मज़दूर दिवस का संकल्प: लड़कर लेंगे सारे हक़! नोएडा और मानेसर में सभी गिरफ्तार मज़दूरों एवं उनके नेताओं व कार्यकर्ताओं को अविलम्ब बिना शर्त रिहा किया जाये!

बिगुल संवाददाता

1 मई, मज़दूर दिवस के संकल्प को लेकर हरियाणा के कलायत ब्लॉक में मज़दूर-कर्मचारी संगठनों द्वारा साझा कार्यक्रम आयोजित किया गया। मज़दूर दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में मज़दूर आन्दोलन की चुनौतियों और प्रतिरोध पर एक हॉल मीटिंग की गयी। कार्यक्रम में सर्व कर्मचारी संघ, क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन, आँगनवाड़ी, आशा और मिड-डे मील यूनियनों ने भागीदारी की। क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन के साथी अजय ने बताया कि 1 मई मेहनतकश वर्ग का संकल्प दिवस है। इसी दिन शिकागो शहर के शहीद मज़दूरों ने “8 घण्टे काम, 8 घण्टे आराम और 8 घण्टे मनोरंजन” का नारा बुलन्द किया था। इसलिए मई दिवस के शहीदों को याद करने का मक़सद मेहनतकश आबादी के हक़-अधिकारों की लड़ाई को तेज़ और संगठित करना है।

हम देख रहे हैं कि 2026 में मज़दूर आन्दोलन में एक नया उभार दिखाई दे रहा है। नोएडा, गुरुग्राम और मानेसर सहित देश के कई औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूर अपनी नारकीय परिस्थितियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं। बढ़ती महँगाई, घटते वेतन और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों ने उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। यह उभार मज़दूर वर्ग की बढ़ती चेतना का संकेत है। चार लेबर कोड जैसे मज़दूर-विरोधी क़ानूनों के बीच 8-10 हज़ार रुपये में 12-16 घण्टे काम करने वाले मज़दूर आज भारी संकट में हैं। एलपीजी और आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती क़ीमतों ने उनकी ज़िंदगी को और कठिन बना दिया है।

ऐसे हालात में जब मज़दूर अपने हक़ के लिए खड़े होते हैं, तब सत्ता और पूँजीपति वर्ग का असली चेहरा सामने आता है। नोएडा और मानेसर में मज़दूरों की जायज़ माँगों के समर्थन में खड़े छात्रों, नौजवानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को भी दमन का सामना करना पड़ रहा है। अब तक आये सबूतों के आधार पर कहा जा सकता है कि जनबुद्धिजीवी, वरिष्ठ पत्रकार, अनुवादक व लेखक सत्यम वर्मा, श्रम अधिकार कार्यकर्ता आदित्य आनन्द व रूपेश राय, छात्र कार्यकर्ता हिमांशु, सृष्टि, आकृति और मज़दूर साथी मनीषा को नोएडा मज़दूर आन्दोलन में फ़र्ज़ी मुक़दमे लगाकर फँसाया जा रहा है। साथ ही, यूपी पुलिस की तानाशाही का आलम यह है कि 1100 मज़दूरों को भी बिना कोर्ट में पेश किए जेलों में भर दिया गया। वहीं मानेसर क्षेत्र में भी इंक़लाबी मज़दूर केंद्र के 6 मज़दूर कार्यकर्ताओं को झूठे मुक़दमों के तहत जेल में डाल दिया गया। मानेसर में भी एफआईआर में बाद में आदित्य आनन्द का नाम डाल दिया गया है। यह दमनकारी रवैया साफ़ दिखाता है कि सत्ता मज़दूरों की आवाज़ दबाना चाहती है। इस सभा से भी सभी वक्ताओं ने मज़दूरों की रिहाई और फ़र्ज़ी मुक़दमे रद्द करने की माँग उठायी गयी। मज़दूरों के समर्थन में बिगुल मज़दूर दस्ता के सुनील ने कहा कि भगतसिंह और उनके साथियों का सपना था मेहनतकश आबादी का राज। यानी, जो मज़दूर सुई से लेकर जहाज़ तक का निर्माण करते हैं — फैक्ट्रियों, कारखानों, रेलवे, बसों और अनाज जैसी तमाम चीज़ों का उत्पादन करते हैं — आज वही लोग ज़िन्दगी की बुनियादी पूर्वशर्तों से वंचित हैं। मेहनतकश वर्ग समाज की रीढ़ है, फिर भी वही सबसे अधिक शोषण का शिकार है। इसलिए मई दिवस हमें याद दिलाता है कि इस अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष को और तेज़ करना होगा।

सभा के बाद मज़दूरों ने रैली निकालते हुए नगरपालिका में हड़ताल पर बैठे मज़दूरों का समर्थन किया। हड़ताल स्थल पर मज़दूरों को सम्बोधित करते हुए कहा गया कि आज ज़रूरत इस बात की है कि मज़दूर डर और दमन के सामने झुकें नहीं, बल्कि और मज़बूती से एकजुट हों। यह लड़ाई केवल वेतन बढ़ोत्तरी की नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन और शोषण के ख़िलाफ़ एक व्यापक संघर्ष है। मई दिवस के शहीदों की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए आज ज़रूरी है कि पूरे देश के मज़दूरों और मेहनतकश किसानों को साथ लिया जाए और उनकी एकता को मज़बूत किया जाए। आज हम सभी इंसाफ़पसंद और मेहनतकश लोगों को अपने हक़-अधिकार की लड़ाई के लिए खड़ा होना होगा, क्योंकि वर्तमान सरकार चार लेबर कोड जैसे क़ानूनों के ज़रिये स्थायी मज़दूरों के अधिकारों को भी कमज़ोर करने की तैयारी कर रही है।

साथ ही, गांवों में मनरेगा को लगभग ख़त्म करके 100 दिनों के रोज़गार पर भी असर डाला जा रहा है। मज़दूर आन्दोलन का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब मज़दूरों ने अपनी जुझारू एकजुटता कायम की है, तब-तब सरकार और प्रशासन को झुकना पड़ा है। इसलिए मज़दूर आन्दोलन के इस उभार को मज़दूर मुक्ति के व्यापक संघर्ष में बदलना हमारी ज़िम्मेदारी है।

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026