क्यों लगातार गिर रहा है भारतीय रुपया?
अभिनव
भारतीय रुपया मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान अपने निम्नतम स्तर पर पहुँच चुका है। इस समय भारतीय रुपया एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा है। मोदी जी ने प्रधानमन्त्री बनने से पहले (और प्रधानमन्त्री बनने के लिए!) यह बयान दिया था कि किसी देश की मुद्रा का गिरना उस देश की अर्थव्यवस्था और उसकी प्रतिष्ठा का गिरना है। मतलब, एक बार उन्होंने सच बोला था! लेकिन अब मोदी सरकार के मन्त्री (क्योंकि ख़ुद मोदी जी किसी ठोस प्रश्न पर कुछ बोलते ही नहीं हैं) कह रहे हैं कि “रुपया अपना स्तर ख़ुद ढूँढ लेगा, चिन्तित होने की कोई बात नहीं है!” सही बात है! देश के अमीरज़ादों और धन्नासेठों के लिए निश्चित ही कोई चिन्तित होने की बात नहीं है। लेकिन देश के ग़रीबों को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ रही है और आगे इससे भी भयंकर क़ीमत चुकानी पड़ेगी।
लेकिन भारतीय रुपया गिर क्यों रहा है? ज़ाहिर है कि इसके लिए गुरुत्वाकर्षण की शक्ति तो ज़िम्मेदार नहीं है! हम मज़दूरों-मेहनतकशों को भी समझना चाहिए कि हमारे देश की मुद्रा के इस अभूतपूर्व अवमूल्यन के कारण क्या हैं। यह लेख लिखे जाने तक भारतीय रुपया अपने ऐतिहासिक निम्न स्तर पर पहुँच चुका था : 1 अमेरिकी डॉलर में 96 रुपये। मई 2025 में 1 अमेरिकी डॉलर 85 रुपये के बराबर था और साल भर के भीतर ही यह 96 रुपये के क़रीब पहुँच गया है और कई अर्थशास्त्री अभी से ही इस बात का कयास लगा रहे हैं कि भविष्य में यह 100 के निशान को भी पार कर जायेगा। इस भारी गिरावट की वजह क्या है? हम बुनियादी सरल बातों को समझते हुए इन वजहों को समझेंगे।
अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा विनिमय–दर क्या है?
अन्तरराष्ट्रीय विनिमय-दर यह बताती है कि अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में किसी राष्ट्रीय मुद्रा की क्या “क़ीमत” है। सटीक वैज्ञानिक अर्थों में कहा जाय तो मुद्रा की कोई क़ीमत नहीं होती, बल्कि मुद्रा ही वह इकाई व माध्यम है जिसमें क़ीमत को अभिव्यक्त किया जाता है। दूसरे शब्दों में, मुद्रा की क़ीमत की बात करना वैसा ही है जैसा कि यह कहना कि “1 किलोग्राम का वज़न 1 किलोग्राम है।” यानी, एक मूर्खतापूर्ण दुहराव। लेकिन बुर्जुआ अर्थशास्त्री इसी प्रकार के गोल चक्करों में फँसे होते हैं।
तो फिर विनिमय दर का अर्थ क्या हुआ? यह किसी भी देश की राष्ट्रीय मुद्रा की अन्य राष्ट्रीय मुद्राओं की तुलना में सापेक्षिक मूल्य को प्रदर्शित करता है। मुद्राएँ हमेशा राष्ट्रीय वर्दियाँ पहने होती हैं, जैसा कि मार्क्स ने बताया था। यानी अलग-अलग देशों की अलग-अलग मुद्राएँ होती हैं, उनके नाम, उनके चिह्न अलग-अलग होते हैं, उनकी पोशाक अलग-अलग होती हैं। जब एक राष्ट्रीय मुद्रा को दूसरी राष्ट्रीय मुद्रा में परिवर्तित किया जाता है, तो उनके सापेक्षिक मूल्य के अनुसार ही उनके विनिमय की दर तय होती है।
यह भी याद रखना चाहिए कि मौजूदा दौर पूर्ण रूप से स्वर्ण–असमर्थित काग़ज़ी मुद्रा का है। एक दौर था जब सोने और चाँदी की मुद्राएँ चलती थीं। उसके बाद, सोने और चाँदी की मुद्राओं की प्रतिनिधि धातु मुद्राओं जैसे तांबा, काँसा आदि की मुद्राओं का दौर आया जो सोने/चाँदी की मुद्रा की निश्चित मात्राओं की नुमाइन्दगी करती थीं। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि धात्विक मुद्राओं का संचरण ही उन्हें घिस डालता है और वास्तव में ये धात्विक मुद्राएँ कालान्तर में उक्त धातु (मसलन सोना या चाँदी) की उतनी मात्रा की नहीं रह जाती हैं, जितनी वे मूलत: थीं। जैसे कि अगर सोने का कोई सिक्का 20 ग्राम का था, तो 2 वर्ष परिचलन में रहने के बाद वह महज़ 17 ग्राम का रह जाता है क्योंकि उसकी घिसाई हो जाती है। लेकिन बाज़ार में अभी भी वह 20 ग्राम सोने के मूल्य की ही नुमाइन्दगी करता है। इस प्रकार यह घिसा हुआ सिक्का अब 20 ग्राम सोने का प्रतिनिधि बन जाता है, वह उसका प्रतीक बन जाता है। इसी वजह से कालान्तर में सोने व चाँदी के सिक्कों के साथ या उनकी जगह सस्ती धातुओं के सिक्के परिचलन में आ गये। सस्ती धातु का हर सिक्का सोने या चाँदी की एक निश्चित मात्रा का प्रतीक मात्र होता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि पूरा समाज इसे सोने के प्रतीक के तौर स्वीकार करे, इसके लिए इस सिक्के को राज्यसत्ता से वैधीकरण मिलना चाहिए, यानी उसकी मुहर इस पर लगी होनी चाहिए।
