित श्रम द्वारा ही पैदा होता है। मशीनों के उत्पादन में जो नया मूल्य पैदा होता है, वह उसके बिकने के साथ वास्तवीकृत हो चुका होता है और जब वह मशीन किसी अन्य माल के उत्पादन में लगती है, तो वह उतना ही मूल्य अपने ख़र्च होने की प्रक्रिया में मालों में स्थानान्तरित कर सकती है। वह कोई नया मूल्य उत्पादित होने वाले माल में नहीं जोड़ सकती। यह नया मूल्य उस माल के उत्पादन में लगे मज़दूरों के नये जीवित श्रम से ही पैदा होता है। चूँकि पूँजी का बड़ा हिस्सा उत्पादन के साधनों पर लगता जाता है और सापेक्षिक तौर पर छोटा हिस्सा जीवित श्रम पर ख़र्च होता है, इसलिए माल के मूल्य का बड़ा हिस्सा उत्पादन के साधनों द्वारा स्थानान्तरित मूल्य से निर्मित होता है, जो बढ़ता नहीं है यानी कोई नया मूल्य नहीं पैदा करता है, बल्कि ज्यों का त्यों उत्पाद के मूल्य में स्थानान्तरित होता है। माल के मूल्य में नये मूल्य का हिस्सा सापेक्षिक तौर पर कम होता जाता है। अब चूँकि यह नये जीवित श्रम द्वारा पैदा हुआ नया मूल्य ही मज़दूरी और मुनाफ़े के रूप में मज़दूर वर्ग और पूँजीपति वर्ग में विभाजित होता है, इसलिए अगर यह कल्पना भी कर ली जाय कि मज़दूरों की मज़दूरी शून्य हो जाये, तो भी मुनाफ़े की औसत दर लम्बी दूरी में गिरती है।

मुनाफ़े की औसत दर में गिरने की यह दीर्घकालिक प्रवृत्ति ही बार-बार आने वाले और लगातार लम्बे होते आर्थिक संकटों का कारण होते हैं। मुनाफ़े की गिरती दर का नतीजा यह होता है कि मुनाफ़े के बचे-खुचे अवसरों के लिए पूँजीपतियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा तीव्रतर होती जाती है। यह राष्ट्रीय स्तर पर होता है और साथ ही अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय पैमाने पर संगठित अलग-अलग देशों के पूँजीपति वर्ग के बीच भी होता है। यही परिघटना सामरिक युद्धों, मुद्रा-युद्धों व व्यापार-युद्धों को जन्म देती है, जैसा कि आज की दुनिया में देखा जा सकता है। साथ ही, यह पर्यावरणीय विनाश और जनता की साझी सम्पत्ति यानी जल, जंगल, ज़मीन के निजीकरण और जनता के विस्थापन की ओर भी जाती है। इसके अलावा, बड़े पैमाने पर मन्दी के दौरान छँटनी और तालाबन्दी भी होती है, मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरी को घटाया जाता है, उनका ठेकाकरण कर उन्हें अनौपचारिक क्षेत्र में धकेला जाता है, ताकि उनके सभी श्रम अधिकारों से उन्हें वंचित किया जा सके और उनके मोलभाव की ताक़त को कम किया जा सके। इन सबके ज़रिये पूँजी का अवमूल्यन होता है, उत्पादक शक्तियों का विनाश होता है, और मज़दूरी घटाकर मुनाफ़े की औसत दर को बढ़ाने का प्रयास होता है। इस विनाश के ज़रिये ही पूँजीवाद मुनाफ़े की औसत दर को फिर से बेहतर स्तर पर पुनर्स्थापित कर पाता है।