बहरहाल, इसी बुनियादी तर्क के कारण सस्ती धातुओं के सिक्कों के बाद ऐसी काग़ज़ी मुद्राओं का दौर आया जो सोने/चाँदी की मुद्रा की निश्चित मात्राओं की नुमाइन्दगी करती थीं, लेकिन शुरुआत में इन काग़ज़ी मुद्राओं को राज्य के केन्द्रीय बैंक की खिड़कियों पर सोने/चाँदी की मुद्रा में तब्दील किया जा सकता था। ये स्वर्ण–समर्थित सोने में परिवर्तनीय काग़ज़ी मुद्रा थी, जो सोने में आधिकारिक तौर पर सरकारी बैंक की खिड़की पर परिवर्तनीय थी। इसके बाद ऐसी काग़ज़ी मुद्रा का दौर आया जिसका मूल्य स्वर्ण-मुद्रा द्वारा ही निर्धारित होता था, लेकिन वह आधिकारिक तौर पर सरकारी बैंक की खिड़कियों पर सोने/चाँदी में परिवर्तनीय नहीं थी। यह स्वर्ण–समर्थित आधिकारिक तौर पर सोने में अपरिवर्तनीय काग़ज़ी मुद्रा थी।
अन्तत:, 1930 के दशक से एक प्रक्रिया शुरू हुई जो 1970 के दशक में मक़ाम पर पहुँची, जिसमें एक काग़ज़ी मुद्रा अस्तित्व में आयी जो आधिकारिक तौर पर स्वर्ण-समर्थित भी नहीं थी, यानी, जिसका मूल्य सोने या किसी मुद्रा-माल (ऐसा माल जो मुद्रा की भूमिका सार्वभौमिक तौर पर अदा करता हो) द्वारा निर्धारित नहीं होती थी। इसे शुद्ध रूप से फ़ियेट मुद्रा कहा जाता है, जो औपचारिक और आधिकारिक तौर पर किसी एक मुद्रा–माल द्वारा समर्थित नहीं है। पूँजीवादी माल उत्पादन के विकास के साथ मुद्रा के मामले धात्विक बैरियर को एक न एक दिन टूटना ही था। मार्क्स का मुद्रा का सिद्धान्त ही इस परिघटना को समझने के बुनियादी उपकरण दे देता है। अब इस पूर्ण रूप से स्वर्ण-असमर्थित काग़ज़ी मुद्रा का मूल्य कैसे निर्धारित होता है? इस पर हम ‘मज़दूर बिगुल’ की क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षण-माला में लिख चुके हैं, इसलिए यहाँ हम बस इशारा करने तक अपने आपको सीमित रखेंगे और दिलचस्पी रखने वाले पाठकों से शिक्षण-माला की प्रासंगिक किश्त (https://mazdoorbigul.net/archives/15997 – ‘स्वर्ण असमर्थित काग़ज़ी मुद्रा (फ़ियेट मुद्रा) के विशिष्ट मार्क्सवादी नियम’, जून 2023, मज़दूर बिगुल) का अध्ययन करने का आग्रह करेंगे। आज इस पूर्ण रूप से काग़ज़ी मुद्रा का मूल्य देश में कुल मालों (वस्तुओं और सेवाओं) के मूल्य से और पूँजी निवेश हेतु मुद्रा-पूँजी की माँग के स्तर से निर्धारित होती है, जो माँग स्वयं किसी अर्थव्यवस्था में मुनाफ़े की औसत दर से निर्धारित होती है। यदि इस काग़ज़ी मुद्रा को कुल माल उत्पादन के मूल्य और मुद्रा-पूँजी की माँग की तुलना में ज़्यादा छापा जाता है, तो देश में उसका मूल्य गिरेगा और महँगाई बढ़ेगी।
लेकिन ऐसा बिल्कुल मुमकिन है कि देश के भीतर काग़ज़ी मुद्रा के अधिक छापे जाने या न छापे जाने से बिल्कुल स्वतन्त्र अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में किसी देश की मुद्रा का अन्य देशों की मुद्राओं की तुलना में अवमूल्यन हो, या कुछ देशों की मुद्राओं की तुलना में उनका अवमूल्यन हो। इसलिए अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा विनिमय-दरें शुद्ध रूप से देश के भीतर किसी मुद्रा के अन्य मालों की तुलना में अवमूल्यन या उनके मूल्य के बढ़ने से तय नहीं होती हैं। फिर उन्हें तय करने वाले कारक क्या होते हैं?
इसको इस प्रकार से समझें। अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में जब किसी मुद्रा की माँग अन्य मुद्रा/मुद्राओं के सापेक्ष बढ़ती है, तो उस मुद्रा या उन मुद्राओं के सापेक्ष इस मुद्रा का मूल्य बढ़ता है। इसके उलट, अगर अन्य मुद्रा/मुद्राओं के सापेक्ष इस मुद्रा की माँग घटती है, तो उस मुद्रा या उन मुद्राओं के सापेक्ष इस मुद्रा का मूल्य घटता है। यानी, अगर डॉलर को रुपये में परिवर्तित करने की जितनी माँग है, उसके मुक़ाबले रुपये को डॉलर में परिवर्तित करने की माँग ज़्यादा है, तो रुपये का मूल्य डॉलर की तुलना में गिरेगा और अगर इसका उल्टा है तो रुपये का मूल्य डॉलर की तुलना में बढ़ेगा। लेकिन किसी भी मुद्रा की तुलना में रुपये की माँग में बढ़ोत्तरी या कमी होने के पीछे क्या कारक काम करते हैं?
किसी मुद्रा की विनिमय–दर को प्रभावित करने वाले बुनियादी कारक क्या हैं?
सबसे पहला और बुनियादी कारक है व्यापार–सन्तुलन। अगर भारत देश किसी अन्य देश या देशों को निर्यात कम करता है और उससे या उनसे आयात ज़्यादा करता है, तो उन देशों के साथ उसका नकारात्मक व्यापार-सन्तुलन होगा, या उन देशों के सापेक्ष भारत व्यापार-घाटा झेल रहा होगा। ऐसा होने पर रुपये की माँग उस देश या उन देशों की मुद्रा की तुलना में घटेगी। अगर भारत इन देशों को निर्यात ज़्यादा करता है और उनसे आयात कम करता है, तो इसका उलट होगा। यानी उन देशों के सापेक्ष भारत का व्यापार-सन्तुलन सकारात्मक होगा और उन देशों का भारत के सापेक्ष व्यापार-घाटा होगा। ऐसा होने पर उन देशों की मुद्राओं (या जिस मुद्रा या जिन मुद्राओं में वे अन्तरराष्ट्रीय व्यापार करते हैं) की तुलना में रुपये की माँग बढ़ेगी और उसका मूल्य भी इन मुद्राओं की तुलना में बढ़ेगा।
अन्तरराष्ट्रीय व्यापार में इस समय अधिकांश देश जिस मुद्रा का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, वह है अमेरिकी डॉलर, हालाँकि यह रुझान पिछले दो-तीन दशकों से घट रहा है। लेकिन अभी भी जिस मुद्रा में अन्तरराष्ट्रीय व्यापार सबसे ज़्यादा होता है, वह डॉलर ही है। इस वजह से अन्य देश भी अपने विदेशी मुद्रा भण्डार में पर्याप्त मात्रा में डॉलर चाहते हैं और प्रभावत: वे अमेरिका से डॉलर अपनी वस्तुओं और सेवाओं के बदले ख़रीदते हैं क्योंकि अन्य देशों से व्यापार में भी उन्हें अक्सर ही डॉलर की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन डॉलर की यह बिना किसी चुनौती वाली वर्चस्वकारी स्थिति नहीं रह गयी है, हालाँकि अभी भी विश्व व्यापार में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल की जाने वाली मुद्रा डॉलर ही है। बहरहाल, ऐसे में, अगर भारत का कुल माल निर्यात उसके कुल माल आयात से कम होगा, तो रुपये का मूल्य डॉलर के मूल्य की तुलना में गिरेगा। इसे करेण्ट एकाउण्ट डेफिसिट कहा जाता है। यानी, आयात-निर्यात का भारत वर्तमान सन्तुलन नकारात्मक में है।
जब किसी देश का व्यापार सन्तुलन नकारात्मक में होता है, यानी उसे व्यापार घाटा हो रहा होता है, तो इसका उस देश की मुद्रा के लिए क्या निहितार्थ होता है? एक उदाहरण से समझते हैं। जब कोई निर्यातक पूँजीपति हमारे देश में मज़दूरों का शोषण कर जिस माल का उत्पादन करता है, उसे विदेशी बाज़ार में बेचता है, तो उसे डॉलर, यूरो, आदि मुद्राओं में भुगतान प्राप्त होता है जिसे वह हमारे देश में रुपयों में परिवर्तित करता है। यानी भारतीय रुपये की माँग बढ़ती है। नतीजतन, डॉलर/यूरो आदि के सापेक्ष भारतीय रुपये का मूल्य भी बढ़ता है और उसकी विनिमय-दर बढ़ती है। उसके विपरीत, जब निर्यात के सापेक्ष भारत के आयात बढ़ते हैं, तो रुपयों को अन्य मुद्राओं, मसलन, डॉलर, यूरो आदि में परिवर्तित करने की माँग बढ़ती है। यानी, रुपयों के सापेक्ष इन अन्य विदेशी मुद्राओं की माँग और मूल्य बढ़ता है।
संक्षेप में, अगर भारत के आयात भारत के निर्यात से ज़्यादा हैं, तो इसे बाक़ी दुनिया को विदेशी मुद्राओं में जो भुगतान करना होता है, वह विदेशी मुद्राओं में उसे प्राप्त होने वाले भुगतान की मात्रा से ज़्यादा होता है और नतीजतन भारतीय मुद्रा अन्य प्रमुख विदेशी मुद्राओं के तुलना में अवमूल्यन का शिकार होती है। अगर भारत के निर्यात उसके आयात से ज़्यादा होते, तो उसे बाक़ी दुनिया को विदेशी मुद्राओं में जितना भुगतान करना होता उससे ज़्यादा भुगतान विदेशी मुद्राओं में उसे प्राप्त होते। पहले मामले में अन्य विदेशी मुद्राओं में रुपयों को परिवर्तित करने की माँग अन्य विदेशी मुद्राओं को रुपयों में परिवर्तित करने की माँग से ज़्यादा होगी और दूसरे मामले में अन्य विदेशी मुद्राओं में रुपयों को परिवर्तित करने की माँग अन्य विदेशी मुद्राओं को रुपयों में परिवर्तित करने की माँग से कम होगी। पहली स्थिति में रुपये की माँग सापेक्षिक रूप से घटने के कारण वह अन्य विदेशी मुद्राओं की तुलना में अवमूल्यित होगा और दूसरी स्थिति में रुपये की माँग सापेक्षिक रूप से बढ़ने के कारण वह अन्य विदेशी मुद्राओं की तुलना में मज़बूत होगा, यानी उसका सापेक्षिक मूल्य बढ़ेगा।