लेकिन जब भी ऐसा होता है, यानी जब ये युद्ध, पर्यावरणीय विनाश, मज़दूरी में कमी, अनौपचारिकीकरण, निजीकरण आदि होता है, तो इसका विनाशकारी प्रभाव व्यापक मेहनतकश जनता, यानी मज़दूरों, अर्द्धमज़दूरों, छोटे साधारण माल उत्पादकों, कर्मचारियों, छात्रों-युवाओं के जीवन पर पड़ता है। उनका जीवन-स्तर नीचे गिरता है, औसत आय कम होती जाती है, वे बेरोज़गारी और महँगाई का भयंकर प्रकोप झेलते हैं, कार्यस्थितियाँ ख़राब होती जाती हैं, काम के घण्टे बढ़ते जाते हैं। दुनिया भर में मज़दूर-मेहनतकश हमेशा ही इसका प्रतिरोध करते हैं, सड़कों पर उतरते हैं, अपने वाजिब हक़ माँगते हैं, अपने लिए एक इंसानी ज़िन्दगी का हक़ माँगते हैं। अगर ये बिखरे हुए संघर्ष एक सही राजनीतिक लाइन और संगठन का नेतृत्व पाते हैं, आपस में जुड़ते हैं, अपने साझा दुश्मन यानी पूँजीवाद और पूँजीपति वर्ग को पहचानते हैं, समाजवादी कार्यक्रम को स्वीकारते हैं, समाजवाद के लक्ष्य और विकल्प को स्वीकारते हैं, तो ये एक आम क्रान्तिकारी जनान्दोलन में तब्दील हो सकते हैं।

यानी पूँजीवादी संकट एक दोहरी सम्भावना को जन्म देते हैं: पूँजीवाद से बेहतर एक न्यायपूर्ण और समानतामूलक व्यवस्था की स्थापना यानी समाजवाद की स्थापना या फिर पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा विनाश का उत्तरोत्तर बर्बरता, यानी प्रतिक्रियावाद, तानाशाही, युद्ध और तबाही, की ओर जाना। एक क्रान्तिकारी वैज्ञानिक के तौर पर इन दोनों सम्भावित नतीजों की पहचान ज़रूरी है। लेकिन हमारा क्रान्तिकारी आशावाद हमें यह भी बताता है कि प्रबल सम्भावना यह है कि ऐसी बर्बरता की मंज़िल पूर्ण हो, इससे पहले दुनिया भर की मेहनतकश जनता उठ खड़ी होगी और समाज को एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की ओर ले जायेगी, वह पूँजीवाद को दुनिया को तबाह नहीं करने देगी।

यह है मार्क्स की युगान्तरकारी वैज्ञानिक शिक्षा, जिसे इतिहास बार-बार सही साबित करता आया है और आज भी सही साबित कर रहा है। दुनिया के इतिहास में पहले भी ऐसे दौर आये हैं जब क्रान्तियों की पराजय के बाद हार और विपर्यय (क़दम पीछे हटाने और पलटी खाने) के दीर्घकालिक लम्बे दौर चले हैं। केवल वे लोग इन दौरों के आने पर निराशावाद के शिकार हो जाते हैं, जिनके पास कोई ऐतिहासिक दृष्टि नहीं होती। पूँजीवाद को सामन्तवाद पर विजय पाने के पहले कई क्रान्तियों की हार, पराजय और विपर्यय से गुज़रना पड़ा था और इस प्रक्रिया में ही करीब चार शताब्दियाँ लगी थीं। सर्वहारा वर्ग और उसकी क्रान्ति के विज्ञान के पैदा हुए तो अभी मुश्किल से दो शताब्दियाँ भी नहीं बीती हैं। और इस छोटे-से दौर में ही उसने सोवियत यूनियन और चीन में कुछ दशकों तक जीवित रहे समाजवादी प्रयोगों में ही दिखला दिया कि एक पूँजीवादी व्यवस्था और दुनिया से बेहतर व्यवस्था और दुनिया सम्भव है। निश्चित तौर पर, कुछ गम्भीर ग़लतियों के कारण ये समाजवादी प्रयोग अन्तत: गिर गये, लेकिन पूँजीवादी क्रान्तियों के पहले प्रयोग भी असफल ही हुए थे। साथ ही, यह भी याद रखना चाहिए कि ये एक नये उदीयमान क्रान्तिकारी वर्ग यानी सर्वहारा वर्ग के पहले प्रयोग थे। उनके पास सीखने के लिए असफलताओं का कोई लम्बा इतिहास या मिसाल नहीं थी। आज सर्वहारा वर्ग अपने अतीत के प्रयोगों से सीख सकता है और उसे सीखना ही होगा। उसकी हिरावल शक्तियों को विश्व पूँजीवादी व्यवस्था में आये तमाम बदलावों को भी समझना होगा, चाहे वे आर्थिक हों, राजनीतिक हों या सामाजिक, क्योंकि दुनिया आज 1917 (रूसी क्रान्ति) या 1949 (चीनी क्रान्ति) के ही दौर में नहीं खड़ी है, बल्कि उससे बहुत आगे आ चुकी है।