भारत द्वारा लगातार लम्बे समय से झेला जाने वाला और बढ़ रहा करेण्ट अकाउण्ट घाटा वास्तव में भारतीय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की कमज़ोरी को दिखलाता है। अन्य कारकों की पुष्टि की स्थिति में (जिन पर हम आगे आयेंगे) यह दिखलाता है कि उत्पादक उद्यमों में पर्याप्त निवेश नहीं हो रहा है। पर्याप्त निवेश न होने की वजह क्या है? इसकी वजह यह है कि देश में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की मुनाफ़े की औसत दर कम है। यह सच है कि अकेले व्यापार-घाटा ही मुनाफ़े की औसत दर के संकट को नहीं सिद्ध करता है। बहुत-से ऐसे पूँजीवादी देश हैं, जो व्यापार-घाटा झेल रहे होते हैं लेकिन उसके बावजूद उनकी अर्थव्यवस्था उस क्षण लाभप्रदता के संकट से नहीं गुज़र रही होती है। दूसरे शब्दों में, अकेले व्यापार-घाटा ही मुनाफ़े की दर के संकट को नहीं प्रदर्शित करता है। व्यापार-घाटा किसी देश की विश्व पूँजीवादी व्यवस्था में विशिष्ट अवस्थिति के कारण भी हो सकता है। लेकिन यह उस अर्थव्यवस्था में मुनाफ़े की औसत दर के गिरने के संकट की एक सम्भव अभिव्यक्ति भी हो सकता है।
भारत लम्बे समय से व्यापार घाटा झेलता आया है, यानी ठोस मालों का उसका आयात ठोस मालों के उसके निर्यात से लम्बे समय से कम रहा है। नतीजतन, उसे करेण्ट अकाउण्ट डेफ़िसिट झेलना पड़ता है। इसे एक हद तक प्रति-सन्तुलित करने का काम भारत द्वारा सेवाओं, विशेषकर सॉफ़्टवेयर के निर्यात, और दूसरा, विदेशों में जाकर काम करने वाले भारतीय श्रमिकों और कर्मचारियों द्वारा घर वापस भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा द्वारा होता है, जिसे भारत में रुपयों में तब्दील किया जाता है और जो भारतीय रुपयों की माँग बढ़ाता है और उसका सापेक्षिक मूल्य भी कुछ बढ़ता है। लेकिन इसी से भारत का करेण्ट अकाउण्ट घाटा समाप्त नहीं होता।
भारत को इस करेण्ट अकाउण्ट घाटे को आंशिक तौर पर झेल पाने में जो दूसरा अन्य कारक मदद करता है, वह है विदेशी पूँजी का भारत में निवेश। इसे कैपिटल अकाउण्ट कहते हैं। विदेशी पूँजी का यह प्रवाह दो प्रकार का होता है: पहला, जिसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (फ़ॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेण्ट – एफ़.डी.आई.) कहा जाता है, और दूसरा, जिसे विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश (फ़ॉरेन पोर्टफ़ोलियो इन्वेस्टमेण्ट – एफ़.पी.आई.) कहा जाता है। एफ.डी.आई. वह विदेशी निवेश है जो वास्तव में किसी उत्पादक उद्यम में, मसलन, कारखाना उत्पादन या किसी सेवा के उत्पादन में निवेशित होता है। दूसरी ओर, एफ़.पी.आई. उड़नछू पूँजी है जो तुरत-फुरत मुनाफ़ा पीटने के लिए सट्टेबाज़ी, शेयर बाज़ाद आदि में लगती है और संकट की पहली आहट पर विनिवेशित हो जाती है, यानी उड़नछू हो जाती है।
अगर किसी देश की अर्थव्यवस्था से विशेष तौर पर प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश पलायन कर रहा है, तो यह स्पष्ट तौर पर उक्त देश में मुनाफ़े की गिरती औसत दर के संकट को प्रदर्शित करता है। उड़नछू पूँजी, यानी सट्टेबाज़ पूँजी के पोर्टफ़ोलियो निवेश के आने या जाने की दर अपने आप में, मुनाफ़े की औसत दर के संकट के बारे में कुछ नहीं बताती। असल चीज़ है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जो उत्पादक उद्यमों में लगता है, यानी मैन्युफ़ैक्चरिंग इकाइयों, कारखानों, सेवाओं के उत्पादन आदि में।
अगर विदेशी निवेश (दोनों प्रकार का) घट रहा है और कुल पूँजी प्रवाह नकारात्मक में है (यानी जितनी पूँजी आ रही है, उससे ज़्यादा पूँजी जा रही है) तो यह दिखलाता है कि रुपये में आकलित एसेट्स में पूँजी निवेश घट रहा है, जबकि अन्य, विशेषकर डॉलर वाले एसेट्स, में निवेश बढ़ रहा है। दूसरे शब्दों में, जो पूँजी निवेश के लिए भारत आती है और विशेष तौर पर वह जो कि उत्पादक उपक्रमों में लगती है वह भारतीय रुपये के लिए मौजूद माँग को बढ़ाती है। जबकि जो पूँजी भारत में निवेशित उपक्रमों से पलायन करती है, वह रुपये के लिए मौजूद माँग को घटाती है। इसलिए अगर कुल पूँजी प्रवाह या उसका आवागमन नकारात्मक में है, तो यह भारतीय रुपये के लिए माँग को घटायेगा। नतीजतन, रुपये का मूल्य अन्य विदेशी मुद्राओं, विशेषकर डॉलर के सापेक्ष गिरेगा। यहाँ तक कि घरेलू निवेशक भी अगर भारत में निवेश करने के बजाय किसी अन्य देश में निवेश ज़्यादा करते हैं, तो यह रुपये के सापेक्षिक माँग और इसलिए अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में अन्य विदेशी मुद्राओं की तुलना में उसके सापेक्षिक मूल्य में गिरावट लायेगा। यह परिघटना भी इस समय बड़े पैमाने पर सामने आ रही है।
यानी, जब भी करेण्ट एकाउण्ट घाटा बढ़ेगा और साथ ही पूँजी का शुद्ध प्रवाह नकारात्मक होगा, तब अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में रुपये के मूल्य पर गिरने का दबाव पैदा होगा। हम हालिया वर्षों में हर उस दौर को देख सकते हैं, जबकि रुपया तेज़ी से गिरा है और यह बात शब्दश: सही साबित होती है। ये ठीक वे ही दौर हैं जब व्यापार घाटा बढ़ा है और पूँजी का पलायन बढ़ा है। मिसाल के तौर पर, अप्रैल-सितम्बर 2013 जब रुपया 54.4 रुपया प्रति डॉलर से गिरकर 63.8 रुपया हो गया; जनवरी-अक्टूबर 2018 जब रुपया 63.6 से गिरकर 73.6 प्रति डॉलर हो गया; जनवरी-अक्टूबर 2022 जब रुपया 74.4 से गिरकर 82.3 प्रति डॉलर हो गया; सितम्बर 2024 से फ़रवरी 2025 जब रुपया 83.3 से 87.1 प्रति डॉलर पहुँच गया; और अब का दौर यानी मई 2025 से मई 2026 जब यह 85.2 से क़रीब 96 प्रति डॉलर तक पहुँच गया। ये सारी अवधियाँ वे अवधियाँ हैं जब व्यापार घाटा बढ़ा है और भारत में देश के भीतर और बाहर दोनों से ही पूँजी निवेश सापेक्ष तौर पर कम हुआ है। यानी जितनी पूँजी अर्थव्यवस्था में आयी है, उससे ज़्यादा बाहर गयी है। पूँजी हमेशा मुनाफ़ा ढूँढती है। अगर किसी अर्थव्यवस्था से पूँजी का बाहर की ओर प्रवाह अन्दर की ओर होने वाले प्रवाह से ज़्यादा है, तो यह लाभप्रदता के संकट की एक अभिव्यक्ति होती है।
भारत को व्यापार-घाटे के बरक्स भुगतान करने के लिए विदेशी मुद्रा चाहिए होती है। यह विदेशी मुद्रा उसे एफ़.डी.आई. और मुख्य रूप से एफ़.पी.आई. से मिलती है। एफ़.पी.आई. जो कि सट्टेबाज़ उड़नछू पूँजी है, वह अपनी प्रकृति से ही अटकलों पर चलती है। मसलन, अगर भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि के प्रोजेक्शन ऊँचे होंगे, तो वह भारतीय बाज़ार में निवेशित होती है अन्यथा वह भारतीय बाज़ारों से उड़नछू हो जाती है। अब जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि के भावी आकलन नीचे आ रहे हैं, तो यह उड़नछू पूँजी अपनी असल प्रकृति दिखाते हुए उड़नछू हो रही है! भारत में सकल अचल पूँजी निर्माण की दर कोविड-19 के पहले के स्तर पर भी नहीं पहुँच पायी है और लगातार असन्तोषजनक स्तर पर बनी हुई है। यह दिखलाता है कि उत्पादन के साधनों (मशीनों, उपकरणों, आदि) की ख़रीद की दर कम है। यानी, निजी पूँजी निवेश की दरें लगातार निचले स्तर पर बनी हुई हैं। इसके कारण, पूँजीवादी निवेशकों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में भरोसे में कमी आयी है। नतीजा यह है कि 1 अप्रैल 2025 से ही यानी क़रीब एक वर्ष में 26 अरब डॉलर का एफ़.पी.आई. भारतीय अर्थव्यवस्था से उड़नछू हो गया। वहीं 2024-25 में एफ़.डी.आई. का शुद्ध प्रवाह -0.5 अरब डॉलर था। अगस्त 2025 से जनवरी 2026 के दौरान यह प्रवाह लगातार नकारात्मक बना रहा है। ऐसा होने की प्रमुख वजह ही भारतीय अर्थव्यवस्था में मुनाफ़े की औसत दर का गिरना है क्योंकि निवेश की दर तभी गिरती है जब लाभप्रदता कम होती है।
अब देख लेते हैं कि मौजूदा भारतीय अर्थव्यवस्था में करेण्ट अकाण्ट (यानी व्यापार-सन्तुलन) की क्या स्थिति है। करेण्ट अकाउण्ट घाटा 2024-25 में 23.1 अरब डॉलर का था। यह और ज़्यादा होता, अगर सेवाओं, विशेषकर सॉफ़्टवेयर व तथाकथित “अदृश्य मालों” का निर्यात भारत से बढ़ा न होता। वजह यह कि अगर ठोस वस्तुओं के व्यापार में घाटे को देखें तो यह 2023-24 के 244.9 अरब डॉलर से बढ़कर 286.9 अरब डॉलर तक पहुँच गया था। कैपिटल अकाण्ट की बात करें तो वह 2023-24 में भी सकारात्मक था और 2024-25 में भी सकारात्मक रहा, लेकिन यह पहले से कम हो गया। 2023-24 में पूँजी खाता +89.4 अरब डॉलर था, जो 2024-25 में घटकर +16.6 अरब डॉलर रह गया। वजह? विदेशी निवेश इसी दौर में 54.2 अरब डॉलर से घटकर 4.52 अरब डॉलर रह गया। दूसरी ओर, विदेशी कर्ज़ 6.5 अरब डॉलर से बढ़कर 29.3 अरब डॉलर पहुँच गया, जिसने कुछ शुद्ध प्रवाह में कमी को कम दिखला दिया। वहीं भारत में आम तौर पर सकल अचल पूँजी निर्माण की दर भी निम्न बनी हुई है, जिसका हमने ऊपर ज़िक्र किया और साथ ही ख़रीदार प्रबन्धक सूचकांक (परचेज़िंग मैनेजर्स इण्डेक्स – पी.एम.आई.) जो पूँजीपतियों के बीच की आपसी ख़रीद, यानी उत्पादन के साधनों की ख़रीद का सूचकांक है, वह भी ठहरावग्रस्त है, हालाँकि वह कई अन्य पूँजीवादी देशों से बेहतर है। इसकी वजह भी यह है कि भारत में मज़दूर वर्ग की वास्तविक मज़दूरी को बेहद नीचे गिराकर मुनाफ़े की औसत दर को उस भारी गिरावट से एक हद तक रोका गया है, जिसका सामना अन्य कई पूँजीवादी देशों को करना पड़ा है। दूसरे शब्दों में, भारतीय अर्थव्यवस्था में मुनाफ़े की औसत दर में गिरावट की गति को कम करने वाला एक कारक मज़दूरों की औसत आय को लगातार गिराना है। लेकिन अब यह प्रक्रिया भी अपनी अन्तिम सीमा तक पहुँच रही है, जैसा कि भारत के दर्ज़नों शहरों में मज़दूर वर्ग द्वारा बेहतर मज़दूरी और बेहतर कार्य-स्थितियों के लिए फूट पड़े स्वत:स्फूर्त संघर्षों ने दिखलाया है।
पूँजी का बाहर की ओर प्रवाह और व्यापार–घाटा किस आधारभूत कारक की ओर इशारा करते हैं?