अपने अतीत के प्रयोगों का समाहार करके और पिछले क़रीब आठ दशकों में पूँजीवादी व्यवस्था के काम करने के तौर-तरीक़ों में आये बदलावों को समझकर ही सर्वहारा वर्ग समाजवाद के नये और टिकाऊ संस्करण रच सकता है। उसे मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के नाम पर जो “वामपंथी” दुस्साहसवाद और आतंकवाद की लाइन पेश की जा रही है, उसे सिरे से नकारना होगा क्योंकि उसका मार्क्सवाद के विज्ञान से कोई लेना-देना ही नहीं है। साथ ही उसे संशोधनवाद और सामाजिक-जनवाद को भी नकारना होगा, जो जनता के संघर्षों को केवल सुधारवाद और अर्थवाद के दलदल में ही ले जा सकता है। सर्वहारा वर्ग और उसकी अगुवा ताक़तों को क्रान्तिकारी जनदिशा की लाइन को अपनाना होगा और व्यापक जनता को उसकी आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक माँगों पर जागृत, गोलबन्द और संगठित करना होगा।

आज पूँजीवादी विश्व एक दीर्घकालिक मन्दी के भँवर में फँसा हुआ है। यह संकटग्रस्त, मरणासन्न और परजीवी व्यवस्था आज दुनिया की जनता को तबाही, बरबादी, ग़रीबी, बदहाली, भुखमरी, कुपोषण, युद्ध, पर्यावरणीय तबाही और सांस्कृतिक घटाटोप की पतनशीलता के अलावा कुछ नहीं दे सकती है। यह सच्चाई नंगी आँखों से देखी जा सकती है। जनता के विभिन्न हिस्से अपनी-अपनी विशिष्ट माँगों को लेकर इसके विरुद्ध आवाज़ भी उठा रहे हैं। लेकिन इन बिखरे हुए संघर्षों के बूते कोई व्यवस्थागत परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। इन बिखरे हुए संघर्षों को एक लड़ी में पिरोने के लिए आज एक क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी की आवश्यकता है, जो जनता के तमाम वर्गों और हिस्सों को क्रान्तिकारी जनदिशा के आधार पर एक व्यावहारिक और यथार्थवादी समाजवादी कार्यक्रम पर एकजुट, जागृत, गोलबन्द और संगठित करे।

आज दुनिया भर में क्रान्तिकारी आन्दोलनों की सबसे बड़ी समस्या और संकट है ऐसी क्रान्तिकारी पार्टी का अभाव। हमें एक ऐसी क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी के निर्माण और गठन की ओर आगे बढ़ना होगा। मार्क्स के 208वें जन्मदिवस पर सर्वहारा वर्ग के इस महान शिक्षक को सबसे बड़ी आदरांजलि और इंक़लाबी सलाम यही होगा कि हम उनके द्वारा प्रस्तुत वैज्ञानिक दर्शन और क्रान्तिकारी विज्ञान को समझें और आत्मसात करें, क्रान्तियों के इतिहास का अध्ययन करें, अपने जुझारू पूँजीवादविरोधी जनान्दोलनों को खड़ा करें, जनता के समस्त वर्गों हिस्सों के साथ एकजुट हों जैसे कि आम मध्यवर्ग, ग़रीब निम्नमँझोला किसान वर्ग अर्द्धसर्वहारा वर्ग और उन सभी के वर्ग हितों के आधार पर उन्हें एक नया समाजवादी कार्यक्रम दें। यही मज़दूर वर्ग के उन्नत अगुवा तत्वों का कार्यभार है। अगर हम इसे पूरा नहीं करते तो हमसे यह ग़लती हो जायेगी कि हम समाजवाद की घड़ी को बीत जाने देंगे और फिर फ़ासीवाद और प्रतिक्रिया का दण्ड झेलने को अभिशप्त होंगे।

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026