पूँजी का बाहर की ओर प्रवाह और व्यापार-घाटा और उसके नतीजे के तौर पर किसी देश की मुद्रा का लगातार गिरना वास्तव में मुनाफ़े की औसत दर के गिरने के संकट को दिखलाता है। क्यों? भारत के निवेशक और साथ ही विदेशी निवेशकों द्वारा भारत से पूँजी का विनिवेश यह दिखलाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मुनाफ़े की औसत दर गिर रही है या ठहरावग्रस्त है। पूँजी निवेश को विनियमित करने वाला कारक होता है लाभप्रदता। यानी पूँजीपति द्वारा लगाये गये हरेक रुपये पर उसे कितना मुनाफ़ा हासिल हो रहा है। यह लाभप्रदता जिस जगह सबसे ज़्यादा होगी, पूँजीपति उस जगह अपनी पूँजी निवेश करेगा। अगर लाभप्रद निवेश के ऐसे अवसर ही बेहद कम हों, तो पूँजीपति अपनी पूँजी का सट्टेबाज़ निवेश करते हैं। यानी उन्हें उत्पादक उद्यमों में लगाने के बजाय वे उसे शेयर बाज़ार में, स्टॉक और बॉण्ड्स की ख़रीद में निवेशित करते हैं, जो काल्पनिक पूँजी का एक बुलबुला खड़ा करता है। यदि किसी देश में वित्तीय पूँजी का बुलबुला निर्मित हो रहा है, तो अधिक सम्भावना यही है कि उत्पादक उद्यमों में निवेश के लाभप्रद अवसर नहीं हैं, जिसकी वजह से पूँजीपति अपनी पूँजी को जुए और सट्टेबाज़ी में लगाते हैं।
व्यापार-घाटा तो बहुत-सी स्थितियों में हो सकता है। लेकिन पूँजी का देश से बाहर प्रवाह हो रहा हो, देशी पूँजीपति भी सापेक्षत: अपनी पूँजी का पहले से बड़ा हिस्सा देश के बाहर निवेशित कर रहे हों, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था लाभप्रदता के संकट का शिकार है। रुपये की गिरावट में व्यापार-घाटा और पूँजी का बहिर्गमन, दोनों ही अहम भूमिका निभा रहे हैं और इन दोनों कारकों में से विशेष तौर पर पूँजी का बहिर्गमन लाभप्रदता के संकट को परिलक्षित करता है। चूँकि दुनिया भर में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था लाभप्रदता के संकट का शिकार है, इसलिए अधिकांश भारतीय पूँजीवादी निवेशक जो अपनी पूँजी को भारत से बाहर ले जा रहे हैं, वे भी वित्तीय उपकरणों जैसे इक्विटी व बॉण्ड्स आदि में ज़्यादा निवेश कर रहे हैं। पिछले वर्ष के मुक़ाबले भारतीय निवेशकों ने विदेशी बाज़ारों में निवेश में 60 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ोत्तरी करते हुए, 2.2 अरब डॉलर से ज़्यादा निवेश किया है।
पश्चिम एशिया में ईरान पर अमेरिका और ज़ायनवादी सेटलर औपनिवेशिक राज्य इज़रायल द्वारा थोपे गये साम्राज्यवादी हमले के कारण निश्चित तौर पर स्थितियाँ भारत के लिए बद से बदतर हुई हैं। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट का मूलभूत कारण पश्चिम एशिया में युद्ध नहीं है। युद्ध से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था लाभप्रदता के संकट से जूझ रही थी। युद्ध के शुरू होने के बाद, भारत को दो संकटों का सामना करना पड़ा है: पहला, पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति में कमी और उनकी क़ीमतों में बढ़ोत्तरी (हालाँकि मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में पेट्रोलियम उत्पादों पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ जिस क़दर बढ़ाया है, उसके कारण तेल कम्पनियों को आज भी घाटा नहीं बल्कि अरबों रुपये का फ़ायदा हो रहा है) और दूसरा, विशेष तौर पर पश्चिम एशिया के देशों में काम करने वाले भारतीय मज़दूरों का वापस लौटना जिसके कारण उनके द्वारा भेजी जाने वाली भारी विदेशी मुद्रा में कमी आना और साथ ही देश के भीतर रोज़गार के संकट का और ज़्यादा गहराना। 10 लाख से ज़्यादा भारतीय मज़दूर पश्चिम एशिया से भारत वापस लौट चुके हैं। वैसे तो अहम सवाल यह है कि भारतीय मज़दूरों को परदेस जाकर ग़ुलामों जैसी स्थिति में खटना ही क्यों पड़ता है? हमारे देश में उन्हें जीवन-यापन योग्य मज़दूरी के साथ और सम्मान के साथ रोज़गार क्यों नहीं प्राप्त होता है? बहरहाल, अभी हम इस सवाल पर चर्चा नहीं करेंगे।
मोदी सरकार द्वारा बताये जाने वाले रुपये के अवमूल्यन झूठे फ़ायदे और उसके झूठे कारण
मोदी सरकार की वित्त मन्त्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि “रुपया अपना स्तर ख़ुद ढूँढ लेगा, उसके बारे में चिन्तित होने की ज़रूरत नहीं है।” बात तो सही है! जैसे हर चीज़ अपना स्तर ख़ुद ढूँढ रही है, मसलन, भाजपा के नेता-मन्त्री, रोज़गार का स्तर, भुखमरी, कुपोषण आदि का स्तर। लेकिन अगर हर चीज़ को अपना स्तर ख़ुद ही ढूँढ लेना है, तो मोदी सरकार की ज़रूरत क्या है? मोदी ने प्रधानमन्त्री बनने से पहले कहा था कि रुपये की गिरावट पूरे देश की अर्थव्यवस्था और उसकी प्रतिष्ठा की गिरावट है। लेकिन अब रुपया गिरते-गिरते अपना स्तर ख़ुद ढूँढ रहा है!
मोदी सरकार यह भी कह रही है कि रुपये के गिरने का निर्यातक पूँजीपतियों को काफ़ी लाभ होगा। क्योंकि निर्यातक पूँजीपति अगर किसी कमीज़ को अमेरिका में 10 डॉलर में बेचते हैं, तो एक साल पहले भारतीय रुपये में उनकी आमदनी थी रु. 850 और आज उनकी आमदनी होगी रु. 960। इसमें सत्यांश है। लेकिन एक समस्या है। अगर निर्यातक पूँजीपतियों के उत्पादन में लगने वाले उत्पादन के साधनों का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है, तो यह फ़ायदा नहीं मिलेगा, उल्टे नुक़सान होगा। क्यों? क्योंकि तब निर्यातकों के उत्पादन की लागत पहले के मुक़ाबले बढ़ जायेगी और विश्व बाज़ार में वे प्रतिस्पर्द्धी नहीं रह जायेंगे। भारत के निर्यातक पूँजीपतियों के उत्पादन में ऐसे उत्पादन के साधन बड़ी मात्रा में लगते हैं जिनका आयात होता है, विशेषकर, खनिज, कच्चे माल और कुछ मशीनें। ऐसे में, अगर कोई मशीन 100 डॉलर की है, तो वह एक वर्ष पहले निर्यातक पूँजीपति को रु. 8500 में मिलती थी और अब वह रु. 9600 में मिलती है। इसलिए मुद्रा के अवमूल्यन से हर हालत में निर्यातक पूँजीपतियों को लाभ ही होगा, इसकी कोई गारण्टी नहीं होती है। भारत में फ़िलहाल तो ऐसा नहीं हो रहा है।
साथ ही, यह भी याद रखना होगा कि भारत के आयातों में जिन मालों का सबसे ज़्यादा आयात होता है, उनमें से एक है तेल। तेल की क़ीमतें रुपये के गिरने के साथ भारत में और ज़्यादा बढ़ेंगी। कच्चे तेल की क़ीमत अगर विश्व बाज़ार में 100 डॉलर प्रति बैरल है, तो वह एक वर्ष पहले भारत को रु. 8500 में प्राप्त हो रहा था और अब वह रु. 9500 में प्राप्त होगा। यह हर वस्तु और सेवा की क़ीमत को बढ़ायेगा और बढ़ा रहा है और आम तौर पर महँगाई को बढ़ा रहा है।
एक और झूठ जो मोदी सरकार के मन्त्री लगातार बोल रहे हैं वह यह है कि रुपया नहीं कमज़ोर हो रहा है, बल्कि डॉलर मज़बूत हो रहा है। सच्चाई यह है कि डॉलर ख़ुद कमज़ोर हो रहा है! यानी रुपया एक गिरते हुए डॉलर के सामने और ज़्यादा गिर रहा है। डॉलर मज़बूत हो रहा है या कमज़ोर इस बात की पड़ताल करने के लिए एक डॉलर इण्डेक्स होता है, जो छह प्रमुख मुद्राओं के साथ डॉलर की विनिमय दरों का भारित औसत (weighted average) बताता है। यह भारित औसत डॉलर के लिए ट्रम्प के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से लगातार गिर रहा है। ट्रम्प के दूसरे बार राष्ट्रपति बनने के दिन यह भारित औसत यानी डॉलर इण्डेक्स था 108.2 रुपये जो मई में गिर कर 98.5 रुपये पर पहुँच चुका था। अमेरिकी डॉलर की गिरावट के कई कारण है, जिसके पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था का संकट ही है। अगर आर्टिफिशियल इण्टेलिजेंस के क्षेत्र को छोड़ दें, तो अन्य सेक्टरों में अमेरिकी अर्थव्यवस्था बेहद पीछे छूट गयी है। मई 2025 में यूएस ट्रेज़री डाउनग्रेड हुई, जिसका सीधा असर डॉलर पर पड़ा और वह और कमज़ोर हुआ। ट्रम्प द्वारा छेड़े गये व्यापार-युद्ध और मुद्रा-युद्ध का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। अमेरिकी नेतृत्व में पूँजीवादी विश्व का भरोसा कमज़ोर होता गया है और इज़रायल के नरसंहार के लिए उसका जारी समर्थन भी इसमें एक हद तक ज़िम्मेदार है। तमाम दावों के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग का कोई विचारणीय पुनर्जागरण नहीं हो पा रहा है। अमेरिका लम्बे समय से व्यापार घाटा भी झेल रहा है। पहले डॉलर और अमेरिकी सरकार बॉण्ड्स को लोग भरोसेमन्द और सुरक्षित निवेश के स्थान के तौर पर देखते थे। लेकिन वह स्थिति काफ़ी बदली है। दुनिया में अभी भी अधिकांश अन्तरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में होता है और इसीलिए अधिकांश देश अपने विदेशी मुद्रा भण्डार का अच्छा-ख़ासा हिस्सा डॉलर में रखते हैं। लेकिन इस मामले में भी काफ़ी बदलाव आया है। 2015 में विश्व के समस्त विदेशी मुद्रा भण्डार का 65.7 प्रतिशत डॉलर में था। लेकिन 2025 में विश्व के समस्त विदेशी मुद्रा भण्डार का केवल 55.7 प्रतिशत ही डॉलर में रह गया है। अब महज़ डॉलर छापकर अर्थव्यवस्था को चलाना अमेरिका के लिए पहले के मुक़ाबले मुश्क़िल होता जा रहा है। यह सच है कि अभी स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन आने में कई वर्ष लगेंगे, लेकिन इतना तय है कि परिवर्तन की दिशा यही है : अमेरिकी वर्चस्व का निर्णायक ह्रास। वर्तमान दौर में अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा बदहवासी में उठाये जा रहे तमाम क़दमों के पीछे वर्चस्व को खोने की प्रक्रिया से गुज़र रही एक साम्राज्यवादी शक्ति की घबराहट और बौख़लाहट ही है। ईरान पर थोपे गये साम्राज्यवादी युद्ध में वास्तव में अमेरिका-इज़रायल धुरी को बुरी तरह से मात खानी पड़ी है। दूसरी ओर, इसका सबसे ज़्यादा लाभ रूस-चीन धुरी को मिलने वाला है। आने वाले समय में दुनिया अन्य कई क्षेत्रीय अन्तरराष्ट्रीय युद्धों व सैन्य टकरावों की साक्षी बनेगी क्योंकि अभी तक दुनिया के इतिहास में कभी भी एक साम्राज्यवादी वर्चस्वकारी ताक़त ने पूर्ण रूप से शान्तिपूर्ण तरीक़े से अपना वर्चस्व किसी नयी उभरती ताक़त को नहीं सौंपा है। यह प्रक्रिया ठीक-ठीक कैसे घटित होगी, इसके बारे में कुछ नहीं बताया जा सकता है। लेकिन यह उथल-पुथल निश्चित तौर पर होगी।
बहरहाल, तो तथ्य यह है कि मोदी सरकार और उसके मन्त्रियों द्वारा रुपये के बेतरह गिरने के फ़ायदे बताने या फिर उसके नक़ली कारण बताने के प्रयास वास्तव में कुछ बुनियादी बातों को छिपाने के लिए हैं : एक, भारतीय अर्थव्यवस्था ढाँचागत तौर पर लाभप्रदता के संकट से गुज़र रही है; दो, इस संकट को और भी ज़्यादा विकराल बनाने में मोदी सरकार द्वारा किया गया अर्थव्यवस्था का कुप्रबन्धन और उसकी विवेकहीन विदेश नीति ज़िम्मेदार है; तीन, वास्तव में मन्दी झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले ही मोदी सरकार ने जो दो भूकम्प-समान झटके दिये थे, यानी नोटबन्दी और फिर योजनाविहीनता और तानाशाहाना तरीक़े से लागू किया गया कोविड लॉकडाउन, उससे भारतीय अर्थव्यवस्था कभी ढंग से उबर ही नहीं पायी थी; चार, देश के बड़े पूँजीपति वर्ग की चाव से सेवा करने के चक्कर में मोदी सरकार ने पूँजीवादी मानदण्डों से भी संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था का आश्चर्यजनक कुप्रबन्धन किया है। अब इन चीज़ों का नतीजा देश की जनता भुगत रही है। अगर आर्थिक कारकों की गति का अध्ययन किया जाये तो स्पष्ट है कि इस बात की पर्याप्त सम्भावना है कि अभी हम संकट का कम बुरा दौर ही देख रहे हैं। संकट का सबसे बुरा दौर अभी आना है। इसकी भी पूरी गुंजाइश है कि देश के सबसे धनी पूँजीपतियों पर संकट को कोई बोझ न पड़े इसे सुनिश्चित करने के लिए मोदी सरकार जनता से फिर से पेट पर पट्टी बाँधने के लिए कहेगी, कुछ दिन माँगेगी, उससे भी बात नहीं बनेगी तो साम्प्रदायिक तनाव को नये सिरे से भड़कायेगी और जनसंख्या पर आयोग बनाकर दरअसल मोदी सरकार यही करने वाली है। मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने का झूठा हौव्वा खड़ा किया जायेगा, नये सिरे से “हिन्दू ख़तरे में है” के दावे किये जायेंगे।
देश की जनता को सावधान रहने की ज़रूरत है। हमारा ध्यान भटकाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच और प्रहसन रचे जायेंगे क्योंकि हमारे जीवन के हालात, हमारे रोज़गार की स्थिति, महँगाई की हालत, सभी पहले से ज़्यादा बदतर होने वाली हैं। रुपये का इस क़दर गिरना कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह समूची भारतीय अर्थव्यवस्था की गिरती हालत का लक्षण है। इसका बोझ भाजपा सरकार और देश का पूँजीपति वर्ग पहले से ही भयंकर बेरोज़गारी और महँगाई से बरबाद होती मेहनतकश जनता पर डालेंगे। जनता को ऐसी हर कोशिश को नाकाम करने के लिए तैयार रहना होगा, महँगाई और बेरोज़गारी के विरुद्ध, नौकरी के अधिकार के लिए और शिक्षा-चिकित्सा-रिहायश के अधिकार के लिए जुझारू संघर्ष छेड़ना होगा, और धर्म और साम्प्रदायिकता के झगड़ों में देश को झोंक दिये जाने की हर साज़िश को बेअसर करना होगा।
मज़दूर बिगुल, जून 2026













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